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गुरुवार, 23 अगस्त 2012

रांग नंबर ...?

परसों सुबह अखबार पढ़ते हुए एक खबर पर निगाह जा अटकी और दिमाग़ उससे भी पुरानी एक खबर पर ! पहली खबर (1) ये कि,युवक ने अपने किसी परिचित को फोन लगाया जोकि गलती से किसी और निशाने पे जा लगा, उभयपक्ष में,मुख्तसर सी बातचीत हुई और फोन काट दिया गया ! इससे आगे मसला यह कि युवक को रांग नंबर वाली आवाज़ इस कदर पसंद आई कि उसने दोबारा फोन लगा कर दोस्ती के लिए पहल कर डाली,अब इससे भी आगे सिलसिला यह कि जोड़े के दरम्यान खालिस दोस्ती से बढ़कर रोमान और फिर खालिस रोमान की हुदूद से आगे जाकर ब्याह का ख्याल जोर मारने लगा ! युवक ने अपने घरवालों से बात की सो वे भी राजी हो गये और सिलसिला लड़की देखने की हद तक जा पहुंचा ! लड़की को देखते वक़्त युवक के भाई को शक हुआ कि वह लड़की नहीं बल्कि एक लड़का है,उसे लड़की की साड़ी से बाहर झांकती जींस नज़र आई ! सहसा अनावृत्त हुए इस सत्य से आगे का अहवाल यह कि, ब्याहोत्सुक / प्रेम प्यासा युवक इस झटके से उबरने के उपक्रम में...और उसका भाई थाने जा पहुंचा !

पुलिस दोनों पार्टी को थाने ले तो गई पर उसके पास दोनों को समझा बुझाकर छोड़ने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था ! इस मामले में बिन ब्याही लड़की उर्फ लड़के का पक्ष यह है कि, वह पिछले एक दशक से स्थानीय नाटक मंडली में स्त्रियों की भूमिकाओं का निर्वहन करते करते...स्त्रैण व्यवहृति सहज व्यक्तित्व बन बैठा था !...मुद्दे पर अपना ख्याल यह है कि वह एक सच्चा अभिनेता था, जो अभिनय और वास्तविकता के भेद भुला बैठा,संभव है, उसमें जिस्मानी तौर पर पुरुषों की बजाये स्त्रियों के गुणों का आधिक्य रहा हो या फिर उसकी अवदमित आकांक्षायें अथवा उसका बाल्यकाल / उसके आदर्श उसे इस दिशा में धकेल बैठे हों ? बहरहाल उसके नायिका सदृश होने में, निहित मूल कारण जो भी रहे हों ? पर ब्याह को लेकर उसका दृष्टिकोण समलैंगिकता वादी ही रहा होगा,क्योंकि उसका कथित प्रेमी भले ही,उसकी वास्तविक लैंगिक पृष्ठभूमि से अनजान था किन्तु उसे स्वयं की लैंगिकता के प्रति कोई भ्रम रहा होगा,यह विश्वास करना कठिन है  !

अब दूसरी यानि कि पुरानी खबर (2) ये कि एक युवा व्यवसायी को वृहन्नला से प्रेम हो गया, वह एक समर्पित और सदाशय प्रेमी था,सो अपने प्रेम को अंजाम तक पहुंचाने के ख्याल से वृहन्नला के लिंग परिवर्तन की जुगत में था ! उसने चिकित्सकों से परामर्श किये ताकि अपनी प्रेमिका को स्त्री के परिवर्तित रूप में ब्याह कर अपने घर ला सके ! गहन विचार मंथन और परामर्शों के दौर से गुज़रते हुई इस प्रेमासक्त व्यवसायी ने एक लंबी रकम खर्च करके अपनी प्रेमिका की सर्जरी करवाई / आवश्यक चिकित्सकीय उपाय करवाये! अंततः उसका प्रयास सफल हुआ और उसकी प्रेमिका एक वृहन्नला से पूर्णरूपेण स्त्री के रूप में तब्दील हो गई, इसके बाद प्रेमी जोड़ा ब्याह के पवित्र बंधन में बंध गया ! कहने के लिए ये कथा इसी सुखद परिणय के परिणति बिंदु पर समाप्त हो जानी चाहिए थी, पर भूतपूर्व युवा व्यवसायी प्रेमी उर्फ पति अपनी भूतपूर्व प्रेमिका उर्फ पत्नी से चिकित्सकीय खर्चे की भरपाई चाहता है ! उसका मानना है कि उसके साथ छल हुआ है ! 

प्रकरण की अद्यतन स्थिति यह है कि, पति अपनी पत्नी से चिकित्सा के नाम पर किये गये व्यय की वसूली के लिए पुलिस की शरण में जा पहुंचा है, क्योंकि ब्याह के ठीक दो दिन बाद ही उसकी ब्याहता पत्नी उसके ही चचेरे भाई के साथ प्रणय - पलायन कर गई ! प्रेम में साथ जीने मरने की कसमें खाने और सप्तपदी के दौरान दिए गये वचनों के एन उलट स्त्री का यह कदम उस युवा के लिए स्तब्धता-कारी है, उसे लगता है कि उसके साथ धोखाधड़ी की गयी है ! ...मुद्दे पर अपना ख्याल यह है कि युवा प्रेमी, वृहन्नला की अदाओं पर सम्मोहित हुआ और उसे स्त्री रूप में अपने घर लाने की उसकी कवायद अंतत: सफल भी हुई, किन्तु युवती ब्याह के दूसरे ही दिन अगर उसके अपने चचेरे भाई के साथ पलायन कर गई तो इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि युवक को वृहन्नला से और वृहन्नला को युवक के चचेरे भाई से प्रेम रहा हो, किन्तु आर्थिक तंगी के चलते वे दोनों एक सीमा तक मौन बने रहे हों या फिर ब्याह के दो दिनों में ही पत्नी को इस बात का भान हो गया हो कि उसका पति उसके अनुकूल नहीं है / योग्य नहीं ? 

ये ख़बरें हमें चौंकाती हों या कि नहीं पर इनसे हमारे सामाजिक ढांचे के अंदर मौजूद प्रवृत्तियों का अंदाज़ बखूबी होता है, सेक्स के प्रति हमारे बुनियादी आकर्षण को लेकर प्राकृतिकता अथवा अप्राकृतिकता की तर्ज़ वाली बहस बेमतलब हैं...इनसे जी चुराना और निगाहें फेर कर शुतुरमुर्ग हो जाना भी अर्थहीन है, जबकि यह हमारे अपने यथार्थ हैं ! जैसा कि मैं पहले भी कहता रहा हूँ कि प्रेम मुझे हमेशा कन्फ्यूज करता है...इसके मुताल्लिक एक धन एक बराबर दो का कोई पक्का फार्मूला नहीं जानता मैं... 

साभार :
खबर (1) : दैनिक भास्कर ,रायपुर , मंगलवार 21 अगस्त 2012 , पृष्ठ पांच 
खबर (2) : बीपीएन टाइम्स, बिलासपुर ,मंगलवार ,,10 जुलाई 2012, पृष्ठ दो


{ पुनश्च : मित्रों इस पोस्ट को लिखते वक्त , घुघूती जी की एक पोस्ट को लिंक करने का ख्याल था ! उस वक़्त मुझे लगा कि उन्होंने यह पोस्ट डिलीट कर दी है  सो कोई लिंक नहीं जोड़ा,  चूंकि उनका लिंक सही सलामत मिल गया है तो उसे जोड़ रहा हूं }

बुधवार, 18 जुलाई 2012

कहन की माप...!

पिछली पोस्ट पर संतोष जी ने प्रतिक्रिया दी कि ‘आपकी हर कथा गौण ही हो जाती है , मीमांसा के आगे...’ उनकी प्रतिक्रिया पढ़कर किंचित आश्चर्य हुआ और उत्तर में उनसे कहा कि कथा में जिस बात की संभावना निहित ही ना हो तो मैं उसे कैसे कह पाऊँगा ? आशय यह कि कथा के दम पे ही अपना भी दमखम है ! फिर सोचा कि उन्हें यह गलतफहमी क्यों हुई कि सूचना स्रोत कभी भी गौण हो सकता है ? भले ही उसकी व्याख्या करते हुए कोई कुछ भी कह डाले ! क्या यह संभव है कि कोई बंदा मूल स्रोत में निहित संभावनाओं से इतर भी व्याख्या कर सकता है ? या फिर व्याख्या मूल स्रोत की अहमियत कम करने का कारण हो सकती है ? शायद सामाजिकता की विषय वस्तु के विश्लेषण को लेकर उनकी अनभिज्ञता के कारण उन्होंने ऐसा वक्तव्य दिया हो , मानकर ये पोस्ट लिखने का ख्याल आया है , जिसमें एक छोटे से सूचना स्रोत की पैमाइश / नाप जोख किये जाने की मिसाल दिये जाने का ख्याल ज़ोर मार रहा है ! हालांकि वे केवल व्याख्या पर आश्चर्य कर रहे थे , पर इरादा उन्हें यह बतलाने का है कि वक्तव्यों की पैमाइश भी की जा सकती है !

वर्षों पहले मैंने अपने छात्रों से पूछा कि क्या वे स्नातकोत्तर उपाधि के पंचम प्रश्न पत्र बतौर यह आंशिक शोध करना चाहेंगे कि वर के चयन में लड़कियों की भूमिका / हैसियत फिलहाल क्या मायने रखती है , क्योंकि पिछले जमाने में ब्याह किये जाते वक़्त लड़की की हैसियत / उसकी सुंदरता / उसकी गुण सम्पन्नता को ध्यान में रखे बगैर उसे किसी भी अंधे / काने / लंगड़े / लूले वर से ब्याह दिया जाता था , यानि कि लड़के की हैसियत के सामने लड़की की कोई बिसात ना थी , उसे घर पर बोझ / कुछ दिन की मेहमान मानकर ससुराल विदा करना अभिभावकों का परम कर्तव्य हुआ करता था ! मेरा ख्याल था कि समय के साथ इस प्रवृत्ति में बदलाव ज़रूर आया होगा और लड़कियों के गुण , वर बतौर लड़कों के चुने जाने को तय करने का आधार बनने लगे होंगे !  मैंने छात्रों को इसी बदलाव को मापने की कवायद सौंपने का निश्चय किया तो उन्हें यह भय हुआ कि वे लड़कियों के अभिभावकों से संपर्क करने और सूचनायें एकत्रित करने के लिए कहां भटकते फिरेंगे ? मैंने कहा पूरे देश की विवाह योग्य लड़कियों के अभिभावक हमारे घर आते हैं ,  हम उनसे अपने घर पर ही सूचनायें प्राप्त करेंगे !

छात्र हैरान हुए ? तो मैंने कहा कि , हम वैवाहिक विज्ञापनों के माध्यम से अभिभावकों से सूचनायें प्राप्त करेंगे और बदलाव को नापेंगे ! अब छात्रों को आशंका हुई कि , वैवाहिक विज्ञापन तो वक्तव्य की शक्ल में होते हैं , तो फिर उन्हें कैसे मापा जाएगा ?...खैर डरते सहमते छात्रों ने वैवाहिक विज्ञापनों को मेरे कहे अनुसार सैम्पल बतौर छांटा और अपने अपने काम में जुट गये ! मैंने उनसे कहा कि अखबार वर्गीकृत विज्ञापन छापते हैं , तो इसका मतलब ये हुआ कि ब्राह्मणों / कायस्थों / वणिकों की तर्ज़ पर सभी जातियों और धर्मों के अभिभावक अपनी पुत्रियों के लिए वर का चुनाव करने के लिए , अखबार के कुछ वर्ग सेंटीमीटर के एक कालम में अपनी भावनायें , अपनी शर्तें, अपनी आकांक्षायें उड़ेल कर रख देते हैं ,  इसलिये सबसे पहले हम यह मानकर चलेंगे कि ब्राह्मण के वर्गीकृत विज्ञापन के अंतर्गत जो भी विज्ञापन छपे होंगे उन्हें ब्राह्मण वर ही चाहिये होगा , यह एक सामान्य दशा होगी और हमें इन विज्ञापन कथनों में से वे गुण पहचानने हैं , जो लड़की / भावी वधु के हैं और वे जो लड़के / भावी वर में चाहे गये हैं !

मसलन लड़की अगर कान्यकुब्ज / सरयूपारी ब्राह्मण है अथवा मैथिल या तमिल ब्राह्मण तो फिर उससे दो बातें स्पष्ट होंगी , एक वर्ण / जाति और दूसरा स्थानीयता ! इसी तरह से लड़की की आयु , उसकी आय , उसके परिवार की आय , उसका व्यवसाय , उसके परिवार का व्यवसाय , उसकी शिक्षा , उसकी पारिवारिक संस्थिति , उसका कद , उसका रंग , सौंदर्य और गृह कार्य में दक्ष होने संबंधी विवरण और उसका राशिगत विवरण भी मौजूद होना चाहिये , यहां तक कि लड़की अगर अविवाहित / विधवा / परित्यक्ता है तो वो भी ! लड़की के पिता शीघ्र और उत्तम विवाह करना चाहे तो , जाति / उपजाति / उच्च जाति बंधन में छूट देना चाहे तो , यह सारी सूचनायें , इस छोटे से विज्ञापन में मौजूद होंगी !  अब हम भावी वधु की हैसियत और गुणों को ध्यान में रखकर , विज्ञापन को फिर से देखें तो उसमें साफ तौर पर दर्ज होगा कि इंजीनियर / डाक्टर / राजपत्रित अधिकारी बतौर अथवा मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्यरत लड़की के लिए इसी स्तर का वर चाहिये होगा !  लड़की का कद , उसकी आयु , उसका गौर वर्ण , उसका परिवार , उसके भावी वर के इन्हीं गुणों को सुनिश्चित करेगा ! 

अगर वधु का पिता शीघ्र और उत्तम विवाह का संकेत दे तो इसे भरपूर दहेज देने का संकेत माना जाये ! शिक्षा बनाम शिक्षा , मंगली बनाम मंगली , जाति बनाम जाति ! अगर हम ऐसे सौ या अधिक विज्ञापनों को लें जो पूरे देश के ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व करते हों तो हमें इन विज्ञापनों में भावी वधु के गुणों के आधार पर वांछित भावी वर के गुणों को गिनने में आसानी हो जायेगी और हम भावी वर के चयन को प्रभावित करने में भावी वधु के गुणों के महत्त्व को बाकायदा सांख्यकीय विधियों से नाप पायेंगे और जान पायेंगे कि भावी वधु की हैसियत क्या है ? यानि कि वर के चयन में लड़की की हैसियत में बदलाव का पक्का माप हम कर सकते हैं ! कोई आश्चर्य नहीं कि , कुछ ही दिनों में जब छात्रों ने अपनी रिपोर्ट्स पूरी कीं , तो उनमें एक गौरव की अनुभूति थी कि वे कहन को भी माप सकते हैं ! गुण को गिनती में बदल सकते हैं और छोटे से स्रोत से बड़ी सी यथार्थपरक रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं ! जिसके स्रोत विज्ञापनों के तौर पर मौजूद हैं , अतः उनकी विश्वसनीयता को कोई चुनौती भी नहीं दे सकता !

सोमवार, 11 जून 2012

पहला पन्ना...आखिरी पन्ना !

आज उसे फिर से बूझने का ख्याल क्यों आया ? कह नहीं सकता , कोई पक्की वज़ह , सूझती भी नहीं ! करना क्या चाहता हूं , ये बात समझ में तब आई , जब अपने हाथ में स्केल देखी ! इससे पहले भी ये अखबार किन्हीं विशिष्ट अक्षरों से अपने विशेष प्रेम को लेकर मेरे हत्थे चढ़ चुका था और आज जैसे ही इसे पढ़ना बंद करके स्केल थामी तो लगा कि मुझे इसके पहले और आख़िरी पन्ने की पैमाइश करनी है ! यूं तो ये अखबार कुल बारह पन्नों का है , पर मेरा ख्याल ये है कि किसी भी अखबार का पहला और आख़िरी पन्ना उसके व्यक्तित्व का सबसे अहम / सबसे खास हिस्सा हुआ करता है ! 

बहरहाल ... अखबार के पहले पन्ने में कुल मिलाकर 1980 वर्ग सेंटीमीटर कागज का इस्तेमाल किया गया है , जिसमें से 18 फीसदी हिस्सा राजनीति विषयक ख़बरों को समर्पित है ! कोई आश्चर्य नहीं कि इस 18 फीसदी में से कांग्रेस का हिस्सा सिर्फ 3 फीसदी है जबकि बाकी का 15 फीसदी हिस्सा भारतीय जनता पार्टी के हवाले है ! मुमकिन है कि चढ़ते और ढ़लते सूरज जैसा कोई राजनैतिक अनुमान इसकी पृष्ठभूमि में मौजूद हो ! पहले पन्ने की ख़बरों में अपनी 3 फीसदी हिस्सेदारी में , कांग्रेस पार्टी , अन्ना एंड कम्पनी से बचाव की मुद्रा अख्तियार करती हुई दिखाई दी , जबकि भाजपा की 15 फीसदी हिस्सेदारी में से पूरी पार्टी केवल 1 फीसदी में सिमटी हुई है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बाकी के 14 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं , हालांकि यह बात गौरतलब है कि मोदी के वक्तव्य में कांग्रेस का जिक्र , एक आक्षेपित पार्टी के तौर पर ही सही पर , ख़बरों में , कांग्रेस की हिस्सेदारी को बढ़ाता ज़रूर है !

आज के अखबार के पहले पन्ने का 15 फीसदी हिस्सा फिल्मों को समर्पित है , इसे हाल ही में आयोजित आइफा अवार्ड्स का असर माना जायगा ! इस पृष्ठ का 12 फीसदी हिस्सा , इस अखबार के नाम तथा अन्य विवरणों के साथ भीतर के पन्नों की मुख्य सुर्ख़ियों को संबोधित है ! इसके बाद ख़बरों का 9 फीसदी फोकस , नौकरशाही की ओर है , जिसमें से 4 फीसदी आइ.ए.एस. अधिकारियों और बाकी 5 फीसदी सेना के उच्चाधिकारियों के बारे में है ! इतना ही नहीं अखबार ने 8 फीसदी स्थान कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर से प्राप्त संपत्ति और पुरातात्विक धरोहरों से सम्बंधित ख़बरों को दिया है ! टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी के वक्तव्य ने अखबार के इस अहम पन्ने का 7 फीसदी हिस्सा घेरा हुआ है , नि:संदेह यह वक्तव्य कांग्रेस को निशाने पर रख कर दिया गया है ! सायना नेहवाल की उपलब्धियों के हिस्से इस पन्ने का 6 फीसदी हिस्सा आया है , इस पन्ने में खेलों की ये अकेली खबर है !

शिक्षा और युवाओं के लिए प्रतिस्पर्धात्मक विषय पर अखबार अपने मुख्य पृष्ठ में केवल 4 फीसदी जगह ही दे पाया है जबकि क़ानून व्यवस्था की हिस्सेदारी सिर्फ 3 फीसदी है , इतना ही नहीं , अखबार के नियमित स्तंभ के अंतर्गत मौसम के विवरण के लिए भी 3 फीसदी जगह खर्च की गई है  !  रिश्वतखोरी से सम्बंधित खबरों की हिस्सेदारी सिर्फ 1 फीसदी है  ! छपाई के फॉण्ट और हाशिये जैसे विवशताओं के चलते मुख्य पृष्ठ का कुल 14 फीसदी हिस्सा रिक्त छूट गया है ! अगर हम गौर करें तो इस अखबार का पहला पन्ना राजनीति , फिल्मों , खबर की सुर्ख़ियों , नौकरशाही , धर्मस्थल संपदा , एन.जी.ओ. और खेलों के घटते हुए क्रम में , ख़बरों को अहमियत देता है !  उसके मुखौटे में शिक्षा और प्रतिस्पर्धा तथा कानून व्यवस्था जैसे विषयों के लिए स्थान जरा कम ही है !

अखबार का आख़िरी पन्ना , पहले पन्ने के जितना ही कागज प्रयुक्त करता है , यानि कि 1980 वर्ग सेंटीमीटर लेकिन यह पूरा पन्ना ख़बरों से खाली है  !  यहां पर 85 फीसदी जगह विज्ञापनों के लिए खर्च की गई है जबकि हाशिये वगैरह की वज़ह से 15 फीसदी जगह किसी भी उपयोग में नहीं ली जा सकी है !  विज्ञापनों के लिए अखबार की प्राथमिकता , मानव देह , उसका स्वास्थ्य और ऐसे ही अन्य दैहिक सुख दुःख है  ! आख़िरी पन्ने की 54 फीसदी जगह में ऐसे ही विज्ञापन भरे पड़े हैं ! ‘काम जीवन’ की अभिवृद्धि वाले नुस्खों से सम्बंधित विज्ञापन इस पन्ने के 25 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं , जिसमें से पौरुष को अनंत ऊंचाइयों तक ले जाने वाले विज्ञापन 22 फीसदी और स्त्रियों के दैहिक सौंदर्य को दिन दूना रात चौगुना श्रीवृद्धि देने वाले नुस्खे 3 फीसदी हिस्से पर मौजूद हैं ! इसके अतिरिक्त , स्त्री रोगों और उनके निदान सुझाने वाले विज्ञापनों को यह पन्ना 13 फीसदी जगह देता है ! विभिन्न स्वास्थ्यगत कारणों से सर्जरी को प्रेरित करने वाले अस्पतालों के विज्ञापनों ने 7 फीसदी स्थान घेरा हुआ है जबकि चर्मरोग से मुक्ति दिलाने वाले विज्ञापनों का हिस्सा 6 फीसदी और बवासीर से मुक्ति दिलाने वाले विज्ञापनों का हिस्सा 3 फीसदी है  !

विज्ञापनों से लैस अखबार के आख़िरी पन्ने में शिक्षा और प्रशिक्षण से सम्बंधित विज्ञापनों की हिस्सेदारी सिर्फ 5 फीसदी है , जबकि म्यूजिक सिखाने तथा दो पहिया / चौपहिया वाहन खरीदने के लिए वित्तीय ऋण उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं के विज्ञापन क्रमशः 3 , 3 फीसदी जगह पर मौजूद हैं ! इसके अलावा , बीमा सुविधा / पासपोर्ट / लायसेंस / पेन नम्बर तथा किराये पर वाहन उपलब्ध करने वाली सेवाओं के विज्ञापन भी 3 फीसदी जगह पर काबिज हैं ! नौकरी के लिए रिक्तियों तथा इलेक्ट्रोनिक सामग्री के विक्रय से सम्बंधित विज्ञापन भी 2 , 2 फीसदी और टूर्स एवं ट्रेवल्स के विज्ञापन भी 2 फीसदी हिस्से पर मौजूद हैं  ! इस पन्ने का 12 फीसदी हिस्सा अखबार ने स्वयं के विज्ञापन और हेड लाइन्स के लिए प्रयुक्त किया है  ! मोटे तौर पर देखा जाये तो अखबार का आख़िरी पन्ना केवल विज्ञापनों के लिए प्रयुक्त हुआ है , किन्तु दैहिकता संबंधी विज्ञापनों में अखबार का खास रुझान अपनी कहानी आप कहता है ...

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अखबार...सुर्खियाँ और पार्श्वनाद !


सुबह सुबह खबर बांचना गोया व्यसन, मशीनी रूटीन और अखबारों के पन्ने पलटते हुए, परोसी गयी ख़बरों के दायरे के भीतर बाहर की समझ के इतर कागज़ में मौजूद  सुनियोजित वणिक वृत्तियों का संज्ञान ही नहीं लिया कभी ! हॉकर आता कि टूट पड़ते ! कुल जमा पांच अखबार और उनकी सुर्ख़ियों से गुज़रते हुए ख़बरों की पुनरावृत्ति के सिवा बस एक ख्याल ,चलो आगे देखें...अगली खबर क्या ? ख़बरें बहतीं...उड़तीं, हम बहते...उड़ते, ख़बरें बजतीं...नृत्य करतीं,हम बजते...नृत्य करते, वे ठिठकतीं...फुदकतीं सो हम भी, उनके साथ सुख दुःख गम-ओ-गुस्से के अहसास से गुज़रते हुए ! लहर दर लहर हिचकोले दर हिचकोले बस ख़बरों के साथ ! कहना ये कि कागज़ पर छापे के शब्दों और चित्रों में केवल उतना ही दिखता जितना कि दिखाया गया हो ! अखबार एक मिशन...एक माध्यम जो दुनिया से खबरदार करे,उसे जानने बूझने का मौक़ा दे ! ज़मीन के एक टुकड़े पर सिमटी हुई ज़िन्दगी को ज़मीन के ज़र्रे ज़र्रे और हालात से रूबरू कराने वाले अखबार की हैसियत किसी दूधखोर बच्चे की धाई मां सी लगती, जो उसके जान लेने  की कुदरती ख्वाहिश को हर हाल में पूरा करने का दम रखती !

छुट्टियों के बाद वाले दिन अखबार नहीं आने से उपजा खालीपन हमारी ज़िन्दगी में उनकी अहमियत बयान करता ! अखबार यानि कि आदत ! कभी सोचा भी नहीं...कितने पन्ने ...कितने पैसे...कितनी ख़बरें और कितने विज्ञापन ! पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी और दीगर त्यौहार वाले दिनों के बधाई संदेशों वाले अतिरिक्त पन्ने भी कभी गिने नहीं हमने ! साल में ऐसे गिने चुने मौके भी आदत में शुमार हो गये होंगे तभी तो दिमाग में खटक कुछ भी नहीं बस पन्ना दर पन्ना हर्फ़ दर हर्फ़ आँखों की मुसाफिरत सी ! अब ये महज़ इत्तिफाक है या  कुछ और जो, पिछले दिनों में, एक नया ट्रेंड सा चलन में देखा कि, अखबार के मुख्य पृष्ठ के ऊपर विज्ञापन वाला पृष्ठ कुछ इस तरह से अवतरित हो़ता कि जैसे कोई इंसान रोज़मर्रा की ड्रेस के ऊपर डिजाईनर कोट पहन ले ! अब लगता कि अखबारों को भी बिजनेस की ज़रूरत होगी वर्ना पहले वाला  मासूम ख्याल ये कि अखबार हम पर कृपा करते हैं बिजनेस नहीं ! 

अब हुआ ये कि आज सुबह जैसे ही एक ख्यात नाम दैनिक समाचार पत्र को हाथ लगाया कि पहले पहल डिजाइनर कोट हाथ लगा, सोचा चलो देखते हैं कि इस कोट के पैसे भी अखबार की कीमत में शामिल हैं याकि नहीं ! पढ़ा कुल पृष्ठ 20 और कीमत एक रुपये पचास पैसे मात्र, पृष्ठ गिन भी डाले, पक्का हुआ कोट समेत कुल 20...अब सूझा ये कि इन बीस पन्नों में ख़बरें कितनी और विज्ञापन कितने ? सो पाया ये कि केवल सम्पादकीय पन्ने को छोड़ कर शेष सभी 19 पन्ने विज्ञापनों से लैस हैं और कमाल ये कि पांच पन्ने खालिस विज्ञापन वाले...यानि कि खबर शून्य पन्ने ! अपने लिए यह पहली अनुभूति, जो कि अखबार की धाई मां वाली छवि पर चोट कर गयी, लिहाजा हाथ में स्केल और अखबार के कागज की नाप शुरू ! नतीज़ा ये कि इस्तेमाल शुद कागज कुल 3.85 वर्ग मीटर और उसमें विज्ञापन का हिस्सा 2.0092 वर्ग मीटर निकला,यानि कि ख़बरों के मुक़ाबिल विज्ञापन 52.18 फीसदी कागज पर काबिज थे ! इसे यूं समझिए कि अखबार के 20 पन्नों में से 10.43 पन्नों पर विज्ञापनों का साम्राज्य विस्तारित था और एक उपभोक्ता कि हैसियत से हमारे एक रुपये पचास पैसे का भी यही हाल हुआ जानिये  ! 



 { नोट : दिन / माह और फिर कितने साल ? अखबार /  उपभोक्ता ...अरे नहीं ... मैं यह सब नहीं गिनने वाला }

बुधवार, 4 मई 2011

स है और श ष भी पर जो अधिक प्रिय है !

पता नहीं पड़ोसी के निहित मंतव्य क्या रहे होंगे जो उन्होंने रायपुर से सद्य प्रकाशित एक दैनिक समाचारपत्र मेरे आंगन में नियमित फेंकने ( आपूर्ति से बेहतर शब्द लग रहा है ) की साधिकार घोषणा कर दी  !  मैंने पूछा कि क्या आपने इसकी एजेंसी ली है ?  या कि ब्यूरो चीफ बन गये हैं ?  या फिर कोई अन्य आर्थिक लाभ वगैरह वगैरह ?  उन्होंने कहा कुछ भी विशेष नहीं, बस अपने लोग हैं इसलिए उनका न्यूज पेपर चलना चाहिए !  मैंने कहा , ये तो ठीक है पर एक अकेले मेरे पढ़ने से ये पेपर चलेगा ?  इसपर उनकी प्रतिक्रिया ये कि ,  आप अकेले कहां हैं मैं तो इसे कई और जगह भी फेंकवा रहा हूं  !

पड़ोसी बहुधंधी व्यक्ति हैं , कभी नवनिर्मित आवासों में इलेक्ट्रिकल फिटिंग्स के ठेके लेते है और कभी जीवन बीमा के उद्यम से जुड जाते हैं , इसके अतिरिक्त कई व्यवसाय और भी ,पर मूलतः घोषित कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं सो एक बात अपनी भी समझ में आई कि विविध व्यवसायों से वे क्या कमाते होंगे ये तो वे ही जाने लेकिन हर छोटे बड़े चुनाव में उनके घर के किसी एक हिस्से में नवनिर्माण या जीर्णोद्धार का कार्य ज़रूर संपन्न होता है !   अब  देखना ये है कि वे  इस लोकसभा उपचुनाव में क्या कुछ अर्जित कर पायेंगे !

आगे विषयान्तर नहीं करते हुए बात एक बार फिर से पड़ोसी द्वारा  बलात आरोपित समाचारपत्र की , यूं तो समाचार पत्र का कलेवर और समाचार चयन ठीक ठाक है पर उसमें छत्तीसगढ़ की अपेक्षा मध्य प्रदेश के समाचार प्रमुखता से छापे जाते हैं जिससे लगता यह है कि पुराने राज्य के संवाददाता नवगठित राज्य के अपने सहकर्मियों की तुलना में कहीं अधिक दक्ष हैं, अधिक प्रभावी हैं !  समाचारपत्र के पाठकों वाले स्तंभ में कई बार अपने कार्टूनिस्ट मित्र काजल कुमार के कार्टून्स देखकर हैरानी हुई !  सौजन्य और साभार के अभाव में छपे कार्टून्स ! पता नहीं इस प्रकाशन के लिए कार्टूनिस्ट की सहमति भी ली गई होगी कि नहीं ?

इस क्षेत्र के सांसद के आकस्मिक देहावसान के उपरान्त हो रहे उपचुनाव की बेला में पक्ष प्रतिपक्ष के नेताओं का जमावडा और चुनावी विज्ञापनों से समाचारपत्रों की पौ बारह के इतर लोकप्रिय नेताओं के जन्मदिन की बधाइयों की बाढ़ सी आ गई है, जनाभिमत यज्ञ के अलावा कभी , ऐसे विज्ञापन , इतने सारे जन्मदिन , एक साथ ना देखे ना सुने !  लेख्य यह कि जन प्रतिनिधियों के जन्मदिवस के कई विज्ञापन प्रायोजित प्रतिक्रिया और समाचार की शक्ल में भी देखे गये ! अब संभावित कठिनाई  ये  है कि चुनाव आयोग इन खर्चों को चुनाव लड़ने वाले अभ्यार्थियों के खाते में जोड़ कर देखेगा  भी तो कैसे ?

पड़ोसी द्वारा प्रोन्नत समाचारपत्र में भी कमोबेश चुनावी रेलम पेल और जन्मदिवसोन्मुखी  नज़ारा आम रहा पर एक विशिष्ट बात , आपसे शेयर करना आवश्यक प्रतीत हो रही है !  समाचारपत्र अपने प्रतिक्रियात्मक समाचार के अंतर्गत  "जनप्रतिनिधि विशेष के जन्मदिवस" के हवाले से लिखता है कि " सादगी के साथ संघर्ष ही ... की पहचान"  !  शीर्ष पंक्तियों  को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि समाचारपत्र के पास वर्णमाला के तीनों अक्षर स ,श और ष  उपलब्ध हैं पर वो आगे का समाचार गढते हुए जो भी शब्द टंकित करता है  , ज़रा उसकी बानगी भी देखी जाये !  षिक्षित , छग षासन , संघर्श , संघर्शरत , पार्शद ,  आषियाने , विषाल ,  मषाल , कुपोशित ,   प्रतिषत , कुपोशण ,  उत्कृश्ठ , घोशित , षासकीय , राश्ट्रीय !

अब कहना ये कि उनके पास स है और श  ष भी पर जो अधिक प्रिय है उसे संवाद के लिए प्रयुक्त कर रहे हैं क्या केवल इतना ही निष्कर्ष निकालना पर्याप्त होगा  ? या फिर माध्यमों की भाषाई  विकलांगता के प्रति चिंतित होने की आवश्यकता भी है ?

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढें !


दुनिया का सबसे ज्यादा हिंसाग्रस्त और खतरनाक इलाका , इंसानियत की सबसे बड़ी कब्रगाह अगर कहीं है तो वो है ईशदूत नूह, पैगम्बर मूसा , खुदा के बेटे ईसा और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद की मातृभूमि  !  वे सब के सब , दुनिया में भेजे गये शान्ति,मानवता और मुहब्बत का पाठ पढाने पर उनके अनुयाइयों ने क़त्ल-ओ-गारत की नई मिसालें गढी ! अमूमन मध्यपूर्व कहे जाने वाले एशिया के इस ज़मीनी टुकड़े पर अब तक कितनी इंसानी जाने गईं हैं, गिनना मुश्किल है ! लहूलुहान शताब्दियों में मौत से मुतवातिर शिकस्त खाती जिंदगी ! सच कहूं तो हम इन्सानों ने खुदा की बंदगी के दावे भले ही किये हों, पर हम कभी भी उस बेबस के बस में नहीं रहे वर्ना क्या वजहें थीं, जो हमारे दिलों से मुहब्बतें यूं खुश्क हुईं जैसे सहराओं से पानी ! वो अनादि अनंत होता होगा और जिंदगियां भी बख्शता होगा पर हमारा यकीन मृत्यु पर है,नफरतों पर है !  हमारे एजेंडे में मौत के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं क्या स्त्री , पुरुष , बूढ़े , बच्चे और जवान !

पता नहीं कैसे पर अभी कुछ ही रोज पहले मुहब्बतों ने एक बार फिर से नफरतों से आज़ाद होने की कोशिशे शुरू की हैं ! कारवां पहले भी चलते थे कभी व्यापार के लिए और कभी दीगर मकासिद के लिए...पर अब ये कारवां मुहब्बत के नाम है, इंसानियत के लिए हैं,अमन और जिंदगियों की खातिर अपनी एकजुटता बताने के लिए है ! ख्याल ये कि बदहाल इंसानों के लिए अपनी फ़िक्र का अहसास कराया जाए ! व्यवस्था में इंसानियत की आवाज़ बुलंद की जाए ! पिछले कारवां पर इजराइली हमले के बाद ये उम्मीद ना थी कि भारत से एक नयी पहल भी हो पायेगी,एक अचरज सा हुआ जब ये जाना कि बहु-धर्मी, बहु-सांस्कृतिक ,बहु-भाषाई, और भिन्न राजनैतिक आकांक्षाओं वाले इंसानों ने फिलीस्तीन के हक में एकजुट होने का फैसला किया है और फिर उसमें दैनिक छत्तीसगढ़ के संपादक सुनील कुमार भी शामिल हैं! पहले पहल मुझे भी यह लगा कि फिलिस्तीनियों के लिए एशियाई जनमत की सालिडेरिटी के नाम की यह पहल कोई स्टंट तो नहीं ! पर कारवां जैसे जैसे आगे बढ़ता गया उसकी नेकनीयत पर मेरा भरोसा भी बढ़ता चला गया !  

हालांकि इस कारवां को लेकर देश के बुद्धिजीवियों की सर्द प्रतिक्रिया और संभवतः व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता के कारण मीडिया समूहों का सन्नाटा, अप्रत्याशित नहीं था पर हमारी विदेश नीति और पाकिस्तान की इस्लाम परस्ती दांव पर लगी दिखाई दी !खुदरा बुद्धिजीवियों के चिल्हर सरोकार तो समझ में आते ही हैं पर संगठित सरकारों के सरोकार बदलते देखे तो ऐसा लगा कि अपने ही देश की नीतिगत संप्रभुता के सवाल पर भी कुछ अदद कारवां की ज़रूरत पड़ने वाली है !  वैसे कारवां पर  एक सवाल जो प्रत्याशित ही था कि कारवां काश्मीरी पंडितों, बस्तर के आदिवासियों और अपने ही देश के दूसरे हिस्सों के हिंसा पीड़ित नागरिकों के हक़ में क्यों नहीं निकाला गया ! सोचा ये कि गाजा पट्टी के फिलिस्तीनियों की तरह अपने मुल्क के परेशानहाल बन्दों के लिए भी  कारवां  ज़रूर निकाले  जाने चाहिए  पर ये  दोनों  सवाल बुनियादी तौर पर एक  ही स्केल पर नहीं नापे जाने चाहिए ! जहां फिलिस्तीनियों की आजादी के विरूद्ध सबसे बड़ी बाधा अमेरिकन उपनिवेशवाद है !  वहीं तानाशाह अरब देशों की भूमिका भी इंसान दुश्मन जैसी है ! जहां तक इजराइल के पक्ष में विचारण का प्रश्न है तो एक बात जो साधारण से तर्क से समझी जा सकती है कि अगर यहूदियों के व्यापक संहार के लिए हिटलर की निंदा की जानी चाहिए तो फिलिस्तीनियों के प्रति अमानवीय व्यवहार के लिए इजराइल की प्रतिक्रिया को न्यायोचित कैसे ठहराया जा सकता है ! 

ख्याल ये है कि गाजा के नागरिक शत्रु देश के संगठित अतिवाद का शिकार हैं जबकि बेचारे काश्मीरी पंडित , बस्तर के आदिवासी और अन्य पीड़ित पक्ष अपने ही देशवासियों के राजनैतिक, धार्मिक अतिवाद के भुक्तभोगी हैं और विडंबना ये कि उनका अपना ही लोकतंत्र, अपनी ही सरकारें और अपने ही रक्षाबल उनके बुनियादी हकों की रक्षा करने में असमर्थ हैं ! मंतव्य ये है कि एक ओर अपने ही देश की सामर्थ्यशाली सरकार की नाक के नीचे असुरक्षित नागरिकों और दूसरी ओर विदेशी अमेरिकन साम्राज्यवादी ताकत और उसके गिरोह की दोगली नीतियों से पीड़ित नागरिकों को एक ही जैसे न्याय वंचितों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता !  देश के भीतर के हालात के लिए, देशव्यापी जनमत और देश के बाहर के हालात के लिए विश्वव्यापी जनमत के औचित्य को स्वीकार करना ही पडेगा !हालांकि अपनी सरकारों को बदलने और विश्व जनमत के रुख को मोडने की कोशिशों के दरम्यान एक बहुत बड़ा फर्क होने के बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि काश्मीरी पंडितों और अन्य पीड़ितों को भी अमन के कारवां जैसी सदाशयता और मुहिम का हक़ तो बनता ही है !

दैनिक छतीसगढ में संस्मरणात्मक रूप से छपे यात्रा अनुभवों ने,राजघाट से गाजा तक चले इस कारवां के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्षों को उजागर किया है ! सकारात्मक ये कि उद्देश्य अगर मानवता के पक्ष में हो तो वैचारिक भिन्नताओं के सहअस्तित्व पर आंच नहीं आती ! कारवां में सम्मिलित  लोगों ने इसे बखूबी साबित भी किया  !  यह विश्वास किया जा सकता है कि कारवां प्रतीकात्मक रूप से ही सही पर फिलिस्तीनियों के लिए एशियाई जनमत की एकजुटता को जताने में सफल रहा है , जबकि नकारात्मक यह कि भारत सरकार एवं पाकिस्तानी सरकार और कारवां के रास्ते पड़ने वाले दूसरे देशों की सरकारों की अडंगेबाजियों से तंग आकर इस कारवां को कभी दिल्ली वापस आना पड़ा तो कभी हवाई,  समुद्री यात्राओं का सहारा लेना पड़ा ! शायद यात्रा पूर्व सम्यक नियोजन के अभाव में हुई इस अनावश्यक हर्डल रेस से हुई पैसे और समय की बर्बादी बेहद अखरती है ! ईरान की सरकारी आवभगत और तुर्की के विवादित संगठन की मेहमान नवाजी को स्वीकार किया जाना औचित्यपूर्ण था कि नहीं यह तो कारवां में सम्मिलित लोग ही बेहतर जानेंगे पर एक सवाल तो है ही ! ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद साधारण वेशभूषा में मिले और वे एक साधारण से फ्लेट में रहते हैं ,यह जानना सुखद रहा,फौरी तौर पर अपने नेताओं  का ख्याल आया जिन्हें पद के साथ विलासिता की आदत वैसे ही महसूस होती है जैसे कि जीवन को सांसों की !

ईरान में मानवाधिकार का सवाल भी कमोबेश वैसा ही लगा जैसा काश्मीरी पंडितों का ,  इसे गाजा के साथ हो रहे अमेरिकी छल और अंतर्राष्ट्रीय भेदभाव के समतुल्य आंकना संभवतः सही नहीं होगा !  भारत की जनता या फिर ईरान की जनता अपने देशों की सरकारों के सर से ताज छीन लेना चाहे तो इसमें अमेरिकन दखलंदाजी की गुंजायश नहीं बनती पर गाजा का सवाल ही विदेशी हस्तक्षेप की बिना पर खडा हुआ है सो इन दोनों सवालों को अलग अलग से हल किये जाने की ज़रूरत है ! इस्लामिक देशों से गुज़रते हुए कारवां के सदस्यों के अनुभव बड़े दिलचस्प लगे ! खानपान और बातचीत के स्तर पर बराबरी के विश्वास,फिलिस्तीनियों के लिए निशर्त समर्थन के बावजूद कारवां के सदस्यों को सरकारी वीजा देते वक्त कांपते हाथों और कलुषित मन का विरोधाभाष उजागर हो ही गया ! कहवाखानों ,शराबखानों और हुक्के, सिगार के धुओं  के समानांतर हिजाब से लिपटी नाज़नीनों और सड़कों पर खुले आम बिकते अन्तः वस्त्रों के प्रसंग रुचिकर हैं, किन्तु खाने से पहले हस्त प्रक्षालन नहीं करने वाली बात अगर सच हो तो ये बेहद बुरी लगने वाली है ! 

कारवां के इर्द गिर्द बिना यूनिफार्म पहने हुए सुरक्षा दस्तों जैसे इंतजामात शायद सुरक्षा कारणों से किये गये हों और गाजा में कारवां को जिस तरह से बंधक जैसा बना कर रखा गया उसके बस दो ही मायने हो सकते हैं एक तो यह कि हमास के अधिकारी कुछ छुपा रहे थे या फिर दूसरा ये कि कारवां में भी शत्रु के जासूस हो सकने की अतिरिक्त सम्भावनागत सतर्कता ! इजराइल के इतिहास को देखते हुए मेरा अपना अभिमत दूसरी सम्भावना के साथ है ! बहरहाल  सत्य पर संशय शेष ही है ! कारवां एक सांकेतिक पहल पर निकला था और उसने यह कार्य सफलतापूर्वक अंजाम दिया ! जो लोग इस पहल के भागीदार हुये उनकी जान हमेशा जोखिम पर थी पर वे धैर्य और साहस की कसौटी पर खरे उतरने वाले सृजनधर्मी लोग माने जायेंगे और शेष हम जैसे सब , बाद में लकीर पीटते , आलोचना करते , तारीफ़ करते , शब्दों की शल्यक्रिया करते हुए वाग्विलासी जन ! संवेदनाओं को जताने के विशिष्ट अवसरों पर  भी पत्थर  की तरह बेहिस-ओ-बेजान से  !