बुधवार, 15 अप्रैल 2009

वो किसी को पहचानतीं नहीं !

देश में लोकतंत्र का उत्सव सुख का पर्व होता होगा पर बस्तर में इसे अधिकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों के शोकाकुल चेहरों का पर्व कहा जाता है ! कल ज्यादातर पोलिंग पार्टियां मतदान केन्द्रों के लिए रवाना कर दी गईं और शेष आज रवाना कर दी जायेंगी ! कुछ लोग इससे भी पहले रवाना किए जा चुके थे ! ज़ाहिर है कि रवानगी का समय मतदान केन्द्रों की संवेदनशीलता का पैमाना है ! जो कर्मचारी सबसे बाद में भेजे गए उनके चेहरों में सुकून था लेकिन बाकी के तमाम लोग आशंकाओं के बीच विदा हुए ! उनके परिजन चिंतित हैं कि अब क्या होगा ! वो ख़ुद भी चिंतित गए कि सही सलामत लौटेंगे भी या नहीं !
बस्तर और नक्सलवाद पर लोग लिखते बहुत हैं पर किसी नें भी पुलिसवालों के अलावा इन निरीह कर्मचारियों,अधिकारियों और उनके परिवारों की सुचिंता की हो ऐसा लगता नहीं ! सच पूछिए तो पुलिस फोर्स मानसिक ,शारीरिक और असलहे की भरपूर तैयारी के साथ नक्सलियों के विरुद्ध मोर्चा खोलती है! लेकिन इन निहत्थे अधिकारी और कर्मचारियों का क्या ? .... क्या बस्तर में नौकरी और लोकतंत्र के यज्ञ में अत्यावश्यक सेवाओ के अधीन अभिशप्त हो जाने वाले इन अधिकारी , कर्मचारियों नें पूर्व जन्म में कोई पाप किए थे ? ... यूँ तो चुनाव आयोग क्षेत्र बदल कर डयूटी लगाता है परन्तु बस्तर में ये अदलाबदली अर्थहीन है क्योंकि कांकेर, दंतेवाडा ,नारायणपुर ,बीजापुर ,सभी स्थान तो संवेदनशील हैं ! डयूटी करने वाले बच के जायें भी तो कहाँ ? ....काश रायपुर जैसे सुरक्षित ठिकानों में जुगाड़ से चिपके अधिकारी , कर्मचारीगण भी कभी बस्तर में आकर चुनाव करवायें ?
खैर... मैं कह रहा था कि चुनाव आते ही बस्तर में पदस्थ कर्मियों और उनके परिजनों के चेहरों में हवाइयां उड़ने लगती हैं और क्यो न उडें ? आखिर बस्तर लोकतंत्र के यज्ञ में नर बलि के लिए मशहूर भी तो हैं ! तुर्रा ये कि चुनाव डयूटी से इंकार भी नहीं कर सकते ! चुनाव डयूटी यानि एक तरफ मृत्यु /दुर्घटना की आशंका और दूसरी तरफ़ निलंबन और परिजनों के भूखे मरने का भय ! मतदान के कई दिन पूर्व से ही पति पत्नी के संबंधों में अदृश्य भय भी शामिल हो जाया करता हैं ! सच पूछो तो मुझे मतदान के लिए रवाना होती हुई पार्टियां देख कर अच्छा नहीं लगता हैं ! महसूस होता हैं कि जैसे किसी को अन्तिम विदाई तो नहीं दी जा रही है ? पता नहीं बस्तर जैसी जमीनों के राजनीतिक / सामाजिक हालात कब बदलेंगे ? विचारधाराओं के हिंसक टकराव और इंसानी जानों के व्यर्थ हो जाने का सिलसिला कब थमेगा ?
पिछले दिनों मेरे मित्र चुनाव प्रशिक्षण लेके लौटे ! दुखी थे कि निर्वाचन कार्यालय हर मतदान केन्द्र तक वाहन की व्यवस्था नहीं करता हैं कई कई मीलों तक पैदल भी जाना पड़ सकता हैं ! उनकी पत्नी का कहना था कि वे लोग दस कहें तो बीस किलोमीटर पैदल जाने को तैयार हो जाना पर वाहन में मत जाना ! पैदल जायेंगे तो शायद नक्सलाइट्स परिचय पूछ कर जीवित भी छोड़ दें ! पर वाहन ना बाबा ना ! ...लैंड माइन्स ! ...वो किसी को पहचानती नहीं !

2 टिप्‍पणियां:

  1. dukhad baat to ye hai ki yadi inmein se koi naksalvadiyon ka shikaar ban jata hai to bhee sarkaar uske parivaar kee sudh nahin letee, unek liye to pulis walon se jyada mushkil hai....

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