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सोमवार, 9 नवंबर 2020

मुखिया की पत्नि...

 

वो समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति और दो खूबसूरत लड़कियों का पिता था । एक दिन नदी पार के एक सुदूर गांव में जा पहुंचा वहां उसने सुना कि गांव का मुखिया ब्याह करना चाहता है और उसे सुयोग्य कन्या की तलाश है। अपने घर वापस लौट कर उसने अपनी पुत्रियों से पूछाक्या तुम दोनों में से कोई उस मुखिया की पत्नि बनना चाहोगी ? उसकी बड़ी पुत्री ने कहा हां जरूर । पिता ने कहा कि तब तो तुम्हें वहां जाना होगा । लड़की ने कहा लेकिन मैं वहां अकेली जाऊंगी । पिता ने कहा लेकिन हमारे समाज में ये परंपरा नहीं है । विवाहोत्सुक लड़की को अपने साथ रिश्तेदारों को लेकर जाना चाहिए । लड़की ने हठ करते हुए कहालेकिन मैं अकेले ही जाना चाहती हूं । अंततः विवाहोत्सुक लड़की ने नदी के दूसरे छोर पर बसे गांव की यात्रा अकेले ही शुरू कर दी । रास्ते में उसे एक चूहा मिला उसने कहाक्या मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊं ? लड़की ज़ोर से हंसी और उसने कहा चूहे कब से पथ प्रदर्शक बनने लगे ? हटो भी । इसके कुछ देर बाद लड़की को एक मेढ़क मिलाउसने कहा क्या मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊं ? तुम ? मुझसे बात करने लायक भी नहीं होक्योंकि मैं मुखिया की पत्नि बनने जा रही हूं । अगर तुम मेरे रास्ते में आये तो मैं तुम्हें एक लात मारूंगी । ओहमेढ़क ने कहा और वो रास्ते से हट गया । लड़की चलते चलते थक चुकी थीसो एक पेड़ के नीचे थोड़ी देर आराम करने के लिए बैठ गई ।

वहां उसे बकरियां चराता हुआ एक लड़का मिला । लड़के ने कहादीदी तुम कहां जा रही हो ? लड़की ने कहामैं मुखिया की पत्नि बनने जा रही हूं...पर तुम्हारी हिम्मत कैसे हुईमुझे दीदी कहने की । लड़के ने कहामैं भूखा हूंअगर आपके पास कुछ खाने के लिए हो तो मुझे दे दीजिये । लड़की ने कहा क्यों दूं ? जाओ यहां से मुझे अकेला छोड़ दो । इसके बाद रास्ते में कुछ दूर एक बड़ी चट्टान पर बैठी हुई एक बूढ़ी ने कहा सुनो मैं तुम्हें एक सलाह देती हूं अगर तुम्हें देख कर पेड़ हंसने लगे तो तुम खामोश रहना हंसना मतवहां तुम्हें एक बड़ी मश्क़ भर गाढ़ा दूध मिलेगाउसे पीना मतकोई एक आदमी जो अपनी बांहों में सिर छुपाए हो उससे पानी मत लेनाजाओ यहां से मुझे अकेला छोड़ दो । लड़की ने कहाओ बूढ़ीबकवास मत कर और वो आगे बढ़ गई । रास्ते में उसे देख कर पेड़ हंसे जबाब में लड़की भी हंसने लगी । उसने देखा वहां मश्क़ भर गाढ़ा दूध रखा थावो प्यासी थी उसने वो दूध पी लिया । कुछ दूरी पर उसे एक आदमी मिला जो अपनी बांहों में सिर छुपाए हुआ थालड़की ने उससे पानी मांगा और पी लिया ।

अब तक लड़की नदी पार के गांव पहुंच चुकी थी उसने देखाएक लड़की कुंड से पानी भर रही थीउसने पूछा बहन तुम कहां जा रही होविवाहोत्सुक लड़की ने कहातुम कौन होती हो मुझसे ये पूछने वाली । मैं यहां के मुखिया की पत्नि बनने वाली हूं । पानी भरने वाली लड़की असल में मुखिया की बहन थीउसने कहातुम गांव में इस तरफ से मत घुसनामगर विवाहोत्सुक लड़की ने उसकी बात अनसुनी कर दी और जल्द ही वो मुखिया के घर पहुंच गई । गांव के लोगों ने पूछा वो कौन है और यहां क्यों आई है उसने कहा वो मुखिया की पत्नि बनने के लिए यहां आई है । गांव के लोग उसे देख कर हैरान थे क्योंकि लड़की के साथ कोई नाते रिश्तेदार नहीं थे । उन्होने कहामुखिया अभी घर पर नहीं हैतुम उसके लिए खाना बना लो ताकि लौटने पर वो भूखा ना रहे । उन्होने लड़की को अन्न दिया ताकि वो उसे पीस कर रोटियां बना ले मगर लड़की ने पिसाई में ज्यादा मेहनत नहीं की सो उसकी बनाई रोटियां कड़ी और सख्त बन गई थी । रात में मुखिया घर लौटा द्वार पर ज़ोरदार हिस्स की आवाज सुनाई दी । असल में वो पांच फनों वाला एक नाग थाउसकी आंखे बड़ी बड़ी थीं । लड़की बहुत डर गई थी । मुखिया द्वार पर ही बैठ गया और उसने कहा भोजन लाओ । लड़की ने उसे रोटियां दीं जो वो खा भी नहीं सका । उसने कहा तुम मेरी पत्नि बनने के लायक नहीं होअपने गांव वापस लौट जाओ और लड़की अपने गांव वापस लौट आई ।

बड़ी बहन के लौटने बाद छोटी बहन ने अपने पिता से कहामैं भी मुखिया की पत्नि बनना चाहूंगी । पिता ने कहा ठीक है,तुम भी कोशिश कर के देख लो, पिता ने अपने सगे संबंधियों, मित्रों को बुलाया और छोटी लड़की के साथ भेज दिया । रास्ते में उसे एक चूहा मिलाउसने लड़की से कहा क्या मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊंलड़की ने कहा ज़रूरमैं आपकी अहसान मंद होऊंगीचूहे ने उसे रास्ता दिखायाजो घाटी से होकर गुज़रता थावहां एक बूढ़ी औरत खड़ी थीजिसने लड़की से कहाआगे जाकर रास्ता दो हिस्सों में बंट जाएगातुम छोटे रास्ते से जाना वर्ना बड़े रास्ते में मुसीबत होगी । धन्यवाद मां,मैं छोटे रास्ते से ही जाऊंगी।लड़की ने बूढ़ी को खाना दिया और आगे बढ़ गई,वहां उसे एक खरगोश मिलाउसने कहा मुखिया का घर पास ही हैकुंड के पास तुम्हें एक लड़की मिलेगीउससे अच्छे से बात करनावो जो भी अन्न देउसे अच्छे से पीसना और जब अपने भावी पति से मिलना तो डरना नहीं । लड़की ने कहा धन्यवाद मैं ऐसा ही करूंगी ।

आगे चल कर उसे पानी भरती हुई एक लड़की मिलीजिसने पूछाकहां जा रही हो ? छोटी लड़की ने कहायहां मेरी यात्रा का अंत होने वाला है । पनहारिन असल में मुखिया की बहन थीउसने पूछा यहां क्यों आई हो ? छोटी लड़की ने कहा हम एक वैवाहिक समारोह के लिए आए हैं । पनहारिन ने कहाअच्छामैं समझ गईतुम अपने पति को देख कर डर तो नहीं जाओगी ?  छोटी लड़की ने कहानहीं ऐसा नहीं होगा । पनहारिन ने उसे रुकने का इशारा किया और थोड़ी देर के बाद बारातियों को भोजन कराया गया । इसके बाद मुखिया की मां ने कहा मेरा बेटा शाम तक लौटेगा तुम उसके लिए खाना बना लेना । उसने लड़की को अन्न दिया ताकि वो उसे पीस कर रोटियां बना सके । रात में जोरदार हिस्स की आवाज़ के साथ मुखिया घर लौटाझोपड़ी हिल गईखंबे गिर गए ...पर लड़की डर कर बाहर नहीं भागीमुखिया पांच फनों वाला सांप ही थाउसने लड़की से कहा मुझे खाना दोलड़की ने उसे रोटियां दींरोटियां मुलायम और स्वादिष्ट थीं । मुखिया तृप्त हुआउसने कहावो चूहा खरगोशबूढ़ी औरतमैं ही था मैंने हर जगहतुम्हारी विनम्रता देखी है क्या तुम मेरे पत्नि बनोगी ? यह कहते हुए मुखिया एक खूबसूरत युवा में तब्दील हो गया और उसने लड़की का हाथ अपने हाथों में ले लिया ।

सांकेतिक रूप से यह कथा वर और वधु के चयन को समर्पित है, कथानुसार किसी एक गांव के मुखिया की दो विवाह योग्य पुत्रियां हैं, जबकि दूसरे गांव का मुखिया, जोकि अविवाहित है, के लिए सुयोग्य पत्नि की तलाश जारी है । इस आख्यान का प्रथम संकेत ये है कि कथा कालीन समाज में युवतियां अपने लिए वर के चयन की पहल कर सकती थीं, जैसा कि प्रथम मुखिया की बड़ी पुत्री ने किया । उसके पिता ने ब्याह के लिए, अकेले प्रस्थान की उसकी जिद मान ली, हालांकि युवती अपने सगे सम्बन्धियों के साथ जाकर भी विवाह का प्रयत्न कर सकती थी, किन्तु वो अपनी, आगत सफलता का श्रेय किसी और को देना ही नहीं चाहती थी । उसके स्वभाव में अहंकार है और व्यक्तिवाद चरम पर । विवाहोत्सुक बड़ी लड़की के परिणय प्रयाण का कथा सार यह है कि उसे रास्ते में एक चूहा, एक मेढक और एक चरवाहा मिलता है,  वो उन सभी से अशिष्ट व्यवहार करती है , उसे विश्वास है कि वो युवा मुखिया की पत्नि बनकर रहेगी, इसलिए वो किसी भी सुझाव के उलट कृत्य करती है, जैसे कि उसने अनुभवी बूढी के सुझाव एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाल दिए, उसके जीवन में किसी भी जीव जंतु, वनस्पति, और इंसानी अनुभवों की कोई अहमियत नहीं थी। इतना ही नहीं वो युवा मुखिया की बहन के साथ भी धृष्टता करती है । बहरहाल युवा मुखिया, अपने छद्म रूप में, उसे अस्वीकार करता है, क्योंकि इस युवती में खाना बनाने का हुनर भी नहीं था ।

कथा के अगले हिस्से में दर्ज विवरण के अनुसार, बूढ़े मुखिया की छोटी लड़की अपने परिणय प्रयास की अनुमति लेकर युवा मुखिया के गांव की ओर निकल पड़ती है । वो अपनी बड़ी बहन के बरक्स विनम्र स्वभाव की है, सो उसे, अपने पिता के निर्देश को मानने से कोई परहेज नहीं, अस्तु वो सगे सम्बन्धियों सहित प्रवास पर है । रास्ते में वो चूहे, बूढी स्त्री और खरगोश के साथ सदाशयतापूर्ण करती है । वो सभी के सुझाव ध्यान से सुनती है और उन पर अमल करती चलती है । यहां तक कि वो अपनी भावी ननद जोकि पनिहारिन के तौर पर उससे कुंड पर मिलती है , से भी विनम्रतापूर्ण व्यवहार करती है, परिणाम स्वरूप उसके सहयात्री, सगे सम्बन्धियों की आवभगत और भोजन की व्यवस्था सम्भव होती है । युवा मुखिया की मां, उसे, अपने पुत्र के लिए भोजन तैयार करने के सुझाव देती है । यह लड़की विनम्र भी है और पाक कला में निपुण भी सो छद्म वेश धारी युवा मुखिया उसे अपनी पत्नि के रूप में चुन लेता है और यह भी कहता है कि रास्ते भर भिन्न रूपों में, तुमसे मिलने वाला मैं ही था । बड़ी बहन की तुलना में छोटी बहन स्वभाव से विनम्र है, उसमें अहंकार नहीं, वो अपने साथ समाज को लेकर चलती है, उसमें व्यक्तिवाद नहीं ।  युवा मुखिया ख़ूबसूरत है और युवती खूबसीरत सो जोड़ी बनने में देर नहीं लगती...    

 

शनिवार, 16 मई 2020

सवा दो

सड़क के मोड़ पर लड़के ने इशारा किया, लड़की अपनी साइकिल से उतर गई और उसने कहा, जो भी कहना है जल्दी कहो, पीछे मोहल्ले के लड़के आते ही होंगे  लड़के ने कहा ठीक है, हम बाद में बात करेंगे...फिर 43 साल गुज़र गये, कोई बात नहीं हुई 


गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

मैंने रखा है मुहब्बत...3

औरों की तरह उसे भी इश्क हो गया था, इससे कब्ल, भले ही उसके ताल्लुकात अपनी ही बिरादरी की ढ़ेरों ज़नानियों से रहे होंगे पर ये पहला मौक़ा था कि उसका इश्क खूबसूरत मानुष सुकन्या से वाबस्ता था । बहरहाल इश्क में जोर जबरदस्ती से काम लेने के बजाये उसने सुकन्या के माता पिता से विधिवत सुकन्या का हाथ मांग लिया । इस दफा वो परम्परा अनुसार और मय रीति रिवाज़ के पत्नि हासिल करना चाहता था क्योंकि उसे सुकन्या से सच्ची मुहब्बत थी । बहरहाल मुश्किल ये थी कि लड़की के वालदैन गैर बिरादरी में अपनी लड़की का ब्याह करने के लिए राज़ी नहीं थे, उसपे तुर्रा ये कि याची के हिंसक स्वभाव में उन्हें अपनी लडकी का मुस्तकबिल स्याह नज़र आ रहा था, सो उन्होंने विवाहोत्सुक वनाधिराज को नाराज़ किये बिना अपनी बात कही ।

उन्होंने कहा महामहिम, आपका प्रस्ताव पाकर हम गौरवान्वित हुए, लेकिन हमारी कुछ समस्यायें हैं, जिनकी तरफ आपका ध्यान आकर्षित कराना ज़रूरी है । हमारी लड़की अभी कमसिन है, सो मुमकिन है कि आपके इश्क की शिद्दत की ताब ना ला सके । हमें लगता है कि आपके नुकीले दांतों से वो घायल हो सकती है । इसके अलावा आपके पंजो के पैने नाखून भी उसे, जिस्मानी तौर पर नुकसान पहुंचा सकते हैं । इसलिए हम आपसे, बा-अदब ये अर्ज़ करते हैं कि आप अपने पैने नाखून हटवा दें और नुकीले दांत भी । अगर यह मुमकिन हो पाया तो हम आपके प्रस्ताव पर, सहर्ष पुनर्विचार कर सकते हैं ।

चूंकि शेर बेहद इश्कियाया हुआ था, सो उसने आगा पीछा सोचे बिना अपने नाखून और दांत निकलवा दिए और फिर से सुकन्या के माता पिता के पास जा पहुंचा । नख दंतहीन शेर को देख कर लड़की के अभिभावक हंसने लगे। उनके लिए शेर, अब किसी काम का नहीं था । बेबस और लाचार, जो किसी को भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं था । कहते हैं कि इश्क, हिंसक, पशुवत और भयंकर को भी पालतू बना सकता है ।
यूं तो ये कहानी, शेर के नाम से कही गई है, जिसे आदमजाद सुकन्या से इश्क हो गया है और वो अपनी जिस्मानी हरारत, अपनी शक्तिमत्ता के दम पर उतारने के बजाये सामाजिक तौर तरीकों से शांत करने का इच्छुक है । या ये मान लिया जाए कि शेर को उस लड़की का इश्क, बलपूर्वक हासिल करने की ख्वाहिश नहीं थी । इसलिए उसने बाकायदा लड़की का हाथ, लड़की के माता पिता से मांगा । यहां कथा में निहित हास्य संकेत ये कि शेरों के माता पिता, सात फेरों / निकाह के कायल नहीं होते, बल्कि उन्हें गन्धर्व विवाह या लिविंग इन जैसी नव-विवाही परम्पराओं के निर्वहन का अभ्यास / शौक होता है । कुल मिलाकर विवाहोत्सुक शेर के वालदैन या तो शेर का साथ देने के लिए मौजूद नहीं थे या फिर उन्हें गैर बिरादरी में शेर का ब्याह पसंद नहीं था, सो विरोध स्वरुप, उन्होंने इस पहल का बायकाट / बहिष्कार किया ।
बहरहाल शेर के हवाले से कही गई इस कथा को इस नज़रिये से भी देखा जा सकता है कि शेर वास्तव में वनाधिराज होने के बजाये, गली का कोई गुंडा, मवाली, कोई बाहुबलि, डॉन माफिया, दस्यु सम्राट, आपराधिक प्रवृत्ति का मनुष्य रहा होगा जोकि लड़की की जाति से अलग जाति में जन्मा होगा और उसकी कुख्याति के चलते, लड़की के अभिभावकों ने उसे असामाजिक जीवन शैली छोड़कर सज्जनता पूर्वक जीवन यापन की सलाह दे दी होगी, जिसमें आत्मसमर्पण और गुनाहों की सजा भुगतना भी शामिल हो सकता है । प्रतीत यही होता है कि जंगल का राजा एक प्रतीक है जिसे दुस्साहस और राजतान्त्रिक / तानाशाही पूर्ण निर्णयों से जोड़ कर देखा जा सकता है, इसलिए शेर के हवाले से कही गई यह कथा निश्चित रूप से इंसानी बस्तियों की ही कथा रही होगी, जिसमें सुकन्या के अभिभावकों ने सुकन्या के हित में जो उचित जान पड़ा, वो निर्णय लिया ।
कथा सार ये कि इश्क बड़े बड़ों के चूल्हे ठंडे कर देता है । सेनापति को प्यादा और महामहिमों को हक़ीर कर देता है । मुमकिन है कि ये सारी बातें इसके उलट भी कही जा सकें । पर ये कथा... 

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

मैंने रखा है मुहब्बत...1


उसका नाम चाहे जो भी हो, पर उसे मुहब्बत थी, इक सुफैद पोश से । यूं तो वो ‘केइ’ द्वीप का रहने वाला था...और वज़ूद बचाये रखने की गरज से शिकारी भी । उस रोज उसका मददगार कुत्ता गहरी घाटी में जा गिरा जिसे बचाने की गरज़ से वो खुद भी जैसे तैसे घाटी के निचले हिस्से में जा पहुंचा जहां उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई जोकि उसी घाटी में रहती थी । बूढ़ी ने उसे भूखा जान कर खाने के लिए कंद और अधकच्चे चावल परोसने चाहे तो उसने कहा, चावल मुझे पकाने दो और फिर उसने लकड़ियों की मद्धम आंच में चावल पकाये जिनकी खुशबू पूरी घाटी में फ़ैल गई । बहरहाल भूखे को खाने की पेशकश और कच्चे चावलों को बेहतरीन तरीके से पकाने की कला के दरम्यान इश्क जाग उट्ठा और उन दोनों ने शादी कर ली । 
उधर घाटी में ये खबर दूर दूर तक फ़ैल गई कि चावलों को पकाने का कोई खास तरीका भी हो सकता है । जिन्हें सीखने की चाहत थी शिकारी उन सबको अपने हुनर से आगाह करने लगा । जब कुछ वक्त गुज़रा तो उसे अपने पुश्तैनी गांव की याद सताने लगी । उसने घाटी से वापस, अपने घर लौटने का फैसला कर लिया । उसकी बूढ़ी बीबी उसके साथ उसके गांव आने के लिए तैयार थी पर रास्ते में उन दोनों में झगड़ा हो गया जो शायद अपने घर वापस जाने और अपना घर छूट जाने वाली मुहब्बतों का झगड़ा रहा होगा। शिकारी ने बूढ़ी से कहा ठीक है, तुम अपने घर में ही रहो, हम एक दूसरे से अलग हो जाते हैं । बूढ़ी ने कहा, कोई बात नहीं तुम मुझे मेरे चावल लौटा दो । जो मेरा है उसे लेकर कहीं और ले जाने का तुम्हें हक़ नहीं । इस पर दोनों तैयार थे ।
हालांकि शिकारी ने चोरी से चावल के दो दाने अपने नथुनों में छुपा लिए और अपने गांव वापस लौट आया । कहते हैं कि उनमें एक दाना सुफैद और दूसरा भूरा था । शिकार करने के दौरान मुतवातिर भटकने और खाना मिलने ना मिलने की अनिश्चितता से तंग आ चुका शिकारी खेती करना चाहता था । उसने उन दो बीजों से पौधे उगाये और फिर और ज्यादा पौधे । उसे सुफैद चावलों से मुहब्बत थी...पर गांव वालों को हर किस्म के चावल की ज़रूरत, सो शिकारी से किसान हुआ इंसान, भूरे चावलों को दूसरे लोगों को बेचने लगा । वो अपनी चाहत के सुफैद चावल सिर्फ अपने लिए रखता और भूरे चावल बाज़ार में । भूरे चावलों को इस बात का बेहद रंज था कि शिकारी किसान उन्हें प्यार नहीं करता बल्कि पैसों से बदल लेने वाली शय समझता है ।
वे खेत दर खेत आहिस्ता अहिस्ता समुन्दर के तटों की जानिब भाग निकले ।  गहरी शामों के गहरी रात हो जाने तक अलावों के इर्द गिर्द बुनी गई कहानियों में सुनते हैं कि उन खेतों की मालकिन भी एक बूढ़ी औरत थी, जिसे लगा कि ये चावल बेस्वाद होंगे...पर फसल पकने के बाद उसका शक बेबुनियाद निकला । तटों की माटी और मौसम, भूरे चावलों का हमदर्द निकला । वे जब भी पके बा-स्वाद हुए । बूढ़ी औरत का ख्याल था कि भूरे चावल उसके खेतों तक कोई भी लाया हो, दिखने में चाहे उनकी रंगत कैसी भी हो...पर हैं वो कमाल, उस ईश्वर को धन्यवाद, जिसने उसकी धरती पर नियामत बिखेरी, इंसानी ज़िंदगियों को उपहार दिया ।
कहन के हिसाब से शिकारी समाज के खेतिहर हो जाने का आख्यान है ये । एक इण्डोनेशियाई द्वीप की भूस्थैतिक परिस्थतियों में ऊंची जंगली भूमि में कुत्ते जैसे जानवर को पालतू बना चुकने और शिकार के समय में उसका सहयोग लेने का उद्घाटन करती यह कथा कुत्ते के घाटी में गिर जाने और शिकारी को सहयोगी की चिंता हो जाने का बयान करती है । घाटी में चावल की खेती का स्रोत एक बूढ़ी से जोड़े जाने का आशय कदाचित उसके अनुभव समृद्ध होने से हो । बूढ़ी स्त्री, भूखे शिकारी को भोजन पर आमंत्रित कर, अपने मेहमान नवाज़ होने और सामाजिक शिष्टाचार युक्त होने का परिचय देती है । किन्तु चावल के अधकच्चे होने का कथन उस बूढ़ी की पाक कला पर प्रश्न चिन्ह खड़े करता है यानि कि वो चावल की काश्तकार / मातृदेवी तो है पर भोजन बनाने में निपुण नहीं है । जबकि शिकारी प्रतिदिन कच्चे मांस को मद्धम आंच में पका कर खाने का हुनर ज़रूर जानता होगा ।
कुल मिलाकर अनुभवी काश्तकार और अनुभवी शिकारी रसोइये के अलग अलग नैपुण्य का मिलन था यह, जो उन्होंने ब्याह कर लिया । कथा में उम्र का स्पष्ट उल्लेख ना होने के बावज़ूद प्रतीत यह होता है कि शिकारी उस स्त्री से कम उम्र रहा होगा ? उसे अपनी पाक कुशलता / ज्ञान को अन्य ग्रामीणों से साझा करने में कोई उज़्र ना था...पर अपनी जन्मभूमि / अपने गांव के प्रति उसका मोह और गांव में खेती करने का निश्चय उसे चावल के बीज चुराने और आश्रयदाता, मेहमान नवाज़ पत्नि से छल करने वाला बना देता है यानि कि वो शिकार से अस्तित्व रक्षा के बजाये खेती में अपना भविष्य सुरक्षित मान लेता है । शिकारी की तरह से स्त्री भी अपने गांव से मोहासक्त है और गांव को छोड़ने ना छोड़ने की कशमकश में पति को छोड़ देना मुनासिब समझती है, किन्तु उसे यह मंज़ूर नहीं है कि शिकारी उसके जीवन रक्षण का रहस्य / चावलों की काश्तकारी का ज्ञान खासकर बीज, उससे लेकर चला जाए । वे दोनों बिछड़ने पर सहमत हैं पर उन दोनों में से शिकारी यानि कि पुरुष पात्र छलिया है ।
शिकारी को सुफैद चावलों से मुहब्बत थी सो उसने उन्हें कभी बेचा ही नहीं पर...भूरे चावलों को घर में सहेजा भी नहीं । भूरे चावल बेचे गये, यह खेतिहर व्यवस्था में बाज़ारीकरण के प्रवेश जैसा संकेत है...और अद्भुत कथन ये कि शिकारी की उपेक्षा से भूरे चावल दुखी थे, सो वे खेत दर खेत दूर तक बिखरते चले गये । असल में ये कथन प्रकृति के जीवित होने और वनस्पतियों में मनुष्यों जैसी संवेदनायें / अनुभूतियां होने का कथन है । बहरहाल प्राकृतिक तौर पर आप्रवासी हुए भूरे चावल अनुकूल मौसम और माटी में समृद्ध हुए । संयोगवश यहां भी एक बूढ़ी स्त्री किसान है जो शुरू में भूरे चावलों की खेती के प्रति सशंकित है, लेकिन अनुकूलता में फसलें लहलहाती हैं और उन्हें प्रेम मिलता है जैसा संकेत देती हुई ये कथा समाप्त हो जाती है । आबादियों में भूख और कामुकता नैसर्गिक अपरिहार्यतायें है और अपरिहार्य है प्रेम, स्त्रियों से, भोजन से...   

बुधवार, 20 जून 2018

किन्नर - 22


यह एक सोमालियाई परिवार, जहां कर्रावीलो यानि कि धरती धारिणी का जन्म हुआ था वो बेहद बुद्धिमान और साहसी लड़की थी उसके युवा होते ही अनेकों पुरुष उसके अभिभावकों से याचना करने लगे कि कर्रावीलो का हाथ उनके हाथ में दे दिया जाए । कर्रावीलो के अभिभावकों ने उसका ब्याह उस युवक से कर दिया, जिसने सबसे अधिक दहेज / वधु मूल्य विशेषकर, पशुधन उन्हें दिया । हालांकि वो घर और बच्चों तक सीमित रहने वाली युवती नहीं थी । वो चाहती थी कि उसे पंचायत की न्यायार्थ बहसों में शामिल किया जाए और वो पुरुषों के समतुल्य चर्चा में भाग ले तथा ऐसी ही अन्य, यहां तक कि युद्ध गतिविधियों में भी लिप्त बनी रहे ।

गांव की वृद्धजन परिषद ने कहा यह उचित नहीं है कि कर्रावीलो पुरुषों की तरह से व्यवहार करे उनके मंतव्य से कर्रावीलो को अन्य स्त्रियों की भांति घर द्वार सँभालना चाहिए । कर्रावीलो ने कहा मूर्खो, स्त्रियां भी पुरुषों की तरह से बाह्य गतिविधियों के योग्य होती हैं, उन्हें इसका अवसर मिलना चाहिए । कर्रावीलो का पति, अपनी पत्नी की इस मांग पर आश्चर्य चकित था किन्तु वह अपनी पत्नि का विरोध नहीं कर सका । कर्रावीलो ने सभी स्त्रियों से कहा कि तीन दिन तक घर के कोई काम मत करो ताकि पुरुष घर के कामों में व्यस्त हो जायें और उन्हें कुछ सोचने का मौक़ा ना मिले । इसी बीच हम सब स्त्रियां मिलकर उनके हथियारों पर कब्ज़ा कर लेंगे और दुष्ट पुरुषों को हटा कर इस धरती पर स्त्रियों की सत्ता स्थापित करेंगे ।   
   
स्त्रियों ने ऐसा ही किया, पुरुषों को कुछ सोचने समझने का अवसर ही नहीं मिला, वे घर के काम करने में व्यस्त हो गये और सत्ता पर अधिकार जमाने की, कर्रावीलो की योजना, सफल हो गई, वो उस भूभाग की मुखिया बन गई । अब सारी सत्ता, स्त्रियों के हाथ में थी ।  कर्रावीलो को भय था कि पुरुष कभी ना कभी पलटवार करने की कोशिश करेंगे सो उसने आदेश दिया कि सारे पुरुषों का बंध्याकरण कर दिया जाए , जिन पुरुषों ने बंध्याकरण का विरोध किया, उन्हें मृत्यु दंड दे दिया गया ।  

कहते हैं कि, कर्रावीलो अपने हाथों से अपनी पीठ की सफाई नहीं कर सकती थी, उसके पास एक हज़ार ऊंटनियां थीं, जिनका दूध पी पी कर वो और भी मोटी हो गई थी, अतः नहाने के समय ठीक से सफाई नहीं कर पाने के कारण से, उसकी देह से दुर्गन्ध आने लगी थी, जिसके कारण से लोग उससे दूर दूर भागने लगे थे हालांकि कोई भी व्यक्ति ये सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता था ।  

एक दिन कर्रावीलो ने अपने अनेकों किन्नर दासों में से एक से कहा, मैं तुम्हें एक बछड़ा इनाम में दूंगी अगर तुम बिना कुछ कहे, मेरी पीठ की सफाई कर दोगे । उसने अपने स्नान कक्ष में कपड़े उतारते हुई सफाई के लिये दास को बुलाया जोकि दुर्गन्ध की ताब ना ला सकता और उसके मुंह से उफ़ निकल गई । कर्रावीलो चिल्लाई, अब तुम्हें बछड़े का एक अंश भी नहीं मिलगा और वो, वापस भागते हुई दास को दण्डित करने की जुगत में लग गई ।  

गौरतलब है कि कर्रावीलो के वृत्तान्त का प्रथम संस्करण विशुद्ध रूप से स्त्रीवादी है, जहां पुरुषों को सत्ता से बेदखल करने वाली नायिका के रूप में कर्रावीलो का उल्लेख किया गया है जोकि अवसर मिलते ही पुरुषों से, उनका दंभ छीन लेती है, उन्हें पौरुषहीन कर देती है, यानि कि इस संस्करण में उसे, पुरुषों को निस्तेज कर देने वाली, शौर्यशाली महिला के तौर उद्धृत किया गया है जबकि कथा के दूसरे संस्करण में कर्रावीलो को, अनायास ही प्राप्त हुई, सुख / समृद्धि / विलासिता के गर्त में डूब कर मोटी हो गई महिला के तौर पर दर्शाया गया है । प्रतीत होता है कि गल्प का दूसरा संस्करण कर्रावीलो का उपहास उड़ाने की गरज़ से जोड़ा गया / प्रसरित किया गया है । 


सोमवार, 25 दिसंबर 2017

नींद का पानी


अनेकों चन्द्र मास गुज़रे, मुखिया बीमार था ! वो इस उम्मीद के साथ, पवित्र घाटी में जा पहुंचा कि वहाँ के वाष्पित जल के जादुई प्रभाव से उसकी समस्या का निदान हो जाएगा हालांकि घाटी के, उस गर्म जलस्रोत में इतनी शक्ति नहीं थी कि, उससे मुखिया की बीमारी दूर हो जाए ! गर्म पानी में नहाने, गर्म कीचड़ अपनी देह में लपेटने, पसीना बहाने के बावजूद मुखिया की तबियत में कोई सुधार परिलक्षित नहीं हुआ बल्कि उसकी हालत और भी बिगड़ने लगी थी ! असहनीय दर्द के कारण से वह सो भी नहीं पाता था ! एक रात जब वो, अपने खेमे में बेचैन पड़ा हुआ था, उसकी सुंदर पुत्री, पिता की व्यथा पर रोती हुई आई, पुत्री ने पिता का हाथ पकड़ा और उसे घाटी से बाहर ले जाने लगी !

पुत्री को ठंडे जलस्रोत की तलाश थी, उसे यह विश्वास था कि ठन्डे जल का जादुई असर, उसके पिता को रोगमुक्त कर देगा, पहाड़ों और गहरी घाटियों को पार करते हुए, वो दोनों अंततः उस जगह पर जा पहुंचे, जहां चट्टानों को चीरकर, पांच ठन्डे झरने बह / जलस्रोत फूट, रहे थे ! यहां, पुत्री ने लौकी के तुम्बे में ठंडा जल भरकर अपने पिता के मुंह से लगा दिया ! ठन्डे और ताजगी भरे जल को पीकर बीमार मुखिया गहरी नींद में सो गया...और जब वो नींद से जागा तो उसका दर्द खत्म हो चुका था, उसे यातनादाई व्याधि से मुक्ति मिल चुकी थी ! अपनी प्यारी पुत्री के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये मुखिया ने पुत्री को एक नया नाम दिया, चेवॉक्ला यानि कि नींद का पानी...

आख्यान कहता है कि मुखिया की समस्या वर्षों पुरानी थी, वो दर्द से तड़पता रहता, उसे मुक्ति चाहिए थी, असहनीय दर्द से मुक्ति, व्याधि से मुक्ति ! लगता ये है कि, उसके अपने गांव में इस बीमारी का कोई इलाज़ संभव नहीं हुआ होगा, तभी वो ऊष्म जल स्रोतों के कुंड वाली घाटी में जा पहुंचा...उसने वहाँ पर अपना खेमा लगाया हुआ था, जिसका मतलब ये हुआ कि उसको तप्त जल कुंडों की वाष्प / कीचड़ से,समस्या निदान की उम्मीद थी और इसीलिए वो लंबे अरसे तक वहाँ रुकने की गरज़ से आया था ! मुखिया की अपेक्षा के विपरीत, वाष्प और कीचड़, व्याधि मुक्ति में सहायक सिद्ध नहीं हुए ! बहरहाल ये मानने में कोई हर्ज़ नहीं कि वाष्प और कीचड़ के माध्यम से व्याधि मुक्ति की धारणा, प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली का हिस्सा है !

ये कथा, मुखिया के दर्द की असहनीयता और व्याधि से मुक्ति की असफलता के दौर में, मुखिया की सुंदर पुत्री के आगमन का कहन करती है... पुत्री जो पिता के दर्द में आंसू बहा रही है, पुत्री जिसे अपने पिता के स्वास्थ्य की चिंता है, पुत्री जिसे पिता के लिये चिकित्सकीय विकल्पों की तलाश है, पुत्री जो पिता के सेहतमंद होने के इरादे से लंबी दुर्गम यात्रायें करने के लिये तत्पर है, पुत्री जो बीमार पिता को अपने हाथों के सहारे लेकर चलने तैयार है ! कहने का आशय ये कि इस नाशवान दुनिया की पुत्रियां अपने पिता से बेपनाह प्यार करती हैं, उनकी फ़िक्र करती हैं ! कथा कालीन समुदाय के मुखिया की पुत्री में निर्णय लेने की क्षमता / साहस है, वो पिता द्वारा अब तक करवाई गई, प्राकृतिक चिकित्सा के परिणामों से संतुष्ट नहीं है !

पिता के पास उसका आगमन, पिता के दर्द पर केवल आंसू बहाती, थकी हारी हुई लड़की के जैसा नहीं है बल्कि वो शिद्दत से पिता को अपने हाथों का सहारा देकर उठाती है और...निकल पड़ती है नये चिकित्सकीय विकल्प की खोज में, उसमें पिता की सेहत के नाम पर पर्वत लांघने, घाटियाँ पार करने का हौसला है ! चूंकि ऊष्ण वाष्प और कीचड़ की चिकित्सा पद्धति निष्फल रही थी सो ताजे, ठन्डे और मृदु जल को चिकित्सा का माध्यम चुनने का ख्याल सहज और स्वभाविक ही माना जाएगा, लेकिन स्पष्ट तथ्य ये कि पुत्री भी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में यकीन रखती थी ! संभव है कि गांव छोड़कर बाहर निकलने का एक कारण यह भी हो कि वहाँ मौजूद तमाम चिकित्सा पद्धतियाँ उनकी समस्या के निदान में विफल रही हों !

पुत्री ने ठन्डे ताजे जल स्रोत का पानी तुम्बे में भरकर पिता को दिया, जिसे पीकर बेचैन पिता को नींद आ गई और वह व्याधि मुक्त हुआ ! यदि हम तो चाहें पानी के ठंडेपन और ताजगी को सांकेतिक रूप से सेहत की ठंडक और ताजगी से जोड़कर देख सकते हैं !  बहरहाल असहनीय दर्द से मुक्ति के लिये पुत्री के प्रयत्नों से कृतज्ञ पिता उसका नया नामकरण करे तो इसमें आश्चर्य कैसा ?

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

जल समाधि


वो बेहद खूबसूरत युवती थी, उसे देख कर पुरुष बावले हो जाया करते, हालांकि वो जिससे भी ब्याह करती, वह युवक, ब्याह के फ़ौरन बाद मर जाया करता, लेकिन इससे उस युवती को कोई फर्क नहीं पड़ता था ! वो एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा...और अगला ब्याह करती रही ! उस साल उसके पांच पति काल कवलित हो चुके थे ! वे सभी चतुर, बहादुर और आकर्षक कबीलाई युवा थे ! पांचवें पति की मृत्यु के बाद, उसने जिस युवक से ब्याह किया, वो खामोश तबियत इंसान था और गांव के लोग उसे बेवकूफ समझते थे, लेकिन वो युवक, वास्तव में उतना बेवकूफ भी नहीं था ! उसे ये विश्वास हो गया था कि युवती से सम्बंधित  कोई विस्मयकारी रहस्य ज़रूर है, जिसे जान लेना ज़रुरी है, इसलिए युवक ने दिन रात / हर एक समय उस युवती की निगरानी शुरू कर दी !

यह गर्मियों का समय था जब युवती ने, युवक से कहा कि जलावन की लकडियां लाने और बेरियां चुनने के लिये यह उपयुक्त समय है, चलो जंगल चल कर कैम्प लगाते हैं ! उसने सुझाव दिया कि युवक को अस्थाई झोपड़ी बनाने के लिये, जंगल में एक खास जगह चयनित जगह में रुक कर बाकी के काम निपटाना होंगे, युवक मान गया और झोपड़ी निर्माण के लिये सामग्री लाने के नाम पर घने जंगल में घुस गया ! युवती ने सोचा कि युवक अलग दिशा में गया है सो, वह झटपट, पथरीली चट्टानों की दिशा में मौजूद एक जलाशय के किनारे जा पहुंची जबकि युवक छुप कर उसका पीछा करता रहा ! युवक की गतिविधियों से अनभिज्ञ युवती ताल के किनारे बैठकर एक गीत गाने लगी !

गीत गायन के समय ताल की सतह पर झाग / फेन हिलोरें मारने लगा और उस झाग से एक महाकाय सांप प्रकट हुआ ! इस दरम्यान उस युवती ने अपने गहने और कपड़े उतार कर एक किनारे रख दिये थे और वो उस सांप से लिपट गई, छिपा हुआ युवक समझ गया कि प्रेमालिंगन के दौरान, सांप का जहर उस युवती के शरीर में प्रविष्ट हो जाता है, जिसे अन्य युवकों में स्थानांतरित करके युवती अपनी प्राण रक्षा कर लेती है,जबकि विष प्रभावित युवक मर जाया करते हैं ! युवक फ़ौरन वापस लौटा और पूर्व निर्धारित जगह पर अस्थायी झोपड़ी बना कर उसने जानबूझकर दो बिस्तर बनाए और अलाव जला लिया ! कुछ देर बाद कैम्प में वापस लौटी युवती, दो अलग अलग बिस्तर देख कर हैरान रह गई, उसे उम्मीद थी कि वहां पर एक ही बिस्तर होगा !

उसने, युवक से इस सम्बन्ध में बात की तो युवक ने कड़ाई के साथ युवती के झूठ को उजागर कर दिया, वो डर गई और दूसरे बिस्तर पर जाकर सोने लगी ! युवक रात में तीन बार उठा, उसने आग प्रज्ज्वलित की और हर बार उस युवती को पुकारा, लेकिन उसे कोई जबाब नहीं मिला, सुबह होने पर युवक ने युवती को हिलाया किन्तु वह मर चुकी थी...अपने ही प्रेमी, सांप के जहर के प्रभाव से...युवक ने गांव वालों के साथ मिलकर, दिवंगत युवती की देह को उसी ताल में विसर्जित कर दिया, जहां उसका प्रेमी रहता था ! 

ये आख्यान मूल अमेरिकन इन्डियन, पास्सामक्वोडी कबीले से सम्बंधित है ! खूबसूरत युवती को देखकर युवाओं का प्रभावित हो जाना स्वभाविक है किन्तु विवाह के फ़ौरन बाद हो रही मौतों पर आंखें मूँद लेना, अस्वभाविक लगता है, खासकर तब, जब कि दिवंगत हुए पाँचों पति, चतुर, बहादुर और आकर्षक बताये गये हैं ! युवती का छठा पति, खामोश तबियत इंसान होने के नाते अपने ही समाज में बेवकूफ माना गया क्योंकि वह स्वयं को अभिव्यक्त नहीं करता था ! सामान्यतः ऐसे लोग, लगभग प्रत्येक कालखंड और हर एक समाज में चुप्पे अथवा घुन्ने कह कर संबोधित किये जाते रहे हैं ! बहरहाल युवती द्वारा छठे पति बतौर चयनित किये गये इस युवक में, प्रेम में अंधे हो गये, जैसे लक्षण दिखाई नहीं देते क्योंकि वह पूर्व घटनाक्रम के प्रति सशंकित है !

कहना कठिन है कि ताल निवासी सांप ? यदि वह सांप ही था तो ?  के प्रेम में पड़ी हुई युवती को जहर का अभ्यास क्यों नहीं था, सामान्यतः युवतियों को विषकन्या बनाए जाने संबंधी अनेकों दृष्टांत मिलते हैं, जिनमें विषकन्या स्वयं में, व्यापित जहर से दिवंगत नहीं हुआ करतीं ! क्या ये संभव नहीं है कि ताल निवासी सांप वास्तव में सांप होने के बजाये, नाग कुल का कोई व्यक्ति रहा हो ? और विवाहेत्तर संबंधों के उजागर हो जाने के कारण युवती को जहर दे कर मौत के घाट उतार दिया गया हो ? किन्तु इस स्थिति में हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि पांच, चतुर और बहादुर युवकों की मौतों के लिये युवती का प्रेमी उत्तरदाई रहा होगा जिसने अपने अवैध संबंधों को छिपाने के युवती के पाँचों पतियों को जहर देकर मार डाला होगा ?

प्रतीत होता है कि युवती मूलतः नाग कबीले की कोई विष कन्या रही होगी जोकि कबीलाई दुश्मनी के चलते, चुन चुन कर विरोधी कबीले के चतुर, बहादुर और आकर्षक युवकों को, अपने प्रेम जाल में फांस कर ठिकाने लगा रही थी, किन्तु छठे युवक की सजगता के चलते, उसे स्वयं के प्राण गवाना पड़े होंगे, वैसे तो प्रेमी के होते हुए भी अन्य युवकों से समानान्तर विवाह करने वाली युवती को काम पीड़ित / काम व्याधिग्रस्त कह कर भी कथा के अर्थ, अनर्थ किये जा सकते हैं, लेकिन इस धारणा में झोल यह है कि काम संतुष्टि के लिये ब्याह की अनिवार्यता क्या मायने रखती है ? अतः कबीलों की आपसी शत्रुता और विरोधी कबीले के बहादुर युवकों की मौतों को लेकर युवती के विषकन्या होने तथा रहस्य उजागर हो जाने की स्थिति में स्वयं के मारे जाने की धारणा को अधिक तर्कसंगत माना जाना सकता है !

बहरहाल दिवंगत युवती की जल समाधि, उसके अपने निर्णयों का प्राप्य है...   

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

सुफैद घोड़ा


अंतरीप के मुखिया की पुत्री बहुत सुंदर थी जिसे ब्याहने के लिये अनेकों योद्धा उत्सुक थे लेकिन बात अंतिम रूप से दो योद्धाओं पर अटक गई थी, उनमें से एक अंतरीप की विन्नीपेगोसिस झील का मुखिया था और दूसरा राक्षस ताल का सिओक्स मुखिया ! कुल मिलाकर उस युवती से ब्याह के दावे को लेकर उन दोनों में शत्रुता पनप गई थी !  हालांकि युवती स्वयं अंतरीप के योद्धा के पक्ष में थी और जब विन्नीपेगोसिस झील के मुखिया ने युवती के पिता को मेक्सिको से लाकर एक सुफैद घोड़ा, उपहार स्वरुप सौंपा तो वो भी अपनी पुत्री का हाथ उस अंतरीप योद्धा को देने के लिये सहमत हो गया ! उधर सिओक्स मुखिया स्वयं के दावे को खारिज किये जाते ही क्रुद्ध हो गया और उसने ब्याह के दिन एक बड़ी सेना लेकर युवती के घर पर आक्रमण कर दिया !

आकस्मिक आक्रमण को देखकर अंतरीप योद्धा ने अपनी पत्नी को सुफैद  घोड़े पर बैठाया और स्वयं धूसर रंग के घोड़े पर बैठ कर सिओक्स मुखिया की सेना से विपरीत दिशा की ओर चल पड़ा ! प्रेरीज घास के मैदानों की भूल भुलैयों में उन्हें देख पाना मुश्किल था, एक समय उन्हें लगा कि सिओक्स मुखिया की सेना से पीछा छूट गया है तो वे फिर से समतल मैदान में आ गये किन्तु अप्सरा जैसी उस युवती के सुफैद घोड़े को मीलों दूर से भी देखा और पहचाना जा सकता था इसलिए उन दोनों प्रेमियों के ऊपर तीरों की बरसात जैसी होने लगी, परिणाम स्वरुप प्रेमी द्वय काल के गाल में समा गये ! उनकी मृत देहें घोड़ों से नीचे गिर गईं ! सिओक्स मुखिया ने धूसर घोड़े को अपने कब्ज़े में ले लिया लेकिन सुफैद घोड़ा वहाँ से भाग गया !

इस घटनाक्रम के एक प्रत्यक्षदर्शी ने दावा किया कि उसने वधु की आत्मा को सुफैद घोड़े में समाते हुए देखा है, उसके बाद ही वह घोड़ा सिओक्स मुखिया के चंगुल से निकल भागा था ! कहते हैं कि सुफैद घोड़ा, अंतरीप योद्धा और उसकी ब्याहता पत्नि की मृत्यु के सालों बाद तक उस मैदान में भटकते हुए देखा गया था ! स्थानीय निवासी उस घोड़े के निकट जाने से डरते थे क्योंकि उसमें मृत युवती की आत्मा का वास था ! वे तो ये भी मानते हैं कि घोड़े की स्वयं की मृत्यु के बाद भी, घोड़ा उस मैदान में भटकता रहता है ! आज भी उस मैदान को उस घोड़े के नाम से जाना जाता है !

मूल रूप से यह एक दुखांत प्रेम कथा है, जिसमें प्रेम की वैवाहिक परिणति / पारिवारिक स्वीकृति का आधार, सुकन्या के पिता को उपहार स्वरुप प्राप्त एक सुफैद घोड़ा है ! इस आख्यान से प्राप्त संकेतों के आधार पर सुफैद घोड़े की उपलब्धता दुर्लभ मानी जानी चाहिये क्योंकि उसे दूसरे देश मैक्सिको से लाया गया है ! गौर तलब बात ये कि सुफैद घोड़ा, सुकन्या के पिता को दिया गया है, यानि कि यह अलभ्य वधु मूल्य है, जिसे विवाह के पूर्व ही चुका दिया गया है ...स्पष्ट तथ्य ये कि उक्त समाज में लड़की के पिता को अपने दामाद को क्रय करने के लिये दहेज की व्यवस्था नहीं करनी पड़ी, बल्कि दामाद ने स्वयं वधु मूल्य चुकाया ! स्मरण रहे कि तमाम दुनिया के आदिम जातीय समाजों, यहां तक कि पुरुष सत्तात्मक समाजों में भी, स्त्री पक्ष के महत्व को रेखांकित करने वाला बिंदु / कथन / चलन है, यह ! 

ये जनश्रुति विशुद्ध रूप से आदिम कबीलों के मुखिया / राज कुलों / अभिजात्य परिवारों के दरम्यान स्थापित होने वाले रिश्तों का कथन करती है, जिसमें विवाहोत्सुक, प्रतिभागी राज प्रमुख / मुखिया अपनी सफलता के लिये प्रयत्नरत है ! बहरहाल, विवाह के लिये, वधु मूल्य चुकाए जाने और चुकाए गये मूल्य को कन्या पक्ष द्वारा स्वीकार्य किये जाने के दौरान, हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि विवाह के लिये स्वीकृति प्राप्त जामाता को सुकन्या की प्रेम सहमति भी प्राप्त थी ! मुखरित तथ्य यह कि उक्त समाज में वर के चयन के लिये, सुकन्या की संस्वीकृति / सहमति भी अनिवार्य तत्व रही होगी ! इसमें, कोई आश्चर्य नहीं कि कथा में उल्लिखित पिता अपनी पुत्री के लिये वर चुनते समय तीन मुद्दों पर खास ध्यान देता है, एक तो वधु मूल्य, दूसरा सुकन्या की सहमति और तीसरा रिश्तों के लिये चयनित परिवार की समकक्ष प्रतिष्ठा / समतुल्य कुलीन हैसियत !

प्रथम दृष्टया यह आख्यान, बहुश्रुत प्रेत कथाओं जैसा लगता है, जिसमें नवविवाहित दम्पत्ति अपनी, अतृप्त कामनाओं के साथ अशरीरी रूप से, आज भी इस भौतिक जगत में भटकते फिरते हैं ! अतृप्त जागतिक इच्छाओं वाली, दिवंगत देहों की आत्माओं की भटकन की कथाएं, कमोबेश पूरी दुनिया में ऐसे ही कही सुनी जाती हैं जैसे कि इस कथा में, नायक प्रदत्त, उपहार पशुसुफैद घोड़ा, अकाल काल कवलित नायिका की भटकन का प्रतीक बन गया है ! इस कथा को बांचते समय हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आरंभिक समाजों से लेकर आज तक के समाजों में, प्रणय संगिनी चुनने की प्रक्रिया में असफल पुरुष अक्सर हिंसक पशु जैसा व्यवहार करने लगता है जैसा कि इस कथा में सिओक्स मुखिया...जोड़ा चुनने में असफल होते ही वधिक / हत्यारा हो गया, उसमें इतना भी विवेक शेष नहीं रहा कि उसे, सुकन्या का प्रणय समर्थन प्राप्त नहीं है और प्रतिस्पर्धी मुखिया द्वारा चुकाए गये वधु मूल्य की अलभ्यता, उसकी अपनी तुलनात्मक पराजय है / अक्षमता है !  

मुमकिन है कि सुफैद घोड़ा प्रणय प्रतीक हो, निश्छल, पवित्र, निष्कलंक प्रेम का...अथवा अपने स्वामी की यौन आकांक्षाओं के अतृप्त रह जाने का...   
  

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

बाज़ के पंख

तब एक बूढ़ा, एक युवा और उसकी दो पत्नियां, साथ में रहते थे ! युवा को अपने तीरों के लिये पंखों की ज़रूरत थी, उसे पता था कि दूर. ऊंचे पेड़ पर बाज़ का घोंसला हैं, वो वहां गया और पंख इकठ्ठा करने की गरज़ से पेड़ पर चढ़ने लगा, चूंकि बूढ़ा, युवा के प्रति जलन का भाव रखता था इसलिए उसने जादू से, पेड़ को बहुत ऊंचा कर दिया और पेड़ की छाल भी निकाल दी, जिसके कारण से पेड़ का तना बेहद चिकना हो गया ! युवा उस समय नग्न था अतः फिसलन भरे तने से होकर नीचे उतरना, उसके लिये असंभव हो गया था ! विवशतावश वो पेड़ के ऊपरी हिस्से में बना रहा और रात में अपने घर वापस नहीं लौट सका!उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठा कर बूढ़े ने युवा की पत्नियों से कहा, हमें ये घर छोड़कर, कहीं और जाना होगा ! अगली सुबह वे सभी घर छोड़ कर निकल पड़े ! युवा की पत्नियों में से एक संतानहीन थी और उसे, बूढ़े का कहना मानने में कोई संकोच नहीं था किन्तु दूसरी पत्नि अपने शिशु को लेकर बूढ़े के साथ जाने के लिये तत्पर नहीं थी, खास कर तब, जबकि उसका पति पीछे छूट रहा हो !

अगली रात, दूसरी पत्नि ने बूढ़े से कुछ दूरी पर कैम्प बनाया और अलाव जलाकर अपने शिशु के साथ रुक गई जबकि निःसंतान पत्नि ने बूढ़े के साथ रात बिताई, अगले कई दिन और रात ऐसा ही होता रहा,इस दौरान युवा पेड़ के ऊपर ही अटका रहा ! उसके पास कपड़े नहीं थे इसलिए ठण्ड से बचने के लिये उसने अपने लंबे बालों से अपना तन ढांक लिया था, यही नहीं, उसने बाज़ के पंखों को भी अपने बालों में जहां तहां खोंस लिया था ताकि बालों और पंखों से, उसे कम्बल के जैसी सुरक्षा मिल जाए ! जिन छोटी चिड़ियों ने आस पास के पेड़ों की टहनियों पर घोंसले बनाए हुए थे, उन्होंने बहुत कोशिश की, कि युवा जैसे तैसे पेड़ के नीचे उतर सके पर...उनकी मदद युवा के किसी काम नहीं आई और वो बदस्तूर पेड़ पर अटका रहा ! अंततः एक दिन एक बूढ़ी स्त्री अपने दोनों हाथों में नुकीली छड़ी लिये हुए पेड़ के नीचे आई और पेड़ पर चढ़ने लगी ! वो युवक तक पहुंची और फिर मकड़ी में तब्दील हो गई, उसने ऊपर से नीचे तक जाल बुना, जिसकी सहायता से युवा धरती पर उतरने में सफल हुआ !

जब वो अपने घर पहुंचा तो उसने देखा कि घर उजाड़ पड़ा हुआ है, वहां उसे कुछ पद चिन्ह दिखाई दिये, जिनका पीछा करते हुए वो कई दिनों तक चलता रहा और फिर उसे अपनी दूसरी पत्नि और पुत्र दिखाई दिये ! बच्चा चिल्लाया, मेरे पिता, युवती ने कहा, लेकिन वो तो मर चुके हैं...तब तक युवा उनके निकट पहुंच चुका था ! पत्नि ने पति से पूरा अहवाल कहा ! उसने कहा कि बूढ़ा हम दोनों स्त्रियों को अपने साथ ले जाना चाहता था किन्तु मैं उसके साथ जाने के लिये इच्छुक नहीं थी इसलिए अलग ठहरी हुई हूं जबकि आपकी पहली पत्नि उस बूढ़े के साथ अगले कैम्प में ठहरी हुई है ! इसके बाद वो अपने पति को बड़ी सी टोकरी में छिपा कर बूढ़े के कैम्प तक पहुंची और उसने टोकरी अलाव के पास रख दी, जिसे बूढ़े ने हटा कर दूर रख दिया लेकिन वो, उसे फिर से अलाव के पास ले आई ! युवक तेजी से बाहर निकला और उसने बूढ़े तथा धोखेबाज़ पत्नि की हत्या कर दी, फिर अपनी सच्ची और अच्छी पत्नि के साथ शिशु को लेकर पुराने घर लौट आया, जहां वे सभी लंबे समय तक, सुखपूर्वक रहे !

इस आख्यान को बांचने से यह तो स्पष्ट नहीं होता कि बूढ़े और युवा के मध्य कोई रक्त सम्बन्ध था लेकिन उनके दरम्यान मौजूद किसी ना किसी प्रकार की स्वजनता की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे दोनों एक साथ रहते थे ! उस युवा की दो पत्नियां थीं, जिनमे से एक निःसंतान थी जबकि बूढ़ा संभवतः परित्यक्त अथवा विधुर रहा होगा ! कथा संकेत यह है कि बूढ़ा व्यक्ति, स्त्री सानिध्य / यौन सुख से वंचित व्यक्ति माना जाएगा, जिसमें अनिवार्य, नैसर्गिक, दैहिक लालसायें शेष रह गई हों, इसी प्रकार से दूसरी पत्नि, निःसंतान रह जाने के कारण कदाचित स्वयं को उपेक्षित / पति साहचर्य से वंचित मानने लगी हो ! स्पष्ट ये कि उस समूह में दो व्यक्ति, निश्चित रूप से ऐसे थे जिन्हें दाम्पत्य जीवन से बाहर का यौनाकर्षण प्रभावित कर सकता था, एक वो बूढ़ा, जो कि विधुर अथवा परित्यक्त था और दूसरी निःसंतान स्त्री ! ये अनुश्रुति प्रत्यक्षतः यौनाकर्षण की बात नहीं करती, किन्तु परिस्थितिजन्य साक्ष्य कहते हैं कि बूढ़े का अनुसरण करना पहली पत्नि की कर्तव्य पारायणता या बुज़ुर्ग के प्रति आदर की अभिव्यक्ति नहीं था बल्कि उन दोनों का साथ, एक प्रकार से वंचित द्वय का सहज गठबंधन था !

कथा मोटे तौर पर यह घोषित करती है कि युवक आखेटक था, उसे बेहतर शिकार के लिये अपने तीरों को दुरुस्त रखना ज़रुरी था इसलिए परिंदों के पंख उसकी पहली प्राथमिकता थे जबकि काम सुख वंचित बूढ़े को इस अवसर की तलाश थी कि युवा घर से बाहर जाए और सुरक्षित घर वापस ना लौट सके ! प्रतीकात्मक रूप से जादू का उल्लेख कर, पेड़ की ऊंचाई बढ़ाने और पेड़ के तने से छाल उतार देने का कथन संभव है कि पूर्णतः असत्य हो ! लेकिन यह भी संभव है कि वो युवा स्वयं ही अपने हथियार को अधुनातन / मारक / घातक और अचूक बनाए रखने की लालसा के अंतर्गत, बेहद ऊंचे पेड़ पर जैसे तैसे चढ़ तो गया हो पर उतरते समय उसका हौसला पस्त हो गया हो और उसने, उसी ऊंचाई पर सुस्ताने का निर्णय लिया हो या फिर बूढ़े ने उसे ऐसा करने के लिये प्रेरित किया हो ताकि वह रात में उसकी अनुपस्थिति का फायदा उठा कर, उसकी दोनों पत्नियों को लेकर किसी अपरिचित स्थान की ओर पलायन कर जाए और घर वापसी के बाद युवा उन्हें ढूंढ ना सके, हालांकि दूसरी पत्नि के असहयोगी रवैय्ये के कारण से बूढ़े की योजना निष्फल हो गई !

युवा की पहली पत्नि, बूढ़े व्यक्ति के लिये पुत्रवधु तुल्य थी, उनमें आयु का वैषम्य था पर...कामुकता, नैतिकता की चेरी नहीं होती, वे दोनों परस्पर असमान होकर भी देह सुख गठबंधन धर्मी माने जायेंगे ! कथा कहती है कि दैहिकता कभी भी, किसी भी जगह या समय में सामाजिकता के तट बंध तोड़ सकती है ! उसके लिये सामाजिक मूल्य / आदर्श मायने नहीं रखते ! यौनिकता से इतर, उजाड़ पड़े घर से मिले पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए पहली पत्नि और संतान से मिलन तथा व्यभिचार के आरोपियों / विश्वासघातियों को दण्डित करने के उपरान्त, युवा की घर वापसी की कहन में कोई नयापन नहीं है किन्तु पेड़ की ऊंचाई पर अटके हुए उस युवा की मददगार, नन्हीं चिड़ियों और मकड़ी के उल्लेख का सांकेतिक अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रकृति, यौन नैतिकता / देह शुचिता के पक्ष में खड़ी हुई है ! दिलचस्प बात ये है कि बूढ़ी स्त्री के हाथों में नुकीली छड़ियां थीं यानि कि बुनाई करने वाली तीलियों के समान या चिकने पेड़ में सहजता से चढ़ने के उपकरण जैसी कोई वस्तु !

झुक कर चलने वाली बूढ़ी स्त्री और मकड़ी का सांकेतिक साम्य अद्भुत है, बूढ़ी स्त्री के  हाथ की नुकीली छड़ियां, मकड़ी के नुकीले पंजों के जैसी ! कह नहीं सकते कि वो मकड़ी का जाला था या फिर बूढ़ी स्त्री के द्वारा फेंकी गई रस्सी / रेशे निर्मित कोई संरचना, जिसकी सहायता से युवा, पेड़ से नीचे उतर पाया हो ! यह भी संभव है कि नुकीली टहनियों और छाल के रेशों की मदद से चिकने पेड़ से उतरने का प्रतीकात्मक सुझाव, बूढ़ी स्त्री / मकड़ी के द्वारा उस युवा को दिया गया हो / मिला हो ! ...हो सकता है कि इस कहानी में बूढ़ी स्त्री का उल्लेख, विश्वासघाती बूढ़े के प्रतिकार स्वरुप / स्त्री मददगार बतौर किया गया हो ! विशेष कर समाज में अच्छे बुरे के काउंटर बैलेंस / संतुलन के दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर ! बहरहाल यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं है कि कथाकालीन समाज आखेटक समाज था और वहां पर बहु-विवाह / बहु-स्त्री गामिता प्रचलन में थे, जिसके पश्चातवर्ती प्रभाव / परिणाम, कहे गये आख्यान का मूल आधार बन गये हैं !  

शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

सवा तीन

बेहद सकरी गली थी, लड़का किनारे हट गया  सामने लड़कियां झुण्ड में थीं, पीछे चल रही लड़की की कद काठी रंगत को नापने तोलने से पहले ही, उनकी निगाहें मिली, परम आह्लाद, अनिवर्चनीय आनंद का समय, ब्रह्माण्ड ठहर गया हो जैसे  झुण्ड से आवाज उठी, चलो भी, तिलस्म टूटा...फिर प्रेम या कि ईश्वर, जो भी था, वहां नहीं रहा 

शुक्रवार, 18 अगस्त 2017

ज़ुल्फ़ के शर होने पर...

चाहनामीड समुद्री किनारे से दूर एक द्वीप में अकेला रहता था, उसके पास एक घर और दो डोंगियां थी ! डोंगियां, ताकि वो आस पास आना जाना कर सके ! एक दिन उसने मुख्य भूमि के समुद्र तट पर खूबसूरत युवती को देखा, उसने युवती से कहा, चलो मेरे साथ द्वीप में रहना ! पहले युवती झिझकी...फिर चाहनामीड के दबाब में द्वीप जाने को तैयार हो गई, युवती ने कहा, द्वीप में रहने के लिये उसे कुछ वस्तुओं की आवश्यकता होगी, फिर वो अपने घर गई और वहां से लकड़ी का बड़ा खल बट्टा तथा कुछ अंडे लेकर आई ! इसके बाद वो दोनों डोंगी में बैठ कर द्वीप जा पहुंचे, जहां बहुत दिनों तक एक साथ रहे ! लंबे समय तक अविवाहित रहने के कारण चाहनामीड की अपनी ही तरह की आदतें थीं, यथा अपनी पत्नि को बताये बिना, वो लंबे समय के लिये घर से बाहर चला जाया करता, उसकी पत्नि को यह पसंद नहीं था पर...वो कुछ कहती नहीं थी ! निर्जन द्वीप में अकेला रहना उसे अच्छा नहीं लगता था, सो उसने, चाहनामीड को छोड़ने का फैसला कर लिया ! 

वापस जाने की तैयारी में उसने बहुत सारी गुड़ियां बनाईं, जिनमें से एक अन्य सब से बड़ी थी, आदतानुसार जैसे ही चाहनामीड, घर से गायब हुआ, युवती ने तट पर रखी दूसरी डोंगी में खल बट्टा सहित कुछ अण्डों को रख दिया और घर वापस लौट कर गुड़ियों को करीने से सजा दिया, कुछ इस तरह कि सबका मुंह घर के मध्य भाग की तरफ रहे, फिर उसने सबसे बड़ी गुड़िया को बिस्तर में लिटा कर, उसे फर से ढंक दिया ! युवती ने सारी गुड़ियों के पास थोड़ा थोड़ा जादुई पदार्थ भी रख दिया ! इसके बाद वो डोंगी लेकर मुख्य भूमि की ओर चल पड़ी ! जब चाहनामीड घर वापस लौटा तो उसने अपनी पत्नि को आवाज़ दी पर इसका कोई जबाब उसे नहीं मिला ! घर के अंदर घुस कर उसने गुड़ियों को देखा जो उसका मुंह दूसरी तरफ घूमते ही ठठाकर हंसतीं ! चाहनामीड को लगा कि बिस्तर पर उसकी पत्नि होगी सो उसने एक बड़ी छड़ी के सहारे बिस्तर से फर को हटाया, उसने देखा कि वो एक बड़ी गुड़िया थी, जो दूसरी गुड़ियों के मुकाबले और भी जोर से हंसी !

चाहनामीड ने चारों तरफ ध्यान से देखा, घर में खल बट्टा नहीं था, वो समझ गया कि युवती उसे छोड़कर जा चुकी है ! वो दौड़ते हुए तट पर पहुंचा तो उसने पाया कि उसकी दूसरी डोंगी पानी में बहुत दूर तक जा चुकी है ! उसकी पत्नि मुख्य भूमि में पहुंचने के लिये डोंगी को बहुत तेजी से खे रही थी, वो पहली डोंगी लेकर पत्नि के पीछे चल पड़ा, यथा शक्ति तेज दर तेज, चूंकि वो अपनी पत्नि से बेहतर और ताकतवर खिवैय्या था सो जल्द ही पत्नि की डोंगी के निकट जा पहुंचा ! यह देख कर पत्नि, डोंगी के अगले हिस्से में गई और उसने पानी में बट्टे को फेंक दिया जो सैकड़ों बट्टों में तब्दील हो गया ! डोंगी के सामने से इतने सारे बट्टे हटाने में चाहनामीड को समय लगा, तब तक युवती और भी दूर जा चुकी थी ! चाहनामीड ने चप्पू ज्यादा तेज चलाये और फिर से युवती के नज़दीक जा पहुंचा ! इस बार युवती ने पानी में खल फेंका, जो सैकड़ों खल में तब्दील हो गया, जिससे चाहनामीड के सामने एक नई बाधा खड़ी हो गई, उसने जैसे तैसे सैकड़ों खल सामने से हटाये !

उसने पुनः युवती के निकट पहुंचने की कोशिश की, लेकिन इस बार युवती ने पानी में अंडे फेंक दिये !  अण्डों की बाधा को रास्ते से हटा कर चाहनामीड, युवती को पकड़ने के लिये लेकर आगे बढ़ा, चूंकि युवती के पास अन्य कोई सामग्री नहीं बची थी, जिससे कि वो परित्यक्त पति का रास्ता रोक पाती, सो वो डोंगी में खड़ी हो गई और उसने अपने सिर से एक लम्बा बाल तोड़ा, जो उसके हाथों में आते ही भाले की तरह से सख्त हो गया, जिसे उसने चाहनामीड के माथे की ओर निशाना साध कर फेंका, चूंकि चाहनामीड तेजी से डोंगी खे रहा था तो वो यह देख नहीं सका कि युवती ने क्या किया ! भाला तेजी से चाहनामीड के माथे पर टकराया जिसके कारण वो डोंगी से पलट कर, नीचे पानी में गिर गया और डूब कर मर गया ! इसके बाद वो युवती मोहेगान लोगों तक वापस जा पहुंची और उसने मृत्यु होने तक का जीवन सुख पूर्वक जिया !

आख्यान कहता है कि युवक, सुंदर युवती की ओर आकर्षित हुआ और उसने युवती को सहजीवन व्यतीत करने के लिये प्रेरित / आमंत्रित किया ! युवती प्रथम दृष्टया अनिच्छुक थी फिर युवक के साथ जाने के लिये उसकी सहमति, स्त्रियोचित लज्जा जनक हो सकती है, चूंकि इस ब्याह कथा में, ब्याह के समय अभिभावकों का विवरण अलोप हैं सो माना जा सकता है कि यह प्रेम विवाह रहा होगा ! हालांकि युवती ने अनजाने द्वीप की ओर प्रस्थित होने से पहले, मक्का कूटने के लिये खल बत्ता रख लिया और अंडे शायद इसलिए कि घरेलू स्तर पर, खाने योग्य परिंदों के प्रजनन / पुनुरुत्पादन / मांसाहार की सतत व्यवस्था बनी रहे ! निश्चय ही युवती,परिवार बसाने की आकांक्षा के साथ मुख्य भूमि छोड़ कर द्वीप में पहुंची थी लेकिन पारिवारिक सामंजस्य के अभाव की कल्पना भी उसने नहीं की होगी, युवक को अकेले रहने की आदत थी, वह पहले भी किसी अन्य व्यक्ति के लिये उत्तरदायी नहीं था सो उसे, घर में अपनी उपस्थिति / अनुपस्थिति का विवरण किसी अन्य को देने का अभ्यास ही नहीं था !

कथन मंतव्य यह कि, कामजनित कारणों से युवती, उस युवक के जीवन में आई ज़रूर, लेकिन वह युवक अपने एकाकी जीवन काल की आदतों में अपेक्षित संशोधन नहीं कर सका जबकि युवती अपने बंधु बांधवों को तज कर युवक के भरोसे में, सहजीवन व्यतीत करने आई थी और परिवार चलाने की उसकी तैयारी, खल बत्ते और अण्डों की सांकेतिकता से स्पष्ट है ही ! हम मान सकते हैं कि युवती सामुदायिक जीवन छोड़कर, एक अकेले युवक के साथ रहने के लिये तत्पर थी किन्तु युवक अपने सामाजिक दायित्व के निर्वहन के लिये तैयार नहीं था ! उसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि युवती ने उसके लिये क्या क्या छोड़ा है और उसे युवती के त्याग की एवज किन किन अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए ! बहरहाल कथा, युवक की लंबी अनुपस्थिति के बावजूद, कुछ नहीं कहने के आशय से युवती के संयम का संकेत देती है लेकिन युवक, साहचर्य को लेकर पत्नि की अपेक्षाओं को समझ ही नहीं सका   या शायद महसूस ही नहीं कर पाया !

प्रेम में एक पक्षीय त्याग / समर्पण / अनुभूतियों की समझ को ढ़ोने का ठेका निश्चय ही उस युवती के हिस्से नहीं आया था, जोड़ा हो जाने के हालात में यह सब उस युवक का भी कर्तव्य था ! संभवतः द्वीप पर एकाकी जीवन जीते हुए उस युवक को, पशुवत यौनिकता का बोध अर्थात संगी से मिलो, सहवास करो और भूल जाओ का, ज्ञान तो था पर...उसे प्रणय और सहजीवन के मौलिक दायित्वों का बोध ही नहीं था ! युवती ने पति को पर्याप्त समय देने के उपरान्त ही परित्याग का निर्णय लिया ! उसने मुख्य भूमि की ओर पलायन करने से से पूर्व, पति से पिंड छुड़ाने के लिये यथा संभव तैयारियां की थीं, जो जल यात्रा के दौरान उसके काम आयीं ! दिलचस्प बात ये कि गृहस्थी के लिये जुटाये गये सामान का इस्तेमाल उसने, पीछा कर रहे परित्यक्त पति को बाधा पहुंचाने के लिये किया ! इस आख्यान बांचते हुए प्रतीत होता है कि कथाकालीन समुदाय की उक्त युवती को निर्णय लेने का अधिकार था सो उसने ब्याह करने का निर्णय लिया और परित्याग का भी ! इतना ही नहीं आक्रामक होते हुए, परित्यक्त पति / पुरुष के वध का निर्णय भी...


मंगलवार, 8 अगस्त 2017

मेहराब पर सूरज

बहुत पहले की बात है जब, एक भाई और बहन अकेले रहते थे !  उनके जीवन यापन का तरीका भी बिलकुल आज के जैसा ही था यानि कि पशुओं / परिंदों का शिकार करना और मछलियां पकड़ना ! बहन, हर एक दिन, तीतर, खरगोश और बनबिलाव पकड़ने के लिये झाड़ियों में फंदे लगाती ! इसी दिनचर्या के दौरान बहन और भाई ने किंचित भयाक्रांत होते हुए गौर किया कि दिन और रात, एक दूसरे का अनुसरण करते हुए, छोटे से छोटे होते जा रहे हैं, इनमें से दिन, खासकर बहुत ही छोटा होता जा रहा था !

यहां तक कि सूरज, जो कभी कभार ही दिखाई देता, जल्द से जल्द दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित धरती के मुहाने की ओर, धरती के नीचे छुप जाया करता ! भाई, बहन समझ गये थे कि आने वाले समय में, पूरी धरती में बर्फ जम जायेगी और उसकी सतह पर मौजूद सारा जीवन खत्म हो जाएगा ! उन्होंने इस समस्या का हल निकालने का निश्चय किया ! एक दिन जब बहन, जंगल में बनबिलाव को फांसने के लिये लगाये गये फंदों का अवलोकन कर रही थी, तो उसने पाया कि एक फंदे में फंस गये सूरज का दम घुट रहा था, उसका गोल चेहरा नीला पड़ने लगा था !

बहन ने अपने भाई को आवाज दी और फिर उन दोनों ने मिलकर सूरज को पकड़कर और पूरी तरह से खत्म कर देने की बात सोची लेकिन...सूरज ने उनसे, अपने जीवन के लिये याचना की ! सूरज ने कहा कि अगर तुम लोग, मुझे जीवित रहने दोगे तो मैं अपनी परिक्रमा का समय बढ़ा दूंगा, दिन को लंबा करते हुए धरती को इतना गर्म रखूंगा कि यहां जीवन सहज हो जाए ! अंततः इसी शर्त पर भाई और बहन ने सूरज को मुक्त कर दिया ! कहते हैं कि उसी समय से सूरज आकाश के मेहराब पर लंबे समय तक चमका करता है !

आदिम समय में भाई बहन का अकेले रहना और जीवन यापन के लिये पशु पक्षियों का शिकार करना अथवा नदी ताल में मत्स्याखेट करना कोई असामान्य बात नहीं है, खेतिहर हो जाने से पहले ज्यादातर समुदाय आखेटक ही रहे हैं, सो खेती के हुनर से अनभिज्ञ भाई बहन के लिये आखेट, अस्तित्व रक्षण की प्राथमिक अनिवार्यता रही होगी ! ये कथा, बहन द्वारा रात में फंदे लगाने और सुबह उन फन्दों का अवलोकन कर शिकार के फंसने की पुष्टि करने अथवा रात के निरर्थक बीत जाने का निर्णय लेने  से शुरू होती है ! स्पष्टतः शिकार के लिये रात और दिन का समय चक्र महत्वपूर्ण है !

भाई और बहन अनायास ही यह महसूस करते हैं कि अंधेरे और उजाले का समय / अंतराल घटता जा रहा है, खासकर दिन की आयु, रात्रि की तुलना में अधिक तीव्रता से घट रही थी, जबकि धरती पर सहज और सामान्य जीवन के लिये दिन भर, चमकते हुए सूरज से पर्याप्त ऊर्जा मिलते रहना अपेक्षित होता है, संभव है कि सूर्य नितांत प्राकृतिक कारणों से उस क्षेत्र में अपनी ऊर्जा बिखेर पाने में असमर्थ रहा हो ! आकाश में सूर्य की मुखर अनुपलब्धता निश्चय ही धरती पर चरम शीत का कारण बन सकती थी, ऐसे में भाई और बहन का भय बिलकुल भी अतार्किक नहीं था !

वर्तमान समय में हम अक्सर उदित और अस्त होते सूरज को अपने हाथों में कैद करने वाले छाया चित्र खींचते हैं...और फिर अनहोनी के होने जैसी  आत्ममुग्धता का शिकार हो जाते हैं, या यूं कहें कि अजब से सम्मोहन का हिस्सा बन जाते हैं ! प्रतीत होता है कि भाई बहन भी अति शीत के समय में इसी किस्म के दृष्टि भ्रम / मृग मारीचिका / मोह-भ्रम / इल्यूजन का शिकार हुए होंगें ! जिसके दौरान उन्हें, सूर्य उनके शिकारी फंदे में फंसा हुआ, मृत्यु के भय / फंदे की जकड़न से नीला पड़ता हुआ दिखाई दिया होगा, इतना ही नहीं उसने अपने प्राणों की एवज में, भाई बहन की उस शर्त को मान लिया होगा, जिसके तहत उसे, आकाश के मेहराब पर खुलकर चमकना था !

कथा संकेत यह है कि सूर्य को, हर एक लंबी रात के मुकाबले खड़े हुए, हर एक बड़े दिन भर, चमक कर / दहक कर धरती को गर्म रखना था ! लगता यही है कि, आकाश पर सूर्य की अनुपस्थिति, ऋतु-गत रही होगी और कालांतर में उसकी उपस्थित भी ! परन्तु एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे भाई बहन के लिये सूर्य की तमाम गतिविधियां, प्रतीकात्मक रूप से ही सही, उत्तरी पश्चिमी कनाडा के आदिम लोक जीवन में, एक अनुश्रुति का आधार ज़रूर बन गई हैं !             

      

मत्स्य पुरुष

वो लड़की, फ्रेजर नदी के मुहाने के निकट के गांव में रहती थी, उसने विवाहोत्सुक सभी युवकों के दावे खारिज कर दिये थे ! कुछ समय बाद उसे देखने के लिये एक युवा आया जो रात को उस लड़की के पास ही ठहर गया ! लड़की ने उससे कहा, तुम सुबह तक यहीं रुको ताकि मेरे अभिभावक तुम्हें देख सकें ! युवक ने कहा, नहीं, मैं बेहद गरीब हूं, संभव है कि तुम्हारे स्वजन, मुझे पसंद ना करें ! इस तरह से वह हर रात को युवती के पास आने लगा ! युवती ने यह बात अपने अभिभावकों को बतलाई, जो ये जानकर बहुत नाराज़ हुए ! असल में वह युवक एक मत्स्य पुरुष था, प्रतिक्रिया स्वरुप, उसने समुद्र को उस गांव से कई मील पीछे हटा लिया और स्वच्छ पानी के सभी स्रोत सुखा दिये, यहां तक कि वर्षा होना बंद हो गई ! पशुओं ने प्यास से निढ़ाल होकर गांव छोड़ दिया ! लोगों को मछलियां मिलनी बंद हो गईं, वहां पीने के पानी की एक बूंद तक शेष ना रही ! 

लड़की ने लोगों से कहा, ये सब मेरे प्रेमी ने किया है क्योंकि आप लोगों ने नाराज होकर उसका तिरस्कार किया है ! यह सुनकर गांव के लोगों ने समुद्र के किनारे तक पहुंचने के लिये कीचड़ के ऊपर लकड़ी के पटरे बिछाये और उसके अंतिम छोर पर एक बड़ा सा मंच बनाया ! मंच पर चटाइयां बिछाई गईं ! वहां ऊनी कम्बलों के अम्बार लगा दिये गये ! इसके बाद लड़की को खूबसूरत कपड़े पहनाए गये ! उसके बालों में तेल लगा कर, सुंदर केश सज्जा की गई, उसके चेहरे पर शानदार रंग लगाये गये ! इसके बाद लड़की को, कम्बलों के ऊपर छोड़ दिया गया ! अचानक आसमान में गहरे बादल छा गये, बारिश होने लगी ! झरने बहने लगे ! समुद्र गांव के निकट आ पहुंचा, चहुं दिश वसंत बिखर गया ! लोगों ने समुद्र को उफनते और मंच को उसमें तैरते हुए देखा ! उन्होंने देखा एक युवक, उस लड़की के बगल में खड़ा हुआ है ! लड़की चिल्लाई अब सब ठीक है मैं तुम सब से जल्द ही मिलूंगी !

रात गहराने लगी थी, लोगों को कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया ! दो दिनों के बाद वो लड़की अपने पति के साथ गांव वापस लौटी ! उसने कहा, मैं समुद्र के नीचे मत्स्य प्रदेश में रहती हूं, वहां के लोग भी वैसे ही रहते हैं जैसे कि आप लोग...और उनके घर भी इस गांव के घरों जैसे हैं ! वो दोनों गांव के लोगों के लिये, उपहार स्वरुप मछलियां लाये थे ! लड़की ने कहा, अब से गांव के लोग इस समुद्री किनारे पर ढ़ेरों मछलियां पकड़ सकेंगे, फिर वो दोनों, मत्स्य प्रदेश वापस लौट गये ! कहते हैं कि लड़की एक बार फिर से उस गांव में वापस आई, वो अपने नवजात शिशु को, उन्हें दिखाने लाई थी ! इसके बाद जब वो मत्स्य प्रदेश वापस गई तो उसे किसी ने कभी नहीं देखा ! 

ये सेलिश कथा, समुद्र तटीय बस्ती के लोगों की जीवनचर्या को संबोधित है, कथा की नायिका, उससे विवाह के लिये उत्सुक अनेकों युवकों को ठुकरा चुकी है और किसी नवागंतुक के साथ रात्रि व्यतीत करने का अधिकार उसके पास सुरक्षित है ! प्रतीत होता है कि उक्त समाज में युवतियों को अपने लिये वर चुनने और किसी युवा पुरुष के साथ रात्रि गुज़ारने की पूर्ण स्वतंत्रता थी, लेकिन विवाह के लिये निश्चित धारणा बना चुकने के बाद, उन्हें अपने परिजनों की औपचारिक स्वीकृति लेना भी अनिवार्य हुआ करती होगी ! आख्यान पर ध्यान दें तो कथा का नायक मत्स्य पुरुष मान लिया गया है, जिसके पास, समुद्र को बस्ती से दूर हटाने तथा वर्षा को रोक देने और मृदु जल स्रोतों को शुष्क कर देने का सामर्थ्य मौजूद है !

प्रतीत होता है कि सेलिश समाज के लिये, वो बाहर से आया हुआ विजातीय युवक रहा होगा ! संभवतः समुद्र में अवस्थित किसी द्वीप का कोई मछुवारा ! विवाह के उपरान्त गांव वापस लौटी युवती के बयान से भी यही लगता है कि वो समुद्र के बीच मौजूद मछुवारों की किसी बस्ती (मत्स्य प्रदेश) में निवास करने लगी थी, जिसके घर भी, उसके पैतृक गांव के घरों जैसे थे ! वो युवती पैतृक गांव में वापसी के समय अपने साथ,उपहार स्वरूप मछलियां लाई थी, सो यह कहना उचित नहीं लगता कि उसका पति, प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण रखने वाला,देवतुल्य मत्स्य पुरुष था ! क्या ये संभव है कि मछलियों का देवता, अपनी ससुराल पक्ष को मछलियों के आखेट के अवसर दे या फिर मछलियां बतौर उपहार दे, ताकि वे लोग उन्हें खा सकें, इसलिए लगता ये है कि वो युवा कोई मछुवारा ही था,जिसे विवाहोपरांत,ससुराल पक्ष के मत्स्याखेट से कोई आपत्ति नहीं थी !

अनुश्रुति के आरंभिक कथन के अनुसार सेलिश लोगों का किसी अपरिचित युवा के प्रति नाराज हो जाना अनुचित नहीं लगता, जोकि उनकी पुत्री के साथ रात्रि का सहचर तो हो जाए पर...युवती के अभिभावकों से मिलने में हीला हवाला करे ! ऐसा लगता है कि समुद्र का बस्ती से दूर जाना और पास आना ज्वार भाटे जैसी प्राकृतिक नैमित्तिक घटना का हिस्सा है जबकि ब्याह नहीं होने की स्थिति में, वर्षा नहीं होने, मछलियां नहीं मिलने और फिर ब्याह के उपरान्त, सब कुछ वासंती हो जाने जैसे प्रसंग युवती के विजातीय ब्याह को प्रासंगिक बताने की ग़रज जोड़े गये प्रतीत होते हैं ! युवती को लकड़ी के मंच में उपहार सहित विदा करने का एक ही आशय हो सकता है, लकड़ी के बेड़े / नाव-नुमा संरचना में बैठा कर जल मार्ग से ससुराल भेज देना ! अंततः उफनते समुद्र में उस मंच को तैरते हुए देखा गया था !