मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

शाहबानो के बहाने : ला बनाम पर्सनल ला एक सवाल ?

उन दिनों जब बाबरी मस्जिद बनाम राम जन्मभूमि के मामले में जबरदस्त राजनैतिक दांव पेंच लगाये जा रहे थे तभी मुस्लिम पर्सनल ला बनाम शाहबानो बनाम न्यायपालिका का मसला भी सुर्खियों में छाया रहा और उस वक़्त राजनेताओं /धार्मिक अल्पसंख्यक , बहुसंख्यक नेताओं - वगैरह वगैरह नें अपने अपने अनुकूल रोटियां सेंकनें की कोशिश की और बेचारी शाहबानो शह और मात के खेल की बिसात मात्र बन कर रह गई ! गौर से देखें तो दोनों ही मामलों में धार्मिक अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक अपनी अपनी सुविधा के अनुसार न्यायपालिका के विरुद्ध 'पर्सनल ला' और 'आस्था ' का सवाल खड़ा कर रहे थे ! और मजेदार बात ये कि ऐन इसी वक्त दूसरे पक्ष से न्यायपालिका के सम्मान की आकांक्षा रखते थे !
यानि जहां 'मस्जिद बनाम जन्मभूमि' मसले पर अल्पसंख्यक 'न्यायालय के सम्मान' और बहुसंख्यक 'आस्था' का सवाल उठाते हैं वहीं 'शाहबानो' के मामले में स्थिति उलट जाती है रातों रात बहुसंख्यक 'न्यायालय के हामी' और अल्पसंख्यक 'पर्सनल ला' के पक्षधर बन जाते हैं ! मीठा मीठा हप और कड़वा कड़वा थू की तर्ज पर चल रही इस लम्बी और अनिर्णायक प्रतियोगिता के जनोपयोगी तथा सौहार्द्य पूर्ण परिणामों के सब्जबाग़ दिखा कर, लम्पट राजनेता , खेल के स्वयम्भू निर्णायक बनकर सीटियों पर सीटियां बजाते हुए वोटों की फसलें काट रहे हैं और जनता ......?
इन दोनों मामलों की अन्तिम परिणति क्या होगी यह तय नहीं है और ना ही इसके सार्थक हल के संकेत हैं पर यह तय है कि अवसरवादी राजनेताओं को साइड लाइन किए बिना 'जन गण' की विजय की कामना असंभव ही है ! यहां यह स्पष्ट कर दूँ कि शाहबानों के मामले में राजनेताओं के हस्तक्षेप और संविधान संशोधन को मैं अन्तिम समाधान के रूप में नहीं देख पा रहा हूँ ! मेरे विचार से पर्सनल ला और आस्थाओं को संविधान और न्यायालयीन सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए ! पर्सनल ला और आस्थायें नितांत व्यक्तिगत / घर की चार दीवारों के अन्दर या अन्तःसामुदायिक बातें हैं इन्हें सार्वजानिक / घर से बाहर और अन्तरसामुदायिकता को प्रभावित करने की छूट नहीं मिलना चाहिए ! इसमें कोई शक नहीं कि कतिपय अन्तःधर्मी विषयों को छोड़ कर समस्त अन्तरधर्मी और जनगण के नागरिक मूल्यों और कर्तव्यों / झगडों का एकमात्र निर्णायक / निर्धारणकर्ता न्यायालय ही है और न्यायालय की इस महती भूमिका के लिए संसद को 'जिम्मेदार' और जनगण की 'वाजिब अपेक्षाओं' का हामी होना चाहिये !
अयोध्या का मामला फिलहाल न्यायालय के विचाराधीन है इसलिए उसके सन्दर्भ में कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा लेकिन शाहबानो के मामले में मेरा विचार यह है कि उसे कोर्ट के माध्यम से " जो कुछ " मिल सकता था वो तो मिला ही नहीं बल्कि शरियत और पर्सनल ला "जो कुछ " दे सकते थे वह उससे भी वंचित रह गई !
उदाहरण के लिए अगर किसी महिला का निकाह यूरोप /अमेरिका /अरेबिया/ बांग्लादेश /जापान /या भारत में होता है तो जाहिर है कि उसका महर वहां की करेंसी यानि कि यूरो /डालर /रियाल /टका /येन /या रुपये में तय किया जाएगा ! मतलब ये कि  करेंसी का टाइप मायने नहीं रखता ! अतः जिस मुल्क में शादी , वहां की करेंसी महर के लिए मुनासिब मानी जायेगी ! इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि करेंसी , कागज या धातु की हो ! उसका सीधा सा अर्थ है "क्रय शक्ति " और हर देश की करेंसी की क्रय शक्ति अलग अलग है तो इसका सीधा सा मतलब ये हुआ कि शरियत करेंसी के टाइप नहीं बल्कि उसकी "क्रय शक्ति'' वाले आशय पर फोकस करती है या कि उससे असहमत नहीं है ! अब मान लीजिये कि मेरी शादी सन 1947 में हुई और महर की रकम मात्र 50 रुपये तय हुई और मैं सन 2000 में अपनी बेगम को तलाक दे दूँ तो क्या उसके महर की रकम इस वक्त भी रुपये पचास ही गिनी जायेगी या कि मैं तलाकशुदा बीबी को सन 1947 के 50 रुपये का ( ना केवल शरियत बल्कि न्यायालय के माध्यम से भी ) क्रय मूल्य देने के लिए बाध्य हूँ ?
तो क्या शाहबानो के मामले में इस बिन्दु पर विचार किया गया था ? अगर मैं ग़लत नहीं हूँ तो इस बिन्दु पर ना तो पर्सनल ला के हामियों और ना ही माननीय न्यायालय के जज साहबान ने कोई फोकस किया था ! मेरा ख्याल है कि 1947 में अगर 50 रुपये में एक टुकडा जमीन खरीदी गई होती तो वह सन 2000 में लाखों की होती ? मुझे नहीं लगता कि शरियत करेंसी के धातु / कागज / मिटटी /चमड़े वगैरह के होने न होने के आधार पर कोई भेद भाव करती है ! तो क्या शाहबानों को तलाक के वक्त जो महर मिला वह उसके निकाह के समय की तयशुदा करेंसी के "क्रय मूल्य" के बराबर था ?

2 टिप्‍पणियां:

  1. तर्कसंगत ढंग से रखे गये आपके विचार प्रभावित करते हैं।
    ( Treasurer-S. T. )

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  2. आपके तर्कसंगत कथन से हम भी पूरी तरह से सहमत हैं किन्तु ऎसे मुद्दों पर सोचने,विचारने,उन पर ध्यान देने का समय शायद इस देश में किसी के पास नहीं है.....

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