शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

ब्रह्म मुहूर्त के सपने हमेशा सच .......

इन दिनों राजनैतिक दलों में अवसरवादिता , सिद्धान्तहीनता और परस्पर कीचड़ उछालू गुणधर्म चरम पर हैं ! शायद ही कोई नेता ऐसा होगा जो नाभि के नीचे प्रहार का कोई भी अवसर छोड़ रहा होगा ! सबको ईश्वर नें लम्बी लम्बी जुबानें बख्श दीं हैं ! अब जो मर्ज़ी आये बोल दो ! अपना मतलब साधो बस ! कौन सा संविधान ! काहे का देश ! कैसा लोकतंत्र ! कैसे जनगण !
दशकों पहले किसी गण्यमान्य कार्टूनिस्ट का शानदार कार्टून देखा था , जो लकीर दर लकीर स्मरण है ! चित्र में मंचासीन गाँधी परिवार और मंच के नीचे, जमीन पर पड़ा गोल चश्मा , लाठी और ख़ुद गाँधी जी ! पंक्तियाँ कुछ यूं थीं कि देश की नेता इंदिरा गाँधी ,युवकों के नेता संजय गाँधी , बच्चों के नेता.. ....गाँधी , भाड़ में जायें महात्मा गाँधी !
कार्टूनिस्ट को नमन , उनका मंतव्य आज भी भोथरा नहीं हुआ !
गाँधी परिवार ही क्यों , सारे के सारे नेताओं नें निर्लज्जता के साथ , लोकतान्त्रिक राजनीतिक चिंतन में पारिवारिक विरासत के निर्धारण के व्यवहार को अपरिहार्य बना दिया है ! चुनाव प्रक्रिया में हिस्सेदारी क्या किसी निर्धन व्यक्ति की पहुंच में शेष रह गई है ? सभी दलों के बाहुबली ,निज दल के अन्दर रहने तक दूध के धुले , निर्दोष फंसाए गए मजलूम और दूसरे दल में पहुंचते ही दुर्दांत अपराधी हो जाते है ! सच कहूं तो हमेशा ये लगता है कि जैसे लोकतंत्रीय व्यवस्था पर अपहरणकर्ताओं का कब्ज़ा हो गया हो ! दिल नहीं करता कि इनके बारे में कुछ कहूं , इन्हे वोट दूं !
ब्रह्म मुहूर्त के सपनों के विषय में बचपन से सुनता आया हूँ और राजनीति के सम्बन्ध में मेरे ख्यालात से आप गुणीजन वाकिफ हो ही चले हैं ! तो अजीब सा लगता है कि मुझे ब्रह्म मुहूर्त में राजनीति से जुड़ा स्वप्न दिखाई दिया ! कारण जो भी हो मुझे पता नही ! लेकिन मैंने देखा कि "चुनाव के बाद भाजपा / एन.डी.ए.की सरकार में सरदार मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं और उनके सामने उनकी भावी कैबिनेट के सदस्य , भाजपा और जदयू के बड़े बड़े नेता बैठे हुए हैं ! शपथ ग्रहण के तत्काल बाद की प्रेस कांफ्रेंस में मनमोहन सिंह जी कह रहे हैं कि अगली कांग्रेसी सरकार में श्री अरुण जेटली मेरे उत्तराधिकारी होंगे !"
सम्भव है कि चुनाव प्रक्रिया और दूसरे कामकाजी तनावों की वज़ह से मेरी नींदे उड़ गई हों और मेरे अंतर्मन में कुछ भी उल जलूल विचार कौंध रहे हों और ये स्वप्न भी शायद इसी सब का परिणाम हो ! पर सोचता हूँ कि अरबों रुपयों की बर्बादी और अधूरे जनादेश के कारण शायद बड़े राजनीतिक दल देश हित में ऐसी कोई सरकार बना डालें ?
कौन जाने , ब्रह्म मुहूर्त के सपने हमेशा सच होते हैं कि नहीं ? याकि गणतंत्र की परिस्थितियों नें मेरी मति भ्रष्ट कर दी है ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए निकट भविष्य में आपका ये सपना कभी भी साकार हो सकता है.न मिलने से तो एक ही थाली में मिल बांट के खाना कहीं ज्यादा अच्छा है..))

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  2. डियर अली, कुछ लोग शराब के नशे में किसी दल के पक्ष और किसी के विपक्ष में नारे बुलंद कर रहे थे . अगले दिन नशा उतरने पर वे आपस में बात कर रहे थे , राजनीति ख़राब होती है . देश को बरबाद कर दिया .

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