सोमवार, 13 जुलाई 2009

....हिंसा और अकाल मृत्यु के विरूद्ध हमारी अपेक्षायें !

पिछले कई वर्षों से छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र लहूलुहान हैं , कभी नक्सलवादी समूहों के हमले , कभी उसका प्रतिकार करती पुलिस फोर्स या यूं भी कहें कि पुलिस विरूद्ध नक्सल समूहों के रणक्षेत्र में हताहत बेचारा आदिवासी * ( *इस संज्ञा में गैर आदिवासी भी सम्मिलित माने जायें )
कल पुलिस पार्टी पर नक्सलियों नें चारा डाला फ़िर पापी पेट तथा परिजनों के भविष्य के लिए नौकरी कर रहे कुछ अनमोल जीवन अनन्त में विलीन हो गए ! घटना बेहद दुखद है किंतु ऐसा नहीं कि जीवन वर्सेस अकाल मृत्यु का यह चक्र एकतरफा है , दरअसल इस क्रूर खेल में विपक्ष भी जीवन दांव पर लगाता है और....यह सिलसिला ख़त्म होने के बजाये गति पकड़ता जाता है !
बहस मुबाहिसों के चक्कर में पड़े बिना सबसे पहले ये कह दूँ कि इस तरह से मानव जीवन की क्षति अत्यन्त निंदनीय है , दुखद है , प्रकृति के उसूलों के विरुद्ध है ! कौन जाने हम इन्सान अपनी बात मनवाने के लिए अपना आपा क्यों खो बैठते हैं फ़िर चाहे उसकी परिणति , दूसरे अथवा स्वयं की मृत्यु ही क्यों ना हो ! अतिवाद अपने हर रूप में चाहे वह संगठित हो या असंगठित , सामूहिक हो या व्यक्तिगत , प्राइवेट सेक्टर का हो या सरकारी , हर हाल में , अक्षम्य अपराध है क्योंकि यह कुदरत / प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण करता है ! आप गौर करें तो पाएंगे कि प्रकृति भी जन्म /मृत्यु - सृजन /ह्रास के चक्र से संचालित है किंतु वहां अतिवाद नहीं है !
मुझे लगता है कि शायद विषयांतर हो रहा है अतः मैं मूल मुद्दे पर लौटता हूँ , मुद्दा यह है कि क्या किसी राजनीतिक प्रणाली अथवा शोषण मुक्त समाज याकि सर्वहारा की सत्ता की स्थापना के लिए हिंसा अपरिहार्य है ? पता नहीं कौन क्या तर्क देगा ! लेकिन यह तो तय है कि 'सर्वहारा के पक्ष में युद्ध कर रहे लोग' और 'लोकतान्त्रिक ढंग से चुनी गई सरकार ' के मध्य एक जबरदस्त समानता है ! ....... वो ये कि दोनों ही जन कल्याणकारी होने के दावेदार हैं , भले ही इस दावे पर दोनों पक्षों की सफलताएँ व्यवहारिक धरातल पर संदिग्ध बनी हुई हैं ! जनकल्याण के घोषित उद्देश्य से विचलन और असफलताओं का आंकलन कोई भी पक्ष करना ही नहीं चाहता ! बस लगे हुए हैं अपनी मुर्गी की डेढ़ टांग लिए हुए ! सर्वाधिक अशोभनीय बात यह है कि जन सामान्य के पक्ष में खड़ी लोकतान्त्रिक सरकार और उसी जनसामान्य के पक्ष में खड़े नक्सली ? ......जनसामान्य की अकाल मृत्यु का कारण भी बने हुए हैं ! क्या ये मुमकिन नहीं कि दोनों पक्ष हठधर्मिता त्याग कर ,संवाद के मार्ग पर आगे बढ़ें ! निशर्त ,निरंतर संवाद ,सार्थक संवाद ! वरना वर्षों से हो रही , जनहानि तो यह सिद्ध करती है कि दोनों पक्षों के जनकल्याण समर्थक होने का दावा खोखला है !
तर्क के लिए ऐसे अनेकों उद्धरण दिए जा सकते हैं जिससे दोनों पक्षों की कमियां जगजाहिर हो जाएँगी , लेकिन समय आरोप प्रत्यारोप में नष्ट करने का नहीं है !
वैसे भी असंख्य जीवन लील चुका हिंसा का यह दानव हम जैसे साधारण शांतिकामी इंसानों की पहली प्राथमिकता नहीं है , हमारी पहली मांग है , गरिमामय जीवन , सहज और निश्चिंत ,शांतिपूर्ण जीवन , निर्भय जीवन ...और यह तभी सम्भव है जब हम जैसे साधारण इंसानों की बेहतरी में लगे होने के दावेदार , ये दोनों पक्ष बात करेंगे !
एक बात और जब कोई व्यक्ति रक्षा सेवाओ में सम्मिलित होता है याकि अतिवादी समूहों को ज्वाइन करता है तब उसे कारतूस , जिन्दगी और मृत्यु जैसी संभावनाओं को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित करना होता है किंतु सामान्य नागरिक इसे अपनी दिनचर्या में जोड़ने को अभिशप्त हो जाए खासकर , उनके कारण से जोकि उसकी बेहतरी का दावा कर रहे हों तो ये बात जायज नहीं लगती !
पुनः निवेदन है कि मनुष्य का जीवन अनमोल है ! इसकी रक्षा करें ! सभी तरह की हिंसा से दूर चर्चा का माहौल बनाये ! एक शांतिकामी समृद्ध समाज और बेहतर जीवन के लिए !

4 टिप्‍पणियां:

  1. जब-जब सत्ता खुद को निरंकुश समझने लगती है, हिंसा उसके प्रतिकार का एक रास्ता लगता है, होता है। आज भी वही स्थिति है। मैं लालगढ़ से होकर आया हूं, ऐसा नहीं कि सरकार एक दम पाक-साफ है। हां, हिंसा का रास्ता गलत हो सकता है, लेकिन शांति मार्च से क्या मिलता है? आपको नहीं लगता कि हमारा प्रजातांत्रिक सरकार भी एक तरहसे ऑटोक्रेटिक हो गई है?

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  2. आप से सहमत हैं. जो भी हो रहा है सब राजनैतिक स्वार्थ के लिए पाला पोसा हुआ है.

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  3. आपने बिल्कुल सही लिखा है..इस विषय में आपसे पूरी तरह से सहमत हैं।
    शायद मनुष्य फिर से पशुता की ओर अग्रसर होता जा रहा है।

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