बुधवार, 19 जुलाई 2017

ढ़ोल

कहते हैं कि जब धरती मां में बसाहट के लिये आत्माओं को स्थान दे रहा था तभी कहीं दूर बूम की जोरदार आवाज़ हुई जो कि क्रमशः सृजनहारे के निकट आती गई और सृजनहारा उसे तेजतर होते सुनता रहा ! जब आवाज़ सृजनहारे के ऐन सामने पहुंच गई तो सृजनहारे ने उससे पूछा तुम कौन हो ? आवाज़ ने कहा मैं ढ़ोल की आत्मा हूं ! कृपया आप मुझे आपके अद्भुत कार्य में भागीदार होने की अनुमति प्रदान करें ! सृजनहारे ने कहा भला तुम क्या योगदान दोगी ? आवाज़ ने कहा मैं लोगों के हृदय से निकली गायकी में उनका साथ दूंगी ठीक वैसे ही जैसे कि मैं स्वयं धरती मां के हृदय की धड़कन हूं / आवाज़ हूं ! इस तरह से सारा सृजन समस्वर / अनुकूलता  में गायेगा ! सृजनहारे ने यह सुन कर आवाज़ को सृजन कार्य में सहभागिता के लिये अनुमति प्रदान कर दी और तभी से ढ़ोल लोगों के सुरों की संगत करता है !

यहां तक कि  समस्त अर्वाचीन जातियों में ढ़ोल, गीतों का केन्द्र बिंदु बना रहता है वो गीतों की आत्माओं का उत्प्रेरक है , जिससे गीत सृजनहारे तक अथवा जहां तक वे प्रार्थना बन कर पहुंचना चाहें , पहुंच सकते हैं ! समस्त समयों में ढ़ोल ध्वनि को सम्पूर्णता प्रदान करता है ! दुःख, विस्मय, उत्तेजना, गंभीरता, शक्ति, साहस और गीतों में पूर्णता लाता है ! ये धरती माता पर निर्भर लोगों को धरती माता की धड़कनों की सहमति / स्वीकृति का बोध कराता है ! यह उस ईगल की निर्मिति करता है जो सृजनहारे तक संदेशों को लाता और ले जाता है ! यह लोगों के जीवन को बदल देता है !  

अनक्षर आदिम समाजों में प्रचलित अनुश्रुतियों के अध्ययन से कम-ओ-बेश ये तो स्पष्ट होता ही है कि व्यक्तिगत और समुदायगत अनुभवों के संचयन, में प्रकृति और मानवीय पर्यवेक्षण की सुसंगति अनिवार्य शर्त है ! अद्यतन अनुभवों / ज्ञान और विज्ञान के लिये पर्यवेक्षण, अनक्षर काल में जितना महत्वपूर्ण था उससे कहीं अधिक वह आधुनिकतम समाजों की अपरिहार्यता है ! विवेचनाधीन आख्यान अबनाकी आदिम समुदाय की सृष्टि सृजन विषयक मान्यताओं पर आधारित है, वे आश्चर्यजनक रूप से सृष्टि सृजन के समय नाद / ध्वनि की उपस्थिति की परिकल्पना करते हैं, जैसे कि उनके स्वयं के दैनिन्दिक, व्यक्तिगत या सामुदायिक जीवन घटनाक्रम, जनम, मरण, उल्लास, शोक समय में ध्वनि की भूमिका दिखाई देती है, बिलकुल वैसी ही सृष्टि सृजन के समय भी रही होगी, की धारणा पर आधारित है ये कथा !  

सृजनहारा धरती में बसाहट के लिये, आत्माओं को भूमिकायें और प्रस्थितियां सौंप रहा है, तभी सुदूर कहीं तुमुल नाद का प्रकटीकरण, नाद से सृजनहारे की अनभिज्ञता और परिचय अलबेला है ! नाद स्वयं कहे कि वह ढ़ोल की आत्मा है और उसे धरती में हो रहे अद्भुत सृजन कार्य में भागीदारी की लालसा है, ठीक वैसे ही जैसे कि आदिम समुदाय के दिन प्रतिदिन के जीवन में उसकी सक्रिय भागीदारी है, सशक्त सशक्त हस्तक्षेप है ! नाद स्वयं को धरती मां के हृदय की धड़कन कहे और मनुष्यों के गीतों में अनुकूलता और समस्वरता के रूप में स्वयं के अभिव्यक्त होने का कथन करे तो इसे आख्यान कहने, रचने वाले समुदाय की सृजनशीलता / कल्पनाशीलता का सर्वश्रेष्ठ ही माना जाएगा ! सृजन कर्म में नाद की भूमिका को ईश्वर का स्वीकरण, गीतों / गायन और सुरों में, ढ़ोल की सुसंगति को मनुष्यों के समर्थन जैसा है !

कथा में ढ़ोल को समस्त आदिम समुदायों के गीतों का केन्द्र बिंदु माना गया है ! आशय यह कि ढ़ोल गीतों से लेकर दुःख,उल्लास,विस्मय, उत्तेजना और शक्ति प्रदर्शन के समयों में तथा मनुष्यों की प्रार्थनाओं में परिपूर्णता का प्रतीक है, यानि कि ढ़ोल नाद की पूर्णता है, वो सृजनहारे तक पहुंचने की आकांक्षा रखने वाले मनुष्यों की सफलता की आश्वस्ति है, संदेशों के सम्प्रेषण साफल्य और एक एक एकाकी मनुष्यों के सम्पूर्ण समुदाय में बदलते जाने का महती माध्यम है ! कुल मिलाकर यह आख्यान ईश्वर, मनुष्य और धरती के मध्य एक-लय होने का कथन है ! सृष्टि में नाद की अनिवार्य उपस्थिति जो कि ईश्वरीय सृजन को सम्पूर्णत्व, धरती मां के हृदय को धड़कन और मनुष्यों को सामाजिक सांस्कृतिक प्राणी हो जाने का वरदान दे !