रविवार, 15 अप्रैल 2012

ओ निंदक तू आ मेरे सब्र का इम्तहान ले !

तमाम जिंदगी सिर्फ सोते हुए तो नहीं गुज़ारी जा सकती , इसे जागते हुए भी जीना पड़ता है ! लिहाज़ा जीवन की हर नाक़ाबिल-ए-यकीन घटना केवल ख्वाब में ही घटा करे , ये ज़रुरी नहीं रह जाया करता ! मैं अगर ये कहूं कि ख्वाब में क्या देखा , तो ये भी कहना पड़ेगा कि दरअसल जागते हुए क्या बीती ! जीवन दायिनी मां को अपने बोझ से मुक्त कर चुकने के बाद और ईश्वर पर बोझ बन जाने से पहले की अवधि में कुछ इंसान जागते ज्यादा हैं तो कुछ सोते ज्यादा...पर कई ऐसे भी जिनकी जिंदगी में सोने जागने का अंतर कर पाना बेहद मुश्किल होता है ... और बहुतेरे ऐसे भी , जो अपने जीते जी , सोने जागने का अंतर तो समझते हैं लेकिन बंधु बांधव उनके सोने जागने से लेकर उनके जीवन और खुद उन्हें भी , धरती पर बोझ मानते हैं !

हमारी नींदों में जो घटा अगर वो अवचेतन से प्रकटा है , तो फिर जागते हुए जो कहा , वो केवल चेतन से आएगा , ये विश्वास करना कठिन है ! यौनाकर्षण के फेर में किसी कामिनी से सर्वथा सचेत होकर सफ़ेद झूठ कहा जाये , तो भी समझ में आता है किन्तु आकस्मिकता उदभूत कथन झूठ होने के बजाए सत्य की तरह सिद्ध हो जायें , तो फिर अवचेतन और किसी परा-मानवीयता जैसे एलिमेंट की उपस्थिति की संभावना को हाशिए पे कैसे डाला जा सकता है ! कहने का आशय यह है कि सोने और जागने के हालात में भेदभाव किये बिना हमारे जीवन की घटनायें और हमारे कथन चेतन के साथ ही साथ अवचेतन और परामानवीय तत्वों / कारकों से प्रेरित हो सकते हैं इसे मान लेने में हर्ज ही क्या है ? विशेष कर तब , जबकि विज्ञान इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट अवधारणायें विकसित नहीं कर पाया हो ! 

1987 के फरवरी माह में किसी दिन , अपने मित्रों के साथ गपशप करते बैठे थे कि खबर मिली कि खन्ना साहब भोपाल में बीमार हो गये हैं ! उन दिनों छत्तीसगढ़ राज्य मध्य प्रदेश से अलग नहीं हुआ था , इसलिए भोपाल अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी हुआ करता और तब जगदलपुर से भोपाल के लिए वायुदूत की सीधी सेवायें उपलब्ध थीं ! चूंकि बीमार खन्ना साहब के घर कोई पुत्र नहीं था , सो उनकी पत्नी के साथ एक स्टाफ मेंबर को वायुदूत से भोपाल रवाना कर दिया गया और उनकी वापसी के लिए ट्रेन में रिजर्वेशन के जुगाड़ देखे जाने लगे ! मेरे एक पंजाबी मित्र खन्ना साहब के लिए कुछ ज्यादा ही फ़िक्र मंद थे ! कहने लगे कि दो लोगों का जाना तो ठीक है पर वापसी कैसे होगी ? ट्रेन में सिर्फ दो ही बर्थ मिल रही हैं , जबकि भोपाल से वापसी तीन लोगों की होना है ! मैंने कहा अजी फ़िक्र मत करो तीसरी बर्थ की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी ! 

यहां से दो लोग गये हैं , सो दो ही वापस आयेंगे ! खन्ना साहब तो कलश में होंगे उन्हें बर्थ से क्या लेना देना ! मुझे पता नहीं , यह सब , मैं कैसे कह गया ! खन्ना साहब की बीमारी की पृष्ठभूमि और सीरियसनेस की मुझे कोई जानकारी नहीं थी ! मैंने जो भी कहा मित्र की फ़िक्र की त्वरित प्रतिक्रिया बतौर कहा ! उधर मित्र मुझे सुनकर , आग आग हुआ जा रहा था ! तुम ऐसा कैसे कह सकते हो किसी जीवित व्यक्ति के बारे में ? मैंने कहा जो सूझा वो कह दिया अब तुम इसे अशिष्टता कहो या धृष्टता ? हालात बदलने वाले नहीं है ! तुम जितना चाहो इंतज़ार कर सकते हो ! शाम लगभग तीन बजे फोन पर खबर आ चुकी थी कि खन्ना साहब का अंतिम संस्कार भोपाल में ही किया जाएगा ! मित्र ने कहा तुम्हारी जुबान ...

घटना के बाद के वर्षों मेरे इन्हीं मित्र को सूझा कि कानून की डिग्री हासिल कर ली जाये ! फैकल्टी में सांध्य कालीन क्लासेस की व्यवस्था थी  !  इसलिए उन्हें नौकरी के साथ कानून की पढ़ाई करने में कोई दिक्कत नहीं हुई  !  हमारे अपने युवा विद्यार्थियों की तुलना में मित्र के अंक शानदार आ रहे थे  ! जब वे फाइनल इयर का एक्जाम दे चुके , तो मैं उनकी बुक्स किसी ज़रूरत मंद विद्यार्थी को दिलवाना चाहता था ! मैंने उनसे कहा यार तुम्हारा एक्जाम हो चुका है  !अपनी किताबें अमुक को दे देना ! उन्होंने कहा अभी मेरा रिजल्ट नहीं निकला है बाद में देखूंगा  !  मैंने कहा बाद में क्यों  ? अभी दे दो , जिस पेपर में तुम्हारी सप्लीमेंट्री आयेगी वो किताब वापस ले लेंगे  !  मेरे मित्र पिछले दोनों सालों में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो चुके थे ! इसलिए तीसरे साल में सप्लीमेंट्री आने की कोई वज़ह भी नहीं दिखाई दे रही थी ! मैं नहीं जानता यह शब्द मेरी जुबान में कैसे आया...

रिजल्ट निकलने पर देखा कि मित्र को एक पेपर में सप्लीमेंट्री आ गई है  ! उन्होंने सप्लीमेंट्री परीक्षा देने के साथ पुनर्मूल्यांकन भी करवाया और अंतत प्रथम श्रेणी में उतीर्ण भी हुए !  उन्होंने पूरक की तुलना में पुनर्मूल्यांकन के रिजल्ट को ऐच्छिक तौर पर स्वीकार किया क्योंकि वे अपनी अंकसूची में सप्लीमेंट्री से पास होने का कोई संकेत भी नहीं देखना चाहते थे   !  सच तो ये है कि पुनर्मूल्यांकन से साबित हुआ कि वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण थे   !  इसलिए सप्लीमेंट्री आने की घटना उन्हें आज भी चमत्कृत करती है   !  लेकिन अब वे ये नहीं कहते कि तुम्हारी जुबान...बल्कि अब वे कहते हैं कि तुम्हारे साथ कुछ तो गड़बड़ है ...

47 टिप्‍पणियां:

  1. प्रथम निंदक....

    बाप रे ! बाबा बनने की राह पर हैं अली सा !!

    आपको भी शक्ति प्राप्त हो चुकी है। प्रथम समागम की फीस निर्धारित कीजिए और एजेंट बनाना शुरू कर दीजिये। पहला मौका तो ब्लॉगरों को मिलना चाहिए।:)

    हमारे बारे में अच्छा अच्छा ही बताइयेगा.....कोई गलत बात हो तो किसी को भी मत बताइयेगा...मेरे को भी नहीं। :)

    वैसे आपके साथ कुछ नहीं बहुत गड़बड़ है....

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    1. प्रिय देवेन्द्र जी ,
      अब आपसे क्या छुपायें ! हमें जो सिद्धि प्राप्त हुई है बजट में आकस्मिक मद वाले प्रावधान जैसी है ! ससुरी नियमित रूप से हमारे पास आने लग जाये तो आपको साथ लेकर ही चलेंगे ! दसवंत यानि कि टेनपरसेंट आपका ! हमारे हिस्से तो खाली समागम ही रहने दीजियेगा :)

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    2. परसेंट के अनुपात बता रहे हैं कि सिद्धी प्राप्त होने की संभावना अधिक है। :)

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    3. परसेंट से सिद्धि का जुगाड़ हो जाये तो दसवंत को बीसवंत करने तैयार हूं :)

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    4. व्यापार में 90 हिस्सा मेरा 10 तु्म्हारा कहने का सीधा मतलब यह होता है कि व्यापारी को लाभ का पूरा भरोसा है। 20 तुम्हारा कहने पर लाभ की थोड़ी कम गुंजाइश है। हानी होने की आशंका में कहता.. तुम भी क्या याद करोगे! 90 तु्म्हारा मात्र 10 हमे दे देना। सिद्धि आपको प्राप्त करनी है, हिस्सा भी आप दे रहे हैं इसलिए मैने अनुमान लगाया कि सिद्धी प्राप्त होने की संभावना अधिक लग रही है।:)

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    5. देखिये मैं पहले ही कब कहा कि पैसा बाबा जी के पास रहेगा ? मैंने कहा था कि हमारे हिस्से खाली समागम ही रहने दीजिए ! इसका मतलब ये है कि ९० या ८० जो भी आपसे बचे वह किन्हीं और पार्टियों के लिए सुरक्षित है :)

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    6. ओह! आप असली बाबा लगते हैं जिसे एक परसेंट का भी लोभ नहीं है ! तब तो सिद्धि पर संदेह है:)

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    7. पर आप जिस सिद्धि पर संदेह कर रहे हैं वो कौन है :)

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  2. मेरा कमेन्ट तो देवेन्द्र भाई ने पहले ही मार लिया, अब क्या कहूं ....
    पंहुचे हुए फकीर लगते हो मियां ...
    कुछ काम की बात हमें भी बता देना ....मगर चुपचाप
    एक तो सय्यद.....
    उसपे फकीर.....
    एजेंट की दरकार हमें भी है वेस्टर्न इंडिया हमारे जिम्मे ...
    शुभकामनायें !

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    1. सतीश भाई,
      देवेन्द्र जी अकाउंट्स वाले हैं उनको तो साथ लेकर चलना ही पड़ेगा :)

      आपको वेस्टर्न इण्डिया के लिए एजेंट चाहिये तो हम हैं ना :)

      और अगर एजेंसी चाहिये तो सब आपका ! बस दोस्तों का ख्याल रखियेगा ! क्योंकि नाते रिश्ते और यारी दोस्ती वाले ही भांडा फोड़ते हैं :)

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    1. मैंने सोचा था कि आप भी रिटायरमेंट के बाद की सोचेंगे :)

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    2. रास्ता बदलने के बारे में गौर फरमाएं राहुल भाई ...
      अली भाई पंहुचे हुए फकीर लगने लगें हैं मुझे..

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    3. मैं पहुंचूं ना पहुंचूं राहुल सिंह जी को रिटायरमेंट के बाद का प्लान तो करना ही पड़ेगा :)

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  4. ख्वाबों की दुनिया से निकल कर तो आए !
    लेकिन हकीकत की दुनिया में आकर इतना क्यों डरा रहे हो भाई !! :)

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    1. डाक्टर साहब ,
      कम से कम हकीकत की दुनिया में तो साथ दीजिए :)

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  5. कुछ नहीं बहुत गड़बड़ है ....इस गड़बड़ी को आप प्रोफेशन में बदल कर गड़बड़ी दूर कर सकते हैं .....शुभकामनायें!

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    1. तब तो रिटायरमेंट तक गडबडी झेलनी ही पड़ेगी :)

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  6. यथा नामों तथा गुणों सैयद बाबा ..अली बाबा ..आधा काम तो पहले से ही हुआ रखा है ..
    मैं किसकी दुआ करून किसी दिन खुदा न खास्ता सैयद भाई के यहाँ से मेरा भी पत्ता कट गया तब ?
    बाप रे दर मोहें लागे ...चलिए एक मित्र को अमर वाणी बना देना भी जीवन की सार्थकता है :)

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    1. बाबा बोले बगैर बाबागिरी नहीं चल सकती क्या ?
      किस की मजाल है जो मेरे मित्र का पत्ता काट दे :)

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    2. बाबागिरी का तो कोई मोल भी है जब चाहे खरीदो जिसे चाहे बेचो पर मित्रता अनमोल है मित्र !

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  7. मुझे तो कहते हुए भी अजीब लग रहा है.. आज दोपहर मैंने पत्नी को कहा कि पता नहीं दुग्गल लौटा कि नहीं वृंदावन से और पाँच मिनट बाद दुग्गल का फोन आया कि वो आ गया है और कल शादी में चलना है.. शाम को पत्नी से बात हुई कि झा जी काफी दिनों से आये नहीं जबकि एक चक्कर लग जाता है उनका महीने में.. कुछ देर बाद घंटी बजी और वे सामने खड़े थे सपत्नीक!! और मौत पर फिर कभी.. नहीं तो देवेद्र जी को बहाना मिल जाएगा.. :)

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    1. टेलीपैथी पर भी कुछ ख़ास बहस नहीं हुई है...
      ऐसे उदाहरण शायद हर एक के साथ जुड़े हैं ....अक्सर हम लोग इन्हें "बड़ी उमर है यार तुम्हारी अभी तुम्ही को याद किया था " अथवा "शैतान को याद किया और शैतान हाज़िर "
      कह कर भूल जाते हैं !
      यह विषय उठाने चाहिए ...
      विस्मित करते हैं यह विषय ...

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    2. सतीश भाई ,

      आपने कहा विस्मित करते हैं और मैंने कहा विलक्षण विषय :)

      सवाल यही है कि इन्हें क्यों ना उठाया जाये ?

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    3. गूगल बाबा कहते हैं....

      टेलीपैथी.... एफ. डब्ल्यू. एच. मायर्स का दिया हुआ शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है "दूरानुभूति"। "ज्ञानवाहन के ज्ञात माध्यमों से स्वतंत्र एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क में किसी प्रकार का भाव या विचारसंक्रमण" टेलीपैथी कहलाता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिक "दूसरे व्यक्ति की मानसिक क्रियाओं के बारे में अतींद्रिय ज्ञान" को ही दूरानुभूति की संज्ञा देते हैं।

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  8. सलिल जी,
    मेरी उम्र गुणित ३६५ दिन किया जाये तो गुणनफल से प्राप्त कुल दिनों में ऐसे बेहिसाब कथन भी मैंने किये होंगे जो सच नहीं हुए और जिनकी तुलना में ये दो या तीन सत्य सिद्ध कथन / घटनायें , संख्यात्मक और तुलनात्मक दृष्टि से बेहद गौण हैं ! इसलिए तार्किक लोग इसे महज़ संयोग और गणित में फ्लाप कह कर भी ख़ारिज कर सकते हैं , किन्तु ...

    मेरे लिए ये न्यून संख्या भी अज्ञात / आकस्मिकता जन्य पूर्वाभास जैसी विलक्षणता की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं ! बस इसी नज़रिये से शेयर कर रहा हूं वर्ना , मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता जो मित्रगण इसे बकवास / सतही विषय माने :)

    क्या इन्हें केवल संयोग कह कर ख़ारिज किया जाना उचित होगा ?

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    1. अली सा.
      कॉलेज के ज़माने में सांख्यिकी पढते समय सिक्के को उछाला जाना और चित्त या पट आने की संभावना, या फिर लाल-पीली-नीली गेंदों को एक थैले में डालना फिर निकालना आदि सवाल वैसे भी उलझाने वाले लगते थे.. जितना उलझाव 'ला ऑफ प्रोबैबिलिटी' में देखा है संयोग के मामले में, उस मामले में ये उलझाव कम नहीं!!
      एक शख्स तेज़ी से गाड़ी दौडाता पास से निकला पतली सी सड़क पर, गुस्से से मैंने कहा कि मरेगा साला! और जब जब गली में आगे बढ़ा तो उस गाड़ी के ऊपर एक पेड़ गिर पड़ा था और वो शख्स ड्राइविंग सीट पर बैठा-बैठा मौत की नींद में समा चुका था. उस रफ़्तार से दौडती गाड़ी पर, उसी समय पेड़ का गिरना, उसके ठीक सिर पर और पास बैठा आदमी बिलकुल सही सलामत.. पाँच मिनट पहले कही बात सच हो गयी..
      अगर संजोग है तो बहुत बड़ा संजोग!!शायद काली जुबान या बत्तीस दाँत वाली कहावतें ऐसे ही बनी होंगीं!!

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    2. सलिल जी ,
      दुरुस्त फरमाया आपने !

      मित्रों के साथ दिक्कत यही है कि ज़रा उलझाव देखा और किसी बहाने खिसक लिए ! साथ में दो लाइन ये भी कहके निकल लिए कि साइंस में इसकी ताईद नहीं :) अब पीटते रहिये सर अपना ! आप चर्चा भी नहीं करेंगे तो साइंस में ताईद या रिजेक्शन होगा भी कैसे ?

      सिर्फ इसलिए कि इन घटनाओं की चर्चा करना मित्रों को मुनासिब नहीं लगता बात खत्म नहीं की जा सकती ! घटनायें हुई हैं तो उनका ज़िक्र भी किया जाएगा ! जो घटा उसको कहने में शर्म कैसी ? चाहे कोई माने या ना माने :)

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    3. बाप रे ! एक नहींsss दो दो बाबा !!

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    4. do baba pe kam se kam 'ek chela' ka to provision rakhha jai bhai......

      pranam.

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    5. सञ्जय जी ,
      जैसा आप चाहें :)

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  9. वाकई गड़बड़ तो है ....मगर कोई सुखद भविष्यवाणी के उदाहरण भी तो होंगे !!!
    टेलीपैथी वाली जबरदस्त गड़बड़ी मेरे साथ भी है ,सबको बताती नहीं हूँ वरना महिलाओं को डायन साबित करने में ज्यादा देर कहाँ लगती है :):)

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    1. जी सुखद भी हैं तो सही पर सब एक ही अंक में लिख दूंगा तो कैसे चलेगा :)

      इस वज़ह से महिलाओं में डायन साबित होने की सम्भावना पे कह रहा हूं कि...

      जनता मुझे पिशाच ना घोषित कर दे :)

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    2. ओह जैसे एक कम थे :) हूँ ,एक से भले दो ....वाणी और आप, भैया मुझे बख्श दीजियेगा ...डर लग रहा है एक एक तो दोनों को झेल सकता हूँ एक साथ नहीं ..या मौला रहम करना !

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    3. अरविन्द जी ,
      आप खुद के बारे में जो चाहे कहिये पर हमें पूरा भरोसा है आप पर :)

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