सोमवार, 16 अप्रैल 2012

विषयवस्तु बनाम शब्द और दृष्टिकोण !

पिछले दिनों प्रेम पर लिखने का निश्चय किया ! चिंतनशील मित्र कह उठे...इस उम्र में ये विषयवस्तु आपको शोभा नहीं देती, फिर सपनों को जमीन पे उतारना चाहा,कि मित्र यहां भी आड़े आ गये उन्होंने कहा अविश्वसनीयता की पक्षधरता की आपसे अपेक्षा ना थी ! जितना शीघ्र हो सके इससे मुक्त हो जाइए ! अतिवामपंथ पर लिखना चाहूं तो सेवा की मर्यादायें सामने मुंह बाये खड़ी हैं ! सोचता हूं कि समाज विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते, मनुष्य, उसकी भावनाओं, उसके संबंधों, उसकी परम्पराओं,उसके मृदु कटु जीवन की विषयवस्तु पे ना लिखूं ? तो किस पे लिखूं ? मनुष्य और उसकी सामाजिक सांस्कृतिक जीवनचर्या के कौन से पक्ष मेरे लेखन के लिए स्वीकारणीय होंगे और कौन से क्षेत्र निषिद्ध कहलायेंगे ? क्या इनके निर्धारण में मेरी आयु, एक मानक का काम करेगी ? या कि मेरे व्यक्तिगत परसोना को ध्यान में रख कर कतिपय विषय क्षेत्रों का चयन अपरिहार्य हो जाएगा ? या फिर सामाजिकता के विद्यार्थी के रूप में, मैं सामाजिकता की विषयवस्तु पर मुक्तहस्त लेखन के लिए पूर्णतः स्वतंत्र माना जाऊंगा ?

यदाकदा  सोचता  हूं  कि  हम  अपनी रूचि के  अनुसार किसी विषय क्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं  और उसके विद्यार्थी हो जाते हैं  ! विद्यार्थी के रूप में , स्वयं की आयु , व्यक्तिगत छवि आदि आदि का उस विषय में , वरीयता अथवा वर्जित क्षेत्र निर्धारित करने से क्या लेना देना ?  क्या मेरे लिए मनुष्य के संबंधों और उसकी भावनाओं से सम्बंधित विषयवस्तु पर लेखन निषेधात्मक है ? क्या मुझे प्रेम और सपनों पर केवल इसलिए नहीं लिखना चाहिये कि ये विषय मेरे व्यक्तिगत परसोना से मैच नहीं करते ? या फिर ये विषय दार्शनिकता और चिन्तनशीलता की कसौटी पर निम्नतर माने जा रहे हैं  ? क्या इन्हें चिंतन परम्परा से निष्कासित कर दिया गया है याकि हेय मान लिया गया है ? मानवीय जीवन के विद्यार्थी के तौर पर मुझे जीवन के हर पक्ष पर लिखने से पहले क्या इन पक्षों में भी श्रेष्ठता और हीनता के विभेद करने होंगे ?  क्या मैं प्रेम और कामुकता की तुलना में धार्मिकता और जातीयता को उच्चता और निम्मता के मापकों पर कसकर देखूं  ?  क्या विषय वस्तुओं के मध्य  इस तरह के चयन अनुचित नहीं हैं ? 

मेरा अपना विचार ये है कि कोई भी विषयवस्तु किसी दूसरी विषयवस्तु से हीन अथवा  श्रेष्ठ नहीं मानी जा सकती !  इन्हें परस्पर एट पार / समान रूप से सम्मानित माने जाने के सिवा दूसरा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता ! विषय वस्तुओं के मध्य श्रेष्ठताओं की खोज का विचार अथवा कथन एक परिहास ही है !  उदाहरण के लिए , एक पाषाण खंड मेरे लिए जितना अनुपयोगी है , एक सामाजिक व्यवहार , किसी भूविज्ञानी के लिए उतना ही अनुपयोगी हो सकता है !  किन्तु सोच के इस तरीके से इन दोनों विषय वस्तुओं में उच्चता और निम्नता का क्रम निर्धारण औचित्यहीन है  !  अब इसी उदाहरण को आगे बढ़ाते हुए कल्पना की जाये कि एक बिल्डिंग मैटेरियल विक्रेता और एक भूविज्ञानी अथवा कोई पुरातत्ववेत्ता , उस पाषाण खंड के बारे क्या एक जैसी राय रखते होंगे ?  निश्चित रूप से नहीं  !  कहने का आशय ये है कि विषय वस्तुओं के मध्य पारस्परिक  श्रेष्ठता और हीनता की बात करना , तर्क संगत नहीं है , जबकि केवल एक ही विषयवस्तु के बारे में भी भिन्न व्यक्तियों / विद्यार्थियों / विशेषज्ञों के दृष्टिकोण अलग अलग हो सकते हैं  !

सोचता हूं कि किसी नवविवाहित युगल अथवा प्रेमी जोड़े को ताजमहल अथवा खजुराहो की प्रणय मूर्तियां देखकर क्या ख्याल आता होगा ?  इसकी तुलना में एक फ़िल्मकार अथवा संस्कृतिकर्मी या कोई पुरातत्वविद इनके बारे में उस नवविवाहित युगल से भिन्न विचार रखते होंगे कि नहीं  ?  जबकि इन तीनो के पर्यवेक्षण के अधीन एक ही विषय वस्तु होगी  !  इतना ही नहीं अगर कोई गाईड इन स्थानों के विवरण अपने क्लाइंट्स को दे रहा हो तो ये विवरण किसी पुरातत्ववेत्ता के विवरणों से सर्वथा भिन्न होंगे  !  कहने का उद्देश्य यह है कि एक ही विषयवस्तु की व्याख्यायें , व्याख्याओं में प्रयुक्त शब्द , पर्यवेक्षणकर्ता / विद्यार्थी / शोधार्थी की अपनी अध्ययनशीलता / मननशीलता / दृष्टिकोण के आधार पर पृथक पृथक हो सकते हैं  !  नवविवाहित युगल के लिए गाइड का विवरण , पुरातत्व वेत्ता के विवरण से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और उपयोगी होगा , ठीक इसी तर्ज़ पर किसी विद्यार्थी के लिए पुरातत्ववेत्ता के विवरण की तुलना में गाइड का विवरण बकवास ही माना जाएगा  !

यह आलेख लिखते समय विषयवस्तु  की तुलनात्मक श्रेष्ठता के विचार से असहमति दर्ज करने के अतिरिक्त यह कथन भी करना था कि विषय वस्तुओं का महत्त्व उसके विवरणदाताओं , जिन्हें हम विद्यार्थी भी कह सकते है , के दृष्टिकोण और उनके द्वारा प्रयुक्त किये गये शब्दों पर निर्भर करता है और विषय वस्तुओं की उपयोगिता , उपयोगकर्ताओं की व्यक्तिगत क्षमता तथा उनके  स्वनिर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति एवं संतोष की मात्रा  पर निर्भर करती है ! अतः मेरी निज धारणा यह है कि विषय वस्तुओं के हल्केपन और गुरुतर होने का विचार ही  अतार्किक है  !  कोई भी विषयवस्तु किसी दूसरी विषयवस्तु की तुलना में श्रेष्ठ या हीन नहीं  कही जा सकती ! किसी भी विषयवस्तु का महत्व और उसकी उपयोगिता , उसके व्याख्याकार के दृष्टिकोण तथा उसके उपयोगकर्ता के उद्देश्य और संतोष से सुनिश्चित होती है  !  उपयोगकर्ता और चिंतनकर्ता के बिना विषयवस्तु का कोई मोल नहीं पर इन दोनों के लिए विषयवस्तु भी एक अपरिहार्य आवश्यकता  है  !

54 टिप्‍पणियां:

  1. जो विषय आपको उचित लगे - उस पर लिखना ही सबसे बेहतर option है :) regardless of कौन क्या सोचेगा |

    वैसे - कई विषय वस्तुएं ऐसी हैं - की हम उन पर लिखने में स्वयं ही रूचि न भी रखते हों, तब भी कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं, की मौन रहना भी मौन समर्थन सा हो जाता है | तब उन विषयों पर भी लिखना आवश्यक हो जाता है |

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    1. जी बस यही मैं भी कहना चाहता हूं ! आभार !

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  2. मेरा अपना विचार ये है कि कोई भी विषयवस्तु किसी दूसरी विषयवस्तु से हीन अथवा श्रेष्ठ नहीं मानी जा सकती ! इन्हें परस्पर एट पार / समान रूप से सम्मानित माने जाने के सिवा दूसरा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता ! विषय वस्तुओं के मध्य श्रेष्ठताओं की खोज का विचार अथवा कथन एक परिहास ही है ..ekdam sahi kaha aapne...

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  3. जहाँ तक किसी के लिखने के लिए विषय-वस्तु सुझाने की बात है या किसी पर विषय-विशेष पर दबाव डालने की बात है तो यह सर्वथा अतार्किक और अनुचित है.आपका मामला यहाँ इससे इतर है पर आपने इसमें अपनी लेखकीय-स्वतंत्रता के नाम पर थोड़ा घालमेल-सा किया है.

    यह बिलकुल बहस से परे बात है कि आप क्या लिखें,इसे दूसरे निर्धारित करें.आपकी जहाँ रूचि होगी ,आप वहीँ लिखेंगे,लेकिन विषय-वस्तु तार्किक है या नहीं,इस पर तो प्रश्न उठाना लाजिमी हैं.सपनों पर कवितायेँ लिखना अलग बात है क्योंकि कविता के साथ काल्पनिकता संपृक्त होती है, पर गद्य-लेखन,जो संस्मरणात्मक हो और न विज्ञान-सम्मत हो,न तर्क-संगत, तो मैं समझता हूँ कि ऐसी बातें बार-बार दुहराना उसकी तार्किकता को बल प्रदान करने का प्रयास लगता है.

    भूत-प्रेत,पुनर्जन्म और ख्वाबों को अभी तक किसी तर्कसंगत समाज ने मान्यता नहीं दी है,यह भी आपको पता होगा.इसलिए किसी भी लेखन में ठहराव नहीं हो,अपुष्ट बातों को बढ़ावा न मिलता हो,इस बात को कहने का अधिकार पाठकों के पास है या नहीं ?

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    1. संतोष जी ,
      सुझाने और दबाब डालने में से हमें मात्र सुझाव स्वीकार हैं !

      लेखकीय स्वतंत्रता के नाम पर घालमेल का संकेत आपने पहले किसी पोस्ट में दिया नहीं :)

      कविताओं और गद्य में भेदभाव क्यों ? ऐसा लगा कि जैसे कविताओं को सात खून माफ हों :)

      खैर यह आपका अपना नज़रिया है कि कविताओं में कुछ भी लिखा जा सकता है पर बेचारे गद्य को विज्ञान से परमीशन लेकर लिखना होगा :)

      कोई भी तथ्य अपने जन्मते ही विज्ञान साबित नहीं हो जाया करता ! अगर उसे बार बार कहने और उसके परीक्षण के अवसर ही आप नहीं देंगे तो वह अपने आप को प्रूफ़ कैसे करेगा :)

      लगता है कि आपने अंतरिक्ष में राकेट भेजने से पहले / पुल बनाने से पहले / किसी बड़े अस्पताल की नींव रखे जाने से पहले किसी वैज्ञानिक / इंजीनियर अथवा डाक्टर को नारियल फोड़ते और तिलक लगाते नहीं देखा :)

      या फिर ये विज्ञान सम्मत बातें लगती हैं आपको :)

      शायद ऐसे ही समाज को तर्क संगत समाज मानते हैं आप :)

      पाठकों को किसी भी बात को ख़ारिज करने का अधिकार है पर लिखने वाले के मुंह में बलपूर्वक अपने शब्द डालने का अधिकार नहीं है यह तो आप भी समझते होंगे :)

      कल सुबह दो दिनों के लिए बाहर जा रहा हूं संभवतः इंटरनेट सुविधा के अभाव में आपसे चर्चा ना कर पाऊं ! कृपया धीरज धरियेगा :)

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    2. @लेखकीय स्वतंत्रता
      यहाँ हमारे कहने का तात्पर्य यह था कि लेखकीय स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार तो है,पर क्या अतार्किक बातों को इसी की ओट लेने दें.आप कहेंगे कि जो बातें हमें अतार्किक लगती हैं,हो सकता है वह आपको न लगती हों,एक हद तक सही है पर कुछ बातें सार्वभौमिक सत्य की तरह हैं.ऐसे में अगर कोई बाबा किसी को झाड़-फूंक से निदान करता है तो वह व्यक्तिगत-स्तर तक ठीक हो सकता है पर उसका आधार है क्या ?
      ...आप अगर फंतासी की कहानी लिखते हैं या कोई लेख ,उसमें फर्क है या नहीं ? कविता का तर्क-पूर्ण न होना सामान्य है पर किसी लेख को तो ऐसी कसौटी से गुजरना ही पड़ेगा,जब तक वह गल्प-कथा या फंतासी न हो !

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    3. @ संतोष जी ,
      सभी बातें अपने जन्म के समय / शैशव काल में , अतार्किक कही जा सकती हैं ! क्योंकि वे तब स्वयं अपने पक्ष में कुछ कह पाने योग्य नहीं होतीं ! किन्तु उनका तार्किक अथवा अतार्किक होना उनका पक्ष सुनकर परखकर ही तय किया जाएगा यही नैसर्गिक न्याय भी है :)

      प्राकृतिक सत्यों की तुलना में बहुधा सामाजिक सत्य सार्वभौमिक नहीं होते / और हो भी नहीं सकते , मसलन चरण स्पर्श / सप्तपदी हमारे स्थानीय सत्य है , पूरी दुनिया के नहीं ! बस यही ट्रेंड सारी दुनिया की स्थानीयताओं और उनके अपने सामाजिक सत्यों / तथ्यों में मिलेगा :)

      बाबा जी की झाड़ फूंक को आपको असत्य सिद्ध करना है :) यहां यह कह दूं कि मेरी 'कहन' बाबा जी की झाड़ फूंक के स्तर / आयु तक नहीं पहुँची है ये आपका उदाहरण है सो लिख दिया :)

      कविता का सामान्यतः तर्कपूर्ण नहीं होना मिथ्या धारणा है !

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    4. आज एक बार फ़िर से पढ़ा....आपकी बातों से सहमत हूँ ।

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  4. जैन धर्म में निहित दर्शन है 'स्यादवाद'इसे 'सत्य का सप्त्भंगीय सिधांत' भी कहते हैं।
    वैचारिक सहिषणुता का सन्देश निहित है इसमें,जो एक ही वस्तु से सम्बंधित
    सत्य के 7 विभिन्न रूपों को बताता है।आपको लिखने और पाठकों को पसन्द-नापसन्द
    करने का बराबर अधिकार है,बस दोनों के निज स्पेस का अतिकर्मण नहीं होना चाहिए।

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    1. सुन्दर प्रतिक्रिया ! निज स्पेस के अतिक्रमण नहीं होने वाले मुद्दे पर शब्दशः सहमत !

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    2. बहुत सुन्दर! न निजता का अतिक्रमण/उल्लंघन हो न जानबूझकर किसी की भावनाओं को चोट पहुँचाई जाये।

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    3. सही ! जानबूझकर बिल्कुल भी नहीं !

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  5. विषयवस्‍तु के साथ handling और treatment खासा मायने रखते हैं.

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  6. यह पोस्ट लेखकीय विवशता की, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगने वाले अनाम पहरेदारी की, सफल अभिव्यक्ति है। कहने को तो हम स्वतंत्र हैं लेकिन वह नहीं लिख पाते जो लिखना चाहते हैं। कई तरह के संकोच / कई तरह की सामाजिक, राजनैतिक, कर्मगत विवशता हमे बांधे रखती हैं। हमारा ईगो आड़े न भी आना चाहे तो मित्रों की प्रतिक्रिया एक भयावह खाका खींच देती है कि हमे तो जरा भाव पानी में रहना था ! हमारा मन पानी की तरह बहना चाहता है। हर पात्र मे उसी का आकार ले समा जाना चाहता है लेकिन हाय! हमसे ठोस बने रहने की अपेक्षा, एक सांचे में ढल जाने की अपेक्षा की जाती है! इन सब के बीच रहते हुए लेखकीय धर्म का निर्वहन करना वाकई कठिन कार्य है। जो पेशेवर, मात्र लेखकीय कर्म में रत हैं उन्हें भी कही न कहीं तो इस दंश को झेलना पड़ता होगा भले से वे अधिक स्वतंत्र हैं। व्यंग्यकारों के सामने तो और भी विकट समस्या होती है। वे अनजाने ही दुश्मन पाल बैठते हैं।

    आपकी इस पोस्ट में कहीं भी असहमति के लिए कोई स्थान शेष नहीं है सिवाय इसके कि आप मित्रों की आलोचना से इतने विचलित क्यों हुए जाते हैं ? और आपके मित्र आपके विचारों से प्राप्त होने वाली उर्जा से हमे काहे वंचित करने पर तुले हुए हैं ?

    आप वही लिखिए जो उचित समझते हैं, जिन्हें लिखने की प्रेरणा अस्तित्व से आपको मिलती रहती है, प्रेम कहानियों और ख्वाबों में अभिव्यक्त आपकी दार्शनिक दृष्टि सर्वथा अनूठी है। क्या हुआ कि ख्वाबों की सच्चाई पर हम यकीन नहीं करते ! हमे इस बात का भी मलाल है कि पिछली पोस्ट से आपने जल्दी किनारा कर लिया जबकि उसके पहले दो पैरा मे अभिव्यक्त दार्शनिक पहलू पर चर्चा अभी शेष थी।

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    1. पाण्डेय जी,लिखने पर हमें भी रत्ती-भर आपत्ति नहीं है,बस निवेदन यही है कि जो बातें तर्क-संगत नहीं लगतीं,उनको बार-बार कहकर क्या हम वैधता प्रदान करने की मुहिम नहीं चला रहे होते हैं ?

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    2. देवेन्द्र जी ,
      आप निश्चिन्त रहें ! लिखा वही जाएगा जो अपनी रूचि का हो ! अपने को गवारा हो ! यह केवल एक आलेख है जो मित्रों के नज़रिए पर रौशनी डालता है ! आलोचना से विचलन काहे का ? हमपे भरोसा कीजिये :)

      पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया ज़रूर दीजियेगा :)

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    3. संतोष जी ,
      तथ्यों को इस तरह से ख़ारिज करियेगा तो भ्रूण हत्या के दोषी माने जाइयेगा :)
      हर तथ्य को अधिकार है कि उसे वैधता प्रदान करने की मुहिम चलाई जाये ! इसमें गलत क्या है ?

      नैसर्गिक न्याय भी यही है कि आरोपी को स्वयं को निर्दोष ( इस मामले मं विज्ञान ) सिद्ध करने का अवसर दिया जाता है ?

      अगर आप किसी का पक्ष सुने बगैर उसका तर्कसंगत नहीं होना प्राथमिक स्तर पर ही तय कर देते हैं तो फिर आप धन्य हैं :)

      ऐसी तार्किकता को प्रणाम ! ऐसे विज्ञान और वैज्ञानिक नज़रिये से बचना चाहूंगा :)

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    4. मित्रो ,
      कल सुबह दो दिनों के लिए जगदलपुर से बाहर जाना पड़ रहा है संभव है इंटरनेट की सुविधाएँ मुझे उपलब्ध ना हों ! कोशिश करूँगा कि आपके सतत संपर्क में रहूँ फिर भी , निवेदन है कि आपकी प्रतिक्रियाओं का जबाब देने में , मेरी इस विवशता को ध्यान में रखियेगा ! शुभकामनाओं सहित !

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  7. एक शब्द में यदि इसपर कुछ कहा जाए तो वह है सहमत.. मगर एक बात जिसपर मेरा विशेष ध्यान गया वह है आपके उम्र का ज़िक्र.. जिस किसी ने यह कहा कि यह बात आपकी उम्र को शोभा नहीं देती, यह बात तो सर्वथा निराधार है.. मुझे ज्ञात नहीं कि आपने प्रेम विषयों पर लिखे किसी भी आलेख में यह कहा हो कि आपकी उम्र इतने वर्ष है. और न ही अली सैयद (हिज्जे दुरुस्त है इस बार) नाम से लगता है कि लंबी दाढी वाले हाजी-नमाज़ी बुजुर्गवार होंगे. लिहाजा जब आपके लेख पढ़े जा रहे हों तो जो आपको व्यक्तिगत तौर पर जानते हों वे तो उम्र से जोडकर देख सकते हैं, मगर सभी नहीं. जब आप प्रेम के बारे में लिखते हैं तो यकीनन मेरे सामने सिर्फ उस घटना/कहानी/लेख के पात्र होते हैं जिनसे आपने परिचय करवा दिया. बाकी तो वो अपनी बात खुद कहते होते हैं, आप तो बीच में होते भी नहीं.. आप अचानक तभी आते हैं जब उन पात्रों की समस्या का हल हमसे चाहते हैं..
    वैसे ही जो आपके साथ हुआ, जो आपने महसूस किया उसके लिए विधाता ने आपको चुना, मैं ऐसा मानता हूँ. और मेरा तो दृढ विश्वास है इस बात पर.. ३०-३५ साल पहले एक बार रात के ढाई बजे आधी नींद से उठकर मैंने एक नाटक लिखना शुरू किया जो सुबह ४ बजे जाकर पूरा हुआ.. और जब आकाशवाणी से वह प्रसारित हुआ तो अपने समय का टॉप रेटेड नाटक हुआ था.. मैंने वो लिखा ज़रूर, लेकिन आधी रात को नींद से उठाकर किसने मुझसे लिखवाया.. कुरआन की आयतें हों या वेड की ऋचाएँ परमात्मा की ओर से किसी पर आयद हुईं. वैसे ही ये सपने, ये अनहोनी, ये अबूझ वाकये सिर्फ इसलिए अबूझ हैं कि ये 'उसके' खेल हैं और हम-आप-वो सिर्फ चुनाव हैं 'उसके'... उसके खेल को अंजाम देने के लिए!!

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    1. सलिल जी,

      हिज्जे बराबर दुरुस्त हैं :)

      दूरभाष पर चर्चा हुई थी ! निकटतम मित्र हैं !

      उस नाटक के बारे में कहियेगा / यहां प्रकाशित करियेगा !

      अभी इतना ही लौट कर चर्चा करता हूं !

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  8. प्रेम के बि‍ना भी कोई जीना है !
    लि‍खि‍ये प्रेम पर(छोड़ि‍ए दूसरों को).
    मैं आपके साथ हूं ☺

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    1. प्रेम पर लिखें...मैं भी साथ हूँ !

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    2. @ काजल भाई ,
      आप की सहमति / सम्मति आश्वस्त करती है :)

      @ संतोष जी
      :)

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  9. विषय भले एक ही हो, आयु के अनुरूप देखने का नजरिया तो बदल जाता है.

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    1. आदरणीय सुब्रमनियन जी ,
      आयु के अलावा दूसरे फैक्टर्स भी होते हैं जिनसे एक ही विषय को देखने का नज़रिया बदल जाये पर मैं इन्हें अलग अलग नाम देने के बजाय कहूंगा , सामाजिक / पारिवारिक स्कूल और औपचारिक स्कूल !

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  10. davav......aur aap......sambhav nahi, ye to mitron ka prem/hit ke hetu hain jo apne vichardhara evam drishtikon me bandhana chahte hon.....

    barke bhaijee 'sau-tish' ke anusar blog-jagat me ek se ek aacharya hain hain apne kshetra ke......lekin, 3 saal ka ye balog-balak, vishay aur pratikriya par santulan sadhne ke apki kala ka kayal hua jata hai.....

    bakiya, shabd-sahitya-gyan aur tark pe gahan tarkpurn sangat ke liye 'mandali' me hame sabhi 'brahmarshi-maharshi-rajarshi' ke tarah hi pratit hote hain.....

    pranam.

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    1. सञ्जय भाई ,

      इसे मित्र प्रेम ही कहना उचित है !

      ओह इसे आपका अनुग्रह ही मानूंगा !

      सो तो है :)

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  11. इन्ही स्थितियों के लिए कहा गया है...."सुनो सबकी करो अपने मन की.." या फिर.."कुछ तो लोग कहेंगे.."
    बस इसी पर अमल करते हुए...अपने मनपसंद विषय पर लिखते रहें...अगर दो लोग असहमति जताते हैं तो चार लोग सहमत भी होते हैं

    ये समीकरण नहीं बदलता...

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    1. सही है पर मित्र व्यथित हैं यह भी तो बताना पड़ेगा :)

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  12. विषय पर प्रतिबन्ध कैसा ! आप जिस विषय पर चाहें , लिखें . और विषयों में जितनी विविधता होगी , उतना ही ब्लॉग दिलचस्प लगेगा .
    बस हिंदी को थोडा सरल बना लें तो पाठक ज्यादा सहज महसूस करेंगे .
    अरे भाई , यह कोई हिंदी की थीसिस का मामला थोड़े ही है . :)

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    1. अब इससे सरल बनाना तो अली सा के वश मे नहीं।:)

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    2. डाक्टर साहब ,

      ब्लाग विषयों की विविधता पर आपका ख्याल दुरुस्त है !

      सरल हिन्दी के मसले पे देवेन्द्र जी सही कह रहे हैं :) फिर भी कोशिश करके देखता हूं कि मेरे अंदर से ये वाली सरलता बाहर निकल पाये :)

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  13. और हाँ , आपकी पोस्ट का इ मेल से सन्देश हमें एक दिन बाद मिलता है . कोई विकल्प है ?

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    1. देखता हूं कि क्या किया जा सकता है !

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  14. अब मैं भी आपके हरे जख्मों को कुरेदूंगा तो ज्यादती हो जायेगी ०ऐसा कीजिये सुश्री रश्मि रविज़ा जी की ही लाख पते की सलाह मानिए कि सुनिए सबकी करते अपने मन की रहिये ...आलोचना ..हुंह ? हू केयर्स ! :)

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    1. अरविन्द जी ,
      अच्छा हुआ जो आपने ज्यादती नहीं की :)

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  15. आप तो यूँ भी ऐसा कुछ लिखते नहीं है जिसपर किसी को आपत्ति हो !

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    1. यही तो मैं भी समझ रहा था , अगर वे ना कहते तो :)

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  16. इस विषय वस्तु वाली पोस्ट की विषय वस्तु से सौ फ़ीसदी सहमत। कोई भी विषयवस्तु किसी दूसरी विषयवस्तु की तुलना में श्रेष्ठ या हीन नहीं कही जा सकती| हरेक के लिये कोई भी बात एक जैसी नहीं हो सकती।

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    1. हां हरेक बात का अपना महत्व और अपनी अस्मिता होती है जिसकी कद्र की जानी चाहिये !

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  17. @ हम अपनी रूचि के अनुसार किसी विषय क्षेत्र में प्रविष्ट होते है....
    ..... चिंतनशील मित्र कह उठे...इस उम्र में ये विषयवस्तु आपको शोभा नहीं देती ! फिर सपनों को जमीन पे उतारना चाहा , कि मित्र यहां भी आड़े आ गये उन्होंने कहा अविश्वसनीयता की पक्षधरता की आपसे अपेक्षा ना थी !
    ...



    समाज के अपने दायरे और सीमायें हैं अगर उनमें रहकर कार्य करना है तो कोई आलोचना नहीं सहनी पड़ेगी ! मगर अगर दिल कहे, वह कहना है तब यह हदें तोडनी होंगी !

    विरोध भी कोई मामूली नहीं होता ...

    अपने मन की बात स्पष्ट शब्दों में कहना कोई आसान काम नहीं ...
    डॉ अरविन्द मिश्र इस जगह आदर्श हैं ...

    और ऐसा करके न सिर्फ दोस्तों से ...बल्कि अपने घर में भी विरोध सहने को तैयार रहें ! कई बार यह तकलीफदेह होता है...

    अधिकतर आम विद्वान द्वारा की गयी व्याख्याएं, सामान्य गाइड की भांति ही होतीं हैं, जो टीवी और सुनी कहानियों पर निर्भर करती हैं , मार्गदर्शक के रूप में उसे मान्यता देना केवल सत्य के साथ खिलवाड़ ही सावित होगा !
    ब्लॉग जगत आडम्बरों से भरा है, यहाँ से कोई उम्मीद न पालें तो बेहतर होगा, यहाँ भाई लोग पढ़ाने में अधिक दम लगाते हैं ...

    आप ईमानदार मार्गदर्शक हैं, खोजी हैं , आप अपने रास्तें चलें हमें आपसे बहुत सीखना है गुरुवर !

    शुभकामनायें आपको !

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    1. सतीश भाई ,
      लिखा इसलिए कि क्लेश शेष ना रहे वर्ना होना वही है जो दिल कहेगा !

      अरविन्द जी का जुझारूपन प्रचण्डता की सीमायें छूता है इस मामले में वे अकेले हैं दूसरा कोई नहीं !

      बीमारी से अभी पूरी निज़ात नहीं इसलिए आपकी शानदार प्रतिक्रिया का संक्षिप्त जबाब दे पाया हूं !

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    2. मेरे पीठ पीछे मेरी चर्चाएँ ?सगुन अच्छे नहीं लगती !

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  18. मेरी टिप्पणी स्पैम से निकालिए .

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  19. उत्तर
    1. जय , सुनाई तो थी आपने ध्यान नहीं दिया कभी लिंक देता हूं फिर से !

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  20. बहुत अच्छी पोस्ट, उतनी ही अच्छी चर्चा।
    मन तो यही करता है कि जो मन में आए वही लिखूं, पर कई बार यह भी विषय सामने खड़ा हो जाता है कि किसके लिए लिख रहां हूं, सिर्फ़ अपने लिए तो नहीं ही।

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    1. मनोज जी ,
      अपनी ओर से इस सवाल पर सोचा कई बार ,
      क्या केवल स्वांतःसुखाय ?
      या फिर सर्व सुलभताय नम: ?
      अन्यथा केवल चुनिन्दा मस्तिष्कों की खातिर ?

      इन सबके अपने प्लस माइनस , भारी तर्क वितर्क , बड़ी फिसलन , छूटा कोई नहीं , सब अनिश्चित पर प्राथमिकता कहूं तो तीसरे विकल्प पर अटके है !

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  21. बस अपनी बात कहना और पूरी इमानदारी से कहना ही बेहतर होता है.

    स्वास्थ्य से सम्बंधित कभी भी किसी भी जानकारी के लिए आप फोन भी कर सकते हैं.

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