बुधवार, 30 जून 2010

समृद्ध वाचिक परम्पराओं...लोक संस्कृतियों का परकाया प्रवेश यानि इतिहास लेखन के खतरे !

[ कल रात लैपटाप की बेरुखी से परेशान होकर जल्दी सोने का निर्णय लेना पड़ा लिहाज़ा ब्लॉग आरम्भ की महत्वपूर्ण प्रविष्टि तक पहुंचने में विलम्ब हुआ...सुबह सोचा...त्वरित प्रतिक्रिया देकर आगे बढ़ें...टायपिंग शुरू भी की, लेकिन पूर्वजों की समृद्ध थाथी के प्रति कामचलाऊ टिप्पणी की धृष्ठता से बचने का ख्याल जोर मार गया...फिर क्या था...संजीव जी से बाकायदा दूरभाष पर वार्ता कर अनुमति मांगी कि...क्या मैं आपके आलेख पर मेरी इस लंबी टिप्पणी को अपने ब्लाग की प्रविष्टि बतौर प्रकाशित कर लूं ? वे सज्जन व्यक्ति हैं, उनकी सदाशयता के चलते मैं यह आलेख प्रकाशित कर पा रहा हूं! चूंकि उन्होंने काफी विस्तार से पंडवानी पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है इसलिए मेरे आलेख में उन अंशों की पुनरावृत्ति मुझे उचित नहीं लगी! विशेष निवेदन ये है  कि मेरे आलेख को श्री तिवारी के आलेख की पुरौनी बतौर पढ़ा जाये ]


ब्लाग आरम्भ में आज का पंडवानी विषयक आलेख, दरअसल वाचिक परम्पराओं के लिखित परंपरा बतौर कायांतरण पर फोकस करते हुए, वाचिक से लिपिबद्ध होने की प्रक्रिया के दौरान भ्रांतियों के पनप जाने के खतरे की ओर स्पष्ट संकेत करता है!  मेरे ख्याल से इसे वाचिक परम्पराओं और लोक संस्कृतियों का परकाया प्रवेश यानि इतिहास लेखन के खतरे की तरह से पढ़ा और समझा जाना चाहिये!  इसमें कोई संदेह नहीं कि लोक परम्परायें और लोक संस्कृतियां सबसे पहले वाचिक परम्परा के तौर पर ही उदभूत, विकसित, पुष्पित और पल्लवित हुई हैं!  मनुष्यों की हजारों पीढियां इन्हीं की बदौलत पशु जगत पर अपनी श्रेष्ठता की बुनियाद रखती आई हैं! उसके ज्ञान भंडार का स्वत्व शेष ( बैंक बैलेंस ) , लिपि के आविष्कार से पूर्व, केवल इन्हीं वाचिक परम्पराओं पर आश्रित रहा है ! 

ये भी खूब है कि मनुष्य ने अपने अस्तित्व और सहजीविता की परम्पराओं के समानांतर अभिरुचियों और जीवन्तता की परम्पराओं को भी विकसित किया वर्ना वह केवल हाड़ मांस युक्त नीरस रोबोट अथवा दोपाया पशुओं की तरह का जीवन जी रहा होता !  रोजमर्रा के दुष्कर हालातों से जूझते हुए उसने अपने लिए मनोरंजन और उल्लास की अभिव्यक्ति का अदभुत संसार गढ़ा !  क्या कभी इस बात की कल्पना की जा सकती है कि लोककलाओं / लोकगीतों / लोकगाथाओं और लोक रंग कर्म के बिना मनुष्य का समाज और उसका सामाजिक जीवन कैसा होता ?  वाचिक परम्पराओं को नश्वर देहधारी मनुष्य की अनश्वरता की निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है !  पीढ़ियां गुजरती गईं पर ज्ञान तथा  अनुभव के संचयन की निरंतरता बनी रही !  स्पष्ट होता है कि वाचिक परम्पराओं के अभाव में मनुष्य आज भी कहीं अपने खुर ( एड़ियां ) घिस रहा होता और पशुओं की तरह से झुण्ड बनाकर जीवन जीता रहता...उसकी सभ्यता, उसका विकास, उसकी प्रौद्योगिक उन्नति का स्तर नि:संदेह आज भी शून्य ही होता! कहने में कोई हर्ज नहीं कि वाचिक परम्पराओं ने मनुष्य और उसके सामाजिक विकास की बुनियाद का महती कार्य किया है! यहां यह उल्लेख समीचीन होगा कि वाचिक परम्परायें मनुष्य के सामाजिक संसार की बुनियाद के रूप में भले ही चीन्ही जा रही हों किन्तु उनमें पीढ़ी से पीढ़ी, स्थान से स्थान, समय से समय, बोली से बोली का जो वैविध्य / वैषम्य मिलता है उसका मूल कारण स्वयं मनुष्य है उसके मनोसंसार की विविधता भरी पृष्ठभूमि है! यदि गौर से देखा जाये तो किसी वाचिक परम्परा का नाभि केन्द्र भले ही यथावत बना रहा हो किन्तु उसकी ऊपरी सतह पर मनुष्य की मनोसांसारिक भिन्नताओं के निशान आज भी मौजूद हैं !  

लिपि के विकास के बाद वाचिक परम्पराओं के लिखित परम्पराओं में बदलने की प्रक्रिया प्रारम्भ तो हुई पर इसमें विरूपण का जोखिम बना रहा जबकि यह अपेक्षित था कि वैज्ञानिक चेतना / निरपेक्ष दृष्टि तथा इतिहास बोध संपन्न मस्तिष्क यह कार्य करेंगे पर ऐसा हुआ नहीं !  मिसाल के तौर पर पुराने राजे रजवाड़ों में यह कार्य भाटों / चारणों / कवियों / गवैय्यों / राज्याश्रित लोगों द्वारा किये गये!  मसलन पृथ्वी राज चौहान की अतिमानवीय शक्तियों का अतिरंजित वर्णन! लगभग इसी तर्ज पर  आल्हा ऊदल के पाषाण गुल्ली डंडे को  देख कर कौन कह सकता है कि इससे खेलना कभी भी संभव रहा होगा! अतः वाचिक परम्पराओं के दस्तावेजीकरण अथवा लिखित परम्पराओं के रूप में कायांतरण के समय भी भाट / चारणीय प्रस्तुतिकरण अथवा अनधिकृत हस्तक्षेप का खतरा बना हुआ था और बना रहेगा जब तक कि इन परम्पराओं के संरक्षण का दायित्व कुशल हाथों में नहीं आ जाता !  

खैर मुद्दा ये है कि श्री संजीव तिवारी ने पंडवानी जैसी सशक्त विधा पर कलम भांजते हुए उसके वेदमति और कापालिक रूपों का उल्लेख करते हुए यह संकेत दिया कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परम्पराओं के स्तरीय लेखन की आवश्यकता है! उन्होंने लोक कलाओं के बहाने वाचिक परम्पराओं के सहेजने की प्रक्रिया में भ्रांतियां पनपने के उदाहरण बतौर मध्य प्रदेश लोक कला परिषद के मंहगे मोनोग्राफ का जिक्र किया है, जिसमें पंडवानी के विषय में कतिपय भ्रामक जानकारियां प्रकाशित की गई  हैं!  व्यक्तिगत रूप से मैं उनकी इस चिंता से शत प्रतिशत सहमत हूं कि लोक कलाओं के साथ अदक्ष / अकुशल, कथित लोक कला विशेषज्ञों / मर्मज्ञों द्वारा छेड़छाड़ नहीं की जाना चाहिये !  

छत्तीसगढ़ लोक संस्कृतियों का समृद्ध गढ़ है, धान के खेतों, कीचड़ भरे रास्तों, कवेलू पोश मकानों से,...नितांत खेतिहर / ग्राम्य जीवन से, लोक रंग के अनूठे सितारे , अंतर्राष्ट्रीय आकाश पर यूं चमकने लगते हैं गोया सारा आसमान, केवल अपना हो!  लोक सांस्कृतिक परम्पराओं की अलौकिक आभा बिखेरते छत्तीसगढ़िया कलाकार धूल से उपजे देवताओं की तरह, अपनी यश गाथायें खुद बखुद गढ़ रहे हैं!  अपने आलेख में पंडवानी की वेदमति शाखा को केवल गायन यानि सुर और ध्वनि आधारित पंडवानी के रूप में तथा  कापालिक शाखा को गायन सह अभिनय अर्थात ध्वनि सह भाव भंगिमाओं के साथ जोड़ते हुए श्री  तिवारी,  श्री झाड़ू राम देवांगन श्री पूना राम जी निषाद और श्रीमती तीजन बाई, श्रीमती ऋतु वर्मा का नाम अत्यंत सहज भाव से ले डालते हैं मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता अगर वेदमति या कापालिक कहे जाने के बजाये पंडवानी की इन दोनों शाखाओं को इन महान कलाकारों के नाम से संबोधित किया जाता !  

  

10 टिप्‍पणियां:

  1. 1.लोक कलाओं / लोक गीतों / लोक गाथाओं और लोक रंग कर्म के बिना मनुष्य का समाज और उसका सामाजिक जीवन कैसा होता ? शैलाश्रयों में चित्रांकन कर रहे होते!
    २.लोक कलाओं के साथ अदक्ष / अकुशल ,कथित लोक कला विशेषज्ञों / मर्मज्ञों द्वारा छेड़छाड़ नहीं की जाना चाहिये ! पैमाना क्या होगा. निर्णय किसका माना जाएगा?
    यदि आपका पोस्ट पुरौनी है तो तिवारी जी के पोस्ट पर दुबारा जाना होगा. लोक कलाओं / लोक गीतों / लोक गाथाओं और लोक रंग कर्म के प्रति आपकी आसक्ति को नमन.

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  2. आदरणीय सुब्रमनियन जी
    इसी पोस्ट में मैंने अपनी बात साफ़ की है -
    (२)
    "मिसाल के तौर पर पुराने राजे रजवाडों में यह कार्य भाटों / चारणों / कवियों / गवैय्यों / राज्याश्रित लोगों द्वारा किये गये"

    "जबकि यह अपेक्षित था कि वैज्ञानिक चेतना / निरपेक्ष दृष्टि तथा इतिहास बोध संपन्न मस्तिष्क यह कार्य करेंगे पर ऐसा हुआ नहीं "

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  3. संजीव तिवारी के लेख का लिंक नहीं है ..पर आपके लेख को पढने के बाद यह कदाचित आवश्यक नहीं रह गया है ..
    आपने एकल बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को उठाया है जो कई बौद्धिक अनुशासनो को समाहित करता है ,विशेषतया इतिहास लेखन को .....वाचिक परम्पराएं निश्चित रूप से विरूपित होती हैं जब उन्हें अन्य माध्यमों में तब्दील किया जाता है और कुछ सीमा तक तो इसे सहन किया जा सकता है और कुछ को समझने के लिए नीर क्षीर विवेक चाहिए...भारतीय काव्य विचार अतिरंजना से ओतप्रोत है -आल्हा काव्य को इसी दृष्टि से देखना होगा -बहुत कुछ प्रतीकवाद है और अतिमानवीयकरण भी ...और मनुष्य के अवचेतन का मिथकीय प्रक्षेप भी .....
    अली सा अपनी वाचिक लोक गाथाओं को देखते समय हमें बहुत सतर्क और ज्ञान चक्षुओं को खुला रखना होगा ..
    आप तो बहुत बौद्धिक प्राणी निकले ..मेरी दोस्ती कुछ कम से भी चल जाती ...हा हा !

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  4. अरविन्द जी
    पोस्ट के पैरा दो की शुरुआत में "ब्लॉग आरम्भ" लिंक है कृपया उसे क्लिक करियेगा !
    पोस्ट और मित्रता पर आपके विचारों के लिये शुक्रिया :)

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  5. Bahut-si kalayen,rajyashray ke abhav se nest nabood ho gayin..

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  6. मेरे पोस्‍ट के पुरौनी बतौर स्‍नेह स्‍वरूप प्रस्‍तुत इस पोस्‍ट में आपने पंडवानी और लोक विधाओं पर अपनी स्‍पष्‍ट और विस्‍तृत दृष्टि प्रस्‍तुत की है जो विषय के तारतम्‍य में संपूर्ण पोस्‍ट है.

    आपने मेरी पोस्‍ट, परंपरा, वाचिक से लिपि की यात्रा, परंम्‍पराओं को सहेजने के रास्‍ते भ्रांतियां रचने व प्रदेश की सांस्कृतिक परम्पराओं की लौकिक छवि के संबंध में गहन चिंतन व्‍यक्‍त किया है.

    पंडवानी के दोनों शाखाओं को इन महान कलाकारों के नाम से संबोधित किए जाने के आपके सुझाव का मैं भी समर्थन करता हूं, विद्वजन इसे स्‍वीकारें.

    बहुत बहुत धन्‍यवाद भईया.

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  7. क्षमा जी
    इस आलेख में मैंने केवल 'वाचिक' के 'लिखित' में बदलने का मुद्दा उठाया है और इस प्रक्रिया में विरूपण के खतरों के संकेत दिए है ! आप गौर करें तो राज्याश्रित चारण / गवैय्ये अपनी कलाओं के निष्णात व्यक्तित्व हैं पर वे कलाकार हैं ! राजकुल के इतिहासकार नहीं , इतिहास लेखन उनकी विशेषज्ञता नहीं...वे दस्तावेजीकरण के लिए स्किल्ड( दक्ष )नहीं हैं ! उनकी भूमिका केवल कला साधक की है और केवल यही होनी चाहिये थी !

    आपने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है पर यह प्रश्न कलाओं के आश्रय का है कलाओं के दस्तावेजीकरण का नहीं!मेरे ख्याल से आश्रय और दस्तावेजीकरण दो अलग अलग स्थितियां हैं ! कुछ यूं कि आश्रय कौन दे ? ...दस्तावेजीकरण कौन करे ?
    कलाओं और कलाकारों को संरक्षण के मुद्दे पर, राज्याश्रय बनाम समाजाश्रय के मुद्दे पर यदि संभव हुआ तो आगे जरुर लिखूंगा !
    इस मुद्दे को दिमाग में घुसाने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया !

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  8. लोक परम्पराओं से सम्बंधित आपकी चिंता चिंतन को आमंत्रण देती है। वैसे इनके वर्णन में अतिश्योक्ति के भाव तो रहते ही हैं।
    ---------
    किसने कहा पढ़े-लिखे ज़्यादा समझदार होते हैं?

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  9. गंभीर विश्‍लेषण. विशेषज्ञ लोक कला रूपों का व्‍याकरण पूरा रच भी नहीं पाते, एक नया आयाम सामने आ जाता है. कापालिक वेदमती घोषित करने के बाद के कुछ गड़बड़-झालों की चर्चा संजीव जी से हुई है. जल्‍दी आ जाएगा. शायद उससे तस्‍वीर कुछ अधिक साफ हो. अक्‍सर होता यह है कि एक अनाड़ी शास्‍त्र रच डालने के फिराक में दूसरे की ओर देखता है और कई बार यह सवाल कलाकार पर दाग दिया जाता है. फिर इसके बाद तो लोहे का स्‍वाद लुहार से नहीं घोड़े से पूछा हुआ होता है. मजेदार है य‍ह बुदि्रध विलास. लेकिन गनीमत है कि इससे कलाकारों को कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. बहरहाल पोस्‍ट में गंभीर और जिम्‍मेदार चिंतन है. बधाई.

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