बुधवार, 5 अगस्त 2009

रक्षाबंधन...नक्सलवाद...और मैंने रखा है मुहब्बत अपने ....

इन दिनों काफी हॉउस में बौद्धिक जुगाली की परम्परा संकट में है , जब काफी हाउस ही नहीं तो अड्डेबाजी कैसी ?...अड्डेबाजी के अभाव में साहित्य / समाज / राजनीति / क्रांति , वगैरह वगैरह अनाथ से हो चले हैं .... सच कहूं तो काफी हाउस , गरीब गुरबा और मंझोले अर्थतंत्र वाले चिंतकों के बोधि वृक्ष हुआ करते थे जहाँ गंभीर से गंभीर और हल्के से हल्के विषयों पर चर्चा बिन खर्चा सम्भव थी ! लेकिन काफी हॉउस , उम्र दराज बूढों से , बोधि वृक्ष ... आख़िर टिकते भी तो कब तक ! ...सो उन्हें जाना ही है ! ...जाना ही पड़ेगा !
खैर ...... अब बात बात पर बीडी या सिगार से उपजे धुंयें , उसकी वर्तुलाकार आकृतियों और तम्बाखू की तेज गंध के दरम्यान साहित्य तथा विचार को बेदम फेंटने वाले मित्रगण हैं नहीं तो क्या ? ...उनके जाने की सम्भावना से पेश्तर , साहित्य और विचार के वातानुकूलित पालन पोषण का इंतजाम कर लिया गया है , इसलिए मैं निश्चिंत हूँ और इस नायाब इंतजाम के लिए जनगण की सरकार का अहसान मंद भी ! लोकतंत्रीय ढांचे में , जनगण की सरकार को 'विचार' का खास ख्याल रखना ही पड़ेगा ! जब वोट लिया है तो वोटर की चिंता दूर करना उसका फर्ज भी बनता है ! .....काफी हॉउस रहें ना रहें , काफी हॉउस के भरोसे चिंतन कर पाने वाले लोग रहें ना रहें ... सरकार है ना ! विचार के प्रति सचेत सरकार और विचार को निज पुत्र की तरह पालने को तत्पर उसके बड़े बड़े कारिंदे ...! भाई मैं तो चिंता मुक्त हूँ .... काहे का रंगकर्म , कौन सा नाटक , कैसी कविता ....कौन से छंद , क्या विचार... काहे का द्वंद ....सरकार है ना ....उसे करने दो सृजन , उसे रचने दो साहित्य , उसे तय करने दो संस्कृतियाँ और विचार की नियति .....!
आज रक्षा बंधन है चलो अपनी बहन की चिंता करें ...सामने नक्सलवाद है .... सो अपनी जान की चिंता करें और चिंता करें अपनी पत्नी तथा नवजात शिशुओं की ....फिलहाल मेरे साथ मिलकर गायें ......मैंने रखा है मुहब्बत अपने अफ़साने का नाम तुम भी कोई अच्छा .......!

5 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन विचारणीय आलेख.

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  2. अब कहां रहे काफी हाउस...बहुत से विकल्प आ गए है व समय भी कम हो गया है

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  3. अपने गीत में मेरा स्वर भी मिला लें। आप अच्छा राग छेड़ रहे हैं।

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  4. अच्छा व्यंग्य है।

    रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

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  5. मैने की जगह हमने करके सभी गा सकते हैं।सटीक्।सरकार,साहित्य,सृजन,सम्मान,समारोह,शहीद,शाल,श्रीफ़ल और सिलसिला शहादत का।

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