शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

हां हां रे लला ...

बात उन दिनों की है जब मैं बहुत छोटा था और बाल सुलभ बुद्धि से दुनिया को समझने की कोशिश करता था तब मोहल्ले पडोस या गाँव में किसी भी घर में शिशु आगमन के समय गूंजती हुई आवाज , "हां हां रे लला जियो जियो जियो रे लला" और इसे गाने वाला नर्तक दल हम सब बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र हुआ करता था ! हमारी समझ में नही आता कि बस्ती के सुदूर कोने में रहने वाला यह दल , शिशु जन्म के समय ही क्यों आता है और इस दल में सम्मिलित सारे (पुरूष जैसे )लोग स्त्रियों के कपड़े क्यों पहनते हैं उनकी भाव भंगिमाये स्त्रियों जैसी क्यों होती हैं , श्रंगार स्त्रियों का कद काठी मर्दों की यहाँ तक कि आवाज भी मर्दानी !

बलायें लेता हुआ , बख्शीश मांगता हुआ , कुछ मनुहार और कुछ जबरदस्ती के साथ , नवागत शिशु के माता पिता की झिडकियां और खुशी ! उन दिनों समझ में नहीं आती थी ! सच कहें तो उनको देखकर हम बच्चों में कौतुहल , आनंद और भय एक साथ हिलोरें लेता था !

वक़्त गुजरता गया ! वो लोग गांव के मेलों , नौटंकियों , नाट दलों , कभी फिल्मों , कभी बसों और ट्रेनों में रहे ! पर सवाल अनुत्तरित ही रहे कि वो ऐसे क्यों हैं ! और ये कि वो लोग बस्तियों के कोनों में ही क्यों रहते हैं ! और यह भी कि उनके घर बच्चे क्यों पैदा नहीं होते ! उनके दलों में जुड़ने वाले नये  नये  लोग कहां से आते हैं ! अक्सर वो लोग समाचार पत्रों की सुर्खियों में भी दिखाई देते थे !

कुल मिला कर उनका रहस्मय संसार , मेरी बाल सुलभ जिज्ञासा को युवा उत्सुक्ता में बदल चुका था ! इस समय तक सागर विश्वविद्यालय के नृतत्व एवं समाजशास्त्र विभाग के छात्र के रूप में मेरे दिन लद चुके थे पर मेरे प्रश्न यथावत थे !

सन १९८० के आस पास की बात है समाचारपत्रों में पढ़ा कि देवास में हिजडों का अखिल भारतीय सम्मेलन हो रहा है ! मैंने तत्काल अपने कनिष्ठ , भ्रात सम श्री अनिल जैन से चर्चा की , उनकी सम्मति मिलते ही हम लोगों ने काम का बटवारा कर लिया ! तय ये हुआ कि श्री जैन फील्ड वर्क करेंगे और मैं लाइब्रेरी में उनकी मदद करूंगा !

श्री जैन शुरू में बहुत उत्साहित थे पर व्यवाहरिक स्तर पर 'हिजडों ' से बातचीत में उन्हें काफी समस्याएं आ रहीं थीं ! जानकारी देने के बजाये हिजडे उनसे ठिठोली करते रहते हिम्मत हार कर श्री जैन नें कई बार रणछोड़ दास बनने की सोची मगर मैं अक्सर उन्हें यह कह कर हौसला देता , अरे भाई तुम मध्य प्रदेश में हिजडों पर कम करने वाले अकेले व्यक्ति कहलाओगे !
ले दे कर हमारा प्रोजेक्ट हिजडा समुदाय पूरा हो ही गया और श्री जैन को इसके बदले बाह्य परीक्षक नें काफी अच्छे अंक दिए और दुस्साहसिक काम की प्रशंसा भी हुई !

यह उचित नहीं होगा अगर मैं उस प्रोजेक्ट की उप्लब्धियों से आपको परिचित न कराऊँ ! लीजिये प्रस्तुत है  हिजडों की कहानी ...........


हिजडों का इतिहास मानव इतिहास जितना ही पुराना है पर इनकी वास्तविक उत्पत्ति के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है ! वैसे ज्यादातर लोग इन्हे 'हरम' व्यवस्था के उत्पाद के रूप में स्वीकार करते हैं ! एक किंवदंती के अनुसार भगवान राम के वनगमन के समय अयोध्या के सभी नागरिक श्री राम को नगरी के बाहर तक छोड़ने गए थे और अन्तिम भेंट के उपरांत श्री राम ने समस्त नर नारियों को अयोध्या वापस लौट जाने के निर्देश दे कर वन गमन किया ! १४ वर्ष के उपरांत जब भगवान वनवास से लौटे तो उन्होंने हिजडों को नगरी के बाहर उपस्थित पाया ! उन्होंने हिजडों से इतनी लम्बी प्रतीक्षा का कारण पूछा तो उन्होंने कहा भगवान आपने कहा था कि समस्त नर नारी अयोध्या लौट जायें परन्तु हम लोग न तो नर है न नारी इसलिए हम वापस नहीं लौटे और १४ वर्षों से आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं !
महाभारत के समय इनका उल्लेख शिखंडी और बृहन्नला के रूप में मिलता है तब धर्म नीति के अनुसार इन पर वार करना वर्जित था !
शास्त्रीय साहित्य , असीरियन पाठ्य , और प्राचीनतम वसीयतनामो में इनका उल्लेख पूर्वोत्तर की प्राचीनतम संस्था के रूप में किया जाता है ! प्राचीन बेबीलोन में भी हिजडे उपयोगी माने जाते थे !
इस्लाम की उत्पत्ति के बाद साम्राज्यों के विस्तार के दौरान दमिश्क और बगदाद जैसे महत्वपूर्ण केन्द्रों में हरम व्यवस्था इन्हे पारिवारिक जीवन में खींच लाई ! असल में मुस्लिम साम्राज्यों के विस्तार के समय में पत्नी को पति का अधिकार माना जाता था तथा अधिकार के सम्मान की रक्षा हिजड़े (मुहसाना )स्त्री पहरेदार के रूप में करते थे ! यानि कि वे हरम के पहरेदार हुए !
अपनी शारीरिक विलक्षणता के चलते हिजडों को स्त्रियों की पहरेदारी के लिए सुरक्षित माना जाने के कारण वे व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग बन गए थे !
सन१९६९ में प्रोफेसर सिन्हा ने लखनऊ के शिखंडियों पर शोध कार्य किया था !परन्तु अधिकांश समाज वैज्ञानिक इस संवेदनशील विषय से मुंह चुराते रहे !
सामिजिक उत्सवों में सक्रिय भागीदारी के अतिरिक्त ,धार्मिक कार्यक्रमों में भी इनकी अभिरुचि जग जाहिर है ! राजनीति में सक्रियता के भी उदाहरण देखने में आए हैं !


ईश्वर ने हिजडा उर्फ़ शिखंडी उर्फ़ ब्रह्न्नला उर्फ़ मुहसाना को औरत तो नही बनाया पर शौक /अभिरुचियां , औरतो जैसे दिए ! मर्द भी नही बनाया पर , दुस्साहस मर्दों से बढ़कर दिया !

आज वे जहां भी हैं अलमस्त हैं ! विशेषकर पश्चिमी / विकसित देशों में तो उनके जैसे परिवारों की और उनके चाहने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है !...

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें