गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तेरी आस तेरे गुमान में...

पिछला हफ्ता ऐसा गुज़रा कि हर दोपहर बादल घिर घिर आये और गरज तरज कर बरस गये ! ऐसा लगा कि जैसे पुराने जमाने वाली गर्मियां लौट आईं हों जबकि हर रोज दोपहर की तपिश का जबाब शाम से पहले की बारिश हुआ करती थी ! जिंदगी के ताप का मुकम्मल बैलेंस , ना रत्ती कम ना तोला ज्यादा ! यह मौसम पिछले मौसमों के ख्याल का था सो हम भी अपने अतीत की गलियों में भटक गये ! अपना घर गांव के सबसे ऊंचे मोहल्ले में ! इसलिए गांव में कहीं भी जाना हो , हर दिशा में उतार वाले रास्ते से गुज़र हुआ करती थी !

तब अपनी उम्र यही कोई तेरह बरस के आस पास रही होगी और ख्वाब ये कि हम पश्चिम की दिशा में मंदिर के सामने वाले रास्ते से नीचे की ओर जा रहे हैं और एक गौर वर्ण रमणी जिसके जिस्म पर कपड़ों का नामों निशान तक ना था हमें खोजती हुई उसी रास्ते पर ऊपर की तरफ आ रही थी  !  निसंदेह वह एक यूरोपीय किशोरी थी जो उस ख्वाब में हमारी परिचित जैसी लगी ! विश्वास नहीं होता कि कुछ अरसे बाद फिर से इसी ख्वाब की पुनरावृत्ति हुई  !  हमें स्मरण नहीं कि इस उम्र में हमने जागते हुए / अपने पूरे होश-ओ-हवास में कभी कोई नग्न स्त्री , कोई छायाचित्र या कोई फिल्म या किसी और तर्ज़ पर किसी स्त्री देह , को देखा होगा ! यकीनन स्त्री देह से हमारी पहली और मुकम्मल पहचान महज़ एक ख्वाब थी  ! 

उन दिनों यह तय करना मुश्किल था कि एक स्त्री अपनी बेपर्दगी के हालात में कैसे दिखती होगी पर ...ख्वाब में जो देखा,जैसा भी देखा , सब कुछ वैसा ही होता है  !  यह इत्मीनान कई सालों के बाद हुआ ! दुनिया के किसी भी कोने में अगर वह युवती वास्तव में मौजूद हो तो हम उसे आज भी पहचान लेंगे ! अब सवाल ये है कि अपनी कमसिनी के दिनों में यह ख्वाब हमने देखा भी तो कैसे ? ...और अगर ख्वाब हमारे अवचेतन को अभिव्यक्त करते हों तो क्या हमारे पारिवारिक सामाजिक हालात किसी यूरोपीय किशोरी को उसकी दैहिक नग्नता की स्थिति में  हमारे अवचेतन में शामिल करने के लिए वास्तविक रूप से उत्तरदाई रहे होंगे ? 

निपट गांव के रहवासियों की सामाजिक मर्यादायें हमारे ख्वाब के अनुकूल नहीं थीं ! उस ज़माने में एक टूरिंग टाकीज छै माह के प्रवास पर गांव आया करती और वहां के माहौल के हिसाब से धार्मिक पारिवारिक फिल्में दिखा कर व्यवसाय किया करती ! इंटरमीडियेट कालेज की लाइब्रेरी और गांव में पहुंचने वाली मैगजीन्स ग्रामीण नैतिकता से इतर हों इसका भी सवाल नहीं उठता  !  समवयस्क मित्र और उम्रदराज बंधुबांधव इस तरह की कोई चर्चा करते हों , स्मरण नहीं  !कहने का आशय यह है कि किसी स्त्री देह से परिचय की प्रथम दृष्टया कोई संभावना मौजूद नहीं थी फिर भी वह ख्वाब हम तक पहुंचा भी तो कैसे ?...और वह भी खालिस हकीक़त जैसा ?


टीप : पिछले कई आलेख प्रेम के अलग अलग शेड्स पर लिखते हुए गुज़ारे  !  मित्रों का ख्याल था कि प्रेम और संबंधों की नकारात्मकता वाले संस्मरण , एकरसता का कारण बन जायेंगे ! इसलिए विषयान्तर बतौर अगले कुछ दिनों तक अपने ख्वाब तहरीर करने का इरादा है  !  प्रेम के दूसरे शेड्स आगे फिर कभी !

50 टिप्‍पणियां:

  1. इन दिनों ब्लॉग जगत में ख्वाब बहुत देखे जा रहे हैं -एक तो संतोष त्रिवेदी ने अभी अभी देखा था ..लेकिन वह घटित घटनाओं की रील थी ...भावी/संभावित घटनाओं के स्वप्न कटेगरी में एक तो दूसरे ब्लॉगर विवेक रस्तोगी ने देखा लिखा भी था ब्लॉग पर कि सेनायें गंतव्य को कूंच कर रही हैं -यह सच हुआ है ....
    आपकी इस स्वपन लीला को सच होने के लिए अल्ला ताला से दुआ माँगी जा सकती है ....

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    1. ये ख्वाब उन दिनों का है जब ब्लागर पैदा भी नहीं हुआ था ! अगर आप इसके सच होने लिए दुआ मांगेंगे तो मेरा नुकसान करेंगे :)

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  2. आपका यह ख्वाब बेशक अलहदा किस्म का है पर ऐसा भी नहीं है कि यह अजूबा हो.कई बार तो हम जो सोचते हैं या कल्पना करते हैं,वह ख्वाब में दिखता है पर कई बार ऐसे भी ख्वाब देखे जाते हैं जिनके बारे में हम केवल कयास लगाते रह जाते हैं कि ये किस तरह आये ?
    आपका मामला इसलिए अलग दिखता है कि उस उम्र में जब इस तरह के सोचने,समझने की गुंजाइश भी नहीं होती,एकदम हकीकत-सा लगता है.मेरे हिसाब से ऐसा हो सकता है:

    पहली बार आप किशोरावस्था में थे,वह दौर कल्पनाशीलता का चरम-बिंदु होता है.इसके लिए ज़रूरी नहीं है कि उस चीज़ का आप ख्वाब ही ना देखें,जिसका कोई पूर्वाभास न हो.ख्वाब किसी के वश में नहीं होते.आपकी जिज्ञासा ये है कि इसके कारण क्या हैं तो इस पर तुक्केबाजी ही होगी कि आपके पूर्व-जन्म से इसका कोई सम्बन्ध हो !मुझे इसके बजाय मनोविज्ञान की थ्योरी ही ज़्यादा मुफीद और तर्क-संगत लगेगी.कई बार अवचेतन में ऐसी बातें होती हैं जो ख्वाब में सहसा दिख जाती हैं.
    आपको दुबारा वही दृश्य दिखता है और पूरे होशोहवास में आपको वह चित्र पहचानने की कूवत रखता है तो यह भी हो सकता है कि उस तरह का कोई चेहरा ही वजूद में न हो या समय बीतने के साथ-साथ आपके मन-मस्तिष्क ने वह चित्र गढ़ भी लिया हो.आप एक बार ऐसा विचित्र ख्वाब देख चुके हैं तो निश्चित ही वह रह-रहकर अवचेतन में घुमड़ता रहता है और आपको दुबारा ख्वाब दिखने पर लगता है कि ऐसा क्यों ?
    अब आपको यह आगे भी दिख सकता है और क्यों दिखता है इसका सीधा सम्बन्ध मनोविज्ञान से ही है,आपके लाख मना और प्रतिवाद करने के बावजूद !
    मैंने उस नारी-देह के बारे में जानबूझकर कुछ नहीं कहा,क्योंकि यह ख्वाब का हिस्सा है और ख्वाब में इससे भी ज़्यादा चीज़ें हम देख सकते हैं.आपकी मुख्य गरज यह कि उस उम्र में ऐसा ख्वाब क्यूं तो यह इत्ती भोली उम्र भी नहीं होती .उस समय आप ख्वाब में आखिर नग्नता को पहचान पा रहे थे !

    मुझे यह महज कल्पना-लोक की उड़ान और अवचेतन में बसी कुछ बातें लगती हैं जिनसे हम अनजान बने रहते हैं !

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    1. संतोष जी ,
      आपने एक शानदार प्रतिक्रिया दी है ! इस ख्वाब की वज़ह अनेक हो सकती हैं ! मसलन बात कहीं अवचेतन में रही हो ! पुनर्जन्म की कोई संभावना या फिर नारी देह को लेकर मेरी अपनी ही कल्पनाशीलता वगैरह वगैरह ! किस्सा दर्ज करते समय मैंने स्पष्ट कहा कि उस वक़्त मेरी उम्र बेहद कम थी ! किसी भी देशी / विदेशी स्त्री को अनावृत देखने का अवसर शून्य ! मित्रों में नारी की देहयष्टि पर कोई चर्चा ? कदापि नहीं ! कोई चित्र / कोई फिल्म कोई माहौल भी नहीं फिर भी मैं एक देह को साक्षात् देखता हूं ! सारी बनावट / अंग प्रत्यंग ! क्या मेरी कल्पनाशीलता की वज़ह से ऐसा संभव है ?
      मेरे ख्वाब में देखे गये समस्त की पुष्टि अनेकों वर्षों के बाद हुई ! प्रश्न अब भी यही है कि जिसे मैंने यथार्थ में देखा ही नहीं था वह ख्वाब में कैसे आया ?

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    2. बहरहाल यह तो पहला पार्ट है ,,,,अगली सम्भंवओं को हम क्यों विनष्ट करें !

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  3. कच्ची उम्र ...
    हमें ऐसा ख्वाब क्यों नहीं दिखा :-)
    यह कहीं ख्याली ख्वाब तो नहीं भाई जी ??

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    1. आपकी आत्मिक / दैहिक पवित्रता की वज़ह से इस तरह के स्वप्न आपसे दूर रहे होंगे :)

      ख्वाब तो ख्वाब हैं ! आप ख्याल कह लीजिये पर जो नींद में देखा उसकी पुष्टि वर्षों बाद जागते हुए हुई ! मुद्दा यही है कि एक यथार्थ वर्षों पहले ख्वाब में कैसे आया ? क्यों आया ?

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    2. ऐसा भी साधू सन्यासी नहीं हूँ भाई जी :-)

      आपसे प्रेरणा लेकर अपना अनुभव लिखा है, देखते हैं गुत्थी सुलझेगी या नहीं ...?
      :-)
      http://satish-saxena.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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    3. आपका संस्मरण पढ़ लिया है ! टिप्पणी के लिए फुर्सत से दोबारा पहुंचूंगा !

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  4. मुझे केवल इतना मालूम है कि कुछ घटनाएं जब यथार्थ में घटती हैं उस समय ऐसा एहसास होता है कि यह तो जाने पहचानी घटना थी. अर्थात पूर्व में ही ख्वाबों में कभी देखा था.

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    1. यथार्थ में घटा होता तो सवाल ही ना करता :)

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  5. ख्वाब क्यों देखा ! यह याद होने की संभावना वैसे भी न्यूनतम हैं। याद तो ख्वाब ही रहेगा यदि वह इतना हसीन हो। यह आपको बुढ़ैती में और दिखेगा। किशोरावस्था में और बुढ़ौती में ऐसे ख्वाब आ सकते हैं। यह उम्र ऐसे ख्वाबों के लिए ही बनी है। ख्वाब देखने और आहें भरने के सिवा वे कर भी क्या सकते हैं।

    13 वर्ष का बच्चा कक्षा 8 में पढ़ता है। तब तक स्कूल में हमें यह बताया जा चुका था कि हमने गोरे फिरंगियों से कैसे आजादी पायी। देशभक्ति की कई कथायें बच्चे पढ़ चुके थे। इन कथाओं के कारण किशोरवय में ये गोरे फिरंगी खूब छाये थे । इन फिरंगियों के साथ किसी गोरी मेम की कल्पना करना या उसके चित्र देखना कोई अचरज की बात नहीं। अब किशोर अपने ख्वाब में उसे बेपर्दा करने की क्षमता तो रख ही सकता है।

    आप इधर प्रेम कथाओं में डूबे हैं। अचेतन मस्तिष्क में अगर किशोरवय के ख्वाब को फिर देख लें तो कोई अचरज नहीं। वैसे दुनियां के किसी कोने में अब आप उसे या तो देखेंगे नहीं या देख भी लिया तो पहचानेगे नहीं। अरे ! कित्ती बड़ी हो गई होगी ! सोचिये तो:)

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    1. किशोरवय और बुढौती के ख्वाब ऐसे ही हो सकते हैं कह कर आपने उम्मीदें जगाये रखी हैं ! पहले सांत्वना फिर आहों वाली बद्दुआ के लिए क्या कहूँ !

      गोरे फिरंगियों वाली बात तर्क के तौर पर स्वीकारणीय तो है पर ऐसा कहकर अनजाने में ही सही , आपने हमारे गुरुजनों पर आक्षेप भी कर दिया है ! इसका एक आशय यह भी हुआ कि गुरु जन देशभक्ति की कथाओं में गोरी मेमों का चित्रण भी करते रहे होंगे यानि कि नख शिख वर्णन ! इस हिसाब से एक बात और भी सूझती है कि यह दौर बांग्लादेश के जन्म और पाकिस्तान पर अपनी विजय के आस पास का है तो फिर गुरुजनों की प्रेरणा से बांग्ला भाषी , उर्दू / सिंधी /पंजाबी भाषी रमणियों को भी ख्वाब में बेपर्दा करने की सलाहियत और अवसर हमें मिलने चाहिये थे :)

      ख्वाब में उस कामिनी को कितना सघनता / गहनता से देखा के दावे की पुष्टि बतौर , उसे अब भी पहचान लेने वाले कथन को जब आपने पकड़ ही लिया है तो फिर उस कथन में एक संशोधन की दरकार है ...उसे दुनिया के किसी भी कोने में पहचानूंगा तब जबकि वह आज भी उसी उम्र की हो जितनी की ख्वाब में थी :)

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    2. गुरूजनो पर कोई आक्षेप नहीं। ख्वाब में वही दिखता है जो हमारे मन में होता है। आपके लिखे से यह मान ही लेता हूँ कि यह एक अलहदा किस्म का ख्वाब है जिसे आपने न सोंचा न देखा तो भी इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि कई बातें हमारे अचेतन मस्तिष्क में सवार हो जाती हैं जिसे हम उस वक्त महसूस ही नहीं करते लेकिन जब वह ख्वाब बनकर सामने आते हैं तो हम अचंभित हो उठते हैं..यह कैसे? न देखा न सोचा फिर यह कैसे? यहाँ पिछले जनम की बातें कही जाती हैं कि हो सकता है पिछले जन्म में हमने देखा होगा। हो सकता है लेकिन है ही यह सिद्ध कैसे किया जाय। यही अच्छा होगा कि...

      ख्वाब को ख्वाब ही रहने दो अब तकरार न करो
      लोग डर जायेंगे तुम ख्वाब से यूँ प्यार न करो।

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    3. गुरुजनों पे आक्षेप के मामले में 'अनजाने में ही सही' की शर्त बाकायदा जोड़ी गई है इसलिए कोई भ्रम नहीं होना चाहिये :) सवाल यही है कि एक अलहदा किस्म का ख्वाब अवचेतन में सवार हुआ भी तो कैसे ? जबकि वहां के हालात इसके अनुकूल ना थे ! मान रहा हूं कि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी है ! कुछ भी सिद्ध नहीं हुआ अभी !हम बस संभावनाओं पे चर्चा कर रहे हैं !

      आपके शेर पर एक फ़िल्मी गाना याद आया है ...

      मैं तो इक ख्वाब हूं इस ख्वाब से तू प्यार ना कर
      प्यार हो जाये तो फिर प्यार का इज़हार ना कर
      ये हवाएं कभी चुपचाप चली जाएंगी
      लौट कर फिर कभी गुलशन में नहीं आएंगी
      अपने हाथों में हवाओं को गिरफ्तार ना कर !
      मैं तो ...

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  6. let it as it is dont pull or push more than this
    otherwise it may hurt you.

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    1. शायद हां ...या शायद नहीं भी !

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  7. बड़ी बोल्ड पोस्ट है जी:)

    करने वाले इसकी व्याख्या ’डेजा वू’ से भी कर सकते हैं, कुछ ऐसा ही होता है उसमें। कुछ व्याख्यायें तो आ ही चुकी हैं। अपन इसे (पुनर्जन्म + अवचेतन = कोई ऐसा अप्रत्याशित ख्वाब) कहकर अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हैं:)

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    1. बोल्डनेस इसी को कहते हैं जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई :)
      आखिरकार एक बोल्ड पोस्ट अपने हाथ से भी निकली :)

      संजय जी ,
      डेजा वू + पुनर्जन्म + अवचेतन वाली तीनों संभावनायें प्राथमिकता के साथ विचारणीय हैं / स्वीकारणीय हैं !

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  8. पोस्ट पढ़ते वक़्त वही बातें ध्यान में आ रही थीं जो..देवेन्द्र जी ने लिखी है..
    भले ही उन दिनों...फिल्मे..छायाचित्र..पत्रिकाएं उपलब्ध नहीं थी..परन्तु जैसा देवेन्द्र जी ने कहा...

    "13 वर्ष का बच्चा कक्षा 8 में पढ़ता है। तब तक स्कूल में हमें यह बताया जा चुका था कि हमने गोरे फिरंगियों से कैसे आजादी पायी। देशभक्ति की कई कथायें बच्चे पढ़ चुके थे। इन कथाओं के कारण किशोरवय में ये गोरे फिरंगी खूब छाये थे । इन फिरंगियों के साथ किसी गोरी मेम की कल्पना करना या उसके चित्र देखना कोई अचरज की बात नहीं। "

    शुक्र मनाइए उस वक़्त सिर्फ कल्पना का ही सहारा था....इसीलिए ख़्वाब भी ख़ूबसूरत बन पडा...और अब तक याद है.

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    1. चूंकि पोस्ट आपने देवेन्द्र जी की टिप्पणी के आलोक में पढ़ी इसलिए आपकी प्रतिक्रिया भी उनसे भिन्न नहीं हुई !
      इस हिसाब से , फिरंगियों वाले तर्क पे जो जबाब देवेन्द्र जी को दिया वही आपके लिए भी पेश है !

      आपने ख्वाब को कल्पनाओं से जोड़ा , यह तर्क ख्वाब के विश्लेषण की एक सम्भावना बतौर स्वीकार किया गया :)

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    2. पोस्ट के बाद टिप्पणी पढ़ी थी....टिप्पणी के अलोक में पोस्ट नहीं..:)

      गुरुजन अंग्रेजों के बारे में जो भी बताते हों..छात्रों के मन में गुरुजी की बातें छोड़कर तमाम उटपटांग बातें ध्यान में आती हैं..इसका तो आपको ही
      ज्यादा अनुभव होगा:)..किशोर मन होता ही इतना उर्वर है..

      ख्वाब हमेशा अप्राप्य वस्तुओं के ही देखे जाते हैं...इसलिए बांग्ला / उर्दू / सिंधी /पंजाबी भाषी रमणियों की जगह किसी यूरोपियन को देखना ज्यादा सहज लगता है.

      आपकी इस पोस्ट ने अज्ञेय की "शेखर एक जीवनी" की याद दिला दी. उसमे भी एक किशोर कुछ इसी तरह के ख्वाब देखता है और कल्पनाये करता है. मैं पढ़ते हुए सोच रही थी...एक बारह/तेरह साल का बालक ऐसी बातें कैसे सोच सकता है...पर आपकी पोस्ट ने ताकीद कर दी..ऐसा संभव है...(इसके पहले किसी का ऐसा कन्फेशन पढ़ा भी नहीं था,ना )

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    3. चलिए यही सही कि आपने टिप्पणी के आलोक में टिप्पणी की :)

      किशोर मन की उर्वरता और कल्पनाशीलता पे कुछ ज्यादा ही बड़ा दांव लगा रहे हैं आप लोग ! आखिर को एक किशोर बिना कुछ देखे / सुने / पढ़े किसी अज्ञात यथार्थ की इतनी सटीक कल्पना कैसे कर सकता है ! दूसरों के बारे में ना भी कहूँ तो कम से कम इस प्रकरण में अपनी कल्पनाशीलता के बारे में तो कह ही सकता हूं कि बिना देखे / सुने / पढ़े इतनी कल्पनाशीलता ! अमा ... लाहौल बिला कुव्वत :)

      कन्फेशन तो है पर कोई बाहर से उसका विश्लेषण भी तो करे ! मैं खुद करूं तो तो शायद पूर्वाग्रही कहलाऊंगा !

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    4. तकरार कुव्वत-ए-ख्वाब...! लाहौल बिला कुव्वत:)

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    5. वो जो आसमां से टपक गई , मेरे ख्वाब में अटक गई !
      खुली नींद जो वो सटक गई , मेरे दोस्तों को खटक गई !! अमा...लाहौल बिला कुव्वत :)

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  9. उत्तम लेखन, बढिया पोस्ट - देहात की नारी का आगाज ब्लॉग जगत में। कभी हमारे ब्लाग पर भी आईए।

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    1. जी धन्यवाद , आपके ब्लॉग पर ज़रूर पहुंचेंगे !

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  10. ख्वाब में जो देखा,जैसा भी देखा , सब कुछ वैसा ही होता है
    :)

    प्रियवर आदरणीय अली भाईजी
    चेतन अवचेतन की कितनी ही वीथियों के भ्रमण पर ले गई आपकी यह पोस्ट !
    …कई ख़्वाब कई हक़ीक़तें यादों के दरीचों से झांक कर इशारे करते महसूस होने लगे हैं …
    स्मृतियों की अंधी कोठरी के जुगनू जाग्रत होते प्रतीत हो रहे हैं …
    हां, इस पर लिखने की ज़रूरत है मुझे भी ।

    आपकी प्रविष्टियां प्रेरक होती हैं अक्सर …

    कई बार क़िताबों के उन्वान लिखवाने की उम्मीद लिये' लोग चले आते हैं मेरे पास
    आपकी इस पोस्ट से ऐसे लोग ख़ुद ही कुछ चुरा सकते हैं , मसलन

    *दोपहर की तपिश का जबाब शाम से पहले की बारिश*
    *जिंदगी के ताप का मुकम्मल बैलेंस*
    *अतीत की गलियों में*


    मैं लोगों को आपके ब्लॉग का लिंक दे दिया करूंगा आगे से …
    :))

    बांटते रहें हमेशा ऐसे ही , जो ख़ज़ाना आपके पास है …
    आएंगे फिर कुछ ग़ौहर लूटने…

    *महावीर जयंती* और *हनुमान जयंती*
    की शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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    1. राजेन्द्र भाई ,
      आपको हर उत्सव की अशेष शुभकामनायें !

      वास्ते ,
      ख्वाब में जो देखा,जैसा भी देखा , सब कुछ वैसा ही होता है :)

      मगर ये इत्मीनान कई साल बाद हुआ :)

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  11. बेपर्दगी की हालत में गौर वर्ण रमणी का आपको खोजना और वो भी 13 वर्ष की उम्र में,क्या कहें
    आह या वाह....

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    1. बिष्ट साहब ,
      अगर वो ख्वाब ना होता तो कोई राय मैं भी बना पाता :)

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  12. मियां , १३ की उम्र को ऐसा वैसा समझने की भूल मत कीजिये । यही वो उम्र होती है जब टेस्टोस्टिरोंन अपना रंग दिखाने लगता है । वस्त्रों में लिप्त सुंदरी तो आपने तब भी देखी ही होगी । फिर ख्वाबों में चीर हरण करना कौन मुश्किल काम है । :)

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    1. वस्त्रवान सुंदरियां तो अपने मुल्क की देखी होंगी डाक्टर साहब , पर निवस्त्रवान सुन्दरी विदेश की थी ! मतलब ये कि एक कम उम्र इंसान ने ख्वाब में पहले सुन्दरी का मुल्क बदला फिर चीरहरण भी किया :)

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    2. किताबों , तस्वीरों या फोटो में देखी होंगी । बाकि का काम तो हॉर्मोन ने कर दिया होगा ।
      एक टिप्पणी सतीश जी की पोस्ट पर भी की है । कृपया देखें ।

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    3. उस ज़माने में किताबों और तस्वीरों में आंग्ल सुन्दरी तो देखी नहीं पर हार्मोन्स को एक वज़ह मान सकता हूं :)

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  13. हम तो टिप्‍पणियां पढ़ कर ''कवि का आशय'' समझने का प्रयास करते रह गए हैं...

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  14. टिप्पणियां पढ़कर कवि के आशय को समझने के प्रयास के बाद अब तो कम से कम संस्मरण / आलेख भी पढ़ लीजियेगा :)

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  15. मनोवैज्ञानिक तो यही कहते हैं कि सपने हमारे अवचेतन की ही देन हैं , मगर बहुत कुछ इससे परे है , सबकी समझ के परे ...पराविज्ञान यही तो है !

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    1. कारण समझाने की ही कोशिश है !

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  16. ऐसे सपने न देखें, दिख जाएं तो याद न रखें, याद रह जाएं तो बाटें नहीं और फिर भी उदारता से बांट ही दिया है तो रायशुमारी न करें, और राय मागते भी हैं तो जिन नजरों ने ख्‍वाब बुना, उन्‍हीं नजरों पर नजर रखे आपकी राय से इत्तिफाक बना लेंगे.

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    1. जबरिया चाह कर देखे होते ना देखते :)
      असामान्य / विलक्षण ना होते तो भूल जाते :)
      बांटना अपना पेशा ना होता तो नहीं भी बांटते :)
      राय मांगी है सो नज़र भी रख रहे हैं ! इत्तिफाक आंखमूंद कर नहीं किया जाएगा यह तय है :)

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  17. एक कहानी ख्वाबों से जुडी यहाँ शेयर करना चाहूँगा.. इसकी हकीकत की तस्दीक ज्ञानदत्त जी ही कर सकते हैं.. इलाहाबाद में जमुना नदी पर बना रेलवे का पुराना पुल (अब नया बन गया है).. नदी के बीचों बीच पुल का पाया अपने बाकी के पायों से अलग है.. गौर से देखें (ज़मीन से किले की तरफ से) तो लगेगा कि कोई ज़नानी सैंडिल है.. बताते हैं अँगरेज़ इंजीनियर जब उसे बना रहा था, तो वो पाया पानी में बह जाता था.. इसी उलझन में सोया था जमुना किनारे कि सपने में उसे अपनी बीवी नज़र आ गयी.. उसके जिस्म पर फिसलती नज़र जब सैंडिल पर पड़ी तो उसकी नींद खुल गयी.. उसने पाए का डिजाइन बदलकर सैंडिल नुमा बनाया.. और वो पाया आज भी वैसा ही है..
    /
    बेन्जीन की बनावट बस में आयी झपकी के दौरान साँप के अपनी पूँछ को पकडने की कोशिश के सपने के दौरान केकुले ने सोची.. एक बड़े न्यूरो सर्जन एक बीमारी नहीं पकड़ पा रहे थे और सपने में उन्हें एक ख़ास नस दिखाई दी और बीमारी दूर, ऑपरेशन कामयाब..
    /
    ख़्वाबों को बस ऐसे ही कहकर नज़रंदाज़ तो नहीं ही किया जा सकता.. और ऐसा कुछ देखना जो आपने कभी न देखा हो.. ये तो आप ही बता सकते हैं कि आपकी आइन्दा ज़िंदगी में उस जैसी या उस घटना ने किस रूप में या किसी रूप में आपके सामने आई!! और नहीं आई तो बस इंतज़ार कीजिये!! और हाँ, उसका ज़िक्र भी इस यहाँ होगा ऐसी उम्मीद है!!:)

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    1. सलिल जी ,
      टिप्पणी पढ़कर तसल्ली हुई ! लोग इसे निषिद्ध / अवांछित विषय मानकर परित्याग की सलाह देते है जबकि अपना मानना यह है कि जिंदगी से चाहे जैसे भी हो इनका ताल्लुक बेहद गहरा और अर्थपूर्ण होता है ! कमी अगर कोई हो तो वह अनालिसिस की हो सकती है ! मनोसंसार की पड़ताल बेहद रोचक विषय भी है और गंभीर भी !

      उस घटना या उस जैसी घटना का फिलहाल तो इंतज़ार...घटी तो उसका ज़िक्र , यहां भी ज़रूर किया जाएगा :)

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  18. ख्वाब से जुड़े रीडर्स डाइजेस्ट में पढ़े एक वाकये का जिक्र मैं भी कर दूँ...
    सिलाई मशीन के आविष्कारकर्ता ने सिलाई मशीन बना ली थी...बस उसकी सूई में सुराख कहाँ करें समझ नहीं पा रहे थे. और उन्होंने एक रात सपना देखा...कुछ लोग उनपर भाला लेकर आक्रमण कर रहे हैं कि 'अब तक मशीन क्यूँ नहीं तैयार की'.
    भाले की नोक के समीप उन्हें सुराख दिखाई दिया और उनकी नींद खुल गयी. उन्हें पता चल गया सुई में सुराख कहाँ बनानी है.

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    1. जी ! पढ़ा था इस किस्से को ! मन:जगत अदभुत है !

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