मंगलवार, 22 जून 2010

उसकी खुश्बू में बसे खत मैं जलाता कैसे...? नो आनर किलिंग !

उन दिनों का ख्याल कुछ शहद सा कुछ नीम सा ...मैने सोचा भी कहां था...प्रेम...उसे होना था सो हो गया एक दम अनियोजित ! क्या पता शायद प्रेम ऐसे ही हुआ करता हो...सहज ही बिना विचारे , बिना यत्न , अपने आप ! मेरी मां....मेरे परिजन... और बहुतेरे मित्रों से भी कहां...किसी योजना के अधीन प्रेम किया मैने...उसे होना था...सो हुआ...शायद इसीलिये मैने 'फिरोज़ा' से हो चुके प्रेम की पृष्ठभूमि में किसी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं देखी...मुझे लगा कि प्रेम के लिये अपने आप हो जाना ही नियत है !  यूं तो इस फन में महारत रखने का दावा करने वाले दोस्तों ने प्रेम हासिल करने के ढेरों नुस्खे ईजाद कर रखे थे और वे दोस्त समझ कर छोटी मोटी टिप्स देने के लिये बर-हमेश तैय्यार रहते ...पर प्रेम मुझ पर यूं ही मेहरबान हुआ तो दोस्तों की कंटियां / जाले मेरे किस काम आते !  खैर हैरानी तो उन्हें भी थी कि लड़की  को मुझ जैसे नातजुर्बेकार में दिखा क्या ? कमाल ये कि बिना दस्तावेजी अपील...बिना भाग दौड ये परियोजना मंजूर हुई भी तो कैसे ? ...दोस्त थे बुरा भी लगा होगा तो दिल में दबाकर , आशीष के हाथ आगे बढा दिये ...कभी कोई जरुरत पडे तो ...वैसे इस मामले में जरुरत पड़ती  भी किसे है !

उसके पिता मेरे कस्बे में ट्रांसफर पर आये थे किराये के मकान की तलाश मेरे पड़ोस  पर खत्म हुई और फिर पता नहीं चला कि सिलसिला कैसे शुरु हुआ ...वो मुझे अच्छी लगती , जो मैं कभी कह भी नही पाया... पहल शायद उसने ही की और आहिस्ता आहिस्ता मुझ पर काबू पाती गई !  जब जैसा उसका जी चाहता मैं वैसा ही करता ! एक अजीब सा बडप्पन हुआ करता उसके व्यवहार में एक बच्चे सा दुलार करती मुझसे ...कभी सलाह मशविरा की नौबत आती भी तो मैं उसका एहतराम करता ! वो कहती शादी के बाद मायके जाउंगी तो क्या करोगे मैं कहता बडी मुश्किल होगी ...वो ठठाकर हंसती , कहती तुम्हें भी मायके ले जाया करुंगी , मैं सहमति में सिर हिलाता !  प्रेम हुआ तो कुछ अड़चने  भी नज़र आनें लगीं कुल / मज़हब वगैरह वगैरह ...आगे क्या होगा ?  अक्सर हमारा चिंतन इसी मुद्दे पर हुआ करता पर उसका आत्म विश्वास सारी शंकाओं पर भारी पडता !  वक्त गुजरता रहा ...आमने सामने की मुलाकात के बावजूद हमें खत किताबत की जरुरत भी पडने लगी , खतों को सम्भाल कर रखना जरुरी था अगर किसी के हाथ लग गये तो रुसवाई का ख्याल भय पैदा करता !  छुट्टियों में वो अपने 'देस' जाती तो मेरे प्राण लेकर ...फोन का जुगाड था नही ...छटपटा कर रह जाते ...मुझे समझ में नही आता कि उसका चेहरा भीगा हुआ क्यों दिखाई देता है जुदाई के वक्त यही शिकायत उसकी भी थी ! उसके खत बेसहारे का सहारा होते बार् बार हज़ार बार पढते...जी ना भरता !

और फिर एक दिन उसका आत्म विश्वास डूब गया उसने कहा हमारी बिरादारी अलग है मैने कहा हां पहले से ...हमें अपने परिजनों का कहना मानना होगा !  मैं खामोश रहा उसने पूछा मेरे बिना रह सकोगे ?  मैं खामोश रहा ...मुझे उसकी बात माननें की आदत पडी हुई थी ! मै रोना चाहता था पर उसने कहा भी नही कि रो लेने से दर्द का अहसास कम हो जायेगा सो मै उसकी इजाजत के बिना रो भी नही सका ...उसने कहा मेरे खत लौटा दोगे ...मैने कहा हाँ  वे तुम्हारे है ले लो ...उसने उन्हें वहीं खाक कर दिया ...मैने पूछा ...डरती थीं ...उसने कहा नहीं ...मैने कहा विश्वास नही था ?  उसने कहा खुद से ज्यादा फिर भी... ! ...उसका चेहरा धुंधला हो चला था और मैं खुद भी आखिरी बार उसे ढंग से देख भी नहीं पाया !
 
 

9 टिप्‍पणियां:

  1. "प्रेम के लिये अपने आप हो जाना ही नियत है"
    सही लगा था अली साहब आप को। प्लानिंग से जो होता है वो प्रेम तो नहीं ही होता, कुछ और ही होता है।

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  2. मैंने तो बस यही कहा था! पता नहीं कैसे जबकि मैं शायर कतई नहीं कविता नुमा सा कुछ कर लेता हूँ यदाकदा!! खैर शेर क्या था तवज्जो चाहूंगा :
    मैं मोहब्बत का कभी क़ायल न था
    तुमको देखा तो इश्क़ याद आया !

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  3. प्रेम सहज है असहजता प्रेम का न होना है ..प्रेम की अनुभूति मनुष्यत्व की परिचयाक है ...कितने भाग्यशाली हैं वे जिन्हें यह अनुभूति होती है जीवन ही मानो पूर्ण और सार्थक हो गया .....
    कुदरत किसी किसी को यह उपहार दे जाती है ....नहीं नहीं समय के दस्तावेज के उन सुनहले हर्फों को आग के हवाले मत करें -वे खुद के साथ ही सुपुर्दे ख़ाक हों ऐसी कोई तजवीज करें ....किसी की बहुत बड़ी मजबूरी रही होगी जिसने ऐसा किया होगा ./.श्याद अपने प्रेम की सलामती के लिए ही .....
    क्या अली सा आपने भी आज कैसी दुखती पोरों के दर्द को जैसे और उभार दिया हो अपनी इस कमीनी इश्किया पोस्ट से ....

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  4. यकीन जानिए, इसे पढ़कर मेरे दर्द का ज्वालामुखी पूरे शबाब के साथ फूट पड़ा है। अपनी भी कहानी ऐसी ही थी, जब एम0ए0 कर रहा था, तब। और यकीन जानिए, अंत भी ऐसा ही हुआ। हालाँकि हमारे बीच धर्म की दीवार भी थी, पर वह शहीद हुई अपने पिता की इज्जत के नाम पर।

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  5. अली भाई, हमारे जैसे नातुजुर्बेकार इन्सान के पास तो कहने को कुछ भी नहीं...

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  6. साथियो, आभार !!
    आप अब लोक के स्वर हमज़बान[http://hamzabaan.feedcluster.com/] के /की सदस्य हो चुके/चुकी हैं.आप अपने ब्लॉग में इसका लिंक जोड़ कर सहयोग करें और ताज़े पोस्ट की झलक भी पायें.आप एम्बेड इन माय साईट आप्शन में जाकर ऐसा कर सकते/सकती हैं.हमें ख़ुशी होगी.

    स्नेहिल
    आपका
    शहरोज़

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  7. एक गीत की पंक्तियाँ याद हैं ...शायद शिव अम्बर ओम का लिखा गीत है....
    कर दिए लो आज गंगा में विसर्जित
    सब तुम्हारे पत्र सारे चित्र तुम निश्चिंत रहना...
    ...आपकी कहानी के अंत में मुझे इसी विश्वास की कमी दिखती है जो प्रेम को प्रेम कहने से रोक रही है...!

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  8. मनोज तिवारी का एक भोजपुरी गीत याद आ गया अंतिम निसानी रहे एगो चिट्ठी,
    उहो जलाय दीन्हें
    दुनिया की बदनामी से
    उम्र भर जा तोहके बचाय लीन्हे....
    तुहलो न निभाय रसम प्यार की हो
    तो हम ही निभाय ली हो'

    यहाँ खत 'उसने' जला दिए.किसे क्या दोष दें... जो हुआ अच्छा हुआ.मीठी याद बनकर साथ है.मिल जाते तो एक दुसरे मे जाने कितनी कमियां दिखने लग जाती.हा हा हा
    दुखद अंत वाली प्रेम कहानियां इसीलिए इतनी फेमस हुई है क्योंकि........... वे मिल नही पाए थे.साथ मर जाना उनके लिए सरल था.अब????????मुश्किल है साथ मरना भी और साथ जीना भी.
    रचना के साथ बहा ले जाने का हुनर खूब जानते हैं आप.

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