मुद्दतों पहले समुद्र की खूबसूरत बेटी पानिया,
मूँगे के बागीचे के इर्द गिर्द,
इतराती फिरती, उसका घर पानी की निचली सतह पर मौजूद दुनिया की बसाहटों में से एक था । वो लहरों के साथ खेलती और कभी कभार साँझ को समुद्र
से बाहर की धरती के उस तट पर आ धमकती जहां लहरें , धरती की चट्टानों से टकरा कर बिखर जाया करती थीं । यह माओरी
धरती का ते वांगानुई-ए-ओरोतु नामित बाहरी तट था । बेशक सूरज का ढ़लना,
इंसानों के गानों के आलाप, हंसी और आर्तनाद, इश्क और ना जाने कितने ही किस्म की बातों को सुनने का मोह पानिया
को उस तट पर खींच लाया करता । वो तट पर टिम टिम करती रौशनियों,
जलते अलावों और इंसानों के दिलों की गर्माहट के रहस्य जानने के
लिए आतुर रहा करती । ऐसे ही एक गहराती शाम को उसने दर्द से भरे गीत को सुना,
यह कारितोकी था जो न्गाती काहुन्गुनु कबीले के सरदार का दयावान
पुत्र था और उस शाम अलाव की रौशनी में विरह का गीत गा रहा था । खूबसूरत कारितोकी को
लगा कि उसे कोई देख रहा है , ये पानिया थी । उस शाम के रात की शक्ल में गहराते ही चाँदनी
खिल उठी थी । एक दूसरे से नजरें मिलते ही कारितोकी और पानिया की दुनिया गोया ठहर गई
थी । अब तक पानिया तट की रेत पर आ चुकी थी । कारितोकी ने उससे पूछा कौन हो तुम ?
पानिया ने कहा मैं समुद्र के अंदर की दुनिया में रहती हूं यहीं
तुम्हारी बस्ती के पास में । वो दोनों रात भर बातें करते रहे ,
सुबह से पहले पानिया अपनी दुनिया में वापस लौट गई ।
उनमे उन्सियत जाग चुकी थी सो तय ये हुआ कि रात में पानिया,
कारितोकी के पास रहा
करेगी और भोर होते ही अपनी दुनिया में लौट जाया करेगी । दोनो के प्रेम में बस यही एक
शर्त थी । यह एक अलिखित अनुबंध सा रिश्ता था जिसमें प्रेमी और प्रेमिका रात एक दूसरे
के साथ गुजारते और दिन अपनी अपनी दुनिया में । पानिया अपनी खूबसूरती और अच्छे व्यवहार
के कारण से कारितोकी के परिजनों में काफी लोकप्रिय हो गई थी । उसने उन
लोगों को सिखाया कि वे समुद्र का सम्मान करें और उससे केवल अपनी जरूरत लायक सामान ही
लिया करने लिया करें, सो उन्हें हरेक ज्वार भाटे को धन्यवाद देना चाहिए । वक्त गुजरता
गया और कारितोकी का मन विचलित होने लगा कि कहीं समुद्र उससे पानिया को छीन ना ले ।
वो पानिया को बर-हमेश अपने पास देखना चाहता था । वो सलाह के लिए कबीले के पुरोहित तोहुंगा
के पास गया । तोहुंगा ने उसे समझाया कि समुद्र और जमीन के बीच संबंधों का संतुलन बिगाड़ना
उचित नहीं है । पानिया को समुद्र से छीन कर सिर्फ अपने पास रखने की जिद उचित नहीं है,
लेकिन कारितोकी समझदारी से काम लेने के बजाए ,
पानिया को उसके समुद्री रहवास से बेदखल कर दिन-ओ-रात,
अपनी धरती में बसाने के लिए आतुर हो चला था । एक रात उसने पानिया
के खाने में ऐसी जड़ी बूटियाँ मिला दीं , जिससे इंसान बेसुध हो जाता है । यह सरासर धोखा था जो कारितोकी
ने पानिया के साथ किया । वो पानिया को दिन में भी अपने साथ रखना चाहता था । पानिया
उसके छल से अनजान थी और उसने सहज ही खाना खा लिया ।
वो बेसुध होकर सो गई लेकिन सूरज की पहली किरण ने जैसे ही समुद्र को छुआ पानिया का दिल धड़क उठा, यह समुद्र की पुकार थी । उसे वापस जाना था पर हिम्मत डोल रही थी, उसने मुड़कर प्रेमी की ओर देखा । उसकी आँखें आंसुओं से भर आईं थी, उसने आहिस्ता से बुदबुदाया तुमने मेरे साथ धोखा किया है । मुझे जाना ही होगा समुद्र मेरा घर है वो मेरी रग रग में बसता है । उससे दूर रहना मेरी मृत्यु है । उसने एक झटके से प्रेमी की बांहों के बंधन से मुक्ति ली और समुद्र की ओर भागी । कारितोकी उसका नाम पुकारते हुए उसके पीछे पीछे भागा लेकिन पानिया ने मुड़कर भी नहीं देखा । उसने लहरों में छलांग लगा दी और समुद्र ने उसे घर जाने का रास्ता दे दिया । उसके बाद वो कभी लौट कर धरती पर नहीं आई।कारितोकी कई दिनों तक उसका इंतजार करता रहा, उसे पुकारता रहा पर पानिया उससे दूर जा चुकी थी । एक सुबह उथले पानी में सूरज की किरणों से चमकती हुई मूँगे की परत नजर आई , ऐसा लगा गोया पानिया की बाँहें और बाल पानी में बह रहे हों लाल और सुनहरी रंगत में डूबे हुए । कहते हैं कि वह पानिया ही थी, जिसे देवताओं ने मूंगे की चट्टान में बदल दिया था । उस दिन के बाद से, वो चट्टान तट की रक्षक बन गई, जो लहरों को शांत करती और मछलियों को पनाह देती है । दु:खी कारितोकी आज भी उसका नाम फुसफुसाता है और मानता है कि वो लहरों की लय में जीवित है।जब जब चट्टान से टकरा कर लहरें टूटती हैं लोग यह मानते है कि यह पानिया का गीत है । वो मानते हैं कि प्यार कितनी भी कठिनाइयों से गुजरे, कभी खत्म नहीं होता ।
यह आख्यान माओरी आदिवासियों के मध्य बेहद लोकप्रिय है । धरती
और समुद्र के संधि स्थल पर केंद्रित इस आख्यान से भूमिज और जलीय जीवों के मध्य लगभग
आभासीय प्रेम कथा की अनुभूति कराता यह मिथक, प्रेम के अतिरेक से उपजे एक पक्षीय आधिपत्यवाद और उससे जुड़े
छल के परिणाम स्वरूप उस संतुलन के बिगाड़ की कल्पना करता है जो धरती और समुद्र के दरम्यान
है । ये कथा सांकेतिक रूप से कहती है कि धरती के लोगों को समुद्र का कृतज्ञ होना चाहिए
विशेषकर ज्वार भाटे का । कथनाशय स्पष्ट यह कि धरती के लोगों को समुद्र से मछलियाँ और
खाने योग्य अन्य जीव जन्तु तथा विविध जलीय वनस्पतियां प्राप्त होती हैं यानि कि धरती
के मनुष्यों की निर्भरता समुद्र पर है । इतना
ही नहीं उनके खाने का मूल आधार नमक भी उनके लिए समुद्र का उपहार माना जा सकता है ।
बहरहाल समुद्र तट पर अलाव जलाकर बैठे लोग, दुख दर्द और खुशियां बांटते लोग,
गाते और कथाएं कहते लोग, कल्पना ये कि समुद्र की तलहटी में बसी हुई बस्तियों की एक सुकन्या,
इन लोगों की जीवन अनुभूतियों के प्रति आकृष्ट है । वो समुद्र
तट के इर्द गिर्द भटकते हुए धरती के लोगों के जीवन रहस्यों से परिचित होना चाहती है
। यह कहना कठिन है कि वो दिन भर के थके मांदे लोगों की आभासी नायिका है या जलपरी अथवा
मत्स्य कन्या की तरह की कोई धारणा । बहरहाल नायिका का वास्तविक रूप कोई भी हो,
वो समुद्र और धरती के मध्य आत्मीय तथा सम्मानजनक संबंधों की
कामना करती है ।
मिथक के अनुसार समुद्र उसका अपना घर है अतः वो उसे त्याग भी
नहीं सकती । कह नहीं सकते कि वो मत्स्य कन्या अथवा जलपरी है या फिर किसी समुद्री द्वीप
में अवस्थित नन्ही बस्ती की केवट कन्या, मल्लाहों की सुपुत्री अथवा खुद को जल-क्षत्री मानने वाले समुदाय
की कोई लड़की जो शाम से लेकर रात के भोर हो जाने तक घर से बाहर रह सकती है । लेकिन सूरज
की रौशनी में निजता भंग होने के भय से उसकी घर वापसी जरूरी हो जाती है । वो धरती के
इंसानों के भावनात्मक जीवन से प्रभावित है और हरेक शाम समुद्र तट के इर्द गिर्द चक्कर
लगाते हुए इंसानों को लेकर अपनी जिज्ञासा का शमन करना चाहती है । धरती के तट पर अलाव
की रौशनी वाली साँझ के देर रात चंद्रमा से आलोकित हो जाने वाले कालखंड में वो कथा नायक
के गीत को सुनने का प्रयास करती है । कथा का नायक कबीले के मुखिया का खूबसूरत पुत्र
है और चंद्रमा की रौशनी में नायिका को देख कर हतप्रभ है इतना ही नहीं मिथक कहता है कि वो दोनों एक दूसरे को देख
कर मंत्रमुग्ध हो गए हैं और उन्हें आस पास की सुध बुध तक नहीं है । यह प्रथम दृष्ट्या प्रेम है जो बेखुदी
से उबरने के फौरन बाद, एक दूसरे का परिचय जानने की दिशा में आगे बढ़ जाता है । दो से
एक हो जाने वाले प्रेम ने उन्हें एक साथ रहने पर विवश कर दिया है । दरअसल यह एक अंतहीन
रात थी जो दोनों ने एक साथ गुजारी और भोर की पहली किरण के समुद्र में उतरते ही युवती
अपने पैतृक घर की ओर चल पड़ी । अंततः उनके दरम्यान यही एक शर्त थी कि दिन में अलगाव
अपरिहार्य होगा ।
नायिका से दिन का अलगाव नायक को बर्दाश्त नहीं था वो ज्ञानी
पुरोहित से मार्ग दर्शन माँगता है । पुरोहित उसे समझौते पर कायम रहने की सलाह देता
है किन्तु नायक, प्रेयसी से दिन रात की निकटता के लिए लालायित है वो आशंकित है कि कहीं,
समुद्र किसी रोज उससे, उसकी प्रेमिका को छीन ना ले । अतः वो निर्णय लेता है कि नायिका
को औषधि के प्रभाव से अपने पास रखने का जतन करेगा। उसकी अटूट आसक्ति और बिछोह की किंचित
आशंका,
उसे छल करने को मजबूर कर देती है । वो नायिका को नींद की औषधि, खाने में मिलाकर दे देता है । सुबह की पहली किरण नायिका को,
अपनी बस्ती में लौट जाने का आह्वान करती है पर वो रात की दवा
के असर में है उसका जिस्म शिथिल है , उसे नायक से इस छल की उम्मीद नहीं थी । वो नायक की बांहों का
घेरा और प्रेम के सारे बंधन तोड़कर समुद्र की ओर भागती है । उसकी आंखों में आँसू हैं
और पलट कर नायक को ना देखने जैसे व्यवहार में प्रेम के बिखर जाने का असहनीय दर्द ।
नायक उसे पुकारता हुआ उसके पीछे पीछे भागता है लेकिन नायिका जल्द ही समुद्र के आगोश
में समा जाती है, समुद्र जो उसका बसेरा है । उसका पहला घर । नायक हर दिन,
हरेक साँझ उसकी वापसी की उम्मीद करता है लेकिन वो नायक,
उसके प्रेम और उसकी बस्ती से हमेशा के लिए विदा ले चुकी है ।
बस्तीदार,
इस कथा का अंत जान चुके हैं । एक सुबह समुद्र की उथली सतह पर
मूँगे की नव निर्मित चट्टान उभरती है जैसे कि नायिका की बाँहें और केश पानी में लहरा
रहे हों ।
नायिका जो मछलियों को अपने आँचल में पनाह देती है और समुद्री लहरों के वेग को कम करती है । मूँगे के चट्टान से टकरा कर लहरों का नियमित टूटना जैसे कोई दु:ख भरा गीत और उसके टूटते आलाप की निरन्तरता । नायिका जो मूँगे की चट्टान की शक्ल में आज भी मौजूद है । धरती और समुद्र के संधि स्थल पर...