मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

नियतिवाद...!

राजा सालोमन का एक सेवक हांफते हुए दरबार में दाखिल हुआ और उसने राजा से कहा , कृपया मुझे आपका सबसे तेज घोड़ा कुछ समय के लिए प्रदान कीजिये ! राजा ने सेवक से पूछा कि ऐसा भला क्यों ? इस पर सेवक ने कहा कि मुझे रात घिर आने से पहले ही, यहां से दक्षिण दिशा में , दस मील दूर स्थित कस्बे में पहुंच जाना चाहिए ! ऐसा क्यों ? राजा ने सेवक से पुनः पूछा ! क्योंकि...कांपते / सिहरते / थरथराते हुए सेवक ने राजा से कहा ! अभी अभी मैं आपके बागीचे में मृत्यु से मिला हूं और जब उसने मेरे चेहरे को ताका तो मुझे यह सुनिश्चित हो गया है कि जब वह मुझ पर दावा करने आये तो मुझे उसके आस पास नहीं होना चाहिए ! 

बहुत अच्छे...तब तुम मेरे सबसे तेज घोड़े को ले जाओ , उसके खुर पंखों के समान हैं ! इसके बाद राजा सालोमन बागीचे में पहुंचे जहां उन्होंने मृत्यु को बैठे देखा, उसके चेहरे पर उलझन के भाव थे ! राजा ने पूछा क्या बात / गड़बड़ है ? मृत्यु ने राजा से कहा कि आज की रात , मुझे आपके एक सेवक के प्राण हरण करना है , किन्तु उसे मैंने अभी यहां , आपके बागीचे में देखा है जबकि मुझे उसके प्राण , यहां से दक्षिण दिशा में , दस मील दूर स्थित कस्बे में लेना है !  मुझे नहीं लगता कि वह रात होने तक उस जगह पर पहुंच पायेगा जब तक कि उसके पास पंखों जैसे खुरों वाला घोड़ा ना हो ... 

अमूमन लोक आख्यानों को आदिम समुदायों से जोड़ते हुए बांचा जाता है ऐसे में ये मुगालता पाल बैठना सहज ही है कि प्रारब्धवादी विश्वासों के प्रचलन और उनकी सामाजिक व्याप्तियों में आदिम कबीलों की अहम भूमिका रही होगी , गौर तलब है कि प्रस्तुत आख्यान का सम्बन्ध हीब्रू भाषाई समुदाय से है जोकि प्रथम दृष्टया यहूदी धार्मिक आस्थाओं का अनुपालन करता रहा है ! विषयान्तर ही सही पर यहां , यह याद कर लेना उचित होगा कि , इस्लाम / हिंदू / ईसाई / यहूदी / बौद्ध / जैन / सिख , जैसे धर्मों के अनुयाई दुनिया की कुल आबादी का 80 प्रतिशत हैं , और यह भी गौर तलब है कि इन सभी धर्मों की जन्मभूमि एशिया महाद्वीप है जोकि दुनिया के भूतल का केवल 29.4 प्रतिशत भाग है , जिसमें दुनिया की लगभग 60 प्रतिशत आबादी रहती है !

प्रमुख वैश्विक धर्मों की जन्म स्थली के रूप में एशियाई महाद्वीप को चिन्हित करने के बाद , अब इस आख्यान को समझना अपेक्षाकृत सहल होगा कि पश्चिमी देशों की जुबान में उल्लिखित , मध्य पूर्व एशिया , दक्षिण पूर्व एशिया , अपने आख्यानों में नियतिवाद को क्यों कर अभिव्यक्त करता है ! नि:संदेह आख्यानों में भाग्यवाद के एलिमेंट ( तत्व ) की मौजूदगी को आदिम कबीलों में , विशेष कर धर्म के प्रादुर्भाव से जोड़ कर देखा जाना चाहिए ! कहने का आशय यह है कि अगर आदिम समाजों में नियतिवाद मौजूद भी रहा होगा तो वह अपने स्थायी पैठ की प्रकृति वाला और अपने वर्तमान स्वरूप जितना प्रबल कदापि नहीं रहा होगा ! मेरा अपना अनुमान यह है कि मनुष्य के मन:संसार में ईश्वर निर्धारित जीवनचर्या और परिणामों के जन्म पूर्व निर्धारणवाद का खलल धर्मों की देन है !

प्रस्तुत आख्यान में राजा सालोमन कुलीनता का प्रतीक है , जोकि मृत्यु से उसकी उदासीनता का सबब पूछ सकता है और मृत्यु इतनी असहाय और अल्पज्ञानी...लगभग नश्वर मनुष्य जैसी कि उसे भी अनुमान लगाना पड़ रहा है कि राजा का सेवक अपनी मृत्यु के लिए तयशुदा स्थल तक पहुंच भी पायेगा कि नहीं ! राजा अपने सेवक के प्रति उदार है और वह पंख जैसे खुरों की सांकेतिकता वाले तीव्र गति के घोड़े को उसकी समस्या के निवारणार्थ सौंप देता है ! वो पहले सेवक के कथन पर विश्वास करता है और बाद में उसके कथन की पुष्टि हेतु अथवा जिज्ञासावश बागीचे में जा पहुंचता है ! कहने का आशय यह है कि सेवक अपनी मृत्यु को देख कर भयभीत है और उससे बचने के लिए वो अपने सदाशय / सुहृदय अभिजात्य राजा की सहायता लेता है !

सेवक को यह विश्वास है कि वह मृत्य से बच सकता है , वह घबराया हुआ है और अपने बचने के लिए एक दूर दराज़ का स्थान तथा निश्चित समय तय कर बैठता है जोकि उसके प्रारब्ध में उसकी मृत्यु के लिए पूर्व निर्धारित है ! संभवतः कथा यह संकेत देना चाहती है कि सेवक अपनी जान बचने के लिए वो सब कर्म कर रहा है जोकि उसके भाग्य में पूर्व निर्धारित हैं ! राजा , सेवक की मनवांछित सहायता करते हुए प्रारब्ध के होने में मददगार है ! इधर मृत्यु भी केवल अपना कर्म कर रही है , हालांकि वह एक दैवीय तत्व / शक्ति है...पर असमंजस में है कि सेवक निर्धारित समयावधि में निर्धारित स्थल तक पहुंचेगा भी कि नहीं ? भले ही यह बात आश्चर्यजनक लगे कि देवत्व को असमंजस ? ...पर कथा प्रारब्ध को , मृत्यु के देवत्व और उसके बोध / संज्ञान से श्रेष्ठ तो ठहरा ही देती है !

24 टिप्‍पणियां:

  1. सही है कहते भी हैं कि जगह कहीं नहीं आती मरने वाला ही वहां पहुँचता है और आपकी प्रस्तुति ने इस सच्चाई को सामने भी रख दिया सार्थक प्रस्तुति

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  2. ...कुछ तो ज़रूर कभी-कभी ऐसा होता है जब लगता है कि हम कहीं और से नियंत्रित हो रहे हैं,शायद यही नियति है !

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    1. उस कुछ तो होने को संयोग भी तो कहा / माना जा सकता है !

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  3. अद्भुत व्याख्या! कथा गौण हो गई इसके आगे। कुछ भी जोड़ने का सामर्थ्य नहीं है। ..आभार।

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    1. अरे नहींssss देवेन्द्र जी ये क्या कह दिया आपने ! कथा की वज़ह से ही तो व्याख्या है वर्ना उसकी औकात क्या !

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  4. नियति को बदला तो नहीं जा सकता , बस साहस से उसका सामना किया जा सकता है !
    मृत्युभय से बाज(?) के पंखों पर बैठ सुदूर गुफा में छिपने जा रहे खरगोश
    (या ऐसे ही किसी जीव ) को गुफा के द्वार पर बाघ द्वारा मारे जाने की ऐसी ही एक कुछ याद कुछ भूली हुई कथा याद आई .

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    1. एक जैसे दृश्यबंधों और घटनाक्रम वाली कथायें मिलना सहज ही है , अंततः हम सभी बंदे इंसान ही तो हैं और जिस पर्यावरण में रहते हैं उससे ही तो कथायें गढ़ते हैं ! पर्यावास साम्य सो कथा साम्य !

      इस कथा में नियति को लेकर मृत्यु देव के असमंजस पर कुछ कहेंगी आप ना जाने क्यों ऐसा ख्याल था !

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  5. .
    .
    .
    कथा उतनी सादी नहीं, खासी जटिल है... 'मृत्यु' बागीचे में सेवक से मिल उसके चेहरे को ताक उसे भयभीत कर उसे दस मील दूर कस्बे के लिये पलायन को मजबूर कर देता है... वह चिंतित है कि उस सेवक को 'पंखों जैसे खुरों वाला' घोड़ा मिला कि नहीं... राजा सेवक को ऐसा घोड़ा दे चुका है... सेवक को मरना ही है रात को, वह भी दस मील दूर कस्बे में... वहाँ तक पहुंचाने में 'पंखों जैसे खुरों वाले' घोड़े की अहम भूमिका है यहाँ...

    कथा नियति और जीवन की नश्वरता को तो दिखाती ही है... पर बड़ा सबक है कि 'जिंदगी एक दौड़ है' यह सभी जानते हैं... पर इसे अपने पैरों पर दौड़ें या 'खुरों जैसे खुरों वाले' घोड़े के सहारे... 'पंखों जैसे खुरों वाले' घोड़़े आपको दौड़ से हमेशा के लिये बाहर कर देते हैं... ऐसे घोड़े रखने वाले राजा कितनी भी सदाशयता भले ही रखते हों, पर हैं वह 'मृत्यु' के राजदार-सहयोगी ही... उनसे नजदीकी या उनकी चाकरी अच्छी नहीं...


    ...

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    1. शाह साहब ,
      सारी नियति सारा भाग्यवाद सेवक के माथे मढ़ दिया गया है वो करोड़ों / अरबों जैसा एक साधारण नागरिक है जिसे प्रारब्ध को लेकर जीना और उसे ढोना है ! राजा मृत्यु से सहज है और मृत्यु भी राजा से अपनी चिंता शेयर कर सकती है ! तेजतर ही सही पर घोड़ा , इंसान सेवक की तरह राजा की गुलामी में है ! उसकी अपनी कोई हैसियत अगर है तो वो ये कि उसे अपने मालिक का कहा मानना है बस ! इंसानी सेवक की तर्ज़ पर इसे उसका प्रारब्ध मानिए !
      आपकी इस बात से सहमति की पंखों जैसे खुर वाले आपको(साधारणजन को)हमेशा ही दौड़ से बाहर कर देते हैं ! राजा की चाकरी बुरी तो है पर जो जनगण अपनी अस्मिता स्वयं नहीं निर्धारित करते उनका भला प्रारब्ध भी नहीं कर सकता :)

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    2. ज़ल्दबाज़ी में कहना भूल ही गया ... एक बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिए आभार !

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  6. जो जो जब जब होना है

    सो सो तब तब होता है

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    1. सो सो तब ही होता है जब जब जो जो होने दें :-)

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  7. मृत्यु और इसके बाद का रहस्य तो मनुष्य अभी नहीं जान पाया है .
    इसीलिए लगता है -- जो होना है , सो होकर रहेगा . इसी को प्रारब्ध, नियति या होनी कहते हैं .
    इसका माध्यम कोई भी बन सकता है .

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    1. डाक्टर साहब ,
      क्या समय और सुनिश्चितता से इसका कोई वास्ता है ? क्या इसे प्रारब्ध के बजाये चांस / संयोग / इत्तिफाक भी कह सकते हैं ?

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    1. आपका ह्रदय से आभार , जो आलेख आपने चुना वह मेरा सबसे प्रिय आलेख है !

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  9. अली सा.
    आज कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ.. लोकाख्यान इस प्रकार दोहराते हैं, यह कभी सोचा न था.. दो कहानियाँ (एक लोकाख्यान और एक सच्ची घटना):
    .
    १. दादा जी सुनाते थे कि एक सज्जन थे जिन्हें दिव्य शक्ति प्राप्त थी... अर्थात वे देवी देवताओं, आत्माओं, प्रेत-पिशाचों आदि को देख सकते थे. एक दिन उन्हें दोपहर में एक यमदूत दिखाई दिया. उन्होंने रोककर पूछ लिया कि उनके आने का प्रयोजन क्या है. किसके प्राण हरने हैं. यमदूत ने बताया कि आपके पड़ोसी की मृत्यु का समय आज अपराह्न चार बजे निश्चित हुआ है. उन सज्जन ने यमदूत को अपने आँगन में बिठाया और चारपाई पर सुस्ताने को कहा. यह भी कहा कि उन्हें नींद आ गयी तो वो चार बजे उन्हें जगा देंगे.
    यमदूत सो गया. इस बीच उन्होंने अपने पड़ोसी को खबर कर दी कि भाग जाओ और कहीं छिप जाओ. पड़ोसी भाग गया. यमदूत की नींद जब पाँच बजे टूटी तो वो सज्जन माफी माँगने लगे कि वे उसे नहीं जगा सके. पर यमदूत ने कहा कि आप लज्जित न हों.. आपका पड़ोसी दोपहर में ही निकल कर एक जंगल की एक गुफा में जा छिपा था, जहाँ चार बजे उसे एक शेर ने मार डाला.
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    २. मेरा एक मित्र.. २३ साल का सरदार.. जितना सजीला नौजवान, उतना ही सुन्दर गायक भी था. १९८४ के दंगों में पटना से जान जाने के डर से भागकर दिल्ली चला गया. दिल्ली में ही हफ्ते दस दिन बाद, दंगे समाप्त होने के बाद एक दिन वो अपनी मोटर साइकिल पर जा रहा था कि सड़क पर गिर पड़ा और पीछे से आते ट्रक से कुचला गया.
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    सवाल नियतिवाद का नहीं है अली सा. शायद पहले भी कहीं कहा था मैंने कि चाहे जिस भी नाम से पुकारें, मगर हमारे जीवन की स्क्रिप्ट पहले से लिखी हुई है.. और शायद गीता में कही गयी "मैं करने वाला हूँ' को भुला देने की बात इस स्क्रिप्ट में दखलंदाजी से मनाही है. अब इसे हम प्रारब्ध, नियतिवाद, भाग्य, जो भी कह लें.
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    शेक्सपियेर का नाटक मैकबेथ शायद इसका बेहतरीन उदाहरण है.. चुडैलों की भविष्यवाणियों को सच 'होने देने' के बजाये 'सच करने' की खातिर सब खतम हो गया.
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    वैसे आपके इस आख्यान में 'पंख जैसे खुरों वाले घोड़े' को मैं 'मैकबेथ' के 'भागकर तुम्हारे करीब आता जंगल' की बराबरी में पाता हूँ.
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    वैसे आपकी व्याख्या के बाद सिर्फ इधर उधर के किस्से ही सुना सकता था मैं!!!:)

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    1. सलिल जी ,
      (१) नियतिवाद का शानदार उद्धरण !
      (२) घटना अफ़सोसनाक है / हौलनाक है पर...मृत्यु से भागा हुआ व्यक्ति पुनः मृत्यु के हवाले हुआ , सो लगता है कि जैसे यह सब तयशुद रहा होगा ! ये जो किसी भी घटना का तयशुद लगना है बस उसे ही नियतिवाद कह डाला है ! आस्थाओं के संसार में यह सर्वमान्य धारणा है सो उस जमीन पर इस मुद्दे पर कोई तर्क नहीं !

      आप पहले की तरह से सुगढ़ विवेचक !

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  10. Muddaton baad net pe baithi hun,lekin kharab sehat ke karan aapko padh nahee payee.

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    1. आप अपनी सेहत का ख्याल रखिये , आलेख वगैरह कहीं भागे नहीं जा रहे हैं , इन्हें बाद में भी पढ़ा जाएगा ! सबसे पहले सेहत ! आपकी सेहतयाबी के लिए दुआएं !

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  11. १-कथा सुनी है पहले किन्तु उसमे थोडा बदलाव था , मृत्यु के देवता एक अमीर आदमी को एक दिन बाद के उसकी मौत के बारे में बताते है वो ढेर सारा धन दौलत खच्चरों पर लाद कर दूसरी जगह भागता है तो देवता के सेवक कहते है की देखीये वो भाग रहा है , तब देवता कहते है की भागने दो वो वही जा रहा है जहा उसकी मृत्यु लिखी है | नियतिवाद के साथ उसमे ये भी जुड़ा था की अंत आने पर आप की धन दौलत भी काम ना आएगी जो कमाया है वो यही रह जायेगा | ये कहानी किस सभ्यता से जुडी है मुझे नहीं पता |
    २- दूसरे धर्मो के बारे में तो मै नहीं जानती किन्तु हिन्दू धर्म में मौत को अंतिम सत्य कह उसे स्वीकार करने और उसके प्रति सहज रहने की शिक्षा दी जाती है ( जैन धर्म में तो मृत्यु के पास खुद चले जाने का प्रावधान है ) , जो आप को बेकार का संचय करने और बुरे कर्म करने के प्रति आगाह भी करती है , इस तरह की कहानियो का निर्माण आप को बार बार वही बात याद कराने के लिए बनाई जाती है |
    ३- नियतिवाद या भाग्यवाद कही ना कही कर्मवाद से भी जुड़ा है अच्छे कर्म करो तो अच्छा भाग्य बनेगा या मौत निश्चित है तो उससे डरने की जगह जीवन में अच्छे काम कर लो, समय रहते अपनी जिम्मेदारिया पूरी करो कल पर मत टालो क्योकि मौत कब लिखी है कोई नहीं जानता और जब लिखी है तो वो हो कर रहेगी उसे कोई नहीं टाल सकता है |
    ४- @ मेरा अपना अनुमान यह है कि मनुष्य के मन:संसार में ईश्वर निर्धारित जीवनचर्या और परिणामों के जन्म पूर्व निर्धारणवाद का खलल धर्मों की देन है !
    सहमत , ये सब इंसानी ही ज्यादा है , वही संसार को और मनुष्य को सीधे रास्ते पर रखने की इच्छा , किन्तु समय, मनुष्य और उसकी सोच एक सी नहीं होती है , जिस भाग्यवाद या नियतिवाद का निर्माण मनुष्य को अच्छे कर्म करने के प्रोत्साहन के लिए बनाया बया था वो उसके कर्म ना करने का कारण बना गया , आराम से बैठो जो भाग्य में होगा वो मिल जायेगा , एक बार कोशिश कर ली बहुत है ये भाग्य में ही नहीं है , जैसी बातो ने पूरे कांसेप्ट को ही बदल दिया, लोग कर्म भूल गये और भाग्य नियति को ही पकड़ कर बैठ गये |
    ५- नीजि तौर पर मुझे ये लगाता है की इस नियतिवाद ने मनुष्य के विकाश में भी बाधा पहुंचाई है नियतिवाद को मानने वाले एशियाई देशों का विकाश कहा है और बाकियों का कहा | नियतिवाद आप को संचय करने से रोकता है और संतोष करने को कहता है , सब नश्वर है वाला कांसेप्ट ने व्यक्ति को और विकाश करने और जितना है उतना ही बहुत है जीवन के लिए की सोच ने नये निर्माण करने से रोका , जिससे इन देशी का विकाश रुक गया |

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    1. (१)
      धर्मगत मान्यताओं /आस्थाओं के चलते दुनिया की बहुसंख्य आबादी नियतिवादी हो गई है , ऐसे में कथाओं की समानता सहज ही है , इसलिए हम सभ्यताओं में भेद / या उनकी पहचान ना भी करें तो चल जाएगा !
      (२)
      जैन धर्म का उद्धरण आपने सही दिया ! हिंदू धर्म ही क्यों कमोबेश सभी धर्म इस मामले में एकमत है ,यह मान कर चलिए :)
      (३)
      मुद्दा यही है कि कर्मवाद को नियतिवाद से जोड़ दिया गया है ! बहरहाल होनी तो होके रहेगी वाला विश्वास कर्मवाद को हतोत्साहित करता है !
      (४)
      सहमति के लिए शुक्रिया !
      (५)
      सत्य वचन ! आपसे सहमति !

      आपकी प्रतिक्रिया में भटकाव नहीं है सीधी लीक पर शानदार !

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