मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

परम पूज्य ......

हमारे एक मित्र भारतीय स्टेट बैंक की बड़ी सी ब्रांच के बड़े से अधिकारी हैं और उनकी पत्नी जिले के सरकारी अस्पताल में सीनियर डाक्टर हैं ! कहने का मतलब ये है कि घर में ऐशो इशरत की तमाम सुविधाएँ मौजूद हैं इसीलिये उन दोनों को इहलोक के बजाये परलोक की चिंता सताने लगी थी और उन दोनों नें बरास्ते टेलीविजन परमपूज्य के प्रवचन सुनकर अपनी आध्यात्मिक आवश्यकता को पूरा करने का यत्न प्रारम्भ कर दिया था ! ज्ञात हो कि परमपूज्य ताजे ताजे टेलीविजन ब्रांड संतों में से एक थे इसलिए हर सुबह नई श्रंखला के साथ उपदेश देते और इसके बाद लाभान्वित मित्र द्वय , दिन तमाम हमारे प्राण खींच कर रिक्त स्थान में , उन्ही उपदेशों को ठूंसने का यत्न करते ! मित्र होने के नाते उनकी चिंता जायज़ थी , भले ही वो हमारे आज का सत्यनाश करके हमारे परलोक को सुधारने का प्रयास कर रहे थे ! खैर मित्रता की लाज रखते हुए हमने भी बरास्ते टेलीविजन परमपूज्यों से सानिध्य लाभ प्राप्त करने की कोशिशें शुरू कर दीं लेकिन इस सबमे एक गड़बड़ थी ! जहाँ हम पूरी मार्केट खंगाल रहे थे वहीं मित्रों का प्रयास था कि हम उनके ब्रांड तक सीमित रह कर मुक्ति का मार्ग ढूँढें ! खैर इस प्रक्रिया में दो तीन वर्ष बीते जिसकी वज़ह से हमें और हमारे मित्र द्वय को ज़बरदस्त ज्ञान लाभ हुआ !
हुआ यूं कि मित्र द्वय अपने परम पूज्य को अपने शहर बुलाकर सत्संग कराने के इच्छुक थे इसलिए उन्होंने परमपूज्य से संपर्क साधा ! इसी संपर्क ने मित्र द्वय के ज्ञान चक्षु खोल दिए , परमपूज्य के रेट सुनते ही ,मित्र द्वय का आध्यात्म हिरन हो गया और अब दोनों (पति पत्नी ) इहलोक को सुखद बनाने की कोशिश कर रहे हैं !
दूसरी तरफ़ हम थे ! शुरू शुरू में परम पूज्यों के मुख तेज़, उनके बैठने के स्थल , उनके आस पास के माहौल से हम चमत्कृत थे कि उपदेशों के अर्थ /भाव की तरफ़ ध्यान ही नहीं गया और जब ध्यान दिया तो लगा कि परमपूज्य जो भी कह रहे हैं वह हम सब को पता है फ़र्क सिर्फ़ ये है कि उनकी भाषा परिष्कृत और हमारी अगढ़ है ! लेकिन आगे चलकर हमें ये महसूस होने लगा कि परम पूज्य, उपदेश और चिंतन की जगह बेसुरे म्यूजिकल फिलर भर कर टाइम पास करने की कोशिश करने लगे हैं ! बस यही क्षण थे कि जब हमें लगा कि परमपूज्य का ज्ञान कोष रिक्त हो चला है वरना ये ' फिलर 'भर 'एपिसोड 'का बैंड नहीं बजाते !
यूं समझो कि पल भर में हमें परम पूज्य का चेहरा बदरंग और उनका मस्तिष्क ज्ञान शून्य दिखाई देने लगा , और हमें बोध हुआ कि हम ईश्वर को अल्पज्ञानी ,धन-कामियों के फर्जीवाड़े , में खोज रहे थे जबकि वह तो पहले से ही हमारे /हम सबके अंतर्मन में मौजूद है ! वही सच्चा मार्गदर्शक है और चाहता है कि हम उसके 'परम स्वरूप ' के दर्शनों की कोशिश से पहले उसके "अंश स्वरूप "से मोहब्बत करना सीखें !

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