सोमवार, 26 अप्रैल 2021

सूरज...

आदिम पुरखे कहते हैं कि पहले पहल धरती तो थी पर सूरज नहीं था, उधर ऊंचे आसमान में बादलों का देवता, नगौडेनाउट रहता था, जिसने बादलों के इर्द गिर्द लकड़ी के टुकड़ों का विशाल ढेर इकट्ठा किया हुआ था । किसी एक लम्हे, धरती से एमू के अंडे को आसमान की ओर फेंका गया, जोकि लकड़ी के टुकड़ों से इतनी ज़ोर से टकराया कि वहां अग्नि प्रज्ज्वलित हो गई, जो उस वक्त हल्की ऊष्म और मृदु थी, फिर वो ऐन सुबह की धूप जैसी धरती पर पसर गई । धरती के फूल आश्चर्य से भर गये। उन्होने अपना उनींदा चेहरा, आसमान की ओर उठा लिया, उनकी पंखुड़ियां अपनी पूरी लंबाई में खुल गईं। अंधियारे की ओस, धरती पर गिरी और खो गई । 

नन्हें परिंदे, जोश में दरख्तों पर फुदकने और चहचहाने लगे और परियां, जिन्होने पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमा की थी, अपना काम भूल गई, वो उत्तेजित और हैरान थीं । सो पहाड़ों से पिघलती बर्फ, पानी की नदियों, झरनों की शक्ल में निचले मैदानों की ओर बह चलीं । दूर पहाड़ों के पूर्वी ढलानों से रात की स्याही, सूरज के पुरनूर उजाले में अपनी रंगत खो रही थीं । ऊपर आसमान में कुछेक गुलाबी रंगत बादल, यूं उड़ रहे थे जैसे कि सुर्ख छातियों वाले परिंदे अपने डैने फैला कर धरती पर उतरने की कोशिश कर रहे हों । सूरज की सुनहली किरणों ने पहाड़ों से घाटियों तक चमकीले रहगुज़र से बना डाले थे ।

किसी हल्के गुनगुन नाजुक चुंबन सी तपिश से जिंदगियां, वनस्पतियां खिलखिला उठी थीं।आहिस्ता आहिस्ता सूरज नीले आसमान  में धरती के सिर पर चढ़ने लगा था और गर्मी बढ़ने लगी थी। वहां सारी लकड़ियां शिद्दत से जल रही थीं और उन्हें जल्द ही जलकर, राख़ होकर, शाम और रात में तब्दील होते जाना था । नगौडेनाउट समझ गया था कि सूरज को हर रोज जलना होगा । तब से वो अकेले ही आसमान के जंगल से लकड़ियां चुनता है ताकि अगले दिन भी सूरज जलकर,धरती को जीवन दे । यूं सूरज हर रोज पहले मद्धम, फिर तेज और फिर बुझने की शक्ल में जलता रहता है । देवता नगौडेनाउट को पता है कि सूरज की सांसे उसकी मेहनत पर मुनहसिर हैं और धरती में जीवन की बागडोर सूरज ने थाम रखी है...