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शनिवार, 12 जनवरी 2013

रंग क्या...बे-रंग क्या ?

अपना आंगन परिंदों का डेरा ! बेफिक्र चहकती , दाने चुनती चुगती , डालियों पर फुदकती चिड़ियां ! वो सब रात कहां गुज़ारती होंगी , कभी गौर नहीं किया ! शायद बागीचे के दरख्तों पर या फिर कहीं और ... बस एक गौरैया जो पिछले साल से लगातार घर के अंदर , सीढ़ियों के ऊपरी हिस्से की सबसे ऊंची खिड़की के पेलमेट की स्टील राड पर शब गुज़ारती है ! घर के दरवाज़े शाम को बंद होने से एन पहले वो अपने ठिये पर हाज़िर हो जाती है और हर सुबह , जब भी मैं दरवाज़े खोलता हूं , वो बाहर परवाज़ कर जाती है , फिर उसे दिन तमाम बाहर के परिंदों में से अलग से चीन्हना मुमकिन नहीं ! कभी दरवाजे खोलने में देरी हो तो वो हाल में तेज तेज पंख फड़फड़ाती हुई उड़ती और चीख-ओ- पुकार मचाती है और दरवाजा खोलते ही खुले आसमान में ये जा वो जा... !

आज सुबह लगा कि चाय पीने के बाद दरवाजे खोलने में कोई हर्ज़ नहीं सो अपने बेडरूम में ही बे-दूध , काली कड़क चाय हलक से नीचे उतार रहा था कि वो बेडरूम के अंदर दाखिल हुई और उसने कमरे के अंदर दो बार उड़ान भरी और बाहर हाल में चली गई ! कुछ सेकण्ड के बाद शायद उसे लगा कि मैंने उसे कोई तवज्जो नहीं दी है सो वो एक बार फिर से मेरे कमरे में दाखिल हुई और उसने अपने पंख तेज तेज फड़फड़ाये और फिर से कमरे के बाहर चली गई ! अब मुझे अहसास हुआ कि मुझसे गलती हुई है , मैं उठा और घर का दरवाजा खोलने के लिए चल पड़ा ! उसे इसी बात का इंतज़ार था ! दरवाज़ा खुलते ही उसने आकाश साध लिया और मैं सोच में पड़ गया कि हम ‘बे-जात’ लोग , एक दूसरे से बिल्कुल अलग , कद काठी , शक्ल-ओ-सूरत , रंग बू ...बस एक ‘भरोसे’ के सहारे कितनी आसानी से एक साथ ज़िन्दगी गुज़ार पा रहे हैं ! 

इधर एक छुटकू इंसान अपने घर मेहमान हुआ है , रिश्ते में देखूं तो मेरी अहलिया उसकी फूफी हुईं और इस नाते मैं उसका फूफा , उम्र , यही कोई डेढ़ बरस ! दो तकियों की ऊंचाई पर सिर रख , चित लेटे हुए अखबार पढ़ने का हुनर उसने मुझसे सीखा है , फर्क सिर्फ इतना कि जहां मैं खामोश रहकर अखबार बांचता हूं , वहीं वो हर्फों पर अपनी नन्ही अंगुलियों के इशारे के साथ , यूं बुदबुदाता है कि जैसे अखबार पढ़ना , कोई बच्चों का खेल हो और जिसे स्कूल जाए बिना भी खेला जा सकता है ! दूसरे आम बच्चों की तरह से खिलौने तोड़ना , चीजों को बेदर्दी से पटकना , उसकी खास काबिलियत में शुमार किये जाते हैं , सो उसे , उसकी खास फरमायश के मद्दे नज़र एक ढ़लती उम्र का अति शांत स्वभाव मोबाइल फोन मुहैय्या कराया गया है ताकि वक़्त बेवक्त वो जिससे चाहे बात कर सके ...

आज सुबह देखा कि उसका फोन , मेरे फोन के ठीक बाजू में , बिल्कुल मेरे ही फोन की तरह से एक फोन केस में सुरक्षित रखा हुआ है ! शायद उसे , मेरी अनुकृति होने , मुझसे सामाजिक दीक्षा ग्रहण करने , जैसे प्रभाव दिखलाने में मज़ा आ रहा हो ! वो शक्ल-ओ-सूरत और रंग रूप और स्वभाव में फिलहाल मुझसा नज़र आ रहा है , उस गौरैया की तुलना में वो ‘हम-जात’ है , मुझ जैसा आदम जाद ... पर बड़े होकर , वो मेरा हम ख्याल , हमदम , दोस्त बना रहे , ये ज़रुरी भी नहीं है ! एक परिंदे के मुकाबिले में उस ‘इंसान जात’ के मुझसे जीवन भर पटरी बैठाए रहने की संभावना , शायद हां हो या शायद नहीं भी ! कोई एक मुकम्मल तस्वीर नहीं , बस फिफ्टी फिफ्टी ! दोस्ती या दुश्मनी , सहमति या रंजिशों की हद से बाहर जाकर , असहमतियां !

ख्याल ये कि अगर हम , थोड़ा सा भरोसा , ज़रा सा स्पेस , एक दूसरे के हिस्से में डाल पायें तो , जात क्या... बे-जात क्या ?  रंग क्या ... बे-रंग क्या ? अपनी ज़िन्दगी , कितनी सहल , कितनी स्मूथ , कितनी आसान कर लें ! ...या फिर तैयार हो जायें , दुश्वारियों , दुश्चिंताओं के दरम्यान , कभी भी आपस में मर कट कर खत्म हो जाने के लिए ... इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जाने के लिए !

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

ये क्या हो रहा है ?

घर बनाया तो आंगन में हरियाली की गुंजायश की थी ! ख्याल ये कि  परिंदे आया करेंगे , हुआ भी यही , वे आते हैं , यहां तक कि मैं उनमें से कईयों के नाम तक नहीं जानता ! घर के अन्दर गौरैयों की परवाज़ आम है ! पूरब के आंगन में एक छोटा सा टैंक और उसमें खिली बैगनी रंगत कुमुदनियां / गुलाबी कमल , उसके पानी में चहलकदमी करती , मछलियां सो बगुले भी हर रोज़ आते है , कभी हल्के कत्थई , कभी सीमेंट रंगत और ज्यादातर झक सुफैद रंग के ! नीली सुनहली किंग फिशर और काली मछ्ली खोर चिड़िया अक्सर पानी में डुबकी लगाकर शिकार करते हुए ! एक रोज़ बाज़ भी देखा , आम की शाख पे घात लगा कर बैठे हुए , क्यारियों में ज़रा सी ठसन के साथ चलते हुए , दिल बैठ गया , लगा कि ज़ल्लाद की मौज़ूदगी से डरकर मासूम परिंदे क्योंकर आया करेंगे यहां ? 

पिछले कई महीनों से इस सामान्य सी दिखती ज़िन्दगी में एक असामान्य सी घटना की पुनरावृत्ति हैरान कर रही है ! कुछ रोज़ पहले हल्की फुल्की बारिश और बिजली के गर्जन तर्जन के बीच घुघूती बासूती जी बात हो रही थी , कि अचानक तीन परिंदे पश्चिम के आंगन में टपक पड़े मैंने उनसे कहा आपसे बाद में बात करता हूं , पहले इन्हें देख लूं ! घर के पश्चिम के आंगन के बागीचे के उसपार आवाजाही की आम सड़क है और वहां पर बिजली का एक खम्भा , जिससे लिए गये कनेक्शन से अपना घर भी रौशन होता है , इस आंगन में अक्सर परिंदे गिर कर मर रहे हैं सो फ़िक्र हुई कि माज़रा क्या है ?  बिजली वालों को बुलवाकर कर तार चेक करवाए , उन्होंने कहा कोई समस्या नहीं है , मैं हैरान हूं , अब तक कई परिंदे आसमान से क्यों टपके ? कुछ पता नहीं ? 

बरसात से पहले की एक सुबह 

घुघूती बासूती से बात करते हुए बारिश के समय 

लगा दो जीवित रह जायेंगी 

जीवन केवल एक का नसीब हुआ 

सोमवार, 18 जून 2012

स्मृतियां जिन्हें खुरच कर फेंक नहीं सकते...!

कल शाम अपने पड़ोसी मित्र घूम घाम कर वापस लौटे तो उन्होंने मुझसे कहा , जगदीश दास  मिला था और वो आपको याद कर रहा था ! मैंने कहा हां , उसे मुझे याद करना ही चाहिये , बल्कि मैं खुद , इतने वर्षों बाद भी , उसे अपनी स्मृतियों से खुरच कर फेंक नहीं सका हूं  !   मित्र मुस्करा दिये , किस्सा उन्हें पता था !  बात 1982-83 के सत्र की है , जबकि जगदीश , बी.ए. अंतिम वर्ष में मेरा प्रिय छात्र हुआ करता था  !  प्रिय कहने का मतलब ये नहीं कि वो कक्षा  में सबसे ज्यादा गंभीर और मेधावी बंदा था बल्कि इसलिए कि वह अपनी बदमाशियों को क़ुबूल करने और उनकी एवज में माफी मांगने में हमेशा अव्वल रहा करता था ! उसकी साफ़गोई मुझे पसंद थी और यह जानकर भी कि वह आगे कोई गलती ना करने का अपना वादा , कभी भी पूरा नहीं कर पायेगा और फिर से सामने आ खड़ा होगा माफी की नई पेशकश और नये बहाने के साथ !

मार्च महीने का पहला हफ्ता रहा होगा जबकि , वह मेरे पास आया और उसने कहा सर , आपको पता है कि मेरी तैयारी बहुत अच्छी नहीं है , अगले हफ्ते से वार्षिक परीक्षायें हैं  !  बाद में गांव जाकर खेती ही करना है , तो फिर मेरिट का क्या करूंगा ?सोचता हूं , किसी , तरह से उत्तीर्ण भर हो जाऊं ! मैं अनुत्तीर्ण हुआ तो घर के लोग भी दुखी होंगे और आपको भी अच्छा नहीं लगेगा ! आप मुझे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न बता दें , तो मैं उनकी तैयारी कर लूं  ! पूरा पाठ्यक्रम पढ़ पाना मेरे वश में नहीं है !  मैं जानता था कि वह दीगर सब्जेक्ट्स के प्रोफेसर्स के साथ भी यही नौटंकी करके आया होगा !  मैंने पूछा , बाकी विषयों का क्या होगा ?  उन सबसे , महत्वपूर्ण प्रश्न पहले ही ले आया हूं सर , उसने कहा !  बस आप बचे हैं , सो कृपा करें  !  मैंने सोचा चलो जाने दो , यह अंतिम साल  है , उत्तीर्ण  हो जाये यही बेहतर होगा !  पाठ्यक्रम  देखकर हर इकाई से दो प्रश्नों की दर से कुल दस प्रश्न  लिखा दिये उसे  !  मैंने कहा , अब ठीक है ?  घर जाओ , तैयारी करो , पर वह , वहां से हिला भी नहीं  !  मैंने पूछा अब क्या है ? इतने सारे प्रश्नों का क्या करूंगा सर , ये तो पूरा पाठ्यक्रम ही हो जायेगा !  बस दो तीन प्रश्न बन जायें तो मैं उत्तीर्ण हो जाऊंगा , ज्यादा अंक लेकर क्या करूंगा ?

आप इसमें से कोई पांच छै प्रश्न ही बता दीजिए , दो तीन प्रश्न भी फंस गये , तो मेरा काम हो जायेगा ! उसका तर्क  सुनकर मैंने अपना सिर पीट लिया ...वो टलने को तैयार ही नहीं था ! मैंने पहले वाले दस प्रश्नों में से पांच नये सिरे से चिन्हांकित  कर दिये , मेरा ख्याल था कि इसमें से ,परीक्षा में उसे दो तीन प्रश्न तो मिल ही सकते हैं ! वो खुश होकर चला गया !  उसकी परीक्षायें शुरू हुईं  !  उसकी परीक्षायें दिन में 11 से 2 बजे तक हुआ करती थीं  !  एक दिन वह ठीक 2.15 बजे , रोनी सूरत लिये  हुए मेरे घर पर हाज़िर था ! मैंने पूछा क्या हुआ ? उसने कहा , आज पर्चा बिगड़ गया , सर ! कहां है प्रश्नपत्र , दिखाओ मुझे ? उसने प्रश्नपत्र दिया , जिसमें संयोगवश वो सारे प्रश्न मौजूद थे , जोकि मैंने उसे चिन्हांकित करके दिये थे ! मैंने कहा ये तो वही प्रश्न हैं फिर ? उसने कहा , इसीलिये तो सर , मैंने जैसे ही प्रश्नपत्र देखा , पांचों प्रश्न वही थे , लेकिन  खुशी के मारे मैं सबके उत्तर भूल गया ! उत्तरपुस्तिका में क्या लिख कर आया हूं , कुछ पता नहीं ? उसका उत्तर  सुन कर , मैं कर भी क्या सकता था , बस इतना ही कहा , अगर तुमने उन प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह से याद किये होंगे , तो सब ठीक हो जायेगा , अब घर जाओ और अगली परीक्षा की तैयारी करो , वो चला गया !

परीक्षायें खत्म हुईं  ! जब रिजल्ट निकला तो वो न्यूनतम अंक रेखा पे उत्तीर्ण होने वालों में से एक था  !  मुझे खुशी हुई कि चलो, अब वह गांव चला जायेगा...पर जल्द ही मेरी खुशी काफूर भी हो गई , जब उसने कहा , सर , मम्मी पापा बोले हैं , अब एम.ए. भी कर लो  !  मैं आपके विषय में ही प्रवेश लूंगा !  मैंने कहा कि तुम्हारे अंक  बहुत कम आये हैं , तुम्हारा प्रवेश हो ही नहीं सकता ! उसने कहा , अब मैं सीरियस होकर पढ़ना चाहता हूं तो आप मुझे मौक़ा क्यों नहीं देना चाहते हैं ? आगे आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूंगा , बस किसी तरह से मेरी नैया पार लगवा दीजिये ! मुझे लगा इसे सुधरने का एक मौक़ा और दिया जा सकता है ! 1983-84 की साल भर वो काफी गंभीर दिखाई दिया ! मुझे उस पर एतबार होने लगा था ! इस साल रिसर्च मैथडोलाजी के प्रश्नपत्र में उसकी मौखिक परीक्षा होने वाली थी ! अभिलेख भी उसने ठीक ठाक ही तैयार किये थे ! मौखिक परीक्षा की  तारीख निर्धारित हुई और एन उसी सुबह , वह अपना सिर घुटाये  हुये , एक बार फिर से मेरे घर में मौजूद था  ! मैंने पूछा , अब क्या हुआ ?  मेरी दादी मर गई है , सर , गांव जाना पड़ेगा ! मेरी मौखिक परीक्षा जल्दी निपटवा दीजिये !

मैंने कहा ठीक है , सबसे पहले तुम ही मौखिक परीक्षा दे देना , बाह्य परीक्षक के सामने उसका 'गेटअप' सियापे वाला था ! आंखों में गीलापन ! आवाज़ में सोग के लक्षण ! मैंने पहल करते हुए कहा , एक काम करो सिर्फ ये बता दो , कि इस साल तुम्हारे पांचों प्रश्नपत्रों के नाम क्या है ?  उसे शायद इतने सरल प्रश्न की उम्मीद नहीं रही होगी , वह मिनटों तक खामोश बैठा रहा , जब तक कि बाह्य परीक्षक ने उसे बाहर जाने के लिये  नहीं कह दिया , फिर वो गांव चला गया और उसके बाद हम कभी नहीं मिले !मुझे पता है कि उस दिन भी वह इतना सरल प्रश्न सुनकर 'ब्लैंक' हो गया था !

बुधवार, 13 जून 2012

दुआओं का अपनी असर ढूंढते हैं...!

स्टडी रूम जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ते हुए कुछ ऐसा लगा कि सांसे तेज हो रही है ! उधर घर के बाहर वाले प्लाट पे उभर आये नये मकान की छत की ढ़लाई शिद्दत से ज़ारी है जोकि देर रात तक मुकम्मल भी हो जायेगी ! सुबह से 60-70 आदिवासी लडकियां और कुछ नौजवान रेत, सीमेंट और गिट्टियों के मिश्रण को घर की शक्ल में तब्दील कर रहे हैं!अनथक, लगातार, ऐन वैसे ही जैसे कि सालों पहले से करते आये हैं ! बदरंग खस्ताहाल कपड़े, दुबली पतली काया और हाड़ तोड़ मेहनत ! जल जंगल और जमीन के असली वारिस आज देर से घर, लौटेंगे सौ / पचास के नोटों की चिल्लर लेकर, अपनी नींद भरी आंखों और दिल में अगली सुबह फिर से खटने के लिए वापस लौटने की जिजीविषा लिए हुए ! इधर अपनी सांसे फूल रही हैं  सीढ़ियां  चढ़ते हुए !

तब शायद 1984 के साल की सर्दियों के आख़िरी दिन रहे होंगे, पड़ोसी मित्र आदिवासी कल्याण विभाग में सहायक नियोजन अधिकारी थे ! उन्होंने कहा अगर एक दिन का समय निकाल सकें तो मेरे साथ चलें ! हम इन्द्रावती नदी घाटी का सर्वे करेंगे जहां बांध बनने से गांव / देव स्थान और बेशकीमती जंगल डूबने की संभावना है ! हमने कहा ठीक है, कब चलना है ? उन्होंने कहा कल शाम को, रात वहीं गुजारेंगे परसों दिन भर पैदल मार्च और शाम तक घर वापसी हो जायेगी ! हमने कहा, हम परसों की छुट्टी ले लेंगे, लेकिन कल शाम आकाशवाणी में चिंतन रिकार्ड करने के बाद ही चल सकेंगे आपके साथ ! उन्होंने कहा, हम आपको वहीं से साथ ले लेंगे ! तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक हमने शाम की रिकार्डिंग से पहले कैनवास शूज पहने और लूज कपड़े धारण किये, ताकि पैदल मार्च में तकलीफ ना हो ! ठीक 3.30 पर मित्र की गाड़ी आकाशवाणी के गेट पर थी और हम लोग गंतव्य की ओर प्रस्थान कर चुके थे ! ड्राइवर के अलावा, गाड़ी में एक फोटोग्राफर, हम और हमारे मित्र ! हमने पूछा, तैयारी पूरी है ? उन्होंने कहा हां ! 

जगदलपुर से बारसुर तक पहुंचने में शाम गहरा गई थी, गाड़ी का ड्राइवर हमें नदी के किनारे एक गांव* के पास छोड़ कर वापस हो लिया ! चार लकड़ियों के सहारे खड़ी पैरे की छत वाली एक झोपड़ी ! जिसमें कोई दीवाल नहीं थी ! लगभग 50-60 फीट की दूरी पर बहती हुई नदी और उसपर सर्दियों का आख़िरी महीना ! दोस्त से पूछा कम्बल / चादर वगैरह लाये हैं ? उसने कहा नहीं ! गाड़ी वापस जा चुकी थी और पलटकर भागने की कोई गुंजायश भी शेष नहीं रह गई थी ! अठपहरिया** आते आते काफी देर हो गई, उसने तीन खाटों और उनके बीच एक अलाव की व्यवस्था कर दी थी जिसके सहारे सर्द रात काटनी थी ! ओढ़ने बिछाने का कोई सामान हमारे अधिकारी मित्र लेकर नहीं आये थे, इसलिए खाटों पर भी पैरा डलवा लिया गया ! रात चांदनी थी इसलिए मित्र से ये पूछने की हिमाकत नहीं की, कि टार्च लाये हो कि नहीं ? अठपहरिया ने रात के भोजन की व्यवस्था कर दी थी, पत्तों की प्लेट और पत्तों की कटोरियां, उबला हुआ मोटा चावल और उबली हुई साबुत मूंग के साथ हरी मिर्च और थोड़ा सा नमक ! पीने के लिए नदी का पानी था ही ! 

पैरे में दुबके हुए जैसे तैसे रात गुज़ारने के बाद सुबह 5 बजे नदी के ठंडे पानी के साथ निवृत्ति ने होश फाख्ता कर दिये, हिम्मत करके फ्रेश हुए...बहरहाल नींद हवा हो गई ! सुबह 5.30 के आसपास हम लोग पैदल मार्च के लिए तैयार थे, अगले गांव तक का रास्ता अठपहरिया को दिखाना था ! पता चला कि उसके बाद हर गांव से एक आदमी हमें अगले गांव तक खो करने के लिए तैयार किया गया था ! सूरज निकलते निकलते हमें पता चल चुका था कि हमारा मित्र और फोटोग्राफर बंधु ऊंची एड़ी के जूते पहने हुए थे और उन्हें पगडंडियों में चलने में भारी दिक्कत होने वाली थी !...खैर मित्र ने सरकारी निर्देशों के अनुसार सारी लोकेशंस के फोटोग्राफ्स लेते चलने की बात की, तो हम और भी ज्यादा सतर्क हो गये ! सुबह के 9 बजते बजते हमें यह जानकारी भी हो गई कि हमारे अधिकारी मित्र का थैला बिल्कुल खाली है ! कोई फल / सूखे नाश्ते की व्यवस्था करके यात्रा पर चलने की उन्हें सूझी ही ना थी ! उन्होंने हमें आकाशवाणी से उठाया था, हमने पूछा भी था कि तैयारी है ? जिस पर उन्होंने कहा था, कि हां ! अब ईश्वर जाने कौन सी तैयारी की थी उन्होंने !

फोटोग्राफर बंधु और अधिकारी मित्र जल्दी ही समझ गये के उनके जूते उनकी इज्जत उतार लेंगे ! यात्रा के बीच में किसी गांव में रुकने की कोई गुंजायश ना थी क्योंकि हमें तकरीबन 30 किलोमीटर दूर तक नदी के किनारे चलते रहने के बाद घाटी से ऊपर जंगल के बाहर पहुंचना था ! यात्रा के आख़िरी 5 किलोमीटर में हमारे पास कोई गाइड / ग्रामीण नहीं रहने वाला था इसलिए शाम ढ़लने से पहले 30 किलोमीटर पैदल चल चुकना अंतिम और एकमात्र विकल्प था ! दोपहर होते होते भूख और प्यास से बुरा हाल था ! खाने को कुछ था नहीं पर पीने के लिए नदी में पानी ही पानी, जितना चाहो पियो ! पगडंडियों पर अपने दुखते पैरों और तकलीफ देते हुए जूतों के बावजूद फोटोग्राफर बंधु अपने काम में कोताही नहीं कर रहे थे ! बांध बनने से डूब में आने वाले गांव, देव स्थान, सागौन के बेशकीमती जंगल, कैमरे में रिकार्डिंग, बराबर चालू थी पर हमारे खुद के चलने की गति, घोषित लक्ष्य से बहुत कम थी !

हमारा ख्याल था कि हमें कुल दूरी तय करने में 6 घंटे लगना चाहिये थे और फोटोग्राफी वगैरह में अगर 5 घंटे और भी लग जाते, तो भी हम 4.30 बजे शाम तक गंतव्य तक पहुंच जाते ! इस हिसाब से दिन डूबने तक हमारे पास कम से कम 1.30 घंटे का मर्जिन बचता ही था ! दिन तमाम भूख से बिलबिलाते हुए शाम तकरीबन 5 बजे हम बिन्ता गांव*** पहुंचे ! यहीं से हमें घाट के ऊपर चढ़ना था ! बिन्ता में अपने छात्रों को देखकर हम हैरान थे ! वे हमें रोकना चाहते थे ! हमने कहा फिर कभी, अभी घाटी के ऊपर ड्राइवर चिंता कर रहा होगा ! बच्चों के घर में 15-20 मिनट में पोहे और पानी का तात्कालिक घरेलू सत्कार स्वीकार कर हम घाट चढ़ने के लिए उतावले हो चुके थे ! घाट की खड़ी चढ़ाई मित्र और फोटोग्राफर बंधु पर इतनी भारी पड़ी कि वे ऊपर जाकर जमीन पर गिर पड़े और कहने लगे बस, अब यहां से आगे नहीं जा सकते ! गाड़ी की लोकेशन लगभग एक किलोमीटर दूर की थी, हौसला बढ़ाने पर वे गिरते पड़ते आगे बढ़े ! हम अपने तीस किलोमीटर का कोटा पूरा कर चुके थे पर गाड़ी का दूर दूर तक नामोनिशान नहीं था, तसल्ली ये कि जंगल का टुकड़ा पीछे छूट गया था ! अगले 5 किलोमीटर मुश्किल से गुज़रे ! तभी गाड़ी आते दिखाई दी ! देखते ही देखते वे दोनों गाड़ी में पसर चुके थे और हम वापस जगदलपुर की ओर...रात 8 बजे गर्म पानी से नहा चुकने के बाद बाकी के दोस्तों के सामने अधिकारी मित्र की तारीफ़ के पुल बांधते हुए हमने घोषित कर दिया था कि अब किसी भी अधिकारी के साथ फील्ड वर्क ? कभी नहीं ? 

रश्मि जी की फोन काल, हमें  अतीत से वापस वर्तमान में ले आई है ! सामने वाले घर की छत की ढ़लाई अभी भी पूरी नहीं हुई है, जल,जमीन, जंगल के असली वारिस, जो अब मजदूर हैं, ग्यारह बजे से पहले घर वापस नहीं लौट पायेंगे ! वे सन 1984 में भी मजदूर थे, उससे पहले भी और आज भी हैं, उनकी विरासत पे फैसले लेने का हक़, पहले दिल्ली फिर भोपाल को था और अब रायपुर के पास है... हम जहां रहते हैं, वो धरती रत्नगर्भा है पर उसी धरती की इंसानी बसाहटें निराश्रित...निर्धन, बेसहारा जैसी ! बेहतर मुस्तकबिल और सच्चे मेहरबानों की उम्मीद में...पीढ़ी दर पीढ़ी, देह दर देह खटती हुई...एक मुकम्मिल आबादी के लिए ...दो बोल सूझते हैं ...

किसी मेहरबां की नज़र ढूंढते हैं !
दुआओं का अपनी असर ढूंढते हैं !!

*नक़्शे में 2 नम्बर स्थान देखें !
**अठपहरिया गांव के महमानों की आठों प्रहर सेवा करने वाला व्यक्ति है ,उसके जीवन यापन की व्यवस्था गांव के लोग मिलकर करते हैं ! 
***नक़्शे में 3 नम्बर स्थान देखें यहां से घाटी चढ़कर पैदल चले और फिर 4 नम्बर स्थान से गाड़ी लेकर 1 नम्बर चित्रकूट होते हुए हम जगदलपुर वापस लौटे !
नक़्शे को तैयार करने के लिए छत्तीसगढ़ के नामचीन ब्लागर संजीव तिवारी जी का हार्दिक धन्यवाद !
गीत की धुन जेहन में थी पर उसे बोल दिये रश्मि रविजा साहिबा और जी.जी.शेख साहब ने , उन दोनों के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं  !
तीरों से सहेजा गया हिस्सा पैदल मार्च का है , जबकि शेष यात्रा गाड़ी से की गई !

बुधवार, 16 मई 2012

जो तेरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं !

वो अपने खानदान के अनेकों में से पहला चिराग था, साधारण सी शक्ल-ओ-सूरत , धुंधवाती आग में सेंक कर स्याह किये गये सूखे बांस सी काया, पहलौटी का पुत्र, पिता ने पढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ! सन बयालीस में उसका जन्म हुआ और सन पैंसठ में एम.एससी. की डिग्री हासिल करने के दो साल के दरम्यान ही उसकी नौकरी लग गई ! उन दिनों सस्ते का ज़माना था और मुल्क की आबादी भी तुलनात्मक रूप से कम थी सो नौकरी के सिलसिले में, उसे कोई खास मारा मारी नहीं करना पड़ी ! अपने ही कस्बे में लेक्चरर की पोस्ट जैसे कोई लाटरी उसके हाथ आ लगी ! अब घर वालों को उसकी शादी की फ़िक्र हुई, सुयोग्य पुत्रवधु की खोज करते वक़्त ये ख्याल रखा गया कि लड़की पढ़ी लिखी होना चाहिये और लड़की का खानदान लड़के के खानदान से उन्नीस नहीं हो तो ज्यादा बेहतर !

ब्याह के लिए चुनी गई लड़की के पिता दरोगा थे, उन्हें लगा कि लड़के की नौकरी अच्छी है, सो लड़के का खानदान उनके खानदान से कमज़ोर भी है तो क्या फर्क पड़ेगा ! दोनों घर के बड़ों को रिश्ते की बात अपने अपने हिसाब से पसंद आई, लिहाज़ा ‘नो’ मंगनी पट शादी की रस्म भी पूरी कर ली गई ! लड़की उन दिनों उस्मानिया यूनिवर्सिटी की छात्रा थी और अपने पिता की दौलत के बलबूते हर तरह से दुनिया देख चुकी थी ! लेकिन अपने पिता की बात काटने का हौसला उसमें नहीं था, शादी से इंकार कैसे करती ! उसे समझाया गया था कि लड़का सीधा सादा है चाहे जैसे भी साध लेना ! शादी के छै माह के अंदर ही नवविवाहित दंपत्ति पुश्तैनी मकान छोड़कर किराए के मकान में शिफ्ट हो गये, क्योंकि नवविवाहिता को संयुक्त परिवार में घुटन हो रही थी !

यूं तो कहते हैं कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं पर यहां जोड़ी धरती पर ही बनाई गई थी ! लड़के के अति-श्यामवर्णी सींकिया हुस्न के मुकाबिल लड़की गौरवर्ण भारी बदन की मलिका थी ! लड़की को देखते वक्त महसूस होता कि जैसे मैदे की, बेतरतीब बोरी जैसी कोई आकृति, आंखें छोटी छोटी और चश्में की मोहताज़, नाक बेढब, ओंठ मोटे, गाल चेहरे की परिधि से बाहर लटके हुए और जिस्म यकीनन 38 -42 -38 के अनुपात में रहा होगा ! जो भी देखता, सोचता कमाल की जोड़ी है, मोटापे को बेंत का सहारा ! शादी के बाद के कई बरस तक कोई संतान नहीं होने से चिंतित, घर वाले इस दंपत्ति के घर पहली पुत्री के जन्म से और भी चिंतित हो उठे ! नवजात पुत्री का चेहरा, पड़ोस के मिश्रा जी से मिलने की खबर दूर दूर तक फ़ैल गई थी ! उन्होंने खुद को दिलासा दिलाया कि इतनी सी उम्र में किसी से चेहरा मिलाया जाता है कहीं ? पर...वक़्त बीतने के साथ ही उनका भरोसा धूल में मिल चुका था ! बड़ी होती पुत्री के नैन नक्श हू-ब-हू मिश्रा जी पर ही गये थे !

कुछ अरसे बाद इस दंपत्ति के घर एक पुत्र का जन्म हुआ...पर उसे भी, किसी दूसरे ठाकुर पड़ोसी की संतान बताया गया ! यानि कि दुनिया में पति की मौजूदगी के बावजूद पत्नि के दो अन्य पुरुषों से विवाहेत्तर संबंधों का बाजार गर्म था और पति, शायद उससे कोई भी, इस बात को कहने की हिम्मत नहीं जुटा रहा था कि तुम्हारी पत्नि तुमसे प्रेम नहीं करती ! आम तौर पर अफवाहों को चरित्र हनन की कवायद मानकर टाल जाना हमारी फितरत में है ! इसलिए जब भी सुनते, बकवास समझ कर चुप साध लेते ! आगे चलकर पाठक, शर्मा और गढ़वाली जी का नाम भी उस महिला से जोड़ा गया ! लेकिन हम थे कि हमें ‘उस’ पति से ‘उसकी’ पत्नि की बेवफाई की कोई वज़ह और बेवफाई के सबूत ही नज़र नहीं आते थे ! हमें लगता कि पड़ोसियों की निजी खुन्नस के तहत उस बेचारे परिवार का चरित्र हनन किया जा रहा है !

लेकिन एक गहराती शाम, शर्मा जी के टहलने के अंदाज से हमें...राज़फाश होने का सुअवसर नज़र आया, शर्मा जी दम्पत्ति के घर के सामने छोटी सी लम्बाई में लगातार टहलते हुये अपने चारों ओर कुछ इस अंदाज़ में देख रहे थे कि उन्हें कोई देख तो नहीं रहा है और फिर अचानक वे उस घर में घुस गये ! इसके बाद सड़क पर टहलने की बारी हमारी थी ! हमें पता था कि उस घर में बच्चे और बच्चों के घोषित पिता की अनुपस्थिति के चलते शर्मा जी के हौसले बुलंद हुए हैं ! कुछ मिनट पहले सड़क पर टहलते हुए शर्मा जी ने सोचा भी नहीं होगा कि आम सड़क ‘दूसरों’ के टहलने का ज़रिया भी होती है ! उस घर से बाहर आने वाले एकमात्र दरवाजे के सामने वाली सड़क पर टहलते हुए हम, जानते थे कि आज सारी अफवाहें दम तोड़ देंगी ! दरवाजों और खिड़कियों के पल्ले ज़रा से खुलते गोया वे पक्का करना चाहते हों कि ये कमबख्त कितना और टहलेगा ! हमने तय कर लिया था कि थकान के चलते रात कितनी भी गहरी नींद आये! आज तो शर्मा जी की नज़र उतार ही ली जाये !

जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ, शर्मा जी झेंपते हुई बाहर निकले ! हमने पूछा अरे...शर्मा जी आप यहां कैसे ? अमुक साहब तो घर में हैं नहीं ! वे हड़बड़ाये...हां...नहीं...वो ज़रा भाभी जी की तबियत खराब थी ! सोचा देख लूं ! फिर तो आपको श्रीमती शर्मा को भी लेकर आना चाहिये था ! क्या पता बीमार को कैसी मदद की ज़रूरत पड़ जाये ? चलिये आपने देखा है तो मैं भी बीमार का हाल चाल पूछ लूं ! वे गिड़गिड़ाने लगे ! बात उनकी इज्जत पर बन आई थी ! उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उनसे भारी भूल हुई है ! वो बार बार कहते किसी से कहियेगा मत, दो परिवार बर्बाद हो जायेंगे ! शर्मा जी की कथित भाभी जी उर्फ प्रेमिका दरवाजे की ओट में स्वास्थ्य लाभ ले रहीं थी ! हमने उनसे कहा भाभी जी हम आपसे कल सुबह बात करेंगे ! फिलहाल हम शर्मा जी के घर जा रहे हैं ! बहुत दिनों से शर्मा भाभी के हाथों की चाय नहीं पी है...

हमें पता था कि आज शर्मा जी की प्रेम कहानी हमेशा के लिए समाप्त हुई ! हमारी नज़र में वे बालिग थे और उनकी प्रेमिका भी, सो इन संबंधों में अगर कुछ गलत था, तो वो था, उनका विवाहेत्तर होना और अपने जीवनसाथी से छल करना ! श्रीमती शर्मा के हाथों की चाय केवल बहाना थी ! अगली सुबह शर्मा जी की सांयकालीन भूतपूर्व प्रेमिका हमारे अपने घर में मौजूद थी ! वो नहीं चाहती थी कि हम उसके परिजनों की मौजूदगी में उसके घर...! उसने अपनी सारी प्रेम कहानियों को स्वीकार कर लिया और आश्वस्त होना चाहा कि हम उसके परिजनों से...! ये उसका अपना जीवन था ! उसे इतने सारे प्रेम क्यों करना पड़े...औचित्य भी वो ही जानती होगी ! हमने कहा जाओ ! हमसे निर्भय रहो ! वो आश्वस्त हुई और चली गई ! अभी उसके प्रेमिल जीवन में ‘दयाल दास’ का पदार्पण शेष था...



( उसके प्रेम को लेकर फिलहाल हमें कोई कन्फ्यूजन नहीं )

शुक्रवार, 11 मई 2012

तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो ...!

कह नहीं सकते कि जगजीत कौर साहिबा ने इसे पहली बार कब गाया और फिर हमने इसे पहली बार कब सुना लेकिन जब भी सुना, अच्छा लगा कि नायिका , नायक के रंज-ओ-ग़म बांटने के लिए सहर्ष तैयार है  ! इसे सुनते हुए एक फीलिंग ज़रूर होती कि कभी हम भी दुखी हुए तो ? ... पर कौन ? जाने पहचाने चेहरे दर चेहरे धाड़ धाड़...धाड़ करके आंखों के सामने कौंधने लग जाते और फिर मिनटों में गाना खत्म की तर्ज़ पर रंज-ओ-ग़म बांट लेने वाली ‘अनिश्चया’ का हसीन ख्वाब भी खत्म हो जाया करता ! उस वक़्त यह अंदाज़ नहीं था कि रंज-ओ-ग़म बांटने का ये सिलसिला एकतरफा नहीं हुआ करता होगा ! कह नहीं सकते कि ये गीत में निहां ज़ज्बात और रूमानियत थी याकि अपने अन्दर का स्वार्थी जीव,जो, रंज–ओ-ग़म के एकतरफा डिस्पोजल के सिवा कुछ सूझता ही नहीं था !

आज सुबह सुबह बीबी ने जगा दिया...जाओ मेरे भाई को बस स्टेंड तक छोड़ कर आओ ! सुबह ठीक से जागी भी नहीं और हम जगा दिये गये ! मामला रंज-ओ-ग़म का नहीं था पर सुबह की नींद खोकर अहसास हुआ कि बांटना एकतरफा नहीं होता ! सड़क पर पसरे सन्नाटे के दरम्यान जो ज़रा सी चहल पहल नज़र आई वह चर्बी की अतिशयता वाली थुलथुल भदेस देहों और बेहद तनाव में नित्यकर्म निपटाते हुए जैसे चेहरों की वज़ह से खुशगवार तो क़तई भी ना थी ! किसी के हाथ में लकड़ी और किसी की चाल गोया उसे सिर्फ दाहिने बायें चलने के लिए ही ट्रेंड किया गया हो! बहरहाल घर लौटते ही तुलसी पत्ती की चाय से सारा गिला जाता रहा ! अब बस एक ही ख्याल ये बीबियां कितना ख्याल रखती हैं अपने शौहरों का !

अभी कुछ रोज़ पहले ही काम से बाहर गये थे, वहां से बीमार वापस लौटे तो बीबी की फ़िक्रों और तीमारदारी ने अपने अंदर का हर कोना सुख से भर दिया ! उनकी सेवा का सम्मोहन इतना कि एक ही बार कहे से मान गये कि आजकल राजू की दुकान पर कपड़े अच्छे आये हैं ! बहरहाल पाकेट खाली ! अव्वल तो ये मालूम ना था कि बांटना दोतरफा होता है पर बीमारी के दौर से गुज़रते हुए खबर ये भी हुई कि बांटने से कई बार दुःख नहीं भी होता है ! अब सोचता हूं कि जगजीत कौर साहिबा ने जिस नायिका के लिए वो गीत गाया , वो खुद भी रंज को बांटने का सुख लूटना चाहती होगी और हम थे कि माने बैठे थे कि रंज बांटने से उसे भी थोड़ा बहुत रंज होने जाने वाला होगा ! धुत ...पुराना ख्याल ! 

कहना केवल ये है कि मोहतरमा ने उन दिनों रंज-ओ-ग़म बांटने के ख्याल को हवा क्या दी कि हम भी हवा में उड़ते फिरते...अपना भी, रंज-ओ-ग़म...कोई सुहृदया ?...पर कौन ? पता नहीं ?...वही जाने पहचाने चेहरे...तूफ़ान की रफ़्तार से नज़रों के सामने से भले ही गुज़र जाते पर अंदर ही अंदर देर तक अच्छा लगता रहता ! अब लगता है कि गाने, अगर सुर में हों, तो अंदर ही अंदर की खुशनुमा फीलिंग्स और बाहर ही बाहर के कठोर यथार्थ के सारे भेद मिटा डालते हैं ! इन लम्हों में, रंज-ओ-ग़म के लेन देन, कहे / बोले / गाये, भले ही जायें पर हकीक़त में वे लेन देन हुआ ही नहीं करते हैं ! अपनों के चेहरों पे पसरे / बिखरे सुकून को लेकर भी कोई वणिकों की तरह से सोचता है भला ?



 ( जानता हूं कि ज्यादातर शौहर एक ही भट्टे के तपे हुए होते हैं सो मेरे लिखे को अपना ही सुख दुःख समझ कर बर्दाश्त कर लेंगे )

बुधवार, 9 मई 2012

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो...!

सुबह सुबह बिजली गुल, शाम तक मेंटीनेंस किये जाने की खबर है, आज दोपहर बमुश्किल गुज़रेगी ! एक उम्मीद कि दोपहर तक आसमान पे बादल छा जायें ! यहां होता अक्सर यही है कि तपिश की शिद्दत बादलों को तकरीबन हर रोज बुला लेती है ! शायद आज भी ऐसा ही हो याकि नहीं भी ? आखिर तपिश और बादलों को मेरी सहूलियत से अपने रिश्ते थोड़े ही निबाहने हैं ! ...और बिजली ? वो तो पहले ही किसी और के इशारों की गुलाम है ! बस...एक मैं हूं जो अपनी सुन लेता हूं वर्ना...

तब 1993 की मार्च में ऐसा ही कोई तपता हुआ दिन रहा होगा जबकि मैं उस शहर जा पहुंचा था ! बिजली वहां भी नहीं थी और दिन की हरारत यकीनन चालीस डिग्री के पार रही होगी ! बस स्टेंड में कोई खास चहल पहल नहीं थी ! पास ही के दरख्त के नीचे एक लाटरी वाला अपने गल्ले पर खामोश बैठ कर भी बैटरी के सहारे लगातार बज रहा था! कल खुलेगी...कल खुलेगी...कल खुलेगी ! उसने मुझे हसरत भरी निगाहों से देखा पर समझ गया कि ग्राहक नहीं हो सकता ! मैंने कहा ‘फलां’ से मिलना है उसने कहा पास ही स्कूल है, उनके बारे में वहां पूछ लीजिए ! मेरी शक्ल में उसे ग्राहक नहीं मिला पर उसका टेप बजता रहा ! उसे आगे भी उम्मीद रही होगी किसी और ग्राहक की ! मैं चल पड़ा! 

स्कूल के बीचो बीच मैदान में आम के घने दरख्तों के नीचे कई टीचर्स कुर्सियां डाले वक़्त गुज़ार रहे थे ! मैं हैरान था, जो, उनमें से ज्यादातर मेरे पुराने विद्यार्थी निकले ! मेरे सामने उनके दमकते चेहरे, मेरी कमाई / मेरा हासिल, मैं खुश था ! बातें हुईं , मैंने कहा कल तक रुकूंगा ! उन्होंने कहा हमारे साथ रुकिए, हम ‘फलां’ के यहां, आपको ले जायेंगे और फिर वापस भी ले आयेंगे ! मैंने कहा नहीं, मेरा प्रोग्राम तय है, मुझे वहीं रुकना होगा ! खैर...लंबी मान मनौव्वल के बावजूद मेरा प्रोग्राम जैसा था वैसा ही रखना तय पाया गया, बशर्ते कि मैं सबके यहां जाकर थोड़ा थोड़ा वक़्त गुज़ारूंगा, शिष्य वधुओं से मिलूंगा ! तभी सामने वो भी नमूदार हुआ ! मैंने कहा अरे तपन तुम ? वो मुझे देख कर सकपकाया ! थोड़ा असहज लग रहा था ! उसने बताया कि वह इसी स्कूल में बाबू है ! मैंने दूसरों के मुंह देखे ! अब वे सब भी असहज लग रहे थे !

तपन भी मेरा पुराना विद्यार्थी था पर मेरे सामने उसकी असहजता और उसे देखकर दूसरे शिष्यों की असहजता मुझे अटपटी लगी ! सोचा कारण बाद में पता कर लूंगा ! दूसरे शिष्यों की तुलना में तपन ने मुझसे एक बार भी नहीं कहा कि मेरे घर चलिए ! कहीं कुछ  गड़बड़ ज़रूर थी ! मैंने कहा तुम सब लोग शाम को मेरे पड़ाव में आना मुझे तुम लोगों से और भी बातें करना है ! सबने सहमति में सिर हिलाया पर तपन खामोश रहा ! उसके चेहरे में एक अजीब सी चिंता झलक रही थी ! मैं अपने गंतव्य स्थल तक जा पहुंचा और 'मित्र' से घर की बातों के साथ ही साथ कामकाज निपटाने का सिलसिला शुरू हो गया ! तपन फिलहाल ध्यान से उतर गया था !

शाम सारे शिष्य मुझसे मिलने आये पर उनमें तपन नहीं था ! मैंने दोपहर की असहजता का कारण पूछा ! सब मौन रहे ! वे चाहते थे मैं बारी बारी से सबके घर चलूं ! मैंने उनका आग्रह मान लिया ! कल मुझे भी अपने घर वापस होना था ! शिष्यों से स्वजनता का निर्वाह करते रात देर हो चुकी थी ! पड़ाव पर लौटा तो मित्र ने कहा तपन आया था ! कल सुबह फिर से आएगा ! मैंने कहा अगर तपन के बारे में आपको कुछ पता है तो आप मुझे बताइए ! उन्होंने कहा सुबह तपन से मिल लीजिए ! अगर वो खुद कुछ नहीं कहेगा तो मैं आपको सब बता दूंगा पर उसके जाने के बाद ! अब मुझे सुबह का इंतज़ार था ! 

सुबह तपन आया ! वो उदास था, मैने कहा स्वास्थ्य ठीक है ? उसने कहा हां ! मैंने कहा कोई समस्या है ? उसने कहा नहीं पर उसके बोलने में झिझक थी ! मैंने जोर नहीं दिया ! थोड़ी देर बाद वो चला गया ! अब इसके आगे मेरे मित्र की बारी थी ! उन्होंने कहा, तपन जब अपने घर से नौकरी करने निकला तो वह संयुक्त किसान परिवार का एकमात्र शिक्षित और सरकारी नौकरी प्राप्त सदस्य था ! घर के तमाम लोगों को उससे अपेक्षायें थीं कि वह शेष परिवार के लिये भी कुछ करेगा ! नौकरी ज्वाइन करने के बाद उसने ऐसा किया भी ! वह अपने बड़े भाई की पुत्री को अपने साथ ले आया और उसी स्कूल में दाखिल करा दिया जहां वह खुद नौकरी कर रहा है ! चाचा के साथ रहकर भतीजी ने दसवीं की परीक्षा भी पास कर ली ! समय गुजरता रहा और एक दिन तपन के घर वालों ने तपन की शादी का इरादा कर लिया जिसपर तपन भी उनसे सहमत हो गया ! 

शादी की बात पर तपन की सहमति की खबर के साथ ही आकाश फट पड़ा ! उसकी भतीजी सीधे थाने पहुंची  और उसने तपन के ऊपर खुद के जीवन से खिलवाड़ करने का आरोप लगा दिया ! उसका कहना था कि पिछले दो सालों से उसके और तपन के दरम्यान पति पत्नि जैसे सम्बंध हैं और अब तपन किसी और से शादी करके उसे  धोखा देना चाहता हैं ! थाने की मध्यस्थता में लड़की ने अपनी रिपोर्ट तब वापस ली जब तपन, अपनी गलती मानते हुए,उससे शादी करने के लिए तैयार हो गया ! उनकी शादी और इस हंगामे के बाद तपन के बंधु बांधव और लड़की के माता पिता इस जोड़े से सम्बंध तोड़ चुके हैं ! वे यहां नहीं आते तथा तपन और उसकी ब्याहता गांव नहीं जा सकते !

मैं, संबंधों, रीति रिवाजों और सेक्स को लेकर चिंतन करने स्थिति में नहीं था ! मैं घटनाक्रम पर हतप्रभ था और मुझे घर भी वापस आना था ! बस स्टेंड जस का तस था और लाटरी वाला भी ! आज वो मुझे देख कर मुस्कराया और उसने मुझसे पूछा आपका काम हो गया ? मैंने कहा हां, उसने फिर पूछा, घर वापस जा रहे हैं ? मैंने कहा हां ! मैं अनमना था और लाटरी वाला हस्बे-मामूल अपने धंधे पर, उसका रिकार्ड आज भी एक ही रट लगाये हुए था...कल खुलेगी...कल खुलेगी...कल खुलेगी...और फिर...मैं घर वापस आ गया !




शुक्रवार, 4 मई 2012

कभी यहां तुम्हें ढूंढा...कभी वहां देखा...!

रागवृंत पाण्डेय, जितना सुन्दर नाम उतने ही सुन्दर वे स्वयं भी ! गौर वर्ण, लंबा कद, सारी देह रेखायें एक दम अनुपात में ! सुसंस्कृत, साहित्यिक उत्तर भारतीय परिवार में जन्म और सर्वसुविधायुक्त पालन पोषण दशाओं में शैशव से युवापन तक की सुगम यात्रा ! अभियांत्रिकी स्नातक होते ही व्यवसाय प्रबंधन में स्नातकोत्तर उपाधि अर्जित करने का सुअवसर भी परिजन प्रदत्त...अंततः किसी मल्टीनेशनल कम्पनी में एक शानदार पैकेज लेकर रागवृंत महोदय जीवन की अगली पारी खेलने के लिए तैयार ! उनके परिजन, कुलीन, सजातीय, समृद्ध परिवारों की सुकन्याओं के अनगिन छाया चित्रों और गृह नक्षत्रों में उनका भविष्य खोजने लगे ! इस कवायद में लगभग दो वर्ष यूंहीं गुज़रे, किन्तु रागवृंत के परिजन किसी समुचित निर्णय तक नहीं पहुँच सके...और एक दिन वे असीम दुःख से भर उट्ठे,जबकि उन्हें, रागवृंत के किसी अनन्य मित्र से, यह खबर मिली कि रागवृंत, डेढ़ वर्ष पहले ही अपनी बाल सखि,  रति से प्रेम विवाह कर चुके  हैं !

रति दक्षिण भारतीय नायर परिवार में जन्मी और सुसंस्कारित हुईं, जबकि उनके पिता एक सरकारी अस्पताल में एक साधारण से लिपिक बतौर काम कर, अपना परिवार चला रहे थे ! उन्हें सरकारी कर्मचारियों के मेडिकल बिल्स के सिलसिले में छुपी हुई सहायता करने की एवज, थोड़ी बहुत अतिरिक्त आमदनी भी थी अतः उन्हें, रति को अच्छी शिक्षा देने में कोई कठिनाई नहीं हुई ! रति स्कूल की पहली सीढ़ी से ही रागवृंत के साथ, पढ़ रही थीं ! उनके मध्य प्रेम की सीमा तक अनुराग है यह जानकारी उनके अंतरंग मित्रों के अतिरिक्त किसी भी परिजन को नहीं हुई जब तक कि उन्होंने प्रेम विवाह नहीं कर लिया ! जिन दिनों रागवृंत अभियांत्रिकी के छात्र थे उन दिनों रति व्यवसाय प्रबंधन में स्नातक पाठ्यक्रम की छात्र थीं और फिर दोनों ने व्यवसाय प्रबंधन में एक साथ स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की ! ...एक ही शहर में नौकरी भी !

स्कूल की पहली क्लास से लेकर अब तक, वे जितना समय, एक साथ गुज़ार चुके थे, वह एक दूसरे को निकट से पहचानने, परस्पर अनुरक्त हो जाने...और प्रेम के गहरा जाने के लिए संभवतः पर्याप्त ही रहा होगा, इसलिए उन दोनों ने जीवन एक साथ गुज़ारने का निर्णय लिया और अपने परिजनों को खबर किये बिना, कोर्ट मैरिज कर ली ! परिजनों को अपने विवाह की खबर नहीं करने का एक कारण उन दोनों की सामाजिक पारिवारिक पृष्ठभूमि के अंतर और परिजनों के संभावित विरोध की आशंका रही होगी...और वास्तव में ऐसा हुआ भी ! परिजनों ने खबर पाकर स्तब्ध रह जाने के महीनों बाद इस सम्बन्ध पर सप्तपदी के धार्मिक अनुष्ठान के लिए अपनी सम्मति दी ! वैसे भी परिजनों के पास मात्र दो ही विकल्प शेष थे, एक ये कि नवदंपत्ति को अपने जीवन से खुरच फेंका, और हमेशा के लिए भूल जाया जाये या फिर होनी को बड़प्पन दिखा कर स्वीकार कर लिया जाये ! उन्होंने सामान्यतः चुना जाने वाला दूसरा विकल्प चुना !

रागवृंत पाण्डेय की कथा के समानांतर अनंग सिंह, बिहार मूल के एक साधारण से क्षत्रिय परिवार में जन्मा युवा, उसके पिता सरकारी पोस्ट आफिस में तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे, अपनी छोटी सी तनख्वाह से अपने बच्चों के पालन पोषण की विवशता में उन्होंने अनंग और उसके दूसरे भाइयों को सरकारी स्कूलों में भर्ती करा दिया और उनका भविष्य नियति के हाथ में छोड़ दिया ! घरेलू कठिनाइयों और भीषण जीवन दशाओं के साथ बिहार प्रदेश की दुर्लभ जीवटता के महामेल ने अनंग को अलग ही सांचे में ढ़ाल दिया ! उसे स्कूल से लेकर कालेज तक के विद्यार्थी जीवन में मारपीट उठापटक और नेतागिरी से ही फुर्सत नहीं थी ! जैसे तैसे आर्ट्स ग्रेजुएट हो सका ! जब अनंग बी.ए. में पढ़ रहा था तो मनीषा बी.एससी. की छात्रा थी ! जहां अनंग एक ही क्लास में नींव मजबूत कर करके आगे बढ़ता रहा वहीं मनीषा हर साल अच्छे नम्बरों से पास होती रही ! बहरहाल, कालेज तक पहुंचते पहुंचते यह पता चल गया कि अनंग उम्र में मनीषा से पांच साल बड़ा है! मनीषा, ओडिशा प्रदेश के संपन्न, ब्राह्मण परिवार की गौर वर्ण, सुंदर / सुमुखी कन्या जबकि अनंग, श्यामल वर्ण, साधारण कद काठी और सामान्य शक्ल-ओ-सूरत का एक उत्पाती युवा !

मनीषा को अनंग में कोई रूचि ना थी...पर अनंग , कालेज के चुनाव और छात्रहित के दूसरे बहानों को लेकर मनीषा से लगातार मिलता रहता ! वह मनीषा से एकतरफा प्रेम करने लगा था और उसे किसी भी तरह से हासिल करना चाहता था, हालांकि उसे अच्छी तरह से पता था कि उसे लेकर मनीषा के मन में इस तरह की कोई भावना नहीं है ! वह हर दिन किसी ना किसी बहाने, मनीषा से ज़रूर मिलता ! मनीषा से बातचीत करते समय वह अत्यन्त शिष्ट युवा की तरह से व्यवहार करने की कोशिश करता और उसके मित्रवत विश्वास को अर्जित करने चेष्टा भी ! इधर मनीषा जानती थी कि उसके सामने अनंग का व्यवहार बदल जाता है जबकि वह वास्तव में एक उद्दंड युवा है ! अपने प्रति अनंग के शिष्ट व्यवहार और मित्र मंडली की सतत उपस्थित के चलते मनीषा को कभी ऐसी आशंका ही नहीं हुई कि...

एक दिन अनंग ने मनीषा को फ्रूट जूस में नशीला पदार्थ मिलाकर पिला दिया और...होश में आने तक मनीषा लुट चुकी थी पर अनंग उसे ब्लेकमेल करने या बदनाम करने की धमकी देने के स्थान पर उससे बहुत प्रेम करने और केवल उसी से विवाह करने की रट लगा बैठा ! वह कहता रहा, तुम्हे पाने के लिए मैंने जो किया, वह गलत है...पर मैं जानता था कि तुम मुझसे प्रेम नहीं करतीं और मुझे स्वीकार भी नहीं करतीं ! इसलिए तुमसे विवाह करने और तुम्हे पाने का यही एकमात्र रास्ता मुझे सूझा ! मुझे क्षमा कर दो और मुझसे विवाह कर लो ! मनीषा के सामने भी दो ही विकल्प थे, एक तो ये कि पुलिस तक जाये और दूसरा ये कि अनंग की प्रणय याचना को स्वीकार कर उसकी धोखेबाजी, उसके अपराध को क्षमा कर दे ! लंबी कशमकश के बाद उसने कानूनी प्रतिरोध और बदनामी के रास्ते के बजाये क्षमा के विकल्प को चुना ! संभवतः इस विकल्प को चुनने में उसकी रजामंदी के बजाये, मजबूरी कहीं ज्यादा थी !

और फिर एक दिन सारी बस्ती हैरान थी कि मनीषा ने अनंग जैसे युवा के साथ भागकर प्रेम विवाह कैसे कर लिया ? इस प्रकरण में भी, नवविवाहित जोड़े के परिजन, स्तब्ध थे पर उनके पास भी कोई तीसरा विकल्प नहीं था ! सो पहले को छोड़ उन्होंने दूसरा विकल्प स्वीकार किया और मनीषा, अनंग के साथ अग्नि के फेरे लेकर सामाजिक तौर पर उसकी पत्नि हो गयीं ! मनीषा और अनंग का ब्याह एक छल की नींव पर खड़ा था! इसे एक पक्षीय प्रेम की गाथा कहा जाये, जिसमें कि नायक नायिका के साथ एक अपराध करके, नायिका को हासिल करता है ! इस गाथा में नायिका को नायक से प्रेम नहीं था ! उसने नायक को मजबूरी में स्वीकार किया था ! लेकिन विवाह के बाद, चारित्रिक रूप से बदल चुके और फिलहाल ठेकेदारी करके आजीविका कमा रहे अपने पति के समर्पण से वह बेहद खुश है !

रागवृंत पाण्डेय और रति के लंबे सुदीर्घावधि सुखद मित्रवत साहचर्य की परिणति विवाह में हुई ! उनके एक पुत्री है किन्तु वैवाहिक जीवन के तीसरे वर्ष वे एक दूसरे से कानूनन तलाक ले चुके हैं, जबकि अनंग और मनीषा के अल्पावधि साहचर्य के बाद छल से हुए विवाह की परिणति एक सुखद पारिवारिक वैवाहिक जीवन है ! जहां रागवृंत-रति के संबंधों की निर्दोष शुरुवात का अंत तुरंत हो गया, वहीं अनंग के आपराधिक कृत्य का पश्चाताप, अनंग -मनीषा के संबंधों की प्रगाढ़ता में वृद्धि कर रहा है ! एक ओर रागवृंत और अनंग के प्रकरण अंतरजातीय / अंतरसामाजिक / अंतरभाषाई / अंतरसांस्कृतिक तरह के विवाह का उद्धरण साम्य रखते हैं ! वहीं दूसरी ओर उनके संबंधों में छल और निश्छलता की शुरुवात का अंतर भी है ! रागवृंत और रति  दैहिक / बौद्धिक सौंदर्य साम्य तथा मित्रवत साहचर्य के बावजूद एक दूसरे से पृथक हो गये हैं जबकि अनंग और मनीषा दैहिक / बौद्धिक सौंदर्य असाम्य और मित्रवत असाहचर्य के बावजूद अब भी एक दूसरे के साथ हैं !

यहां रागवृंत और रति अब साथ नहीं हैं...वहां अनंग और मनीषा का साथ प्रगाढ़तम होता जा रहा है ! सो प्रेम को लेकर मैं आज भी कन्फ्यूज्ड हूं ! कहना चाहता हूं ! ओह ... प्रेम ! कभी यहां तुम्हें ढूंढा ? कभी वहां देखा ! तुमने अपने कहीं भी होने या नहीं होने को लेकर मुझे परेशान कर रखा है !

रविवार, 15 अप्रैल 2012

ओ निंदक तू आ मेरे सब्र का इम्तहान ले !

तमाम जिंदगी सिर्फ सोते हुए तो नहीं गुज़ारी जा सकती , इसे जागते हुए भी जीना पड़ता है ! लिहाज़ा जीवन की हर नाक़ाबिल-ए-यकीन घटना केवल ख्वाब में ही घटा करे , ये ज़रुरी नहीं रह जाया करता ! मैं अगर ये कहूं कि ख्वाब में क्या देखा , तो ये भी कहना पड़ेगा कि दरअसल जागते हुए क्या बीती ! जीवन दायिनी मां को अपने बोझ से मुक्त कर चुकने के बाद और ईश्वर पर बोझ बन जाने से पहले की अवधि में कुछ इंसान जागते ज्यादा हैं तो कुछ सोते ज्यादा...पर कई ऐसे भी जिनकी जिंदगी में सोने जागने का अंतर कर पाना बेहद मुश्किल होता है ... और बहुतेरे ऐसे भी , जो अपने जीते जी , सोने जागने का अंतर तो समझते हैं लेकिन बंधु बांधव उनके सोने जागने से लेकर उनके जीवन और खुद उन्हें भी , धरती पर बोझ मानते हैं !

हमारी नींदों में जो घटा अगर वो अवचेतन से प्रकटा है , तो फिर जागते हुए जो कहा , वो केवल चेतन से आएगा , ये विश्वास करना कठिन है ! यौनाकर्षण के फेर में किसी कामिनी से सर्वथा सचेत होकर सफ़ेद झूठ कहा जाये , तो भी समझ में आता है किन्तु आकस्मिकता उदभूत कथन झूठ होने के बजाए सत्य की तरह सिद्ध हो जायें , तो फिर अवचेतन और किसी परा-मानवीयता जैसे एलिमेंट की उपस्थिति की संभावना को हाशिए पे कैसे डाला जा सकता है ! कहने का आशय यह है कि सोने और जागने के हालात में भेदभाव किये बिना हमारे जीवन की घटनायें और हमारे कथन चेतन के साथ ही साथ अवचेतन और परामानवीय तत्वों / कारकों से प्रेरित हो सकते हैं इसे मान लेने में हर्ज ही क्या है ? विशेष कर तब , जबकि विज्ञान इन मुद्दों पर कोई स्पष्ट अवधारणायें विकसित नहीं कर पाया हो ! 

1987 के फरवरी माह में किसी दिन , अपने मित्रों के साथ गपशप करते बैठे थे कि खबर मिली कि खन्ना साहब भोपाल में बीमार हो गये हैं ! उन दिनों छत्तीसगढ़ राज्य मध्य प्रदेश से अलग नहीं हुआ था , इसलिए भोपाल अविभाजित मध्यप्रदेश की राजधानी हुआ करता और तब जगदलपुर से भोपाल के लिए वायुदूत की सीधी सेवायें उपलब्ध थीं ! चूंकि बीमार खन्ना साहब के घर कोई पुत्र नहीं था , सो उनकी पत्नी के साथ एक स्टाफ मेंबर को वायुदूत से भोपाल रवाना कर दिया गया और उनकी वापसी के लिए ट्रेन में रिजर्वेशन के जुगाड़ देखे जाने लगे ! मेरे एक पंजाबी मित्र खन्ना साहब के लिए कुछ ज्यादा ही फ़िक्र मंद थे ! कहने लगे कि दो लोगों का जाना तो ठीक है पर वापसी कैसे होगी ? ट्रेन में सिर्फ दो ही बर्थ मिल रही हैं , जबकि भोपाल से वापसी तीन लोगों की होना है ! मैंने कहा अजी फ़िक्र मत करो तीसरी बर्थ की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी ! 

यहां से दो लोग गये हैं , सो दो ही वापस आयेंगे ! खन्ना साहब तो कलश में होंगे उन्हें बर्थ से क्या लेना देना ! मुझे पता नहीं , यह सब , मैं कैसे कह गया ! खन्ना साहब की बीमारी की पृष्ठभूमि और सीरियसनेस की मुझे कोई जानकारी नहीं थी ! मैंने जो भी कहा मित्र की फ़िक्र की त्वरित प्रतिक्रिया बतौर कहा ! उधर मित्र मुझे सुनकर , आग आग हुआ जा रहा था ! तुम ऐसा कैसे कह सकते हो किसी जीवित व्यक्ति के बारे में ? मैंने कहा जो सूझा वो कह दिया अब तुम इसे अशिष्टता कहो या धृष्टता ? हालात बदलने वाले नहीं है ! तुम जितना चाहो इंतज़ार कर सकते हो ! शाम लगभग तीन बजे फोन पर खबर आ चुकी थी कि खन्ना साहब का अंतिम संस्कार भोपाल में ही किया जाएगा ! मित्र ने कहा तुम्हारी जुबान ...

घटना के बाद के वर्षों मेरे इन्हीं मित्र को सूझा कि कानून की डिग्री हासिल कर ली जाये ! फैकल्टी में सांध्य कालीन क्लासेस की व्यवस्था थी  !  इसलिए उन्हें नौकरी के साथ कानून की पढ़ाई करने में कोई दिक्कत नहीं हुई  !  हमारे अपने युवा विद्यार्थियों की तुलना में मित्र के अंक शानदार आ रहे थे  ! जब वे फाइनल इयर का एक्जाम दे चुके , तो मैं उनकी बुक्स किसी ज़रूरत मंद विद्यार्थी को दिलवाना चाहता था ! मैंने उनसे कहा यार तुम्हारा एक्जाम हो चुका है  !अपनी किताबें अमुक को दे देना ! उन्होंने कहा अभी मेरा रिजल्ट नहीं निकला है बाद में देखूंगा  !  मैंने कहा बाद में क्यों  ? अभी दे दो , जिस पेपर में तुम्हारी सप्लीमेंट्री आयेगी वो किताब वापस ले लेंगे  !  मेरे मित्र पिछले दोनों सालों में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो चुके थे ! इसलिए तीसरे साल में सप्लीमेंट्री आने की कोई वज़ह भी नहीं दिखाई दे रही थी ! मैं नहीं जानता यह शब्द मेरी जुबान में कैसे आया...

रिजल्ट निकलने पर देखा कि मित्र को एक पेपर में सप्लीमेंट्री आ गई है  ! उन्होंने सप्लीमेंट्री परीक्षा देने के साथ पुनर्मूल्यांकन भी करवाया और अंतत प्रथम श्रेणी में उतीर्ण भी हुए !  उन्होंने पूरक की तुलना में पुनर्मूल्यांकन के रिजल्ट को ऐच्छिक तौर पर स्वीकार किया क्योंकि वे अपनी अंकसूची में सप्लीमेंट्री से पास होने का कोई संकेत भी नहीं देखना चाहते थे   !  सच तो ये है कि पुनर्मूल्यांकन से साबित हुआ कि वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण थे   !  इसलिए सप्लीमेंट्री आने की घटना उन्हें आज भी चमत्कृत करती है   !  लेकिन अब वे ये नहीं कहते कि तुम्हारी जुबान...बल्कि अब वे कहते हैं कि तुम्हारे साथ कुछ तो गड़बड़ है ...

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

जिस क़दर अफ़साना-ए-हस्ती को दोहराता हूं मैं...

अब तक कोई तर्क नहीं ! जो भी कहा, महज़ ख्वाब थे, कुछ स्वयं सिद्ध...तो कुछ असिद्ध जैसे गुज़र गये ! बचपन से एक शौक़, चारा लगाया और किसी एक तालाब में कांटा डाल कर बैठ गये, कभी घंटों खाली और कभी लगातार ढ़ेर सारी मछलियां हाथ लगतीं ! रात को ख्वाब देखता, किसी पक्की तारकोल सड़क पर चला जा रहा हूं और अचानक हाशिये की कच्ची सड़क पर एक बड़ा सा छेद हो जाता... नीचे झांकूं तो, छै सात फुट की गहराई में नम रेत की नदी जैसी, जिसका पानी खत्मशुद और एक बेहद चमकीली चांदी जैसी सफेद मछली रेत पर ! कह नहीं सकता कि इस ख्वाब की पुनरावृत्ति कितनी बार हुई ! वज़ह शायद वो अनगिनत मछलियां रही हों, जिन्होंने मेरे कांटे में फंस कर जान दी...या फिर हज़रते ईसा अलैस्सलाम की कोई कृपा होनी थी मुझ गैर इसाई / विधर्मी / सुधर्मी पर !

कभी देखता आकाश में ढ़ेर सारे फाइटर प्लेन, उनमें से कोई एक चोट खाकर मेरे घर से कुछ ही दूरी पर मलबे के ढ़ेर में तब्दील होकर गिरता हुआ कुछ घरों को तबाह करते हुए, कारण...पता नहीं, युद्ध...कोई लड़ा नहीं, फिल्म...कोई देखी नहीं, इस ख्वाब को देखने से पहले ! बहरहाल यह ख्वाब भी अपनी नींदों में बार बार शामिल हुआ ! अक्सर खुद की कच्ची पक्की नींदों में हाथी देखता ! हरे भरे खेत देखता ! जागने पर सोचता, पास के गांव के हाथियों के बारे में, जो शादियों में बुलाये जाते, जिनकी पीठ पर बारहा बैठे ! अपने पुश्तैनी खेत...रात के ख्वाब को सुबह होने तक ख्याल में बदल डालते ! एक फ़र्क ये कि जो अपने पास था वो ख्वाब होकर भी ख्याल ही रहा और फिर इस तरह के तमाम ख्यालों को लेकर कोई ख्वाब नहीं पाले हमने !

एक छोटी सी रेल लाइन पर छुक छुक दौड़ती एक ट्रेन अक्सर अपने ख्वाबों में भी दौड़ती रही ! पूरब से उगते सूरज की ओर भागती इस ट्रेन के दाहिनी ओर / दक्षिणी दिशा में, पटरियों से थोड़ी ही दूर काले काले पत्थरों वाले छोटे छोटे पहाड़ ! पहाड़ों पर बौने बौने से छुटपुट दरख्त और उनके साथ ही सफेद रंग के चंद मठ / समाधियां / मज़ार ! पहाड़ों का सिलसिला खत्म होते ही मंगलूर टाइल्स वाला एक बड़ा सा घर जिसके पीछे से ट्रेन को गुज़र जाना है ! इससे आगे शायद कोई स्टेशन भी हो...पर अनुभूति ये कि ट्रेन थोड़ी दूर पर रुक जायेगी और उसे यहीं से वापस लौट जाना है, लेकिन हम ट्रेन से कब उतरे और इस घर तक कैसे पहुंचे...कोई खबर नहीं ! 

दक्षिणी दिशा में खुलने वाले इस घर के मुख्य दरवाजे से कुछ एकड़ की दूरी पर अथाह जलराशि...संभवतः कोई बड़ी सी झील और झील के एन उस पार पहाड़ियों की लंबी श्रृंखला ! झील की लम्बाई चौड़ाई इतनी ज्यादा कि उस पार की पहाडियां छाया जैसी दिखाई देती हैं ! हैरत अंगेज बात ये कि इस घर से जुड़ा हुआ कोई दूसरा घर दिखाई ही नहीं दिया, यहां तक कि आस पास भी नहीं ! घर के सामने अलबत्ता एक घना विशालकाय छायादार दरख्त, शायद बरगद हो ?  ख्वाब में दरख़्त की कोई पहचान नहीं ! एक अहसास ये कि इस दरख्त के नीचे खेलते हैं हम...पर किसके साथ पता नहीं ! वो घर अब शायद, वीरान हो गया है जो, हमारी ख्वाब ख्वाब आमद पर वहां बेहिसाब सन्नाटा पसरा हुआ है !

 जिस क़दर अफ़साना-ए-हस्ती को दोहराता हूं मैं 
 और भी बेगाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूं मैं

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

अरे बावले ये तेरा वहम नहीं है ...

किशोर वय स्वप्न के अनिन्द्य सौंदर्य को मित्रों ने मेरे अवचेतन की अभिव्यक्ति मात्र मान लेने के आग्रह निरंतर किये ! उनके ख्याल से यह सब मेरे जीते जागते अवलोकन और चिंतन का स्वप्न बतौर पुनर्प्रकटन मात्र था ! अपने पालन पोषण की परिस्थितियों और ग्राम्य दशाओं की निज भिज्ञता ने मुझे इस आग्रह से विरत बने रहने की प्रेरणा दी यद्यपि इस उहापोह में उस सुदेह के स्वप्न के आद्य बिंदु / आद्य कारण पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सका ! किन्तु यह निश्चित हुआ कि स्वप्न के स्रोत के रूप में स्वयं की अंतर-यात्रा अंतत: शेष एकमात्र विकल्प है ! सोचता हूं कि मिथकों और आख्यानों में सुराधिपति के ऋषि पत्नि से सहवास पूर्व कथनों के अध्ययन यदि मेरे मानस पर कोई प्रभाव छोड़ गये हों तो ? देवेन्द्र को कटि सुरम्य से संगम की चाहना थी ! ऐसे ही अनगिनत वृत्तान्त पढ़ सुनकर संभव है अवचेतन ने कोई रूप धरा हो और मैं स्व सम्मोहित एक अनावृत चित्र गढ़ पाया होऊं ! किन्तु संशय यह है कि तेरह वर्ष की अल्प-आयु में इस तरह के अध्ययन मैंने किये ही कब थे ?

महाशिवरात्रि 2011 की पूर्व संध्या में अपने एक शिष्य और एक मित्र के साथ गुप्तेश्वर, ओडिशा जाने के विषय में चर्चा हुई थी किन्तु पर्व की प्रातः प्रवास की अपनी अनिच्छा के चलते उन दोनों को ही तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए कह दिया ! भोर के स्वप्न ने विचित्र से संशय में डाल रखा था सो संध्या तक उन दोनों की वापसी की प्रतीक्षा की ! फिर संध्या काल तीर्थ यात्री द्वय की वापसी ने मुझे और भी विकट परिस्थिति में धकेल दिया ! मैंने उनसे पूछा कि जगदलपुर से ‘अमुक’ किलोमीटर ? की दूरी पर आपको कोई एक गांव ऐसा मिला था जहां बिजली के एक खम्भे के पास ढेर सारी सफ़ेद गायें पूरी की पूरी सड़क को घेर कर खडीं थीं ? क्या सड़क मुरम वाली थी ? उन्होंने कहा, हां ऐसा ही हुआ ! हमें अपनी गाड़ी धीमी करना पड़ी थी ! वो जगह गुप्तेश्वर के अत्यन्त निकट है...पर आपको कैसे पता? 

उनके प्रश्न का उत्तर दिए बिना मैं उनसे फिर से पूछा कि उसके ठीक आगे सड़क से दाहिनी ओर पचास फुट की दूरी पर कोई खपरैल वाला घर था ? गांव के प्राइमरी स्कूलों के जैसा ? उन्होंने कहा हां...मगर आप... मैंने फिर से कहा कि क्या वहाँ कोई ब्राह्मण युवती गुलाबी साड़ी पहने हुए सड़क की ओर वाले स्थल / आँगन को बुहार रही थी ? क्या उसकी साड़ी का बार्डर थोड़ा गहरा लाल था ? क्या उस गौर वर्ण युवती की आंखें बड़ी बड़ी और अत्यन्त सुन्दर थीं ? क्या वह युवती बाद में आपको तीर्थ स्थान वाले घाट पर भी मिली थी ? उन्होंने कहा यह सब सही है ! गायों के झुण्ड कारण गाड़ी धीमी करना पड़ी ! वहां एक युवती झाड़ू लगा रही थी ! घर भी देशी खपरैल वाला था और ... 

जैसा कि आप कह रहे हैं ! उसकी आंखे अत्याकर्षक बड़ी बड़ी थीं उसने गुलाबी साड़ी पहन रखी थी जिसका बार्डर गहरा लाल था और वह हमें बाद में घाट पर भी मिली थी किन्तु स्नान के समय कहीं गायब हो गई...पर यह सब आपको कैसे पता ? क्या कोई और भी गया था वहां ? किसने बताया यह सब आपको ? मैंने कहा बंधु आज मैंने स्वप्न में यह सब देखा था ! पर यह सोच कर आप लोगों के साथ नहीं गया कि संभव है कि बीते कल की चर्चा और धर्म स्थल की पृष्ठभूमि में मेरे अवचेतन ने कोई एक स्वप्न गढ़ लिया हो ! मुझे प्रतीति हुई कि भोर में, मैं आपके साथ जाऊं और मेरा स्वप्न कपोल कल्पना सिद्ध हो तो मुझे दुःख होगा ! बस इसी आशंका से मैंने यह यात्रा आप लोगों के साथ नहीं की ! मैं अपने स्वप्न को अपनी आँखों से असत्य सिद्ध होते नहीं देखना चाहता था ! लेकिन अब मैं वास्तविक रूप से, किसी दिन, अपने स्वप्न के उस घर, उस डगर और यथासंभव उस युवती को देखने ज़रूर जाऊंगा ! 

महाशिव रात्रि 2012 की सुबह ढेर सारे बैल बेहद , बेहद स्वस्थ बैल , एक दम सफेद बैल ,कम से कम आधा दर्जन बैल मैंने स्वप्न में फिर से देखे हैं ! अपने जीते जागते इतना हृष्ट पुष्ट पशुधन मैंने कभी नहीं देखा ! फिर लगातार दो महाशिवरात्रि की सुबह के श्वेत पशुधन का स्वप्न मुझे आश्चर्य में डाल रहा है ! कह नहीं सकता कि दूसरा स्वप्न भी पहले स्वप्न की तरह से यथार्थ सिद्ध होगा या कि नहीं किन्तु ...प्रथम स्वप्न की धरती पर जाये बगैर स्वप्न की सिद्धता मुझे संकेत दे रही है कि...अरे बावले ये तेरा वहम नहीं है ...

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

मैं तो गुम था तेरे ही ध्यान में तेरी आस तेरे गुमान में...

पिछला हफ्ता ऐसा गुज़रा कि हर दोपहर बादल घिर घिर आये और गरज तरज कर बरस गये ! ऐसा लगा कि जैसे पुराने जमाने वाली गर्मियां लौट आईं हों जबकि हर रोज दोपहर की तपिश का जबाब शाम से पहले की बारिश हुआ करती थी ! जिंदगी के ताप का मुकम्मल बैलेंस , ना रत्ती कम ना तोला ज्यादा ! यह मौसम पिछले मौसमों के ख्याल का था सो हम भी अपने अतीत की गलियों में भटक गये ! अपना घर गांव के सबसे ऊंचे मोहल्ले में ! इसलिए गांव में कहीं भी जाना हो , हर दिशा में उतार वाले रास्ते से गुज़र हुआ करती थी !

तब अपनी उम्र यही कोई तेरह बरस के आस पास रही होगी और ख्वाब ये कि हम पश्चिम की दिशा में मंदिर के सामने वाले रास्ते से नीचे की ओर जा रहे हैं और एक गौर वर्ण रमणी जिसके जिस्म पर कपड़ों का नामों निशान तक ना था हमें खोजती हुई उसी रास्ते पर ऊपर की तरफ आ रही थी  !  निसंदेह वह एक यूरोपीय किशोरी थी जो उस ख्वाब में हमारी परिचित जैसी लगी ! विश्वास नहीं होता कि कुछ अरसे बाद फिर से इसी ख्वाब की पुनरावृत्ति हुई  !  हमें स्मरण नहीं कि इस उम्र में हमने जागते हुए / अपने पूरे होश-ओ-हवास में कभी कोई नग्न स्त्री , कोई छायाचित्र या कोई फिल्म या किसी और तर्ज़ पर किसी स्त्री देह , को देखा होगा ! यकीनन स्त्री देह से हमारी पहली और मुकम्मल पहचान महज़ एक ख्वाब थी  ! 

उन दिनों यह तय करना मुश्किल था कि एक स्त्री अपनी बेपर्दगी के हालात में कैसे दिखती होगी पर ...ख्वाब में जो देखा,जैसा भी देखा , सब कुछ वैसा ही होता है  !  यह इत्मीनान कई सालों के बाद हुआ ! दुनिया के किसी भी कोने में अगर वह युवती वास्तव में मौजूद हो तो हम उसे आज भी पहचान लेंगे ! अब सवाल ये है कि अपनी कमसिनी के दिनों में यह ख्वाब हमने देखा भी तो कैसे ? ...और अगर ख्वाब हमारे अवचेतन को अभिव्यक्त करते हों तो क्या हमारे पारिवारिक सामाजिक हालात किसी यूरोपीय किशोरी को उसकी दैहिक नग्नता की स्थिति में  हमारे अवचेतन में शामिल करने के लिए वास्तविक रूप से उत्तरदाई रहे होंगे ? 

निपट गांव के रहवासियों की सामाजिक मर्यादायें हमारे ख्वाब के अनुकूल नहीं थीं ! उस ज़माने में एक टूरिंग टाकीज छै माह के प्रवास पर गांव आया करती और वहां के माहौल के हिसाब से धार्मिक पारिवारिक फिल्में दिखा कर व्यवसाय किया करती ! इंटरमीडियेट कालेज की लाइब्रेरी और गांव में पहुंचने वाली मैगजीन्स ग्रामीण नैतिकता से इतर हों इसका भी सवाल नहीं उठता  !  समवयस्क मित्र और उम्रदराज बंधुबांधव इस तरह की कोई चर्चा करते हों , स्मरण नहीं  !कहने का आशय यह है कि किसी स्त्री देह से परिचय की प्रथम दृष्टया कोई संभावना मौजूद नहीं थी फिर भी वह ख्वाब हम तक पहुंचा भी तो कैसे ?...और वह भी खालिस हकीक़त जैसा ?


टीप : पिछले कई आलेख प्रेम के अलग अलग शेड्स पर लिखते हुए गुज़ारे  !  मित्रों का ख्याल था कि प्रेम और संबंधों की नकारात्मकता वाले संस्मरण , एकरसता का कारण बन जायेंगे ! इसलिए विषयान्तर बतौर अगले कुछ दिनों तक अपने ख्वाब तहरीर करने का इरादा है  !  प्रेम के दूसरे शेड्स आगे फिर कभी !

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है...ये इश्क इश्क है !

शायद 1990 की बहार का मौसम था जबकि वे एक दूसरे के प्रति अनुरक्त हुए होंगे और फिर शादी के पवित्र बंधन में बंधना उनकी मजबूरी बन गया ! फिलहाल उनके दो बच्चे हैं , बड़ी लड़की सुजाता , उम्र यही कोई 24 बरस ! सुजाता का जन्म उनके प्रेम की शुरुवात से दो साल पहले का है इसलिए यह माना जाता है कि उसके वास्तविक पिता मदनमोहन वल्द श्याम शरण है , जबकि छोटा बेटा अनिकेत उनकी शादी के बाद पैदा हुआ सो उन दोनों के प्रेम का प्रतीक माना जाये  ! अनिकेत की उम्र लगभग 18 बरस है और उसे अपनी बड़ी बहन सुजाता से बेहद उन्सियत है ! मुख़्तसर ये कि भाई बहिन के दरम्यान सौतेलेपन की कोई खलिश नहीं ! 

मदनमोहन और ललिता की शादी पारंपरिक रीति रिवाज़ के साथ 1986 में हुई थी और उन दोनों की पुत्री बतौर सुजाता का जन्म 1988 में हुआ ! इसे इत्तेफाक ही कहा जायेगा कि नीलोत्पल , मदनमोहन के गांव का रहने वाला था और मदनमोहन को अपने बड़े भाई जैसा मानता था ! सुजाता के जन्म के समय ही नीलोत्पल के परिजनों ने नीलोत्पल की शादी स्वजातीय परिवार की लावण्या से कर दी , हालांकि अगले दो बरस तक वे दोनों किसी संतान को जन्म नहीं दे सके ! सन 1990 के जनवरी माह में अपनी नौकरी में होने वाले विभागीय प्रशिक्षण के सिलसिले में नीलोत्पल को उस शहर जाना पड़ा जहां मदनमोहन पहले से ही नौकरी कर रहा था ! पुराने संबंधों के चलते नीलोत्पल को मदनमोहन के घर पनाह मिली और बहारों के मौसम के खत्म होने से पहले नीलोत्पल और ललिता में प्रणय संबंधों का सूत्रपात हो गया !

मदनमोहन ने इन संबंधों की आंच महसूस करते ही ललिता को तलाक देने का मन बना लिया और इस बारे में नीलोत्पल और ललिता को भी आगाह कर दिया ! नीलोत्पल की बेवफाई से बौखलाई उसकी वास्तविक पत्नी लावण्या ने स्वजातीय पंचायत के सामने नीलोत्पल की अच्छी खैर खबर ली पर...नीलोत्पल ललिता से अपने संबंधों को लेकर अडिग बना रहा ! स्कूल शिक्षिका होने के नाते लावण्या आर्थिक रूप से आत्म निर्भर थी अतः उसने यह मान लिया कि नीलोत्पल को अपनी जिंदगी से खुरच देना ही बेहतर होगा ! लावण्या के इस फैसले से गोया नीलोत्पल की लाटरी खुल गई और उसने ललिता से विधिवत विवाह कर लिया जिसके उपरान्त अनिकेत का जन्म हुआ ! नीलोत्पल और ललिता के विवाह के समय सुजाता की उम्र इतनी कम थी कि उसे घटना की सहजता और असहजता का भेद ही समझ में नहीं आया ! वैसे भी नीलोत्पल उसके ही घर में रहने की परिस्थितियों के चलते उसका जाना पहचाना चेहरा था और आहिस्ता अहिस्ता उसने नीलोत्पल को अपना पिता स्वीकार कर लिया , जबकि मदनमोहन उसके लिए अंकल की हैसियत से चीन्हे जाने का हक़दार हुआ !  

ललिता से नीलोत्पल की शादी के बाद अनिकेत का जन्म लावण्या और नीलोत्पल के संबंधों के ताबूत में आख़िरी कील साबित हुआ ! नीलोत्पल से विरक्त लावण्या अपने ही स्कूल के प्रधान पाठक संजय त्रिवेदी से दिल लगा बैठी , उसे उम्मीद थी कि संजय एक ना एक दिन उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेगा पर संजय विवाहेत्तर सम्बन्धों से आगे बढ़कर लावण्या को अपनी पत्नी की हैसियत देने तैयार नहीं हुआ ! उसे अपनी पत्नी और बच्चों के आगे अपनी औकात पर पर्दा डाले रहने की मजबूरी और लावण्या का भावनात्मक दैहिक शोषण करने की हबस थी ! लंबे इंतज़ार ... नाउम्मीदी और संबंधों में बुरी तरह मात खाई लावण्या को आखिरकार चित्रकोट के खूबसूरत झरने ने हमेशा हमेशा के लिए अपनी पनाह में ले लिया ! 

इधर नीलोत्पल और ललिता की गृहस्थी की गाड़ी सरपट दौड़े जा रही थी ! उन्हें लावण्या की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ना था सो नहीं पड़ा पर ... एक दिन मदनमोहन का ट्रांसफर भी उसी शहर में हो गया जहां कि वो दोनों अपनी जिंदगी बेधड़क गुज़ार रहे थे ! मदनमोहन अब उनके ही साथ , उनके ही घर में रहता है और उसकी घोषित भतीजी सुजाता , यह समझने लगी है कि मदनमोहन उसका कौन है ? एक छत के नीचे रिश्तों की इस रेलमपेल में किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं ...ये इश्क इश्क...है इश्क  !

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

उसे तो बुद्ध होना था ...


अगस्त 82 के आस पास के ही दिन रहे होंगे तब ! वो हर रोज राह की एक पुलिया के अनकरीब  मिलता ! स्याह सुफैद खिचड़ी दाढ़ी, बढे...बिखरे बेतरतीब बाल, सांवली रंगत जो उसके बेनहायेपन की वज़ह से उसको अश्वेत वर्णी होना साबित करती ! कपड़े पैबंदों के साथ तार तार और एक गहरा कत्थई काला सा कम्बल ! वो राहगीरों को देखता,बोधित करता और उचारता कुछ अर्थहीन से शब्द हवाओं में...हालांकि किसी भी राहगीर पर जिस्मानी तौर पर झपटा नहीं वो कभी भी ! उसे देखकर हमने पहली यह बार जाना कि कुछ शब्द अर्थहीन भी हो सकते हैं और उनके साथ जड़ी हुई कुछ ध्वनियां भी...फिर भले ही उन्हें कोई इंसान अपने कंठ से साधता हो और अपनी जुबान  देता हो  !

लगता कि जैसे अपनी सारी बेमानी ध्वनियों और शब्दों को हवा में बिखेर कर,कह रहा हो कि मैंने जो कहा नहीं...उसे सुनो ! मैंने जो सुना नहीं...उसे कहो ! मैंने जो लिखा नहीं...उसे पढ़ो ! मैंने जो पढ़ा नहीं...उसे लिखो ! पर कुछ ऐसा...ऐसा कुछ भी, कि मैं इन्सान हो जाऊं ! इंसान उसे  पागल कहते ! अरसे तक वह उसी सड़क पर झूमता रहा, अपने उस वजूद के साथ, जिसे उसपर चस्पा करके लोग उसे चीन्हते रहे, जबकि पहले के किसी एक दिन वह ऐसा नहीं भी रहा होगा ! तब शायद उसकी परसोना, उसे अब हिकारत से देखने वालों जैसी ही रही होगी !

अक्सर ये ख्याल आता कि दो मजबूत पैरों पर टिके हुए जिस्म और हाथों की दसों अंगुलियों की जीवित थिरकन के साथ चेहरे की कोटर में चिपकी हुई मशाल सी जलती बुझती आंखों के अलावा उसमें ज़िंदा इंसान होने की वो सारी निशानियां मौजूद थीं जो उसे फिलहाल होशमंद नहीं मानने वाले इंसानों में हुआ करती हैं...तो क्या दैहिक विशिष्टताओं की मौजूदगी और ध्वनियुक्त शब्दाचार की अपनी क्षमताओं के बावजूद वह एक इंसान इसलिए नहीं है कि उसका ध्वन्यात्मक आग्रह अर्थहीन है! यह तो तब भी मुमकिन था जब वह संकेतों की मौन भाषा पे आरूढ़ होकर भी, दूसरे मस्तिष्कों में अर्थयुक्त ढंग से प्रविष्ट होने में असफल रहता ! यानि कि इंसान होने के लिए एक जीवित देह मात्र की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे दूसरे इंसानों तक अर्थपूर्ण ढंग से पहुंचने  का हुनरमंद भी होना होगा ! साबित यह कि शब्द और संकेत...ध्वनियां  और अध्वनियां...यदि बेमानी हुआ करें तो इंसान का इंसान होना ही बेमानी हो जाएगा जैसे कि वो अपनी जीवित देह और अपनी सम्पूर्ण वाक् क्षमता के बावजूद इंसान नहीं माना गया कभी  !  


सुना था कि उसने जीवन और मृत्यु के सभी रहस्यों को जानने की उत्कंठा में अपनी सांसे होम कर दीं, कितने ही गुरुओं और ग्रंथों की शरण नहीं गया वो...! उसे अपने भीतर कुण्डलिनी जागृत करना थी और शायद इसी यत्न में ,वो एक होशमंद इंसान नहीं रहा ! अपनी कोशिश के हिसाब से उसे तो बुद्ध होना था...लेकिन अब वो अपने पूरे वजूद और पूरी अभिव्यक्तियों केआलोक में अर्थहीन शब्दों सा एक अर्थहीन जिस्म होकर रह गया है ! पता नहीं कैसे मैं , ब्लॉग जगत की कुछ चौड़ी कुछ तंग गलियों से गुज़रते हुए किसी एक पुलिया के एन सामने ठिठक जाता हूं और मेरे सामने वही अर्थहीन शब्द गूंजने लगते हैं, फिर मैं इस निष्कर्ष पर जा अटकता हूं कि इसे तो बुद्ध होना था ...

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

चोरी कहीं खुले ना नसीम-ए-बहार की !


कल शाम तकरीबन सात  बजे  , बेटे का बुलावा , पापा...आपके स्टुडेंट्स आये हैं  !  उन्हें बैठा दो अभी आता  हूं  , सोचा इंटरनेट बंद करने की जरुरत नहीं है...ये गया और वो आया  !   वे  दो  लडकियां  उम्र  कोई  २०-२२ साल  के आस पास , उनमें से एक जिसे मैं पहचान सका , मोहल्ले  के  विद्युत  कार्यालय  से  रिटायर्ड  बड़े  बाबू  की  बेटी  थी  पर दूसरी को पहचानना मुमकिन नहीं लगा  !  उसे सवालिया निगाहों से देखता हूं  !   सांवली , दुबली  पतली , दरम्याने कद वाली उस लड़की  को समझते देर नहीं लगती कि मैं उसका परिचय जानना चाहता हूं  ! वो कहती है ...আমার  মা  আপনার  ছাত্রী  ছিলো   ! ओह ... তোমার  মায়ের নাম কী  ?  ... রীনা মন্ডল  !  मैं हंसता हूं ...इससे पहले तुम्हें देखा नहीं कभी !  अच्छा कहो , कैसे आना हुआ  !  सुनते ही , वो अपने हाथ आगे बढ़ाती  है  , जिनमें पिछले  सालाना इम्तहानात की दो फोटोस्टेट कापियां थीं , ज़ाहिर है कि  इन्हें उसने सूचना के अधिकार के तहत विश्वविद्यालय से हासिल किया  होगा  ! 

उसने कहा मैंने एम .ए. फाइनल का इम्तहान दिया था  !  दूसरे और तीसरे पेपर में कम नंबर मिलने की वज़ह से पुनर्मूल्यांकन करवाया  लेकिन  इसके बाद तीसरे पेपर में मेरे नंबर और भी कम हो गये हैं  ! कापियों को  एक बार आप देख लीजिए ! अगर आप कहेंगे तो फिर से जांच की अपील करूंगी  !  मैंने कहा , देखो ...मैडम के पास चली जाओ  वहां मेरा नाम लेना वो तुम्हारी कापियों का वाजिब मूल्यांकन कर देंगी  ! उसने कहा मां  ने कहा है , जो भी कहेंगे बस आप ही कहेंगे ! उसकी ज़िद को देखते हुए मैंने कापियां देखना शुरू किया और ...पूछा , तुम्हें लगता है कि तुमने सारे सवालों के जबाब एकदम सही दिए थे ,उसने सहमति में सिर हिलाया  !  मैंने फिर से पूछा कौन कौन सी किताबें पढीं थीं ...तुमने इम्तहान देने से पहले  , उसने कहा ट्वेंटी क्वेश्चन सीरीज से  तैय्यारी की ... अब सिर पीटने की बारी मेरी थी ! 

सवाल बेहद आसान थे पर लड़की उतनी ही संभ्रमित  !  हिंदू विवाह को संस्कार साबित करने के लिए उसके पास कोई तर्क ही नहीं थे और ना ही कोई कंटेंट ,  बस एक दो पैरा फिजूल से शब्द जाल में लपेटे हुए  !  उसे यह तक पता नहीं था कि जाति क्या होती है ? और यह भी कि यह खालिस हिन्दुस्तानी अवधारणा है  ! कापी में जबाब दर्ज करते हुए उसने बड़ी ही मासूमियत से लिखा ... जाति भाषा के आधार पर बांटी जाती है ...उड़िया , तमिल  , तेलगु , गुजराती वगैरह वगैरह  और  हद तो  यह हुई  जब उसने कहा कि वर्ग से हमारा मतलब है ...ब्राह्मण , क्षत्रिय ,वैश्य , शूद्र !  यहां तक कि उसे वर्ण और वर्ग में फ़र्क ही महसूस नहीं हुआ !  कापी में उसके लिखे को तूल देने का कोई कारण ही नहीं था सो मैंने उससे दो चार छोटे मोटे सवाल किये और कहा अब तुम ही कहो , क्या  फिर से जांच की अपील करना सही होगा , उसने कहा नहीं मुझसे ही गलती हुई है  ! 

वो चली गई पर मैं सोचता हूं कि उसमें खुद के अधपके ज्ञान पर अति आत्मविश्वास क्यों था  ? अव्वल तो उसे यह फ़िक्र भी नहीं थी कि मास्टर्स डिग्री की तैयारी ट्वेंटी क्वेश्चन सीरीज से करने पर हासिल क्या होगा ? वो नौजवान लड़की शार्टकट से ज्यादा नंबर पाने की ख्वाहिश मंद थी  सो पाये  हुए नम्बरों का बीस फीसदी पुनर्मूल्यांकन के नाम पे गवां बैठी ...उस पर  हौसला ये कि एक बार और जांच की अपील करने  का ख्याल  !  मास्टर्स डिग्री के इम्तहानात के लिहाज़ से उसने जो पढ़ा वो  कतई अपर्याप्त था ...और जो लिखा वो भी गलत था  !  इस उम्र में , सही और गलत समझने का विवेक विकसित हो जाये  , उसमें ऐसी कोई ललक भी ना थी...वो एक बर्बाद शुद पीढ़ी के प्रतिनिधि सी , मुझे नाउम्मीद कर गई  ! उसे समझना चाहिए था कि उसके पैरों पर अंततः उसे ही खड़े होना है  !  शार्ट कट  बैसाखी तो हो सकते हैं पर वे जीवन संघर्ष का माद्दा / हौसला पैदा नहीं कर सकते...बुद्धि  को  तराश नहीं सकते ... विवेक को जागृत भी नहीं कर सकते  !  एक बोध , एक समझ , जिसकी ज़रूरत  तमाम ज़िन्दगी पड़ती ही रहेगी  !  उसे नसीम-ए-बहार होना चाहिए ...होना ही होगा  !  वो महज़ एक नौउम्र लड़की नहीं ,आखिर को उसे नस्लों की विरासत का मुहाफिज़  भी  होना  है   !


* আমার  মা  আপনার  ছাত্রী  ছিলো  =  मेरी मां आपकी छात्रा थीं  !
* তোমার  মায়ের নাম কী  ?  =  तुम्हारी मां का नाम क्या है  !
* রীনা মন্ডল  =  रीना मन्डल !


बुधवार, 9 नवंबर 2011

नक्श-ए-ख्याल दिल से मिटाया नहीं हनोज़ !


लकड़ी की तख्ती ,सरकंडे की कलम और बतौर रोशनाई खड़िया मिट्टी के साथ स्कूल की अपनी पहली जमात का पहला दिन और उसी दिन अपनी पहली पिटाई इस ज़िद के वास्ते  कि अ आ इ ई  के बजाये वही लिखूंगा जो तीसरी जमात में पढ़ने वाला बड़ा भाई  लिखता है ! उसने कहा...अभी हमें अ आ इ ई ही लिखना चाहिए ,बड़े भाई की जमात में पहुँच कर वैसा ही लिखेंगे जैसा तुम चाहते हो ! उसकी झक सफेद फ्राक और खुद परी सी वो ...पूरे  तीन साल  सिर्फ उसका कहा मानता रहा ! चौथे बरस मैं जहां चौथी क्लास में दाखिल हुआ वहीं उसने एक बरस का जंप ले पांचवीं की राह ली ! सूनी टाट पट्टी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त...सो स्कूल अपना  भी  बदल डाला ! बस्ती में कभी कभार मिलते...बात भी क्या होती ? अगले दो बरस ले देके गुज़रे कि उसके वालिद ट्रांसफर पे चल दिए ... रही सही कसर  पूरी हुई ! इधर नया स्कूल, नए दोस्त, नया शौक़ जो हॉकी स्टिक हाथ में...पर ज़ेहन में उसकी खैरियत जानने का हमेशा से नामुकम्मल रह जाने वाला झक सफ़ेद परी जमाल ख्याल...गोया उसकी उम्र ठहर गई होगी !  

वक़्त ...जिसे ठहरना ही कहां था...ग्रेजुएशन के नाम पर हम भी कस्बे से बाहर धकेल दिए गये ! कस्बे से अपनी गैरहाज़िरी के किसी एक दिन सुना  कि उसकी शादी कर दी गई है, खबर सुनके अफ़सोस कितना हुआ ये कहना तो मुश्किल है पर अपना पहला रिएक्शन ये कि शादी...! बड़े  भाई ने कहा वो घर आई थी और पूछ रही थी...कैसा है वो ? उससे मिलना था ? उसे देखना था एक बार ? अब ठीक से पढ़ता है ना ? ... तुम यहां थे ही नहीं इसलिए चली गई ! अब हाल ये कि पिछले चालीस साल से ज़्यादा गुज़र गये जो उसे देखा तक नहीं...अब कहीं मिल भी जाये तो  श्वेत वसना, उस नन्ही सी जान को पहचानूंगा भी कैसे ? ... तब भैया से मैंने पूछा था क्या उसने सफेद कपड़े पहने  हुए थे ? जिस पर उन्होंने कहा, हां ...

परसों रात फोन पर भाई से पूछ रहा था ! सुशील और तापोश की कोई खबर है, उनसे  मिले हुए बरसों हो गये और हिफज़ुर्रहमान साहब भी...स्कूल के दिनों में हॉकी का खुमार उतरने और क्रिकेट का बुखार चढ़ने की संक्रमण बेला में, हम साथ साथ खेला करते उम्र में हिफज़ुर्रहमान साहब बड़े थे और अपोजीशन के खिलाड़ी हुआ करते जबकि बाकी दोनों दोस्त उम्र में मुझसे छोटे थे और टीम मेट भी...तकरीबन बीस साल गुज़रे होंगे जब इन तीनों से आख़िरी मुलाकात हुई थी ! भैया ने कहा सुशील कैंसर और तापोश ब्रेन हैमरेज की वज़ह से खुदा को प्यारे हुए और हिफज़ुर्रहमान नशे की गोलियों के शिकार इस तरह से हुए कि छत से...अब तो वो ग्राउंड भी वैसा नहीं रहा जहां तुम लोग खेला करते थे ! आह...उन सबसे कितनी ही बातें करने बाकी थीं ! हे ईश्वर क्या भैया से फोन पर हुई बात  फिर से अनहुई हो सकती है ? एक दु:स्वप्न मात्र...

मैं जानता हूं कि दुनिया अब पहले जैसी  नहीं रही, वो कस्बा, वो दोस्त और वो  दिन  ठहर भी नहीं सकते थे किसी एक मुकाम पर ! उन्हें बदलना ही था मेरी मर्ज़ी का ख्याल किये बगैर ! कोई खास  लम्हा, कोई एक पल,  कहीं भी मुझसे पूछ कर गुजरने वाला नहीं था, ज़िन्दगी और हालात जस के तस बने रह जायें ये मेरा ख्वाब तो हो सकता है पर हकीकत नहीं...मुझे पूरा यकीन है कि मेरे चाहने भर से कुछ भी अनहुआ नहीं हो सकता...पर मैं अब भी...इस यकीन से नज़रें चुराकर कुछ क्षण जीना चाहता हूं उस भ्रम में...उस अनहुएपन के अहसास के साथ जो कभी भी अनहुआ नहीं रह सकता...



मंगलवार, 8 नवंबर 2011

कहां आके रुकने थे रास्ते ...


लगता ही नहीं कि सर्दियाँ शुरू भी हुई हैं , तवील अरसे से नाचीज़ के दुश्मनों की तबियत नासाज थी, कोई दो चार दिन कब्ल से हालात  बेहतर जान के भाई बन्दों के ब्लाग्स पर टिप्पणियों की शक्ल में हाज़िरी दर्ज करानी शुरू ही की है, इधर धूप,खिड़की के कांच पर बेहद सख्त हुई जा रही है, कम्प्यूटर के सामने बैठते ही परदेदारी की नौबत, वज़ह साफ़ कि खुदा की दी हुई आँखों तक मामला महदूद होता तो शायद सर्दियाँ कुछ बेहतर जान पड़तीं पर उधर धूप का जलवा और  इधर खिड़कियों  के कांच  के एन बाद  कम्प्यूटर  स्क्रीन और फिर अपनी नई आँखों बतौर एक और कांच ! तपिश के अहसास के लिए एकदम माकूल माहौल लिहाजा  खिड़की को पर्दा  डाले बगैर अपने  ख्यालात को बेपर्दा करना मुमकिन नहीं होगा !

अभी परसों ही केश कर्तनालय से लौटा तो नई आँखें धो पोंछ कर सहेज दीं  कि गुसलखाने से लौट कर फिर चढ़ा लेंगे, इधर अपना मोबाइल लगातार बजे जा रहा था  कोई अनजान नम्बर जानके उठाया नहीं कि एस एम एस अलर्ट ...बिटिया से कहता हूं पढके बताओ क्या लिखा है ...उसने कहा सतीश सक्सेना अंकल बात करना चाहेंगे ! ये पहला मौक़ा जो उनसे बात होनी है, खुश खुश उनका नंबर डायल करता हूं! बातचीत अपनेपन की हरारत लिए , अहसास  ये कि हम एक  मुद्दत से दोस्त हैं ! 

इन दिनों ब्लाग जगत में आहार पे वाचिक हिंसा सिक्त, घृणा आपूरित, विद्वेष जन्य,पूर्वाग्रहयुक्त, उपदेशात्मक और दूसरों के गिरेहबान में बलात झाँकू प्रविष्टियों की भरमार है ! इस मसले पर अपने ख्याल पहले भी नेक रहे हैं और आज  भी उछल कूद मचाने  का कोई औचित्य नहीं लगता, पिछले बरस एक जैन  युवा  ने कर्ज ना चुका पाने के चलते अपने एक मित्र को पहले तो अगवा किया और फिर जंगल में ले जाकर अपनी चौपहिया वाहन से कुचल कर मार डाला ! इसके एक माह के अंतराल में ही प्रापर्टी डीलिंग में लगे  ब्रोकर बन्दों ने अपने ही  सहव्यवसायी  का सर पत्थरों से  कुचल डाला !  एक काम्प्लेक्स में दुकाने चलाने वाले मित्रों ने नौकर से चोरी की रकम क़ुबूल करवाने के चक्कर में इतनी मारपीट की और उसके जिस्म पर इस कदर जलती हुई सिगरेट्स दागीं  कि बेचारा अकाल ब्रह्म लीन हुआ ! मेरे लिए बहुत मुश्किल है कि इन सारी घटनाओं की पृष्ठभूमि में निहित हिंसा के लिए संबंधितों के आहार को दोषी ठहरा दूं  !

अरविन्द जी मित्र तो हैं ही पर प्राणिकी , दैहिकी , प्रेम और सौंदर्य विशेषज्ञ भी हैं  ! उन्हें छेड़ता  हूं ...पंडित जी  प्रेम तरल होता है कि ठोस  ? ...और दैहिक प्रेम के समय , प्रति संसर्ग कितने शुक्राणुओं की अकाल मृत्यु हो जाती है  ? मनुष्य जीवन में कितनी बार संसर्ग करता है ! उसके पिता बनने की संभावनाओं की संख्या के साथ कुल कितने संभावित पुत्र पुत्रियों / शुक्राणुओं को अपने प्राण गवाना पड़ते हैं ? क्या यह संभव है कि एक संसर्ग में एक ही सामर्थ्यशील  शुक्राणु बाहर आये और शेष लाखों  शुक्राणु प्रेमनिहित /  प्रेमजन्य हिंसा का शिकार ना होने पायें ? अरविन्द जी मेरे सवालों पे बड़ी ही सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहते हैं कि प्रेम तो तरल ही होना चाहिए किन्तु समागम में मृत होने वाले शुक्राणुओं  की निश्चित संख्या बता पाना कठिन है  ! आप इन आंकड़ों को लाखों में ही मानिए  !  दैहिक प्रेम की परिणति बतौर हुई लाखों शुक्राणुओं ( जन्म से वंचित संततियों ) की मृत्यु के लिए वे संसर्ग लीन जोड़े को उत्तरदाई नहीं मानते  ! उनका ख्याल ये  है  कि प्रेम जन्य  हिंसा प्रकृति अनुमोदित है  जो सृजन और विध्वंस को साथ लेकर चलती है ! किसी एक सामर्थ्य शील शुक्राणु मात्र के निष्क्रमण और शेष लाखों शुक्राणुओं के जीवित रह  जाने के मसले को वे मात्र संकल्पनाओं के स्तर  तक ही सीमित मानते है ! मैं फिर से दोहराता हूं...प्रेमी युगल के अपकृत्य के लिए बेचारी प्रकृति पर दोषारोपण किया जाना क्या कहां तक उचित है,कितना तर्क संगत है ! वे ठठाकर हँसते हैं !  

मैं जानता हूं कि अगर पूर्वाग्रह ना हों तो कई प्रश्न  बिना उत्तरों के ही शोभा देते हैं  !  सो प्रश्न मेरे , अपने शौक , अपनी पसंद और निज रूचि के आहार का भी है  !  दुनिया की सात अरब आबादी को अपनी पसंद के साथ जीने का उतना ही अधिकार है जितना कि मुझे   !  शुक्राणुओं की मृत्यु  के तर्क  का इस्तेमाल , अपनी मनमर्जी दूसरों पर आरोपित करने के लिए  करना, मुझे जायज़ नहीं लगता  ! मेरे लिए यह बहस भी कोई मायने नहीं रखती कि कोई मुझसे जाने कि उसे क्या करना है और फिर हूबहू वैसा ही , जैसा मैं करूँ ,जो मैं चाहूं ,जैसा मैं कहूं  , निश्चय ही कोई अंत नहीं , मेरी जिद , मेरे पूर्वाग्रहों का , अगर मैं ना चाहूँ तो...और  इन हालात में इंसानी रिश्तों की कांच पर चटख...चुभती हुई धूप का फिर कोई हल भी नहीं ...