रविवार, 17 मई 2009

कोतो टका ?

दिन ठीक से स्मरण नहीं लेकिन घटना अप्रैल १९९० की ही है ! मित्रवर छुट्टियों पर जाने से पहले ज़िम्मेदारी दे गये थे कि जरुरी समझो तो टेलीग्राम कर देना मैं वापस आ जाऊंगा ! वो मूलतः पश्चिम बंगाल के नार्थ परगना जिले के छोटे से गांव के रहने वाले थे और उन्हें पूरा भरोसा था कि मैं , आफिस में कोई समस्या होते ही , उन्हें सम्यक सूचना दे सकूंगा ! यूं तो बांग्ला भाषी मित्रों की सोहबत में मैं बांग्ला भाषा के कुछ कुछ शब्दों के अर्थ समझने लगा था लेकिन बांग्ला में संवाद अभी भी औकात से बाहर की बात थी ! उस दिन नया पारा स्थित तार घर में भीड़ बहुत ज्यादा थी इसलिये अपना तार संदेश खिड़की से अन्दर डालकर मैं अपना नंबर आने का इंतजार करने लगा ! मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि अन्दर सीट पर बैठे सज्जन नें आउट आफ टर्न मेरा तार संदेश उठाकर मुझे आवाज दी और मैं हडबडाते हुए दोबारा खिड़की पर पहुंचा ! इधर लाइन में लगे हुए लोग मुझे घूर रहे थे , उधर वो सज्जन मुस्कराते हुए मुझसे बोले ...उखाने तारघर आछे ? मैंने जानकारी नहीं होने के संकेत बतौर कंधे उचकाये तो वो अपनी सीट से उतरकर आफिस के अंदरूनी हिस्से में चले गये ! मैं समझ गया कि बांग्ला भाषी समझ कर वो मेरी मदद कर रहे हैं ! भीड़ में अपना काम जल्दी निपट जाने की खुदगर्जी नें मुझे यह सच कहने से रोक रखा था कि महोदय मैं बांग्ला भाषी नहीं हूं ! लेकिन मैं डर भी रहा था कि अगर मुझे बोलना पड़ा तो मैं क्या बोलूंगा ? खैर वो सज्जन वापस लौटे ,उनके हाथ में बड़ी सी डायरेक्टरी थी जिसे उलट पलट कर उन्होंने बड़ी तसल्ली और अपनेपन के साथ मुझे देखा और बोले ...उखाने तार घर आछे ! मैंने मुस्कराकर कृतज्ञता ज्ञापित की ! उन्होंने बड़ी उपेक्षापूर्ण दृष्टि के साथ लाइन में लगी हुई भीड़ को देखा और फ़िर मेरे तार संदेश को प्रोसेस करने लगे ! अब मेरी बारी थी ! मैंने डरते डरते दो शब्द कहे ...कोतो टका ! सच पूछो तो ग़लत पहचान और झूठ पर खड़ा मैं बेहद डरा हुआ था ! उन्होंने क्या कहा मुझे सुनाई नहीं दिया ! मैंने सौ रुपये दिये उन्होंने इक्कीस रुपये वापस कर दिये ! उनके चेहरे से झलकते अपनेपन के जबाब में मेरी मुस्कराहट कितनी अस्वाभाविक थी ! मुझे पता नही लेकिन मैं उनके हाथ से बचे हुए पैसे और रसीद लेकर लगभग भाग निकला !
इस घटना के वर्षों बाद भी मैं सोचता हूं कि तब मैंने सच क्यों नहीं कहा ,भले ही मेरा काम लाइन में लगने और थोड़े से विलंब के साथ होता ! वो सज्जन भाषावाद के शिकार होकर नियम विरुद्ध मेरा पक्ष ले रहे थे और मैं ? उस दिन ...मैं भी अच्छा नागरिक, कहां रह गया था ?
क्या छोटी छोटी खुदगर्जियां और छोटे छोटे 'वाद' हमें अच्छा नागरिक बनने से रोकते हैं ?

6 टिप्‍पणियां:

  1. आपने भारतीय व्यवस्था की नब्ज पर ऊँगली रखी है. भारत में बहुत से कार्य नियमविरुद्ध कर दिए जाते हैं अथवा करवा लिए जाते हैं क्यूंकि पहचान निकल आती है. भारतीय जनमानस से जब तक कार्यस्थल पर सामाजिकता निभाने की यह प्रवृति समाप्त नहीं होगी, हमारा सरकारी तंत्र सुधर नहीं सकता.

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  2. हाँ यह होता ही रहता है। अधिक भाषाएँ जानने वालों का काम जल्दी भी हो जाता है।
    घुघूती बासूती

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  3. हम सबसे पहले आये परन्तु बिजली अचानक बंद हो गयी और लिखी हुई टिप्पणी भी बट्टे खाते गयी. हम कहना चाह रहे थे कि ऐसा होता ही रहेगा. दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएँ अपने आदमी को उपकृत करने की चाहत बन ही जायेगी. हमें साल में एक बार केरल जाना होता था. जगदलपुर से पहले जयपुर ( उडीसा ) फिर वहां से विजयनगरम बस से. उसके बाद ही रेलगाड़ी मिलती थी. जयपुर में उडीसा और आंध्र की बसें मिलती थीं जो विजयनगरम ले जाती थी. टिकट , कंडक्टर देता था जो दरवाजे पर ही खडा रहता था. उसके सामने लोगों की भीड़ लगी होती थी. लोगों में हिंदी बोलने वाले, उड़िया बोलने वाले और तेलगु बोलने वाले होते थे. उडीसा की बस हो और उड़िया में टिकट की मांग करे तो उसे प्राथमिकता दी जाती थी. वैसे ही यदि आन्ध्र की बस हो तो उस कंडक्टर से तेलगु में मांग करें तो टिकट आपको ढूंढ कर दे दिया जाता था. भाषा के इस कमाल को हमने बड़े बारीकी से समझा . फिर हमें कभी कोई दिक्कत नहीं हुई. हम अपने कार्यालय में अपने अधीनस्थों के साथ उनकी ही भाषा में वार्तालाप किया करते थे. हमने उनकी सेवा भाव में और आत्मीयता में बहुत ही सकारात्मक परिवर्तन पाया . पुनश्च : देखिये यह टिप्पणी भी नहीं जा रही है. इसे संजो के रहता हूँ फिर भेज देंगे .

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  4. मैं तो इस बारे में यही कहूँगा कि "जैसा देश वैसा भेष".

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

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  5. ये सिर्फ किसी क्षेत्र/स्थान विशेष की बात नहीं है. आप चाहे दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं. ये मानव की एक सहज प्रवृ्ति है कि वो अपनी जाति, भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर अपने व्यक्ति को प्राथमिकता देने का प्रयास करता ही है.किन्तु साथ ही ये जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहीं इसके कारण किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार का हनन न हो रहा हो.

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  6. अपनी भाषा से प्यार, उसे बोलने वाले को प्राथमिकता देना स्वाभाविक भले ही हो परन्तु यह प्राथमिकता दूसरों का अधिकार छीन कर नहीं दी जा सकती। यह सब हम अपने निजी जीवन में करें तो सही माना जा सकता है। यदि हम सब करते हैं तो भी यह सही तो नहीं हो जाएगा।
    घुघूती बासूती

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