रविवार, 15 नवंबर 2009

सुने हुए लोग ..देखे हुए लोग ...भुगते हुए लोग !

लगभग भागते हुए ट्रेन पकड़ी , बर्थ पर सामान पटक कर कुली, रेंगती हुई ट्रेन से प्लेटफार्म की तरफ़ वापस लपका और मैं उसका मेहनताना लिए हुए ट्रेन के गेट तक , पैसों को मुट्ठी में दबाकर वो नीचे कूदा और ट्रेन के साथ साथ दौड़ते हुए ख़ुद को गिरने से बचाने की कोशिश करने लगा ! इधर मेरी ख़ुद की सांसे धौंकनी की तरह चल रही थीं ! उधर कुली की प्लेटफार्म पर सुरक्षित लैंडिंग के बाद मैं वापस बर्थ पर लगभग ढह गया !
सहयात्री ने पूछा कहां जा रहे हैं मैंने कहा भोपाल और आप ? उन्होंने कहा वहीं ! बातों बातों में पता चला कि सहयात्री अपने ही विभाग के बड़े अधिकारी हैं हालाँकि उनसे इससे पहले मिलने का मौका कभी मिला नहीं था ! इस दौरान उन्होंने मेरा परिचय पूछा नहीं सो मैंने बताया भी नहीं लेकिन विभागीय बातों का सिलसिला चल निकला ! दूसरे अधिकारियों की चर्चा करते करते वे अचानक मेरा नाम ले बैठे , मुझे उत्सुक्तता हुई देखूं क्या कहते हैं मेरे बारे में ?
मैं सामने मौजूद ! लेकिन वे मुझे पहचानते नहीं थे और अब मेरा नाम लेकर प्रतिक्रिया देने ही वाले थे ! मैं दम साध कर बैठ गया , वे कहने लगे 'वो' (यानि कि मैं ) बहुत घमंडी है जब देखो नियम लेकर बैठ जाता है अरे भाई 'सब के काम' करना पड़ते हैं सबको 'साथ' लेकर चलना पड़ता है अगर हम किसी को 'ओबलाइज' नहीं करेंगे तो अपना 'भला' कैसे होगा ?
'वो' .....ऐसा , 'वो'...... वैसा , वो ********* !
मैंने पूछा 'उससे' ( यानि कि मुझसे ) कभी मिले हैं आप ? कभी देखा है ? कोई बातचीत ? उन्होंने जबाब दिया कभी नहीं !.....लेकिन आपकी बातों से लगता है कि आप 'उसे' बहुत अच्छे से जानते है ! उन्होंने कहा 'अमुक ' नें बताया था ! मैंने फ़िर से कहा 'अमुक' तो पिछले हफ्ते ही 'अन्दर' गया ! ऐसे आदमी से 'सुनकर' आपने कोई धारणा कैसे बना ली ?
अधिकारी नें कुछ नहीं समझने के अंदाज में कंधे झटके और खामोश हो गए पर मैं सोच में हूँ .......क्या उन्हें अपना परिचय दे दूँ ? .....अब मैं भी खामोश हूँ ...और चिन्तन कर रहा हूँ कि क्या कभी मैंने भी 'किसी' इंसान के बारे में केवल सुने सुनाये आधारों पर कोई धारणा बनाई थी ? अगर मेरे चिंतन का परिणाम हाँ में आया तो ......? ......... तो ?........तो ? मैं ख़ुद इस दुनिया का सबसे बड़ा 'अहमक' होऊंगा ! फ़िर सहयात्री से शिकायत कैसी ?

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुने सुनाए पर अवधारणा बनानी नहीं चाहिए परन्तु ऐसा हो तो जाता ही है। आपने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है।
    घुघूती बासूती

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  2. सच में, हमारी धारणाएं अधिकांशत: बिना सोचे-समझे सिर्फ देख,सुन कर ही निर्मित होती है....

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  3. आदमी की फितरत पर आपने बहुत सधी हुई चोट की है।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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