पिछली पोस्ट पर संतोष जी ने प्रतिक्रिया दी कि ‘आपकी हर कथा गौण ही हो जाती है , मीमांसा के आगे...’ उनकी प्रतिक्रिया पढ़कर किंचित आश्चर्य हुआ और उत्तर में उनसे कहा कि कथा में जिस बात की संभावना निहित ही ना हो तो मैं उसे कैसे कह पाऊँगा ? आशय यह कि कथा के दम पे ही अपना भी दमखम है ! फिर सोचा कि उन्हें यह गलतफहमी क्यों हुई कि सूचना स्रोत कभी भी गौण हो सकता है ? भले ही उसकी व्याख्या करते हुए कोई कुछ भी कह डाले ! क्या यह संभव है कि कोई बंदा मूल स्रोत में निहित संभावनाओं से इतर भी व्याख्या कर सकता है ? या फिर व्याख्या मूल स्रोत की अहमियत कम करने का कारण हो सकती है ? शायद सामाजिकता की विषय वस्तु के विश्लेषण को लेकर उनकी अनभिज्ञता के कारण उन्होंने ऐसा वक्तव्य दिया हो , मानकर ये पोस्ट लिखने का ख्याल आया है , जिसमें एक छोटे से सूचना स्रोत की पैमाइश / नाप जोख किये जाने की मिसाल दिये जाने का ख्याल ज़ोर मार रहा है ! हालांकि वे केवल व्याख्या पर आश्चर्य कर रहे थे , पर इरादा उन्हें यह बतलाने का है कि वक्तव्यों की पैमाइश भी की जा सकती है !
वर्षों पहले मैंने अपने छात्रों से पूछा कि क्या वे स्नातकोत्तर उपाधि के पंचम प्रश्न पत्र बतौर यह आंशिक शोध करना चाहेंगे कि वर के चयन में लड़कियों की भूमिका / हैसियत फिलहाल क्या मायने रखती है , क्योंकि पिछले जमाने में ब्याह किये जाते वक़्त लड़की की हैसियत / उसकी सुंदरता / उसकी गुण सम्पन्नता को ध्यान में रखे बगैर उसे किसी भी अंधे / काने / लंगड़े / लूले वर से ब्याह दिया जाता था , यानि कि लड़के की हैसियत के सामने लड़की की कोई बिसात ना थी , उसे घर पर बोझ / कुछ दिन की मेहमान मानकर ससुराल विदा करना अभिभावकों का परम कर्तव्य हुआ करता था ! मेरा ख्याल था कि समय के साथ इस प्रवृत्ति में बदलाव ज़रूर आया होगा और लड़कियों के गुण , वर बतौर लड़कों के चुने जाने को तय करने का आधार बनने लगे होंगे ! मैंने छात्रों को इसी बदलाव को मापने की कवायद सौंपने का निश्चय किया तो उन्हें यह भय हुआ कि वे लड़कियों के अभिभावकों से संपर्क करने और सूचनायें एकत्रित करने के लिए कहां भटकते फिरेंगे ? मैंने कहा पूरे देश की विवाह योग्य लड़कियों के अभिभावक हमारे घर आते हैं , हम उनसे अपने घर पर ही सूचनायें प्राप्त करेंगे !
छात्र हैरान हुए ? तो मैंने कहा कि , हम वैवाहिक विज्ञापनों के माध्यम से अभिभावकों से सूचनायें प्राप्त करेंगे और बदलाव को नापेंगे ! अब छात्रों को आशंका हुई कि , वैवाहिक विज्ञापन तो वक्तव्य की शक्ल में होते हैं , तो फिर उन्हें कैसे मापा जाएगा ?...खैर डरते सहमते छात्रों ने वैवाहिक विज्ञापनों को मेरे कहे अनुसार सैम्पल बतौर छांटा और अपने अपने काम में जुट गये ! मैंने उनसे कहा कि अखबार वर्गीकृत विज्ञापन छापते हैं , तो इसका मतलब ये हुआ कि ब्राह्मणों / कायस्थों / वणिकों की तर्ज़ पर सभी जातियों और धर्मों के अभिभावक अपनी पुत्रियों के लिए वर का चुनाव करने के लिए , अखबार के कुछ वर्ग सेंटीमीटर के एक कालम में अपनी भावनायें , अपनी शर्तें, अपनी आकांक्षायें उड़ेल कर रख देते हैं , इसलिये सबसे पहले हम यह मानकर चलेंगे कि ब्राह्मण के वर्गीकृत विज्ञापन के अंतर्गत जो भी विज्ञापन छपे होंगे उन्हें ब्राह्मण वर ही चाहिये होगा , यह एक सामान्य दशा होगी और हमें इन विज्ञापन कथनों में से वे गुण पहचानने हैं , जो लड़की / भावी वधु के हैं और वे जो लड़के / भावी वर में चाहे गये हैं !
मसलन लड़की अगर कान्यकुब्ज / सरयूपारी ब्राह्मण है अथवा मैथिल या तमिल ब्राह्मण तो फिर उससे दो बातें स्पष्ट होंगी , एक वर्ण / जाति और दूसरा स्थानीयता ! इसी तरह से लड़की की आयु , उसकी आय , उसके परिवार की आय , उसका व्यवसाय , उसके परिवार का व्यवसाय , उसकी शिक्षा , उसकी पारिवारिक संस्थिति , उसका कद , उसका रंग , सौंदर्य और गृह कार्य में दक्ष होने संबंधी विवरण और उसका राशिगत विवरण भी मौजूद होना चाहिये , यहां तक कि लड़की अगर अविवाहित / विधवा / परित्यक्ता है तो वो भी ! लड़की के पिता शीघ्र और उत्तम विवाह करना चाहे तो , जाति / उपजाति / उच्च जाति बंधन में छूट देना चाहे तो , यह सारी सूचनायें , इस छोटे से विज्ञापन में मौजूद होंगी ! अब हम भावी वधु की हैसियत और गुणों को ध्यान में रखकर , विज्ञापन को फिर से देखें तो उसमें साफ तौर पर दर्ज होगा कि इंजीनियर / डाक्टर / राजपत्रित अधिकारी बतौर अथवा मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्यरत लड़की के लिए इसी स्तर का वर चाहिये होगा ! लड़की का कद , उसकी आयु , उसका गौर वर्ण , उसका परिवार , उसके भावी वर के इन्हीं गुणों को सुनिश्चित करेगा !
अगर वधु का पिता शीघ्र और उत्तम विवाह का संकेत दे तो इसे भरपूर दहेज देने का संकेत माना जाये ! शिक्षा बनाम शिक्षा , मंगली बनाम मंगली , जाति बनाम जाति ! अगर हम ऐसे सौ या अधिक विज्ञापनों को लें जो पूरे देश के ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व करते हों तो हमें इन विज्ञापनों में भावी वधु के गुणों के आधार पर वांछित भावी वर के गुणों को गिनने में आसानी हो जायेगी और हम भावी वर के चयन को प्रभावित करने में भावी वधु के गुणों के महत्त्व को बाकायदा सांख्यकीय विधियों से नाप पायेंगे और जान पायेंगे कि भावी वधु की हैसियत क्या है ? यानि कि वर के चयन में लड़की की हैसियत में बदलाव का पक्का माप हम कर सकते हैं ! कोई आश्चर्य नहीं कि , कुछ ही दिनों में जब छात्रों ने अपनी रिपोर्ट्स पूरी कीं , तो उनमें एक गौरव की अनुभूति थी कि वे कहन को भी माप सकते हैं ! गुण को गिनती में बदल सकते हैं और छोटे से स्रोत से बड़ी सी यथार्थपरक रिपोर्ट तैयार कर सकते हैं ! जिसके स्रोत विज्ञापनों के तौर पर मौजूद हैं , अतः उनकी विश्वसनीयता को कोई चुनौती भी नहीं दे सकता !