स्टडी रूम जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ते हुए कुछ ऐसा लगा कि सांसे तेज हो रही है ! उधर घर के बाहर वाले प्लाट पे उभर आये नये मकान की छत की ढ़लाई शिद्दत से ज़ारी है जोकि देर रात तक मुकम्मल भी हो जायेगी ! सुबह से 60-70 आदिवासी लडकियां और कुछ नौजवान रेत, सीमेंट और गिट्टियों के मिश्रण को घर की शक्ल में तब्दील कर रहे हैं!अनथक, लगातार, ऐन वैसे ही जैसे कि सालों पहले से करते आये हैं ! बदरंग खस्ताहाल कपड़े, दुबली पतली काया और हाड़ तोड़ मेहनत ! जल जंगल और जमीन के असली वारिस आज देर से घर, लौटेंगे सौ / पचास के नोटों की चिल्लर लेकर, अपनी नींद भरी आंखों और दिल में अगली सुबह फिर से खटने के लिए वापस लौटने की जिजीविषा लिए हुए ! इधर अपनी सांसे फूल रही हैं
सीढ़ियां चढ़ते हुए !
तब शायद 1984 के साल की सर्दियों के आख़िरी दिन रहे होंगे, पड़ोसी मित्र आदिवासी कल्याण विभाग में सहायक नियोजन अधिकारी थे ! उन्होंने कहा अगर एक दिन का समय निकाल सकें तो मेरे साथ चलें ! हम इन्द्रावती नदी घाटी का सर्वे करेंगे जहां बांध बनने से गांव / देव स्थान और बेशकीमती जंगल डूबने की संभावना है ! हमने कहा ठीक है, कब चलना है ? उन्होंने कहा कल शाम को, रात वहीं गुजारेंगे परसों दिन भर पैदल मार्च और शाम तक घर वापसी हो जायेगी ! हमने कहा, हम परसों की छुट्टी ले लेंगे, लेकिन कल शाम आकाशवाणी में चिंतन रिकार्ड करने के बाद ही चल सकेंगे आपके साथ ! उन्होंने कहा, हम आपको वहीं से साथ ले लेंगे ! तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक हमने शाम की रिकार्डिंग से पहले कैनवास शूज पहने और लूज कपड़े धारण किये, ताकि पैदल मार्च में तकलीफ ना हो ! ठीक 3.30 पर मित्र की गाड़ी आकाशवाणी के गेट पर थी और हम लोग गंतव्य की ओर प्रस्थान कर चुके थे ! ड्राइवर के अलावा, गाड़ी में एक फोटोग्राफर, हम और हमारे मित्र ! हमने पूछा, तैयारी पूरी है ? उन्होंने कहा हां !
जगदलपुर से बारसुर तक पहुंचने में शाम गहरा गई थी, गाड़ी का ड्राइवर हमें नदी के किनारे एक गांव* के पास छोड़ कर वापस हो लिया ! चार लकड़ियों के सहारे खड़ी पैरे की छत वाली एक झोपड़ी ! जिसमें कोई दीवाल नहीं थी ! लगभग 50-60 फीट की दूरी पर बहती हुई नदी और उसपर सर्दियों का आख़िरी महीना ! दोस्त से पूछा कम्बल / चादर वगैरह लाये हैं ? उसने कहा नहीं ! गाड़ी वापस जा चुकी थी और पलटकर भागने की कोई गुंजायश भी शेष नहीं रह गई थी ! अठपहरिया** आते आते काफी देर हो गई, उसने तीन खाटों और उनके बीच एक अलाव की व्यवस्था कर दी थी जिसके सहारे सर्द रात काटनी थी ! ओढ़ने बिछाने का कोई सामान हमारे अधिकारी मित्र लेकर नहीं आये थे, इसलिए खाटों पर भी पैरा डलवा लिया गया ! रात चांदनी थी इसलिए मित्र से ये पूछने की हिमाकत नहीं की, कि टार्च लाये हो कि नहीं ? अठपहरिया ने रात के भोजन की व्यवस्था कर दी थी, पत्तों की प्लेट और पत्तों की कटोरियां, उबला हुआ मोटा चावल और उबली हुई साबुत मूंग के साथ हरी मिर्च और थोड़ा सा नमक ! पीने के लिए नदी का पानी था ही !
पैरे में दुबके हुए जैसे तैसे रात गुज़ारने के बाद सुबह 5 बजे नदी के ठंडे पानी के साथ निवृत्ति ने होश फाख्ता कर दिये, हिम्मत करके फ्रेश हुए...बहरहाल नींद हवा हो गई ! सुबह 5.30 के आसपास हम लोग पैदल मार्च के लिए तैयार थे, अगले गांव तक का रास्ता अठपहरिया को दिखाना था ! पता चला कि उसके बाद हर गांव से एक आदमी हमें अगले गांव तक खो करने के लिए तैयार किया गया था ! सूरज निकलते निकलते हमें पता चल चुका था कि हमारा मित्र और फोटोग्राफर बंधु ऊंची एड़ी के जूते पहने हुए थे और उन्हें पगडंडियों में चलने में भारी दिक्कत होने वाली थी !...खैर मित्र ने सरकारी निर्देशों के अनुसार सारी लोकेशंस के फोटोग्राफ्स लेते चलने की बात की, तो हम और भी ज्यादा सतर्क हो गये ! सुबह के 9 बजते बजते हमें यह जानकारी भी हो गई कि हमारे अधिकारी मित्र का थैला बिल्कुल खाली है ! कोई फल / सूखे नाश्ते की व्यवस्था करके यात्रा पर चलने की उन्हें सूझी ही ना थी ! उन्होंने हमें आकाशवाणी से उठाया था, हमने पूछा भी था कि तैयारी है ? जिस पर उन्होंने कहा था, कि हां ! अब ईश्वर जाने कौन सी तैयारी की थी उन्होंने !
फोटोग्राफर बंधु और अधिकारी मित्र जल्दी ही समझ गये के उनके जूते उनकी इज्जत उतार लेंगे ! यात्रा के बीच में किसी गांव में रुकने की कोई गुंजायश ना थी क्योंकि हमें तकरीबन 30 किलोमीटर दूर तक नदी के किनारे चलते रहने के बाद घाटी से ऊपर जंगल के बाहर पहुंचना था ! यात्रा के आख़िरी 5 किलोमीटर में हमारे पास कोई गाइड / ग्रामीण नहीं रहने वाला था इसलिए शाम ढ़लने से पहले 30 किलोमीटर पैदल चल चुकना अंतिम और एकमात्र विकल्प था ! दोपहर होते होते भूख और प्यास से बुरा हाल था ! खाने को कुछ था नहीं पर पीने के लिए नदी में पानी ही पानी, जितना चाहो पियो ! पगडंडियों पर अपने दुखते पैरों और तकलीफ देते हुए जूतों के बावजूद फोटोग्राफर बंधु अपने काम में कोताही नहीं कर रहे थे ! बांध बनने से डूब में आने वाले गांव, देव स्थान, सागौन के बेशकीमती जंगल, कैमरे में रिकार्डिंग, बराबर चालू थी पर हमारे खुद के चलने की गति, घोषित लक्ष्य से बहुत कम थी !
हमारा ख्याल था कि हमें कुल दूरी तय करने में 6 घंटे लगना चाहिये थे और फोटोग्राफी वगैरह में अगर 5 घंटे और भी लग जाते, तो भी हम 4.30 बजे शाम तक गंतव्य तक पहुंच जाते ! इस हिसाब से दिन डूबने तक हमारे पास कम से कम 1.30 घंटे का मर्जिन बचता ही था ! दिन तमाम भूख से बिलबिलाते हुए शाम तकरीबन 5 बजे हम बिन्ता गांव*** पहुंचे ! यहीं से हमें घाट के ऊपर चढ़ना था ! बिन्ता में अपने छात्रों को देखकर हम हैरान थे ! वे हमें रोकना चाहते थे ! हमने कहा फिर कभी, अभी घाटी के ऊपर ड्राइवर चिंता कर रहा होगा ! बच्चों के घर में 15-20 मिनट में पोहे और पानी का तात्कालिक घरेलू सत्कार स्वीकार कर हम घाट चढ़ने के लिए उतावले हो चुके थे ! घाट की खड़ी चढ़ाई मित्र और फोटोग्राफर बंधु पर इतनी भारी पड़ी कि वे ऊपर जाकर जमीन पर गिर पड़े और कहने लगे बस, अब यहां से आगे नहीं जा सकते ! गाड़ी की लोकेशन लगभग एक किलोमीटर दूर की थी, हौसला बढ़ाने पर वे गिरते पड़ते आगे बढ़े ! हम अपने तीस किलोमीटर का कोटा पूरा कर चुके थे पर गाड़ी का दूर दूर तक नामोनिशान नहीं था, तसल्ली ये कि जंगल का टुकड़ा पीछे छूट गया था ! अगले 5 किलोमीटर मुश्किल से गुज़रे ! तभी गाड़ी आते दिखाई दी ! देखते ही देखते वे दोनों गाड़ी में पसर चुके थे और हम वापस जगदलपुर की ओर...रात 8 बजे गर्म पानी से नहा चुकने के बाद बाकी के दोस्तों के सामने अधिकारी मित्र की तारीफ़ के पुल बांधते हुए हमने घोषित कर दिया था कि अब किसी भी अधिकारी के साथ फील्ड वर्क ? कभी नहीं ?
रश्मि जी की फोन काल, हमें अतीत से वापस वर्तमान में ले आई है ! सामने वाले घर की छत की ढ़लाई अभी भी पूरी नहीं हुई है, जल,जमीन, जंगल के असली वारिस, जो अब मजदूर हैं, ग्यारह बजे से पहले घर वापस नहीं लौट पायेंगे ! वे सन 1984 में भी मजदूर थे, उससे पहले भी और आज भी हैं, उनकी विरासत पे फैसले लेने का हक़, पहले दिल्ली फिर भोपाल को था और अब रायपुर के पास है... हम जहां रहते हैं, वो धरती रत्नगर्भा है पर उसी धरती की इंसानी बसाहटें निराश्रित...निर्धन, बेसहारा जैसी ! बेहतर मुस्तकबिल और सच्चे मेहरबानों की उम्मीद में...पीढ़ी दर पीढ़ी, देह दर देह खटती हुई...एक मुकम्मिल आबादी के लिए ...दो बोल सूझते हैं ...
किसी मेहरबां की नज़र ढूंढते हैं !
दुआओं का अपनी असर ढूंढते हैं !!
*नक़्शे में 2 नम्बर स्थान देखें !
**अठपहरिया गांव के महमानों की आठों प्रहर सेवा करने वाला व्यक्ति है ,उसके जीवन यापन की व्यवस्था गांव के लोग मिलकर करते हैं !
***नक़्शे में 3 नम्बर स्थान देखें यहां से घाटी चढ़कर पैदल चले और फिर 4 नम्बर स्थान से गाड़ी लेकर 1 नम्बर चित्रकूट होते हुए हम जगदलपुर वापस लौटे !
नक़्शे को तैयार करने के लिए छत्तीसगढ़ के नामचीन ब्लागर संजीव तिवारी जी का हार्दिक धन्यवाद !
गीत की धुन जेहन में थी पर उसे बोल दिये रश्मि रविजा साहिबा और जी.जी.शेख साहब ने , उन दोनों के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं !
तीरों से सहेजा गया हिस्सा पैदल मार्च का है , जबकि शेष यात्रा गाड़ी से की गई !