बुधवार, 8 अगस्त 2012

लापता...सोये और जागे हुए लोग !

ये कथा दुनिया में मृत्यु के आगमन के विषय में है  !  कहते हैं कि सृष्टि के प्रारम्भ में मृत्यु नहीं थी  !  नैतेरू-कोप , जोकि सृष्टि के रचयिता हैं ,  वे धरती पर जिस प्रथम मनुष्य को लेकर आये , उसका नाम लीयिओ था !  नैतेरू-कोप ने लीयिओ से कहा जब धरती पर किसी मनुष्य की मृत्यु हो जाये और उसकी देह का निपटारा / अंतिम संस्कार किया जाना हो तो , याद से कहना कि ‘मनुष्य मरता है तो लौटकर आता है , चंद्रमा मरता है तो दूर ही रहता है‘ !  कालान्तर में जब पड़ोसी के बच्चे की मृत्यु हुई तो उसकी देह के निपटान के लिये लीयिओ को बुलाया गया !  घर से बाहर , मृत बच्चे की देह का संस्कार करते वक़्त लीयिओ से एक गलती हुई , उसने कहा ‘चंद्रमा मरता है तो लौटकर आता है , मनुष्य मरता है तो दूर ही रहता है’ ! सो इसके बाद से दुनिया में कोई भी मनुष्य मृत्युपाश से नहीं बच सका !

इसके कुछ माह बाद स्वयं लीयिओ के बच्चे की मृत्यु हुई तो वह उसकी देह को संस्कार के लिए बाहर लाया और कहा ‘मनुष्य मरता है तो लौटकर आता है , चंद्रमा मरता है तो दूर ही रहता है ‘ !  इसे सुनकर नैतेरू-कोप ने लीयिओ से कहा ,  तुम्हारी स्वयं की गलती की कारण से , अब बहुत देर हो चुकी है  !  दुनिया में मृत्यु की उत्पत्ति उसी दिन हो चुकी थी , जिस दिन तुम्हारे पड़ोसी के बच्चे की मृत्यु हुई थी !  कहने का आशय यह है कि , मृत्यु लीयिओ के त्रुटिपूर्ण कथन के कारण से दुनिया में आई और अब , जब भी कोई मनुष्य मरता है , तो लौट कर नहीं आता जबकि चंद्रमा मरता है तो लौटकर वापस आता है ! स्मरण रहे कि मसाई लोग मृत शब्द का प्रयोग कभी नहीं करते , युवा मृत्यु के प्रकरण में वे ‘लापता’ और वृद्धजन की मृत्यु के लिए ‘सोया हुआ’ शब्द का प्रयोग करते हैं  !

मसाई आदिवासियों की इस लोक कथा के बारे में काफी पहले पढ़ा था , मृत्यु के विरुद्ध अमरता वाली मसाई फीलिंग्स से हटकर एक कथा मैडागास्कर में भी प्रचलित है , जिसमें मनुष्य की मृत्यु को केले के पौधे की तरह से वर्णित किया गया है , उस कथा में चन्द्रमा की मृत्यु और उसके क्रमिक पुनर्जीवन के चलते सौन्दर्यशाली चंद्रमा की अमरता को , उसके एकाकीपन तथा उसके नीरसता पूर्ण जीवन से जोड़ा गया है !  कथा के अनुसार ईश्वर ने धरती के प्रथम पति पत्नी से पूछा कि वे किस तरह की मृत्यु चाहेंगे , चंद्रमा की तरह से धीरे धीरे क्षय होने के उपरान्त पुनः धीरे धीरे पुनर्जीवन पाने और अमर बने रहने वाली अथवा केले के पौधे की तरह से ? पति पत्नी ईश्वर के प्रश्न को ठीक से समझे नहीं तो ईश्वर ने उन्हें समझाया कि केला सदैव के लिए मृत हो जाता है , वह चंद्रमा की तरह से पुनर्जीवन नहीं पाता बल्कि उसकी मृत हो जाने वाली देह से अन्य संततियां (केले के पौधे) जन्म लेती हैं !

गहन चिंतन के उपरान्त पति पत्नी ने तय किया कि वे चंद्रमा की तरह की उबाऊ / एकरसता वाली (मृत्यु )अमरता नहीं चाहेंगे , क्योंकि इस अमरता में नवजीवन नहीं है , दूसरा कोई साथी भी नहीं है , प्रेम और खुशियाँ भी नहीं हैं , जबकि केले के पौधे की मृत्यु में नवजीवन का आनंद है !  केले की तरह की मृत्यु के उपरान्त नये जीवन को धरती में लाने का चमत्कार है  , नई संततियों में प्रेम और लगावट के अवसर हैं , यहां नीरसता नहीं है , अकेलापन भी नहीं है !  धरती के इस प्रथम जोड़े ने अस्थाई सहवास चुना !  अमरता के बदले उन्होंने ईश्वर से , वह मृत्यु चाही जो नवजीवन अपने पीछे छोड़ कर जाती है और यह क्रम अनोखी अमरता को जन्म देता है, जिसमें खुशियाँ और प्रेम सदैव जीवित रहते हैं !  उन्होंने देहों की नश्वरता और सह अस्तित्व को चुना ! अनेकता और बहुलता को चुना !  

अगर गौर से इन दोनों कथाओं को देखें तो हम पायेंगे कि मसाई समुदाय , मृत्यु को प्रथम पुरुष की कथनगत त्रुटि का परिणाम मानता है ! उसमें , सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदत्त वचन की अमरता नहीं मिल पाने की टीस है ! वहां त्रुटि के निवारण की असंभावना वाली कथागत अमरता है !  मृत्यु , एक मानवीय भूल है ! इसके बरअक्स , मैडागास्कर के आख्यान वाला, प्रथम जोड़ा ईश्वरीय वरदान में से , स्वयं सोच समझकर नश्वरता को चुनता है !  मृत्यु के विषय में कहे गए इन दोनों आख्यानों में अमरत्व प्राप्त चंद्रमा और सृष्टि रचयिता ईश्वर के उपहार / कृपा की संभावना समान रूप से मौजूद है , परन्तु सचेत और लापरवाह निर्णय का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है ! मृत्यु की दार्शनिक व्याख्या बतौर मैडागास्कर की कथा , मसाई कथा से अधिक प्रभावशील प्रतीत होती है !  यहां चंद्रमा और ईश्वर के रूप में अनंत निरंतर प्रकृति है तथा नश्वर देह के रूप में मनुष्य भी , पर अंतर है तो केवल दृष्टिकोण का...!


{ निशांत मिश्र जी संदेशपरक आख्यानों/बोधकथाओं के ओलिम्पियन हैं ! जुलाई महीने के आखिर में मृत्यु बाबत उनका एक लिंक देखने का अवसर मिला ! इरादा था कि आलेख वाली कथाओं के लिंक उन्हें दे दूं पर पता नहीं बात कैसे आई गई हो गई ! यह आलेख निशांत जी को समर्पित तथा उनसे प्रेरित माना जाए }

19 टिप्‍पणियां:

  1. Bina mrutyu ke jeewan kee kalpana karna asambhav-sa lagta hai!

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  2. विश्व के ज्यादातर प्राचीन साहित्य में अमरता की ही अभिलाषा है और अमृत कलश को हथियाने की चाह है .....मृत्योर्मामृतंगमय का उद्घोष ही मानवता की अंतिम अभीष्ट है ........यह कथा इस विचार से अलग है !

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    1. एक कथा में मानवीय भूलवश अमरता न मिल पाने की कसक और दूसरी में अमरता को ठुकराया जाना स्पष्ट दिखाई देता है !

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  3. मृत्यु और भविष्य न जान सकने के अद्भुत तिलस्म ने जीवन को कितने सुंदर दर्शन दिये!
    ...खूबसूरत पोस्ट।

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  4. life comes with fear of death....
    every 'start' have an 'end'.

    b'fully wrtten.

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  5. मनुष्यता का स्तर अबोरिजिनल हो या उत्तराधुनिक, दोनों में ही जन्म और मृत्यु की मीमांसा दो अबूझ पहेलियों के उत्तर की तलाश में एक छोर से दूसरे छोर के बीच की यात्रा है. दुर्भाग्य यह है कि हमारा सदियों का अर्जित चिंतन और विज्ञान भी हमें मृत्यु की उस पीड़ा से निजात नहीं दिला सकता जिससे जीव जगत के बोधिहीन प्राणी अछूते और असम्पृक्त हैं.
    इन कथाओं का आप बेहतरीन deconstruction करते हैं. यह विश्लेषण लाजवाब है. कभी मुझे लगता है कि हमने न जाने ऐसे कितने दुर्लभ और नायाब प्रसंगों को इतिहास के प्रवाह में खो दिया है. शायद कुछ व्यक्तियों के लिए ये महत्वहीन हों लेकिन आख्यानों और जनश्रुतियों के बिना मैं मानव सभ्यता और संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकता.

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    1. यह पोस्ट आपको ही समर्पित है ! जिन व्यक्तियों के लिए आख्यान महत्वहीन हों उन पर दया का भाव बनाये रखियेगा !

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  6. अली सा!
    निशांत जी द्वारा प्रस्तुत आख्यानों और बोधि कथाओं को पढ़ा भी है और अपने ब्लॉग पर शेयर भी किया है.. आज आपकी यह पोस्ट उनको समर्पित किये जाने पर मुझे व्यक्तिगत तौर पर खुशी हुई.. उनका कमेन्ट भी देखा, जो कमोबेश वही बात बयान करता है जो मैं अलग-अलग मौकों पर कहता रहा हूँ..
    खैर! आज के आख्यान युगल के सम्बन्ध में बस एक मुस्कराहट सी फ़ैली है मेरे होठों पर. दोनों में अंतर होने के बावजूद भी एक समानता है कि दोनों आख्यानों का निष्कर्ष एक ही है.. मृत्यु अवश्यम्भावी है.. मुस्कराहट का कारण पुनः हमारे शास्त्रीय आख्यानों/घटनाओं के साथ इन कथाओं का मेल है.. इंसान कितनी भी कोशिश कर ले, अमरत्व प्राप्त कर लेना सिर्फ एक सराब साबित होता है.. रचयिता का इतना पुख्ता इंतज़ाम है कि चाहे गलती से ही सही वो गलत प्रार्थना करता है और अमरत्व खो देता है.. (हमारे बुज़ुर्ग कहते हैं कि यह सब करता रचयिता ही है, लेकिन हालात ऐसे पैदा कर देता है मानो इंसानी भूल हो).. भस्मासुर, रावण, हिरण्यकश्यप, होलिका, कंस आदि कितने ही ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जो खुद को अमर माने बैठे थे, लेकिन परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि मौत को गले लगाना पड़ा और आज भी दुनिया उसे उनकी ही भूल बताती है, जबकि मानती है कि वह रचयिता का खेल था..
    दूसरी कथा में एक सात्विकता के साथ मृत्यु को स्वीकार किया गया है और कोंट्रास्ट के तौर पर मृत्यु के बाद की अमरता को संततियों के रूप में तथा केले के प्रतीक के रूप में दर्शाया गया है..!! नतीजा दोनों का एक ही है कि मौत अवश्यम्भावी है क्योंकि मृत्यु ही जीवन का दूसरा छोर है या कहें कि जिसे हम मृत्यु कहते हैं वह वास्तव में जीवन-चक्र का दूसरा छोर है जो शायद चक्र में होता ही नहीं!!

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    1. सलिल जी,
      बढ़िया विवेचना !
      नि:संदेह ईश्वर / प्रकृति / मृत्यु दोनों ही आख्यानों के समान तत्व है ! मृत्यु को लेकर यही बात मैंने भी कही है कि अंतर केवल सचेत और लापरवाह निर्णय का है ! जैसा कि भारतीय दृष्टान्तों में , आपने भी ज़िक्र किया है , ईश्वर से वरदान पाने के हकदार लोगों के लापरवाह निर्णय / उनकी प्रार्थना वाली चूक या फिर ईश्वर का पुख्ता इंतजाम !
      यदि प्रकृति को ही ईश्वर माने तो भी सृजन सह विनाश को स्वीकारना होगा और अगर ईश्वर को प्रकृति से ऊपर का रचयिता मानकर चलें तो भी हमें नश्वरता /अनित्यता को लेकर उसके नियतिवाद को स्वीकारना होगा ! आदिम लोक जीवन में अनित्यता का चिंतन महत्वपूर्ण है !

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  7. हमारे यहां कहते हैं फ़लॉं पूरा हो गया.

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    1. हां ! दिन पूरे हुए या फलां पूरा हुआ कहने का चलन बहुतेरी जगह में है !

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  8. मुझे केले के द्वारा नवजीवन की उत्पत्ति का उदाहरण रोचक और दार्शनिक लगा.अमरता इसी लिहाज़ से बेहतर है कि उसका रूप बदल जाय क्योंकि जीवन-चक्र टूटने से जीने का भी रोमांच खत्म हो जाता है.अमरता के साथ अजर होना असंभव है,इसलिए भी चोला बदल जाना आवश्यक है.
    ...देर से इस पोस्ट की जानकारी मिल पाई,इसकी भरपाई बहुत मुश्किल है.

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    1. सही ! केले वाली कथा में दार्शनिकता अधिक हैं !

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