मंगलवार, 26 फ़रवरी 2013

देव नृप सुता...!

बहुत समय पहले की बात है , जब ज़्यूस ने अफ्रोडाइटी के पति हैफीस्ट्स को कहा कि वो उसके लिए एक कन्या की निर्मिति करे ! यह दुनिया की पहली स्त्री थी जो, मृदा और जल से निर्मित की गई ! हैफीस्ट्स ने एक सुंदर स्त्री का निर्माण किया और उसका नाम पंडोरा रखा ! इसके बाद ज़्यूस ने अपनी इस पुत्री पंडोरा को भूलोक में भेज दिया ताकि वो एपिमैथियस से विवाह कर सके जोकि, धरती पर एकाकी किन्तु सुसंस्कृत / शिष्ट महाकाय व्यक्ति (टाइटन) था ! ज़्यूस, एपिमैथियस के भाई प्रोमैथियस से प्रसन्न नहीं था, क्योंकि उसने ज़्यूस की सहमति के बिना मनुष्यों को अग्नि प्रदान कर दी थी !

सभी देवी देवताओं ने पंडोरा को क्रमशः सौंदर्य, आकर्षण, संगीत, उत्सुक्ता, अनुनय, धारणा आदि आदि गुण उपहार में दिये, जिन्हें अच्छाई अथवा बुराई के लिए प्रयुक्त किया जा सकता था, जबकि ज़्यूस ने पंडोरा को एक छोटा सा पिटारा दिया जिसमें एक बड़ा सा ताला लगा हुआ था ! उसने पंडोरा से आश्वासन लिया कि वह उस पिटारे को कभी नहीं खोलेगी ! ज़्यूस ने पिटारे के ताले की चाबी पंडोरा के पति को दी और उससे कहा कि वह कभी भी इस पिटारे को नहीं खोलेगा यद्यपि ज़्यूस आश्वस्त था कि उत्सुक्तावश एपिमैथियस अथवा उसका भाई प्रोमैथियस इस पिटारे को ज़रूर खोलेंगे ! 

पंडोरा उत्सुक्तावश उस पिटारे को खोलना चाहती थी, किन्तु एपिमैथियस ने उसके पिता ज़्यूस के कठिन स्वभाव का हवाला देकर समझाया कि उसे पिटारा नहीं खोलना चाहिए ! एक दिन जब एपिमैथियस सो रहा था तो पंडोरा ने पिटारे की चाबी चुरा कर पिटारे को खोल दिया ! पिटारे का ढक्कन खुलते ही समस्त प्रकार की व्याधियां, निर्बलतायें, घृणा और ईर्ष्या तथा समस्त बुरी बातें / बुराइयां, जिन्हें धरती के लोगों ने इससे पहले कभी अनुभव नहीं किया था, पिटारे से बाहर निकल गईं ! पंडोरा ने जल्दी से ढक्कन को बंद किया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी वे सब पिटारे से बाहर के जगत में व्याप्त हो चुकी थीं !

पंडोरा के सुबकने की आवाज सुनकर एपिमैथियस जागा तो पंडोरा ने आर्तनाद करते हुए उसे बताया कि सारी बुराइयां किस तरह से पिटारे से बाहर निकल गईं ! उसने अपने पति को यह दिखाने के लिए कि पिटारा पूरी तरह से खाली हो चुका है , पिटारे का ढक्कन एक बार फिर से खोला, पिटारा वास्तव में पूरी तरह से खाली नहीं हुआ था, इससे पहले कि पंडोरा, पिटारे के ढक्कन को दोबारा बंद करती उसमें से एक लघु कीट बाहर निकला, उसने पंडोरा की पकड़ से दूर होते ही कहा...ओ पंडोरा मैं ‘आशा’ हूं मुझे मुक्त करने के लिए धन्यवाद !  इस तरह से ‘आशा’ भी बाह्य जगत में व्याप्त हो गई ! अब दुनिया में व्याधियां हैं , निर्बलतायें हैं , घृणा है , ईर्ष्या है , अपराध है और आशा भी ...

इस ग्रीक मिथक के विविध संस्करण पढ़े और कहे जाते रहे हैं, किन्तु एक संस्करण यह है कि ज़्यूस देवताओं का राजा था और धरती पर नश्वर मनुष्यों से पूर्व के समय में अनश्वर देव और टाइटंस सयुंक्त रूप से मित्रवत / भ्रातवत अस्तित्वमान माने गये ! टाइटंस, देवताओं की ओर से युद्ध करते थे, परन्तु किसी अन्य संस्करण में वे धरती पर मनुष्य और अन्य जीवों के सृजनकर्ता भी माने गये हैं, प्रोमैथियस ने संभवतः हैफीस्ट्स की सहायता से मनुष्यों को रचा जबकि उसके भाई एपिमैथियस ने अन्य जीवों / पशुओं को ! चूंकि एपिमैथियस ने तत्परता/चपलता और साहस जैसे गुण अन्य जीवों को दे दिये और मनुष्यों के लिए कुछ भी शेष नहीं रहा तो प्रोमैथियस ने मनुष्यों की सामर्थ्य वृद्धि की नियत से अग्नि की चोरी करके उसे मनुष्यों को सौंप दिया !

कथा के अनुसार पंडोरा सर्वगुण संपन्न (उपहार में प्राप्त) धरती की प्रथम स्त्री है, जिसके जन्म का आशय, अनश्वर टाइटन प्रोमैथियस अथवा नश्वर मनुष्यों को दण्डित करने जैसा बतलाया गया है ! पंडोरा नश्वर मनुष्यों की तरह से मृदा और जल से निर्मित की गई तथा उसमें उत्सुक्ता के गुण / तत्व की मौजूदगी को देवता ज़्यूस की सुनियोजित दंड योजना / षडयंत्र का हिस्सा माना जा सकता है , बज़ाहिर ज़्यूस अपनी ही पुत्री का उपयोग अपनी शत्रुता / वैमनष्य को निपटाने के लिए करता है !  ज़्यूस नामक देवाधिपति के इस मंतव्य को ध्यान में रखा जाए तो समकालीन समाज के नश्वर मनुष्य / पुरुष में भी इसी तर्ज़ की षडयंत्रकारिता के गुण / तत्व निहित द्रष्टव्य होंगे, जहां वो अपनी ही परिजन/स्वजन स्त्रियों को दांव में लगाने से नहीं चूकता...गोया स्त्रियों का वज़ूद / उनकी अपनी अस्मिता, केवल पुरुषों के हित साधन मात्र के लिए हो...

गौर तलब है कि कथा की नायिका पंडोरा आद्योपांत यंत्रवत व्यवहार करती दिखाई देती है, एक सुनियोजित घटनाक्रम में उसका अपना विवेक कहीं खो गया सा लगता है ! प्रतीकात्मक तौर पर वो भले ही दुनिया में सर्वव्याप्त बुराइयों की नासमझ मुक्तिदाता मानी जाये किन्तु...मेरा ख्याल ये है कि पंडोरा का सुबकना, दुनिया में सर्वव्याप्त बुराइयों की तुलना में ‘आशा’ के मुक्त अस्तित्व और पंडोरा के प्रति उसके कृतज्ञता ज्ञापन पर ठिठक / ठहर जाना चाहिये !


25 टिप्‍पणियां:

  1. कथा और उसके मंतव्‍य दोनों अद्भुत हैं। पढवाने के लिए शुक्रिया।

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    1. डाक्टर साहब, कथा बहुश्रुत है सो आपने पहले भी सुनी / पढ़ी ही होगी ! मंतव्य में कोई नई बात सूझ जाए तो अलग बात :)

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    2. पता नहीं कैसे यह कथा मुझसे पढने से छूट गयी। :)
      .............
      सिर चढ़कर बोला विज्ञान कथा का जादू...

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  2. पंडोरा बाक्‍स यानि आफत का पिटारा, यही रूढ़ हो गया है.

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    1. राहुल सिंह जी, तब तो आशा भी रूढ़ि में शामिल मानी जाये :)

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  3. ....हमारे काम की 'आशा ' रही जो पिटारे से निकली !

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    1. संतोष जी, सारी कायनात आपके काम वाली बात पे टिकी हुई है :)

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  4. बहुत खूब अच्छी इस के लिए आपको बहुत - बहुत बधाई
    मेरी नई रचना
    ये कैसी मोहब्बत है
    खुशबू

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    1. आभार पारीक जी , आपकी नई रचना जरूर बांची जायेगी !

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  5. हम्म , कुल मिलाकर बुराइयों के लिये ज़िम्मेदार पैंडोरा या हव्वा (ईव) ही रही ......
    पैंडोरा का बक्सा और भानुमती का पिटारा में कोई रिश्ता तो नहीं .........

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    1. श्रीवास्तव साहब ,
      भानुमति के पिटारे को ग्रीक पंडोरा के बाक्स का भारतीय संस्करण जानिये !

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    2. ऊपर की टिपण्णी गोलू के ताऊ की थी , गोलू के अकाउंट से !

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    3. गोलू श्रीवास्तव के ताऊ को श्रीवास्तव साहब कह के ही तो काम चला सकता था :)

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  6. आशा के होते कोई रास्ता निकाल ही लेंगे हम ...
    मगर यह पिता घ्रणित था ..इसने अपनी पुत्री के प्रति भी कोई दया नहीं व्यक्त की !

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    1. सतीश भाई,
      देवताओं की अपनी ही राजनीति...जिसमें स्वजनता मायने नहीं रखती!

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  7. किसी को 'पंडोरा' भायी, 'आशा' किसी को अच्छी लगी ,
    पिटारे तो खुल ही जाते जब-जब जिज्ञासा अपनी जगी,

    हुई जो निर्मित थी 'मिटटी-जल' से व्याधियों में घिरी ,
    अब अग्नि चोरो के पास ले दे के एक 'आशा' बची.
    http://aatm-manthan.com

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    1. शुक्रिया मंसूर अली साहब ! हमेशा की तरह बेहतर टीप दे डाली आपने !

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  8. मतलब ये हुआ की अपने मतलब के लिए स्त्रियों को दांव पर लगाना उन्हें मोहर बनाने का काम ईश्वर ने शुरू किया और उनसे मनुष्यों ने सिखा , किन्तु बड़ी चालाकी से इस बुराई को सिखाने का दोष भी स्त्री पर ही डाल दिया गया । हर समाज में हर बुराई की जड स्त्री को ही क्यों बनाया जाता है , हमारे यहाँ भी जर जमीन के साथ जोरू स्त्री को ही फसाद की जड़ माना गया है , पुरुष शुरू से ही कमजोर रहा है अपनी गलती मानने में और और खुद को बचाने के लिए तुरंत ही उंगली स्त्री पर उठा देता है और ये दोषारोपण आज भी जारी है ।

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    1. अंशुमाला जी ,
      इस दैवीय उद्धरण में स्त्री का इस्तेमाल एक मोहरे की तरह से किया गया !
      अस्तु लौकिक उद्धरण दैवीयता(धार्मिकता)पोषित / प्रेरित माने जाने चाहिए !
      स्त्रियों पर दोषारोपण आज भी जारी है पर पूर्ण सहमति !

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  9. मोहरे बनी हुए स्त्री जब खुद चाल चलती है , बहुत खतरनाक हो जाती है ...

    ऐसी भी कोई कथा है क्या !!!

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    1. वाणी जी, ये जिम्मेदारी भी आपने मुझे दे दी :)

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  10. ali sa,

    kafi dino baad aayee ye post.....

    bina padhe tip rahe hain.....

    padh baad me lenge


    pranam.

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    1. संजय भाई , इन दिनों व्यस्ततायें बढ़ गई थीं ! आप का हर हाल में स्वागत है !

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  11. मैंने कभी ध्‍यान नहीं दि‍या था कि‍ पंडोराज़ बॉक्‍स क्‍यों कहा जाता है :)

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  12. गनीमत माने, आशा तो निकल आयी.

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