शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अरे बावले ये तेरा वहम नहीं है ...

किशोर वय स्वप्न के अनिन्द्य सौंदर्य को मित्रों ने मेरे अवचेतन की अभिव्यक्ति मात्र मान लेने के आग्रह निरंतर किये ! उनके ख्याल से यह सब मेरे जीते जागते अवलोकन और चिंतन का स्वप्न बतौर पुनर्प्रकटन मात्र था ! अपने पालन पोषण की परिस्थितियों और ग्राम्य दशाओं की निज भिज्ञता ने मुझे इस आग्रह से विरत बने रहने की प्रेरणा दी यद्यपि इस उहापोह में उस सुदेह के स्वप्न के आद्य बिंदु / आद्य कारण पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका ! किन्तु यह निश्चित हुआ कि स्वप्न के स्रोत के रूप में स्वयं की अंतर-यात्रा अंतत: शेष एकमात्र विकल्प है ! सोचता हूं कि मिथकों और आख्यानों में सुराधिपति के ऋषि पत्नि से सहवास पूर्व कथनों के अध्ययन यदि मेरे मानस पर कोई प्रभाव छोड़ गये हों तो ? देवेन्द्र को कटि सुरम्य से संगम की चाहना थी ! ऐसे ही अनगिनत वृत्तान्त पढ़ सुनकर संभव है अवचेतन ने कोई रूप धरा हो और मैं स्व सम्मोहित एक अनावृत चित्र गढ़ पाया होऊं ! किन्तु संशय यह है कि तेरह वर्ष की अल्प-आयु में इस तरह के अध्ययन मैंने किये ही कब थे ?

महाशिवरात्रि 2011 की पूर्व संध्या में अपने एक शिष्य और एक मित्र के साथ गुप्तेश्वर , ओडिशा जाने के विषय में चर्चा हुई थी किन्तु पर्व की प्रातः प्रवास की अपनी अनिच्छा के चलते उन दोनों को ही तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए कह दिया ! भोर के स्वप्न ने विचित्र से संशय में डाल रखा था सो संध्या तक उन दोनों की वापसी की प्रतीक्षा की ! फिर संध्या काल तीर्थ यात्री द्वय की वापसी ने मुझे और भी विकट परिस्थिति में धकेल दिया ! मैंने उनसे पूछा कि जगदलपुर से ‘अमुक’ किलोमीटर ? की दूरी पर आपको कोई एक गांव ऐसा मिला था जहां बिजली के एक खम्भे के पास ढेर सारी सफ़ेद गायें पूरी की पूरी सड़क को घेर कर खडीं थीं ? क्या सड़क मुरम वाली थी ? उन्होंने कहा ...हां ऐसा ही हुआ ! हमें अपनी गाड़ी धीमी करना पड़ी थी ! वो जगह गुप्तेश्वर के अत्यन्त निकट है ...पर आपको कैसे पता ? 

उनके प्रश्न का उत्तर दिए बिना मैं उनसे फिर से पूछा कि उसके ठीक आगे सड़क से दाहिनी ओर पचास फुट की दूरी पर कोई खपरैल वाला घर था ? गांव के प्राइमरी स्कूलों के जैसा ? उन्होंने कहा हां...मगर आप... मैंने फिर से कहा कि क्या वहाँ कोई ब्राह्मण युवती गुलाबी साड़ी पहने हुए सड़क की ओर वाले स्थल / आँगन को बुहार रही थी ? क्या उसकी साड़ी का बार्डर थोड़ा गहरा लाल था ? क्या उस गौर वर्ण युवती की आंखें बड़ी बड़ी और अत्यन्त सुन्दर थीं ? क्या वह युवती बाद में आपको तीर्थ स्थान वाले घाट पर भी मिली थी ? उन्होंने कहा यह सब सही है ! गायों के झुण्ड कारण गाड़ी धीमी करना पड़ी ! वहां एक युवती झाड़ू लगा रही थी ! घर भी देशी खपरैल वाला था और ... 

जैसा कि आप कह रहे हैं ! उसकी आंखे अत्याकर्षक बड़ी बड़ी थीं उसने गुलाबी साड़ी पहन रखी थी जिसका बार्डर गहरा लाल था और वह हमें बाद में घाट पर भी मिली थी किन्तु स्नान के समय कहीं गायब हो गई...पर यह सब आपको कैसे पता ? क्या कोई और भी गया था वहां ? किसने बताया यह सब आपको ? मैंने कहा बंधु आज मैंने स्वप्न में यह सब देखा था ! पर यह सोच कर आप लोगों के साथ नहीं गया कि संभव है कि बीते कल की चर्चा और धर्म स्थल की पृष्ठभूमि में मेरे अवचेतन ने कोई एक स्वप्न गढ़ लिया हो ! मुझे प्रतीति हुई कि भोर में , मैं आपके साथ जाऊं और मेरा स्वप्न कपोल कल्पना सिद्ध हो तो मुझे दुःख होगा ! बस इसी आशंका से मैंने यह यात्रा आप लोगों के साथ नहीं की ! मैं अपने स्वप्न को अपनी आँखों से असत्य सिद्ध होते नहीं देखना चाहता था ! लेकिन अब मैं वास्तविक रूप से , किसी दिन , अपने स्वप्न के उस घर , उस डगर और यथासंभव उस युवती को देखने ज़रूर जाऊंगा ! 

महाशिव रात्रि 2012 की सुबह ढेर सारे बैल बेहद , बेहद स्वस्थ बैल , एक दम सफेद बैल ,कम से कम आधा दर्जन बैल मैंने स्वप्न में फिर से देखे हैं ! अपने जीते जागते इतना हृष्ट पुष्ट पशुधन मैंने कभी नहीं देखा ! फिर लगातार दो महाशिवरात्रि की सुबह के श्वेत पशुधन का स्वप्न मुझे आश्चर्य में डाल रहा है ! कह नहीं सकता कि दूसरा स्वप्न भी पहले स्वप्न की तरह से यथार्थ सिद्ध होगा या कि नहीं किन्तु ...प्रथम स्वप्न की धरती पर जाये बगैर स्वप्न की सिद्धता मुझे संकेत दे रही है कि... अरे बावले ये तेरा वहम नहीं है ...

66 टिप्‍पणियां:

  1. अली सा , ये क्या हो रहा है भाई , ये क्या हो रहा है !
    सपने में इतने सूक्षम लेकिन विस्तृत वर्णन ! सपने में दूरी भी नाप ली ! किलोमीटर और फुट में भी !
    कैसे पता कि वह ब्राह्मण थी ! उस पर साड़ी का रंग ही नहीं , साड़ी का बोर्डर भी ! तौबा तौबा !
    और यही सब डिटेल्स उन महानुभावों ने भी देखे , परखे और याद रखे ।

    ये क्या हो रहा है भाई , ये क्या हो रहा है ! :)
    अब अगली पोस्ट आप तभी लिखियेगा , जब आप स्वयं अपनी आँखों से ये सब देख कर आयें और साथ में किसी और को ले जाएँ सबूत के तौर पर ।:)
    वैसे सपने रेम स्लीप में आते हैं जो अक्सर जागने के बाद याद नहीं रहते ।

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    1. डाक्टर साहब ,
      इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ की सीमा बीसवें किलोमीटर में खत्म होती है और ओडिशा की शुरू ! छत्तीसगढ़ बार्डर तक मैं खुद कई बार जा चुका हूं और कई बार कैम्प में रहा भी हूं ! पर ओडिशा के अंदर गुप्तेश्वर की ओर कभी नहीं गया ! ऐसे कई मौके आये जबकि मैं गुप्तेश्वर जा सकता था पर नहीं जा सका ! मुझे नहीं पता कि मैंने उस युवती को ब्राह्मण क्यों कहा और ना ही ये पता है कि मेरे दिमाग में किलोमीटर में दूरी कैसे घुस गई पर यह पक्का है कि मुरम सड़क से उस घर का खुला आंगन मैंने स्पष्ट देखा आंगन में कोई बाउंड्री नहीं थी और दूरी भी पचास फुट के लगभग होनी चाहिये ,एक्जेक्ट पचास फुट मेरे मुंह से क्यों निकला मुझे नहीं मालूम ! मकान के खपरैल / साड़ी का बार्डर / रंग / उसका चेहरा / आंखे और झाड़ू वगैरह सब मैंने देखा ! वो युवती मुझे मिल जाये तो मैं उसे पहचान लूंगा ! फिर से कहता हूँ कि मैं उस युवती को पहचान लूंगा !

      गुप्तेश्वर जाते हुए उन लोगों को उसी स्थान पर स्लो होना पड़ा या कहूं लगभग रुकना पड़ा ! निश्चित रूप से मैंने उन्हें ,वहां रुकने और सब कुछ देखने के लिए प्रोग्राम करके नहीं भेजा था :)

      शिष्य जी 82 किलोमीटर दूर से गाड़ी लेकर आये थे और सुबह उनसे मेरी बात फोन पर ही हुई कि मैं नहीं जा सकूंगा फिर वे मेरे मित्र जी के घर से उन्हें लेकर चल पड़े और मेरी उन दोनों से जो भी मुलाकात हुई वह शाम को ! शाम को मैंने उन्हें अपने स्वप्न की बात कही और उन्होंने उसे आश्चर्य के साथ स्वीकार किया ! वे दोनों खुद ही हैरान थे कि मेरा स्वप्न उन्हें फील्ड में हूबहू कैसे नज़र आया ! हालांकि यह सब कैसे हुआ मुझे नहीं पता ! मेरे शिष्य जी फिलहाल एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और मित्रवर अब भी जगदलपुर में रहते हैं ! सपने के डिटेल्स की पुष्टि उन दोनों ने की तो मुझे संशय का कोई कारण नज़र नहीं आता !

      अगर कभी आप जगदलपुर आयें तो स्वप्न स्थल की यात्रा आपके साथ ज़रूर करना चाहूंगा :)

      क्या हो रहा है ? कैसे कहूं ? पर जो हो चुका है वह कह दिया है ! स्वप्न क्यों आया ? इतना विस्तार से मैं सब कुछ कैसे देख सका मुझे पता नहीं ! स्वप्न किस स्लीप में आया ये जाने बगैर कह रहा हूं कि मुझे सब कुछ याद है क्योंकि उसी शाम को ही मैंने उन दोनों बन्दों से इसकी चर्चा की थी !

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    2. अली सा , ऐसा लगता है कि आपके मित्र और शिष्य ने आपकी हाँ में हाँ मिला दी । वर्ना आपके साथ साथ उन्हें भी कैसे सब डिटेल्स याद रह पाए , सही दूरी के साथ । आदमी को यह तो याद नहीं रहता कि कल उसकी पत्नी ने क्या पहना था , फिर किसी अंजान स्त्री को कैसे याद रख सकते हैं ।

      वैसे डॉक्टर्स किसी चमत्कार में विश्वास नहीं रखते । :)

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    3. डाक्टर साहब ,
      दिन में जो देखा उसे शाम को कैसे भूल सकते थे वे ! उनसे मेरे सम्बन्ध ऐसे नहीं है कि उन्हें मेरी हां में हां मिलाना पड़े :)

      चमत्कारों में मुझे भी विश्वास नहीं ! ...और पत्नी के कपड़ों का रंग मुझे भी याद नहीं रहता पर उस दिन मेरे साथ जो हुआ उसे कैसे झुठला दूं !

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  2. अविश्वसनीय सा लग रहा है...
    भाइयों की प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार करते हैं !
    शुभकामनायें आपको !

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    1. सो तो है ! सुनकर वो दोनों भी हैरान थे !

      शुभकामनायें आपको भी !

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  3. कमाल है। आप (के सपने) एक अध्ययन का विषय हैं। युवती के वर्ण/जाति के बारे में दराल साहब का प्रश्न वैलिड है। सपनों को उसी समय, तारीख व समय चिन्हित कर लिखते रहिये। साथ ही उनके वासत्विक जीवन में देखे जाने का समय भी। रोचक दास्तान है।

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    1. मुझे नहीं पता कि मैंने उसे ब्राह्मण क्यों कहा ? संभवतः यह आदिवासी क्षेत्र है और वो बाकी रहवासियों से भिन्न दिखी हो इसलिए ? पर पक्का नहीं कह सकता कि मैंने उसे ब्राह्मण क्यों कहा ?

      2011 की महाशिवरात्रि की सुबह का स्वप्न है इससे ज्यादा कैलेंडर में और क्या दर्ज करूं :)

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    2. आपके कहने की बात उतनी खास नहीं जितनी शिष्यों के कंफ़र्म करने की बात है।

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  4. yah sab chetan aur awachetan ki sthiti lagati hai .
    aap wicharwan hain so aap hi is par jyada prakash dal sakate hain.

    ek ne kahi duje ne mani
    hum to kahen dono gyani.........

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    1. सिंह साहब ,
      यह सही है कि बतौर स्रोत सबसे बड़ी जिम्मेदारी मेरी ही है कि ढूंढूं इसके कारण ! पर चर्चा में मित्रगण कहीं ज्यादा बेहतर सुझाव दे सकते हैं यह उम्मीद भी है !

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  5. ब्रह्मं सत्‍यं जगन्‍नमिथ्‍या.
    कैसी बीती रात किसी से ना कहना, सपनों की वो बात किसी से ना कहना.
    ऐसी और कुछ बातें याद कर रखते हैं, आपकी इस सुपन सीरिज पर टिप्‍पणियों के लिए.

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  6. धन्यवाद ! मैं सोच रहा था कि असंगत और अतार्किक प्रतीति वाला ही सही पर ... घटा है कुछ मनो-जागतिक संसार में , सो उसकी व्याख्या के यत्न होने ही चाहिए ! संभव है वह असत्य ही सिद्ध हो जाये या फिर हमें किसी नवज्ञान के संकेत मिलें !

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  7. वह ब्राहमणी ही थी यह कैसे जाना था ?
    आप तो अप्रतिम रहस्य रोमांच और आकर्षण का जाला बुनने लग गए हैं अंतर्जाल में भी .
    अंतर्जाल में भी एक इंद्रजाल ..और हिन्दी तो क्या गज़ब . हिन्दी विभागों के अधिकारी विद्वान भी शर्मसार हो जायं ...
    मुझे तो यह कोई टोटका निकार सा आयोजन लग रहा है -बड़ा डर रहा है अली भाई ....
    हम तो ले दे कर झेल लेगें मगर आपके अंतर्जाल पाठकों की आधी दुनिया के नुमायिंदे या तो इससे भयग्रस्त हो भाग चलेगें या
    फिर कुछ अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आपके यहाँ कतारों में लगेगें ...जो भी हो मुबारक हो ....
    महाशिवरात्रि के दिन तो आपने नंदी को देखा ...यह तो संस्कारों ,संस्कृतियों का स्वप्न -प्रतिफलन लगता है!

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    1. अरविन्द जी ,
      उसके ब्राह्मण होने की बात मैंने कैसे कही मुझे पता नहीं ! ये बात मैंने दराल साहब से भी कही है पर अब एक बात आपसे कहता हूं कि मैंने उसके "होने" की बात भी कैसे कही ? उसके घर के सामने की सड़क , झाड़ू ,गायों और बिजली के खम्बे से लेकर उसके वस्त्रों के रंग तक का कथन मैंने कैसे किया ? उसकी आँखों और घर से स्नान घाट तक पहुंचने का कथन मैंने कैसे किया ? कोई तर्क नहीं ! मुझे पता नहीं...पर हुआ तो है !

      ...और हां जो बात उस दिन मैंने अपने शिष्य , अपने मित्र और अब इस आलेख में नहीं कही , टिप्पणीकार बंधुओं की प्रतिक्रियाओं के जबाब में भी नहीं कही , आपसे कह रहा हूं ...मुझे तो उस युवती का नाम भी स्मरण है ! अब आप इसे इंद्रजाल कहें ! टोटका कहें ! झेल लेने वाले मित्रों की बर्दाश्त कहें या फिर आधी दुनिया के नुमाइंदों के भयातुर हो कर होने वाली भगदड़ की संभावना कहें :)

      कतार में मनोकामनाओं की पूर्ति वाले दरबार की गुंजायश के वास्ते टी.वी.चैनलों का समय खरीदने की हैसियत / औकात नहीं है मेरी :)

      बहरहाल आपके इस संकेत से सुखद अनुभूति तो हो ही रही है झूठ क्यों बोलूं :)

      हिन्दी मेरी मातृभाषा है सो जैसी भी लिखूं सह लीजिए :)

      इस स्वप्न की कोई विवेचना / कोई कारण सूझते हों तो कृपा कर अवश्य कहियेगा ! इस पोस्ट को प्रकाशित करने का उद्देश्य इससे अधिक कुछ भी नहीं है !

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  8. का कारण बतायें अली सा ! कोई दूसरा कहता तो झट से कह देते.. काहे हाँक रहे हो ? अपनी तो खोपड़िये भन्ना गई ! कल रात पढ़े तो पढ़ते फूट लिये। कमेंट करने की हिम्मते नहीं हुई। अपना नाम पढ़के थोड़ा उछले लेकिन फिर तुरंते जान गये कि इन्द्र की बात हो रही है। सच कहें तो थोड़ा-थोड़ा डर लगने लगा है आपसे। देखिये मेरे बारे में कोई उल्टा-पुल्टा सपना देखियेगा तो लिखियेगा या बताइयेगा नहीं। जो होना है सो तो हो कर ही रहेगा। हमको भविष्य जानने की तनिको इच्छा नहीं है। हां, कौनो बढ़िया बात हो तो धीरे से बता दीजिएगा, मजा आयेगा।:)

    एक बात कहें, जल्दी से जाके ऊ ब्राह्मणी से मिल आइये। कहीं उसका कोई कर्ज न हो आप पर।

    ले दे कर एक कारण सूझता है स्वप्न का...आप ब्रह्मणों से बहुत ज्यादा दोस्ती गाँठ लिये हैं। उनके संस्कार/विचार आप पर हावी होते जा रहे हैं। :)

    अरे बावले ये तेरा वहम नहीं हैं...वहम नहीं है तो तू ही बता, ऐ खुदा ! आखिर तेरी रजा क्या है ?

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    1. देवेन्द्र जी ,
      आपका संकेत जबरदस्त है ! काहे 'हांक' रहे हो ! गज़ब का शब्द याद दिलाया आपने इन हालात के लिए ! आखिर कौन है जो मेरे अंतर्मन को इस तरह से 'हांक' रहा है :)

      कौन है जो मेरे स्वप्न / मेरे ख्यालों को मेरी मर्जी के बिना हांके चला जा रहा है :)

      अब आप हमसे इतनी दूर रहते हैं कि टेलीफोन पे चर्चा और त्योहारों में शुभकामनायें एकरसता पैदा करने लगी हैं ! बहुत दिनों से आपको कुछ भेंट करने की इच्छा हो रही थी ! खुल्लम खुल्ला आपके नाम से कह नहीं सकते थे तो दूसरे वाले के बहाने से कह दिया है ! इस कहन (वाक्य) को आप आपने नाम से समझ कर जितनी बार हो सके बांचियेगा / फील कीजियेगा :) ये भी मानियेगा कि वहां के देवेन्द्र , देवता होंगे दूसरों के लिए पर हमारे लिए :)

      ब्राह्मणों से दोस्ती वाले कारण में दम हो सकता है पर वो झाड़ू मार कर क़र्ज़ चुकाने आने वाले का इंतज़ार कर रही हो ऐसा नहीं लगता :)

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    2. हम फील कर रहे हैं लेकिन आप हो ही आइये। उसके आंगन बुहारने के पीछे हम स्पष्ट संकेत समझ रहे हैं..इसका मतलब है कि घर में मेहमान आने वाला है:)

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    3. मेहमान का स्वागत झाड़ू से :)

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    4. आप खाली झाड़ू के पीछे काहे पड़े हैं भैया ? पूरा काहे नहीं देख रहे हैं ! आँगन को बुहार रही थी... से संकेत मिलता है घर में मेहमान आने वाला है।...हमारी बात पर यकीं नहीं तो किसी दूसरे पंडित जी से भी पूछ कर देख लीजिए:)

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    5. @ मेहमान का स्वागत झाड़ू से :)

      काहे घबरा रहे हो ...
      मेहमान को बिठाने से पहले घर कि सफाई करनी जरूरी है :-)

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    6. देवेन्द्र जी ,
      आपने पहले ही कहा कि पूर्व जन्म का कोई क़र्ज़ बाकी होगा ! तो फिर झाड़ू से कहे ना डरें :)

      सतीश भाई ,
      कोई कहे कि आप पर पिछले जन्म का क़र्ज़ बाकी है और वहां हाथ में झाड़ू दिखाई दे तब भी आप घर की सफाई के बारे में सोचियेगा :)

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    7. आप शंकित बहुत रहते हो ...
      पिछले जनम में क्या करते थे ...???
      :-)

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    8. क़र्ज़ लेकर फरार होने वालों में से कोई एक रहा होऊँगा :)

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  9. अली सा!
    सर्वप्रथम आभार इस बात का कि एक पोस्ट जो बरसों से कुलबुला रही थी मन में , पर लिखने का साहस नहीं कर पा रहा था, शायद अपना लेख-विराम उसी पोस्ट से टूटे! आपकी दोनों पोस्टों ने बल दिया है!!
    अंग्रेज़ी का एक शब्द "प्रिमौनिशन" ही शायद सटीक होगा इस घटना को व्याख्यायित करने के लिए!! इसके पीछे के विज्ञान को मैं नहीं जानता, न जानना चाहता हूँ!! इस घटना पर पूरा भरोसा कर रहा हूँ क्योंकि यकीन करता हूँ इस बात पर कि जो विश्वास करते हैं उन्हें तर्क की आवश्यकता नहीं होती और जो अविश्वास कर्त्ने वाले हैं उन्हें कोई तर्क संतुष्ट नहीं कर सकता..
    अपनी 'आदतानुसार' कहानी नहीं कहूँगा, बस याद दिलाऊंगा उस रात्रि प्रहरी की कथा जिसने रात सपने में दुर्घटना देखी थी और अपने महाराज की जान बचाई थी.. और जिसे राजा ने इनाम भी दिया और नौकरी से भी निकाल दिया!! शायद सपनों के सच होने की कथा जिसे प्रिमौनिशन कहा पश्चिम ने, हमारे समाज का अभिन्न अंग है! हमारी लोक-परम्परा की तरह!!

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    1. सलिल जी ,
      आपको लिखना चाहिये था ! अब भी लिखना चाहिये ! आपके भरोसे के लिए धन्यवाद क्योंकि विज्ञान और तर्क के आधार पर इस बात को कह पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था ! मित्रगण इस नाज़ुक स्थान पर कुछ ज्यादा ही बलपूर्वक प्रहार / हमला करते हैं :)

      कई बार यह समझ पाना कठिन हो जाता है कि हमारा अपना वजूद / हमारी अपनी जुबान / हमारी अपनी कहन / हमारे अपने शब्दों / वचन का कोई अस्तित्व है भी कि नहीं !

      मित्र की कोई अनुभूति तर्क की कसौटी पर अनुतीर्ण हो जाये / झूठी साबित हो जाये तो भी ! इसका यह मतलब कैसे हुआ कि मित्र अपनी अनुभूति को लेकर झूठ बोल रहा था !

      प्रिमौनिशन एक बेहतर शब्द है और हम बोध से भी काम चला सकते हैं ! निश्चय ही यह पश्चिम से पेश्तर हमारी परम्पराओं का अंश है !

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  10. हो ही आईये उस धरती पर(मन में सोचकर कि ’देखी जायेगी’) :)

    कहने को बहुत कुछ है, कहने पे जो आते(इस विषय पर),
    अपना भी तो है एक ब्लॉग, वहीं पे कहेंगे कभी :)

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    1. संजय जी ,
      मेरे घर से बमुश्किल सवा घंटे की दूरी है बस राज्य अलग है सो देखने के लिए घुसे नहीं अब तक ! अब आपने हिम्मत बढ़ाई है तो फिर जो होगा देखा जाएगा :)

      जिसके पास भगवान का दिया बहुत कुछ हो वह गरीब गुरबा को भी देता चलता है ! पर आप इस मामले में 'कुन्नियाई' कर रहे हैं :)

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    2. देखा तूने ख्वाब तो ये सिलसिले हुए
      दोस्तों के राज दिल में हैं दबे हुए।

      हम भी सोए आज दिन में खूब तानकर
      ख्वाब गहरे कब्र में, कहीं गड़े हुए।

      सोचता हूँ ख्वाब देखूँ एक जागकर
      मजे सभी के जिनमें हों मिले हुए।

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    3. मैं भी आता हूँ आपके साथ ...
      आनंद आ जाये अगर पंडित अरविन्द मिश्र और देवर्षि भी बनारस से आ जाएँ :-), ब्राह्मणों से आपकी पटती भी खूब है !

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    4. @ देवेन्द्र जी ,

      देखा एक ख्वाब तो , ये सिलसिले हुए !
      ब्राह्मण हमारे दोस्त पै दुश्मन मिले हुए !!

      झाड़ू के खौफ से हमारे दिल हिले हुए !
      हिम्मत हमारी पस्त पे वे खिलखिले हुए !!

      @ सतीश भाई ,
      पंडितों से मित्र के पिटने की संभावना से आनंदित मित्र से पटते हुए संबंधों वाले मित्र का पिटते ही भरोसा ना उठ जाये :)

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    5. यह पिटने, पीटने, पटने, पटाने, पटते, पटाते, वाली बात पल्ले नहीं पड़ी गुरु !
      वैसे भी व्याकरण में शुरू से ही हाथ तंग रहा है :-((
      जरा सीधे शब्दों में समझा कर बताओ तो कुछ कहें !

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    6. सीधे सीधे तो देवेन्द्र पाण्डेय ही बता पायेंगे :)

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  11. रोचक !
    कोई स्वप्नदृष्टा कर दे इस पहेली को हल तो हमारे ज्ञान में वृद्धि हो ...
    अमृता प्रीतम जी ने इस तरह के रहस्यमय स्वप्नों के बारे में खूब लिखा है और वे इस सम्बन्ध में किसी स्वप्न ज्योतिषी से मिली भी थी !

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    1. किसी स्वप्न विशेषज्ञ के सुझाव की आस इधर भी है ! ...पर एक बात ज़रूर कहूँगा कि इस मसले का हल स्वप्न ज्योतिषियों के बजाये मनोवैज्ञानिकों / परा-जागतिक अध्येताओं के पास होने की संभावना अधिक है ऐसा मुझे विश्वास है !

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  12. मुझे ऐसा लगता है कि प्रगतिशील समाज का अंग होने के कारण, हम ऐसी किसी बात को सुनने से पहले ही नकारने का मन बना चुकते हैं कि कहीं हम भी मज़ाक का पात्र न बन जाएँ, समझने की कोशिश तो शायद ही की जाती होगी !

    यह स्वप्न श्रंखला आश्चर्य जनक और अविश्वसनीय अवश्य लगती है मगर इस बहाने अपने अनुभव बांटने में हर्ज़ ही क्या है ??

    शायद यही कारण है कि हम जैसे तथाकथित विद्वान इन विषयों से लगभग परहेज करते चले आ रहे हैं, जबकि ऐसे अनुभव लगभग हर घर का अभिन्न हिस्सा हैं !

    आशा है नकारने से पहले मेरी इस टिप्पणी पर गौर किया जाएगा :-)

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    1. यहां मजाक बनने का भय तो है ही नहीं क्योंकि अनुभव तो अनुभव है ! अगर बाद में उसके गलत सिद्ध होने की संभावना है तो उतनी ही संभावना सही सिद्ध होने की भी ज़रूर होगी ! क्या केवल मजाक भय से , जो भी अनुभव हैं , उन्हें आपस में बांटना अनुचित माना जाये :)

      मुझे इस तरह के अनुभव शेयर करने से कोई परहेज़ नहीं है ! सकारात्मक चिंतन के लिए आपका आभारी हूं !

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  13. उत्तर
    1. जी , बहुत बहुत शुक्रिया आपका !

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  14. अदभुत...श्रदेय'पंडित श्री राम शर्मा आचार्य' गायत्री संस्थान,हरिद्वार रचित स्वप्नों की वैज्ञानिक सत्यता
    पर आधारित पुस्तक पढी थी, करीब 16 वर्ष पूर्व।निष्कर्ष बेहद ख़ास थे आम धारणायों से हटकर।आपके
    अनुभव निष्कर्षों की पुनः पुष्टि करते हैं।

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    1. रोहित जी ,
      गायत्री संस्थान के संदर्भोल्लेख और स्वप्न कथन पर आपके विश्वास हेतु आपका आभार !

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  15. यह स्वप्न अब पुराना हो गया सर जी। वंदना जी ने भी एक पोस्ट लिख दी। मित्र वहाँ जायें और उसका आनंद लें उनके स्वप्न उनकी जिंदगी में लाभकारी रहे हैं।:) हाय ! हमी अभागे रहे इस मामले में जो हमने नहीं देखे।:-( आज तानकर सोता हूँ..शायद एक पोस्ट का जुगाड़ हो जाय:)

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    1. हमने नींद वाले पे लिखा आप नींद से पहले वाले पे लिख डालिए :)

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    2. ई पोस्टों के जुगाड में काहे लगे रहते हैं देवेन्द्र जी ... खोजी विसय है ये भी ...

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    3. इनके नाम राशि युगों युगों से कहीं ना कहीं / कुछ ना कुछ पोस्ट करने की जुगाड़ में रहते आये हैं सो इन पर भी यही असर मान लीजिए :)

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    4. सतीश भाई ,
      धन्यवाद !

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  16. अद्भुत .... वैसे लोग कहते हैं सपने सच नहीं होते

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    1. शुक्रिया !

      लोगों का काम है कहना :)

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  17. जिंदगी में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं,....आम आदमी के पास तो जिनका...कोई एक्सप्लेनेशन नहीं....

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    1. आम आदमी तो ठीक है पर खास लोग भी कोई एक्सप्लेनेशन नहीं दे रहे हैं :)

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  18. अनेकों प्रकार की बातें की जा सकती हैं परन्तु अपने खुद के अनुभव से कह सकता हूँ की कभी कभी ऐसा भी होता है. कोई तर्क नहीं, कोई वैज्ञानिक आधार नहीं.

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  19. ऐसी घटनाएं जिनके साथ होती हैं वो सत्य मानते हैं और जिनके साथ कभी नहीं होती उनका विश्वास कभी नहीं बन पाता ... पर बात में अविश्वास का कोई कारण नहीं है ... जिस तरह से विज्ञानं तरक्की कर रहा है कुछ समय में ये बातें भी प्रमाण के साथ प्रूव हो जायंगी ... कल तक जो बातें मिथ्या थीं वो आज सच भी मानी जा रही हैं और कई बातों का उलट बी प्रूव हो रहा है ....

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    1. जी ज़रूर ! आपसे सहमत !
      हम अपनी अनुभूति बयान करते हैं ! ये बयान , कल चाहे असत्य सिद्ध हों या सिद्ध हमें दोनों ही स्थितियां मंजूर होंगी ! ...पर आदमी की जुबान को प्रथम दृष्टया / बिना परीक्षण किये / सुनते ही ख़ारिज कर देना कब से वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो गया :)

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  20. गज़ब का सपना रहा यह तो...आप हूबहू अपने दोस्तों से यात्रा-वृत्तान्त बताते रहे और वे अपनी मुहर लगते रहे.ऐसा साम्य तो आपको अंतर्यामी की कोटि में खड़ा करता है.इस ज़माने में आपके आलावा कोई और न मानेगा पर आप झूठ थोड़ी ना बोलेंगे और न यह वृत्तान्त सपने में हुआ होगा.
    ...इस पर मैं कुछ भी निष्कर्ष निकालने की स्थिति में नहीं हूँ !

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    1. संतोष जी ,
      अब आपसे मजाक थोड़े ही करूँगा :)

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    2. ...और हाँ,कुछ कहोगे भी नहीं !

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    3. ठीक है बताइये क्या कहलवाना चाहेंगे :)

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  21. डिअर अली , बात सरल थी.तुमने सपना देखा,सही निकला. अपने आधारों पर इसको तोला और व्यक्त किया. और अच्छी तरह किया.बेहतर होता कि पाठक अपने कुछ अनुभव रखते

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    1. डाक्टर साहब ,
      मित्रों ने उनके अनुभव , उनके स्वयं के ब्लॉग में लिखे हैं , कभी मौक़ा मिले तो देखियेगा !

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  22. अली जी, मुझे विशेष आश्चर्य नहीं क्योंकि मेरे कई सपने सच हुए हैं, कुछ सोते हुए देखे तो कुछ जागे हुए देखे। जैसे आपने स्थान कपड़े आदि सब देखे वैसे ही मैंने भी देखे और फिर बाद में जिस व्यक्ति के विषय में देखा उसने भी हूबहू वही बताया जो मैं अपने परिवार व मित्रों को बता चुकी थी।
    वैसे विचित्र संयोग यह है कि सप्ताह भर से मैं अपने दुःस्वप्न के बारे में लिखना चाह रही थी और आज ही लिखकर यहाँ आई हूँ तो यहाँ भी स्वप्न वर्णन!
    घुघूती बासूती

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    1. संयोग तो है ! आप अपने सपनों को हमसे भी शेयर करियेगा !

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