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सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूंढें !


दुनिया का सबसे ज्यादा हिंसाग्रस्त और खतरनाक इलाका , इंसानियत की सबसे बड़ी कब्रगाह अगर कहीं है तो वो है ईशदूत नूह, पैगम्बर मूसा , खुदा के बेटे ईसा और उसके रसूल हज़रत मुहम्मद की मातृभूमि  !  वे सब के सब , दुनिया में भेजे गये शान्ति,मानवता और मुहब्बत का पाठ पढाने पर उनके अनुयाइयों ने क़त्ल-ओ-गारत की नई मिसालें गढी ! अमूमन मध्यपूर्व कहे जाने वाले एशिया के इस ज़मीनी टुकड़े पर अब तक कितनी इंसानी जाने गईं हैं, गिनना मुश्किल है ! लहूलुहान शताब्दियों में मौत से मुतवातिर शिकस्त खाती जिंदगी ! सच कहूं तो हम इन्सानों ने खुदा की बंदगी के दावे भले ही किये हों, पर हम कभी भी उस बेबस के बस में नहीं रहे वर्ना क्या वजहें थीं, जो हमारे दिलों से मुहब्बतें यूं खुश्क हुईं जैसे सहराओं से पानी ! वो अनादि अनंत होता होगा और जिंदगियां भी बख्शता होगा पर हमारा यकीन मृत्यु पर है,नफरतों पर है !  हमारे एजेंडे में मौत के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं क्या स्त्री , पुरुष , बूढ़े , बच्चे और जवान !

पता नहीं कैसे पर अभी कुछ ही रोज पहले मुहब्बतों ने एक बार फिर से नफरतों से आज़ाद होने की कोशिशे शुरू की हैं ! कारवां पहले भी चलते थे कभी व्यापार के लिए और कभी दीगर मकासिद के लिए...पर अब ये कारवां मुहब्बत के नाम है, इंसानियत के लिए हैं,अमन और जिंदगियों की खातिर अपनी एकजुटता बताने के लिए है ! ख्याल ये कि बदहाल इंसानों के लिए अपनी फ़िक्र का अहसास कराया जाए ! व्यवस्था में इंसानियत की आवाज़ बुलंद की जाए ! पिछले कारवां पर इजराइली हमले के बाद ये उम्मीद ना थी कि भारत से एक नयी पहल भी हो पायेगी,एक अचरज सा हुआ जब ये जाना कि बहु-धर्मी, बहु-सांस्कृतिक ,बहु-भाषाई, और भिन्न राजनैतिक आकांक्षाओं वाले इंसानों ने फिलीस्तीन के हक में एकजुट होने का फैसला किया है और फिर उसमें दैनिक छत्तीसगढ़ के संपादक सुनील कुमार भी शामिल हैं! पहले पहल मुझे भी यह लगा कि फिलिस्तीनियों के लिए एशियाई जनमत की सालिडेरिटी के नाम की यह पहल कोई स्टंट तो नहीं ! पर कारवां जैसे जैसे आगे बढ़ता गया उसकी नेकनीयत पर मेरा भरोसा भी बढ़ता चला गया !  

हालांकि इस कारवां को लेकर देश के बुद्धिजीवियों की सर्द प्रतिक्रिया और संभवतः व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता के कारण मीडिया समूहों का सन्नाटा, अप्रत्याशित नहीं था पर हमारी विदेश नीति और पाकिस्तान की इस्लाम परस्ती दांव पर लगी दिखाई दी !खुदरा बुद्धिजीवियों के चिल्हर सरोकार तो समझ में आते ही हैं पर संगठित सरकारों के सरोकार बदलते देखे तो ऐसा लगा कि अपने ही देश की नीतिगत संप्रभुता के सवाल पर भी कुछ अदद कारवां की ज़रूरत पड़ने वाली है !  वैसे कारवां पर  एक सवाल जो प्रत्याशित ही था कि कारवां काश्मीरी पंडितों, बस्तर के आदिवासियों और अपने ही देश के दूसरे हिस्सों के हिंसा पीड़ित नागरिकों के हक़ में क्यों नहीं निकाला गया ! सोचा ये कि गाजा पट्टी के फिलिस्तीनियों की तरह अपने मुल्क के परेशानहाल बन्दों के लिए भी  कारवां  ज़रूर निकाले  जाने चाहिए  पर ये  दोनों  सवाल बुनियादी तौर पर एक  ही स्केल पर नहीं नापे जाने चाहिए ! जहां फिलिस्तीनियों की आजादी के विरूद्ध सबसे बड़ी बाधा अमेरिकन उपनिवेशवाद है !  वहीं तानाशाह अरब देशों की भूमिका भी इंसान दुश्मन जैसी है ! जहां तक इजराइल के पक्ष में विचारण का प्रश्न है तो एक बात जो साधारण से तर्क से समझी जा सकती है कि अगर यहूदियों के व्यापक संहार के लिए हिटलर की निंदा की जानी चाहिए तो फिलिस्तीनियों के प्रति अमानवीय व्यवहार के लिए इजराइल की प्रतिक्रिया को न्यायोचित कैसे ठहराया जा सकता है ! 

ख्याल ये है कि गाजा के नागरिक शत्रु देश के संगठित अतिवाद का शिकार हैं जबकि बेचारे काश्मीरी पंडित , बस्तर के आदिवासी और अन्य पीड़ित पक्ष अपने ही देशवासियों के राजनैतिक, धार्मिक अतिवाद के भुक्तभोगी हैं और विडंबना ये कि उनका अपना ही लोकतंत्र, अपनी ही सरकारें और अपने ही रक्षाबल उनके बुनियादी हकों की रक्षा करने में असमर्थ हैं ! मंतव्य ये है कि एक ओर अपने ही देश की सामर्थ्यशाली सरकार की नाक के नीचे असुरक्षित नागरिकों और दूसरी ओर विदेशी अमेरिकन साम्राज्यवादी ताकत और उसके गिरोह की दोगली नीतियों से पीड़ित नागरिकों को एक ही जैसे न्याय वंचितों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता !  देश के भीतर के हालात के लिए, देशव्यापी जनमत और देश के बाहर के हालात के लिए विश्वव्यापी जनमत के औचित्य को स्वीकार करना ही पडेगा !हालांकि अपनी सरकारों को बदलने और विश्व जनमत के रुख को मोडने की कोशिशों के दरम्यान एक बहुत बड़ा फर्क होने के बावजूद इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि काश्मीरी पंडितों और अन्य पीड़ितों को भी अमन के कारवां जैसी सदाशयता और मुहिम का हक़ तो बनता ही है !

दैनिक छतीसगढ में संस्मरणात्मक रूप से छपे यात्रा अनुभवों ने,राजघाट से गाजा तक चले इस कारवां के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही पक्षों को उजागर किया है ! सकारात्मक ये कि उद्देश्य अगर मानवता के पक्ष में हो तो वैचारिक भिन्नताओं के सहअस्तित्व पर आंच नहीं आती ! कारवां में सम्मिलित  लोगों ने इसे बखूबी साबित भी किया  !  यह विश्वास किया जा सकता है कि कारवां प्रतीकात्मक रूप से ही सही पर फिलिस्तीनियों के लिए एशियाई जनमत की एकजुटता को जताने में सफल रहा है , जबकि नकारात्मक यह कि भारत सरकार एवं पाकिस्तानी सरकार और कारवां के रास्ते पड़ने वाले दूसरे देशों की सरकारों की अडंगेबाजियों से तंग आकर इस कारवां को कभी दिल्ली वापस आना पड़ा तो कभी हवाई,  समुद्री यात्राओं का सहारा लेना पड़ा ! शायद यात्रा पूर्व सम्यक नियोजन के अभाव में हुई इस अनावश्यक हर्डल रेस से हुई पैसे और समय की बर्बादी बेहद अखरती है ! ईरान की सरकारी आवभगत और तुर्की के विवादित संगठन की मेहमान नवाजी को स्वीकार किया जाना औचित्यपूर्ण था कि नहीं यह तो कारवां में सम्मिलित लोग ही बेहतर जानेंगे पर एक सवाल तो है ही ! ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद साधारण वेशभूषा में मिले और वे एक साधारण से फ्लेट में रहते हैं ,यह जानना सुखद रहा,फौरी तौर पर अपने नेताओं  का ख्याल आया जिन्हें पद के साथ विलासिता की आदत वैसे ही महसूस होती है जैसे कि जीवन को सांसों की !

ईरान में मानवाधिकार का सवाल भी कमोबेश वैसा ही लगा जैसा काश्मीरी पंडितों का ,  इसे गाजा के साथ हो रहे अमेरिकी छल और अंतर्राष्ट्रीय भेदभाव के समतुल्य आंकना संभवतः सही नहीं होगा !  भारत की जनता या फिर ईरान की जनता अपने देशों की सरकारों के सर से ताज छीन लेना चाहे तो इसमें अमेरिकन दखलंदाजी की गुंजायश नहीं बनती पर गाजा का सवाल ही विदेशी हस्तक्षेप की बिना पर खडा हुआ है सो इन दोनों सवालों को अलग अलग से हल किये जाने की ज़रूरत है ! इस्लामिक देशों से गुज़रते हुए कारवां के सदस्यों के अनुभव बड़े दिलचस्प लगे ! खानपान और बातचीत के स्तर पर बराबरी के विश्वास,फिलिस्तीनियों के लिए निशर्त समर्थन के बावजूद कारवां के सदस्यों को सरकारी वीजा देते वक्त कांपते हाथों और कलुषित मन का विरोधाभाष उजागर हो ही गया ! कहवाखानों ,शराबखानों और हुक्के, सिगार के धुओं  के समानांतर हिजाब से लिपटी नाज़नीनों और सड़कों पर खुले आम बिकते अन्तः वस्त्रों के प्रसंग रुचिकर हैं, किन्तु खाने से पहले हस्त प्रक्षालन नहीं करने वाली बात अगर सच हो तो ये बेहद बुरी लगने वाली है ! 

कारवां के इर्द गिर्द बिना यूनिफार्म पहने हुए सुरक्षा दस्तों जैसे इंतजामात शायद सुरक्षा कारणों से किये गये हों और गाजा में कारवां को जिस तरह से बंधक जैसा बना कर रखा गया उसके बस दो ही मायने हो सकते हैं एक तो यह कि हमास के अधिकारी कुछ छुपा रहे थे या फिर दूसरा ये कि कारवां में भी शत्रु के जासूस हो सकने की अतिरिक्त सम्भावनागत सतर्कता ! इजराइल के इतिहास को देखते हुए मेरा अपना अभिमत दूसरी सम्भावना के साथ है ! बहरहाल  सत्य पर संशय शेष ही है ! कारवां एक सांकेतिक पहल पर निकला था और उसने यह कार्य सफलतापूर्वक अंजाम दिया ! जो लोग इस पहल के भागीदार हुये उनकी जान हमेशा जोखिम पर थी पर वे धैर्य और साहस की कसौटी पर खरे उतरने वाले सृजनधर्मी लोग माने जायेंगे और शेष हम जैसे सब , बाद में लकीर पीटते , आलोचना करते , तारीफ़ करते , शब्दों की शल्यक्रिया करते हुए वाग्विलासी जन ! संवेदनाओं को जताने के विशिष्ट अवसरों पर  भी पत्थर  की तरह बेहिस-ओ-बेजान से  !