सोमवार, 2 मार्च 2009

दारू आन

,यहाँ दारू आन में से "आन" का मतलब "ला " है ! अब अगर मैं अपने आलेख का शीर्षक 'दारू ला' रखता तो मेरे बहुतेरे मित्र समझते कि बन्दा ख़ुद तो पियेगा ? नहीं , ज़रूर हम लोगों के लिए व्यवस्था कर रहा है ! अब दोस्ती यारी हो और पीनें पिलानें के संकेत मिलें तो वज़ह पूछने की क्या ज़रूरत है ! जहाँ तक मैं जानतां हूँ मेरे मित्रों को पीने के लिए किसी वज़ह की जरुरत ही नहीं हुआ करती ! खैर ...
सन १९७९ में मैं और मेरे भ्रात सम मित्र और उनकी पत्नी सागर विश्विद्यालय की घटिया ( घाटी ) उतर कर बस्तर आ पहुंचे ,वो एन्थ्रोपोल्जी एंड सोसियालोजी विभाग के स्कालर थे और उनकी नई नई शादी हुई थी इसलिए भाभी का आगमन स्वाभाविक था ! उन दिनों गांव में कैम्प करना बेहद शानदार अनुभव था ! हम लोगों नें अपने लिए स्टोव की व्यवस्था कर ली थी लेकिन मिटटी तेल मौके पर नहीं मिलने की वज़ह से ज्यादातर खाना बनाना लकड़ी और चूल्हे पर निर्भर था !
वहां डाटा कलेक्शन में मददगार की हैसियत से मेरे अपने तजुर्बात में अभूतपूर्व इजाफा हो रहा था ! हमने लोकल जुबान सीखने और गांव वालों से दोस्ती बढाने के लिए सुकलधर की मदद ली थी जोकि उन दिनों स्थानीय नौजवान उपसरपंच था और जब कुछ दिन बाद हमने उसके गांव में कैम्प लगाना चाहा तो उसने मजबूर किया कि हम उसके साथ रहें ! गरीबी के बाद भी आदिवासियों के दिल का बड़प्पन मैंने वहीं जाना ! काश मैं केकड़े की सब्जी बनाना और खाना जानता होता ? वो लोग बड़े शौक से केकड़े पकड़ते और हमारे लिए गिफ्ट कर देते बमुश्किल सुकलधर उन्हें समझाता कि हम लोगों की फ़ूड हैबिट में केकडा शामिल नहीं है और वो इस लजीज व्यंजन को ठुकराने के लिए हम पर तरस खाते ! शुरू शुरू में हमें चाय के लिए दूध नहीं मिलनें से काफी तकलीफ हुई ! कारण पूछा तो पता चला कि जैसे हमारी मां का दूध हमारे लिए सुरक्षित है वैसे ही बछडे की मां का दूध बछडे के लिए सुरक्षित माना जाता है इसलिए दूध दुहने और बेचने का प्रश्न ही कहाँ उठता है ! उधर खुटपदर के बूधन के घर एक नया बच्चा काम करता दिखा ! जानकारी मिली कि लड़के के पास पैसा नहीं है इसलिए बूधन के घर सेवा करेगा और जब उसकी सेवा समुचित हो जायेगी तो बूधन की बहन से उसकी शादी कर दी जायेगी यानि कि वह लड़का बूधन का घर जमाई था ! और उसे पत्नी पाने के लिए धन के एवज में सेवायें देनां थीं ! ये दुनिया ......यूँ कहें कि हमसे अलग लेकिन स्त्रियों की महत्ता वाली दुनिया !
एक दिन ईंधन ख़त्म हुआ तो भाभी नें अपनें शौहर से और शौहर नें सुकलधर से फ़िर सुकलधर नें अपनी पत्नी से कहा " दारू आन " ! भाभी हैरान -ओ- परेशान कि मैंने लकड़ी मांगी है और ये शराब मंगा रहा है ! अब हम लोग हंस रहे थे ! ये बस्तर है ! शेष भारत के दैनिक बोलचाल में संस्कृत शब्दों का विलोपन भले ही हो चला हो मगर यहाँ दारू माने लकड़ी होता है !
अब मेरे मित्रों को खुश होनें के लिए मुझसे , सुनना पड़ेगा "मंद खाऊ आये " यानि शराब पियोगे ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर संस्मरण और बढ़िया जानकारी बस्तर की जिन्दगी की. आभार.

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  2. रोज़ शाम को 'दारु ऒन'सुनता था (बीवी की डांट में,)अब हंसी में टाल दिया करूंगा ,कोई कुकिंग गॆस के युग में,लकडी से पकाता है क्या?

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