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बुधवार, 11 अगस्त 2010

ये सुबह जो आके ठहर गई है बे रौशनी सी अजाब जैसी !

अपनी जैविक घड़ी पे भरोसा टूट सा चला है...भोर पांच पंद्रह का अलार्म लगा कर सोया था हालांकि कुदरत की घड़ियां सुबह दो बजे से ही बजने लगी हैं...पास ही कहीं बिजली गिरी होगी ! उठकर देखता हूं बारिश तेजतर होती हुई, दूर स्ट्रीट लाईट सिमट सी गई है गोया तूफ़ान के आसार से सहमी हुई हो ! यक़ीनन कोई और वक्त होता होगा जबकि बूंदे गिनना रोमांटिक एहसासों में शामिल होता हो पर अभी तो उन्हें बूंदे मानने की हिमाकत नहीं कर सकता, आंगन  के पक्के फर्श पर हथौड़ों सी बजती हुई, भय पैदा करती हुई, वापस अपने बिस्तर पर दुबक गया हूं पर नींद जा चुकी है कोसों दूर ! 

बमुश्किल करवटें बदलते हुए तीन घंटे की ताबड़ तोड़ बारिश से बेसब्र हुआ, मैं सोचता हूं चाय पीकर नेट पर बैठ जाऊं...तलब किचन की ओर कदम खींचती है पर मैं कंप्यूटर रूम की ओर बढ़ता हूं, बेबस सा...हसरत भरी निगाहों से बीबी की ओर निहारता हुआ...काश जागती होती ! शादी के बाद की निर्भरता, तलब पर भारी पड़ती है और मैं उसके जागने का इंतज़ार करना तय करता हूं ! बाहर बारिश थम चुकी है, नेट पर आते ही ताज़ा प्रविष्टियों पर टिप्पणियां लिखने की शुरुआत से पहले खिड़की से बाहर झांकता हूं, सागवान के पत्ते गहरे स्याह हरे स्तब्ध से, सूरज महराज के आगमन की फिलहाल कोई खबर नहीं, दरख्तों की शाखों पर बसेरा लिए पत्तों का मौन मुझे हमेशा ही कष्टदाई लगता है, गोया किसी एडिक्ट ब्लागर का कंप्यूटर हैंग हो गया हो ! 

कुछ देर पहले तक की मूसलाधार बारिश के बाद , विलंबित सुबह के धुंधलके में अटकी हुई रौशनी के लिए पत्तों का यूं ठहर जाना,उदास कर गया ! ख्याल आता है कि ज़िन्दगी के लिए पानी ही नहीं रौशनी भी चाहिए इन्हें ! कुल जमा दोनों चाहिए मगर जरुरत बराबर...ना रत्ती भर कम ना रत्ती भर ज्यादा, इधर बैलेंस गड़बड़ उधर जान के लाले ! बेजुबानों में शुमार हैं सो इनकी चीख-ओ-पुकार कोई सुनता भी नहीं...पता तब चलता है जब लाशें बिछ जाती हैं ! स्तब्ध पत्तियों को देखकर तो यही लगता है कि रात जरुर ज्यादती हुई है, इनके साथ वर्ना हल्की सी हवा में क्या मस्त झूम झूम जाती हैं ये ! तब बूंदें  इतनी तेज ही थी कि इन्हें चोट जरुर पहुंची होगी या फिर हवाओं ने ये खबर ही दे दी होगी कि तुम्हारा पड़ोसी अपनी खिडकी से झांकता हुआ अपने कांक्रीट के किले में सुरक्षित है तो क्या ? बगल की बस्ती डूब चुकी है, मिट्टी की दीवारें भरभरा कर ढह गयी हैं, वहां मातम है ! 

मुझे सुबह के सूरज का इन्तजार है, शायद रौशनी में ये पत्तियां मुस्करा उठें तब मुमकिन है कि इनकी रंगत गहरी स्याह हरी से गहरी हरी दिखाई दे ! सुबह का इंतजार तो बगल की बस्ती वालों को भी होगा पर उनकी सुबह कब होगी ? फिलहाल तो वे रात की बूंदों की मार से साबुत बच गया कुछ सामान खोज रहे होंगे ! उनकी सुबह यक़ीनन मेरी सुबह से बहुत दूर होगी, दरख्त उदास हैं, शाखें खामोश हैं और पत्तियां शायद बगल की बस्ती के सोग में स्तब्ध सी ! वहां मलबे में अब भी कुछ सामान कुछ उम्मीदें जरुर बाकी होंगी ! आह ये सुबह जो आके ठहर गई है बे रौशनी सी अजाब जैसी...

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

बच्चे कौव्वों से सावधान नहीं हैं लेकिन .....

हमारे मित्र चन्द्रशेखर जी शहर की पाश कालोनी में रहते हैं , खुद की शानदार नौकरी , एक सुन्दर आत्मनिर्भर गृहणी और चिकित्सा शिक्षा प्राप्त कर रही एक मात्र पुत्री का छोटा सा ... सुखी परिवार ! वे सोचते बहुत हैं... कभी देश ...कभी दुनिया ...पर देखा परसों ही...और देखते ही मुझे फोन लगाया , क्या कर रहे हैं ? जी ... न्यूज देख रहा हूं...उन्होंने कहा कुछ खास ? मैंने कहा कुछ खास नहीं , बस टिकट बंट रहे हैं... जो टिकट पा गये वे निष्ठावान सिपाही हैं...जिन्हें नहीं मिला ...उनके हाथ भी खाली कहां हैं ? जब टिकट पाये हुए लोग भी लड़ने ही वाले हैं तो जिन्हें टिकट नहीं मिला वो लड़ रहे हों तो इसमें हर्ज ही क्या है ?
मित्र नें कहा , यहां पास की स्लम के कुछ बच्चे खड्डे के कोरे टुकड़ों को बैनर की तरह लेकर पैदल मार्च कर रहे हैं , उनकी रैली आप भी देखते तो अच्छा होता ! मेरे पास कैमरा नहीं है वर्ना फोटो खींच लेता ...बच्चे नारे लगा रहे हैं ! जिन्दाबाद... मुर्दाबाद ...मित्र लगातार बोल रहे हैं ...पर मेरे कान बंद हो चुके हैं ...और मैं सोच रहा हूँ ...हाँ ...ये सच है ! सारा देश ...सारे का सारा देश...'पाश' और 'स्लम' रिहायशगाहों की सीमा रेखाओं में बंटा हुआ ! पाश इलाकों में रहने वाले 'सिटीजंस' देख रहे हैं , पाश इलाकों में रहने वाले 'सिटीजंस' यानि कि मैं भी सोच ही रहा हूँ !
स्लम्स के बच्चे 'जुलूसों' में तब्दील हो चुके हैं , उन्हें सड़कों से गुजरते हुए , मैदानों में फ़ैल कर भीड़ बन जाना है , उन्हें वोटर बनना ही होगा ! इधर कौव्वे कुर्सियां तोड़ रहे हैं , उधर कौव्वे पत्थर फेंक रहे है ...इमारतों के शीशे चटक रहे हैं और बच्चे ...उनका क्या ? उनके हाथों में खड्डे , जिस्म पर चड्ढी और सामने सड़क तो हैं ना ?
मित्र कहते हैं कि बच्चे कौव्वों से सावधान नहीं हैं लेकिन कौव्वों से निपटने की तकनीक उन्हें और मुझे भी कहां आती है ?