शुक्रवार, 27 मार्च 2009

तालाब...स्कूल ... गुमशुदा ख्वाब और मैं

शायद १९६५ के आस पास का वक़्त रहा होगा इसलिए घर के बड़े बुजुर्ग लालबहादुर शास्त्री और जंग की बातें किया करते और हम बच्चों को कुछ भी समझ में नहीं आता लिहाज़ा हम सभी बच्चे कंचे और गिल्ली डंडे और पतंगों के बीच अपना वक़्त गुजरना पसंद किया करते थे उस वक़्त कस्बे में बिजली नहीं आई थी इसलिए नगर पालिका वाले अँधेरा होने से पहले ही तेल वाली कंदीलें ( चिमनियाँ /लैम्प पोस्ट ) जलादेते और उन्होंने बाकायदा एक आदमी इस काम के लिए तैनात कर रखा था जो हर दिन तेल चेक करता ,कांच साफ करता और रौशनी कर देता ! बिजली वहां कई सालों के बाद आई ! पहले मुहल्ले के खंबों में पीली रौशनी देता लट्टू ( बल्ब )और बाद में ट्यूब लाइट ! धीरे धीरे घरों में कनेक्शन ! इस दरम्यान लैंप पोस्ट अंधेरे में गुम होते गए !
जिस प्रायमरी स्कूल में हम पढ़ते थे वो घर से उत्तर दिशा में ,तकरीबन एक किलोमीटर दूर और बस्ती से बाहर तालाब की 'पार' पर बना हुआ था स्कूल के एक तरफ गहराई में पक्के घाटों का सिलसिला और दूसरी तरफ पक्की सड़क गुजरती थी चूँकि सड़क आगे चल कर इन्टरमीडियेट कालेज और उससे आगे बसे छोटे से गांव तक जाती थी इसलिए सड़क पर ट्रेफिक या शोरगुल था ही नहीं ! सारे बच्चे पैदल स्कूल जाया करते और जो बच्चा गोल मारता उसे मास्साब द्वारा भेजी गई टीम गांव ,खेत जहाँ भी मिले ढूंढ कर , पकड़ लाती और तब उसका मुर्गा बनना तय हुआ करता ! मजाल है कि कोई गार्जियन इस व्यवस्था से असहमत हो जाता ! इसलिए बच्चों के सामने स्कूल जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प था भी नहीं ! लकड़ी की तख्तियों ,सरपट की कलमों , और खरिया मिटटी से प्रोमोशन , स्लेट और चाक तक और उसके बाद होल्डर पेन और घोली गई टिकिया वाली स्याही और कापी का नंबर आया करता था ! स्कूल में फलदार ,छायादार ,दरख्तों की भरमार थी इसलिए क्लास रूम सिर्फ़ बरसात के समय काम आते ! सर्दियों और गर्मियों में क्लास रूम मुक्ताकाशी हुआ करते थे ! स्कूल के समय के बाद और पहले यही तालाब हम सभी बच्चों के नहाने , तैरने और मस्ती करने का जरिया हुआ करता ! चूँकि बस्ती की चारों दिशाओं में कई छोटे ,बड़े तालाब मौजूद थे इसलिए कोई अभागा ही तैरना नहीं सीख पाता था ! उधर इंटर कालेज का खेल मैदान इधर तालाब फ़िर खेत और लहलहाती फसलें फ़िर सख्त गर्मियों का मौसम ! लू लगने के खतरे से बेपरवाह भरी दुपहरी में तालाब पहुंचना कमल नाल, कमल फूलों और सिंघाडों की चोरी ?(शायद शरारत) ! जिन्दगी हर हाल में ख्वाब जैसी लगती है!
अब ज्यादातर पानी को लोहे और प्लास्टिक के पाइपों के बीचो बीच कैद कर दिया गया है और उसे कुछ घंटों के लिए हर घर में आजाद किया जाता है इसलिए तालाब लगभग वीराने हो चुके हैं ! इधर मशरूम से उगते आंग्ल माध्यम स्कूलों नें मेरे मुक्ताकाशी स्कूल को अतीत के गर्भ में दफन कर दिया है !
वैसे कहने को तालाब अब भी है उसमें पानी और उसकी पार में खंडहर हो चुके स्कूल की कुछ ईंटें , टूटी हुई खपरैल भी शेष हैं मगर मेरा मन खाली खाली हो चला है !

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच में वे भी क्या दिन थे !
    बहुत बढ़िया लिखा है।
    घुघूती बासूती

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  2. सामाजिक संबंधो का विश्लेषण प्रभावशाली है. पिछले आलेखों में धर्म,शादी,शिक्षक,भरोसा,
    बचपन पर ध्यान खींचनें में सफल रहे हैं आप.
    मैं मुबारकबाद देता हूँ आपको,

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