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रविवार, 31 दिसंबर 2017

ललमुंहे बंदर

जब ईश्वर ने धरती को बनाया तो उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो निर्माण सामग्री को अपनी विशाल कुंडली में संभाल कर रखे ! इस तरह से धरती को आकार मिला ताकि सभी तरह के लोग, परिंदे और जानवर, उस पर, अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकें ! उस समय प्राचीन सांप ने चार खम्बे, उत्तर, दक्षिण, पूरब,पश्चिम बनाए, जिन्हें अपनी कुंडली में जकड़ कर सीधा खड़ा रखा और  स्वर्ग इन्हीं खम्बों पर टिका हुआ है ! प्राचीन सांप की त्वचा काली, सुफैद और लाल रंग की थी जिसकी वज़ह से रात, दिन और सांझ बनी ! शुरू में धरती पर पानी ठहरा हुआ था इसलिए महाकाय सांप ने झरने और नदियाँ बनाईं, इसके कारण से जीवन चक्र प्रारम्भ हुआ ! इसके बाद जैसे जैसे महाकाय सांप, ईश्वर को नई दुनिया दिखाने लगा, उन सभी जगहों पर पर्वत बन गये, जहां पर ईश्वर ठहरा / चलते चलते रुक गया था !

सृजन का कार्य संपन्न होने पर ईश्वर ने देखा कि बहुसंख्य पर्वत, असंख्य वृक्ष, अनगिनत जीव, अकेली धरती पर बोझ बनने वाले हैं, तो उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो धरती की सहायता करे, सो महाकाय सांप ने खुद की पूंछ को अपने मुंह में दबा कर एक घेरा बना लिया ! इसके बाद ईश्वर ने लाल मुंह के बंदरों को निर्देश दिया कि जब भी अर्वाचीन सांप को भूख लगे, वे उसे खाना खिलाएं ! तब से लेकर आज तक अर्वाचीन सांप ने धरती को संभाल रखा है, हालांकि जब जब सांप करवट बदलता है या फिर खुजलाने अथवा दर्द से मुक्ति, के लिये अपने शरीर को हिलाता है, तब तब धरती पर भूकंप आते हैं ! अगर लाल मुंह के बंदर किसी दिन, सांप को खाना खिलाना भूल जायें और सांप, भूख से परेशान होकर अपनी ही पूँछ निगलने लग जाए, तो यह निश्चित है कि, उस दिन धरती का जीवन समाप्त हो जाएगा !

मध्य अफ्रीका के डाहोमी क्षेत्र के फ़ॅान जनजातीय समुदाय की ये कथा, उस ईश्वर को समर्पित है, जिसने अर्वाचीन सांप के माध्यम से धरती की निर्मिति की थी ! सांप महाकाय है, जिसकी कुंडलियों में धरती के निर्माण में प्रयुक्त सारी सामग्री, एकत्रित / संयोजित और सुरक्षित है ! चारों दिशायें उसके द्वारा खड़े किये गये सतूनों / स्तम्भों से निर्धारित हैं और तो और स्वर्ग भी इन्हीं खम्भों पर अवलंबित है ! कहने का आशय ये कि, स्वर्ग चारों दिशाओं में विस्तारित है ! सांप की चमड़ी के रंग, दिन की धूप, सांझ की लालिमा सह श्यामलता और रात्रि की कृष्णता को सुनिश्चित करते हैं ! उसने ठहरे हुए पानी को सचल किया, झीलों, तालों,  एवं समंदरों से नदियाँ और झरने बनाये, जिससे जीवन का प्रादुर्भाव हुआ ! सांप की कुंडली में बंधी हुई धरती को टिकाऊपन और सधी हुई / सुनिश्चित गति मिली ! ईश्वर के मनवांछित आकार की धरती, जैसा भी उसने चाहा था सांप ने वैसा ही कार्य किया !

जनश्रुति कहती है कि सांप की कुंडलियों में बंधी, सधी हुई धरती में मनुष्यों, परिंदों और जानवरों के रहने लायक परिस्थितियाँ मौजूद हैं ! ईश्वर, निर्दिष्ट सृजन कार्य के समापन के उपरान्त अर्वाचीन सांप ने, ईश्वर को निर्माण कार्य के अवलोकन करने का आमंत्रण दिया, ईश्वर जो धरती को, निरखता हुआ घूमा फिरा ! आदिम समुदाय की कल्पनाशीलता में, दिलचस्प बात ये कि ईश्वर जहां ठहरा, वहीं पर्वत बन गये ! धरती पर भ्रमण के दौरान, ईश्वर को ये अनुभूति हुई कि, नवजात धरती, असंख्य पर्वतों, वृक्षों और जीव जंतुओं का भार वहन करने में सक्षम नहीं हो पायेगी, इसलिए उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो अपनी पूंछ को मुंह में दबाकर धरती को बिखरने से बचाये, गौरतलब बात ये कि धरती, एकजुट और गोलाकार बनी रहे ! बहरहाल ईश्वर के आदेशानुसार, धरती रक्षण में सहायक अर्वाचीन सांप, अपने आप में बंध कर रह गया !

सांप द्वारा, दर्द से मुक्ति के लिये, करवट बदलने और उसकी, खुजलाहट जन्य दैहिक अस्थिरता की प्रतीकात्मकता से, धरती पर आने वाले भूकंपों की कल्पना मजेदार है ! ईश्वर जिसे, जीव जंतुओं, मनुष्यों, परिंदों, वृक्षों के जीवन की चिंता थी, जो धरती को टिकाऊपन और निर्धारित लय युक्त जीवन देना चाहता था, जो धरती के सृजन, विन्यास और निर्मिति में प्रयुक्त अभियांत्रिकी के लिये पर्याप्त सचेत था, जिसे दिन, रात, और सांझ का ख्याल था, जो स्वर्ग को हर दिशा में विस्तारित और स्थिर देखना चाहता था, वो भला अपने परम सेवक, सभी निर्देशों का अनुपालन करने वाले अर्वाचीन सांप को भूखा मरने के लिये कैसे छोड़ देता ? अब ये ललमुंहे बंदरों पर निर्भर है कि, सांप सलामत रहे और...धरती भी !     

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

लोई

ईश्वर ने कीचड़ से कुछ मनुष्यों को बनाया, लेकिन वे लोग बहुत मुलायम तथा पिलपिले थे और गीले होने पर खड़े भी नहीं हो सकते थे ! वे देख नहीं सकते थे पर...बोल सकते थे हालांकि जो कुछ भी बोलते सब अर्थहीन हुआ करता ! ईश्वर समझ गया कि वे लोग किसी काम के नहीं हैं, उसने उन्हें तोड़ डाला और कहा, मैं फिर से कोशिश करूँगा ! इसके बाद ईश्वर ने लकड़ी से मनुष्य बनाये, जो पहले से बेहतर थे, ये, बोलना और चलना जानते थे ! लकड़ी से बने मनुष्यों ने घरों का निर्माण किया और उनके बच्चे भी पैदा हुए, उनकी संख्या बढ़ने लगी, लेकिन ये लोग सूखे, पीले और भावहीन चेहरों वाले थे क्योंकि इनके पास दिल, दिमाग और आत्मा नहीं थी ! लकड़ी से बने मनुष्य, अपने पशुओं को पीटते, उनके बर्तन अक्सर जल जाते पर...उन्हें समझ में नहीं आता कि नये बर्तन कैसे बनायें, इतना ही नहीं, उन्हें ईश्वर का कोई एक नाम तक, याद नहीं रहता ! 
  
ईश्वर ने कहा, ये लोग भी ठीक नहीं है, मैं इन्हें नष्ट कर दूंगा और उसने धरती पर महान बाढ़ लाई, जिसके कारण से लकड़ी के मनुष्य और उनके घर बह गये ! इस कठिन समय में पशुओं, जिन्हें वे पीटते थे, बर्तनों, जिन्हें वो जला डालते थे और पेड़ों, जिनकी शाखें वे काट डालते थे, ने उनकी कोई मदद नहीं की ! कहते हैं कि महा-बाढ़ में जो, थोड़े से लोग बच गये, उनके वंशज बंदर हुए  जो आज तक नीचे नहीं उतरते ! ईश्वर सच्चे मनुष्य बनाना चाहता था, जब सूर्योदय हुआ तो उसने मकई के पीले भुट्टे और सुफैद भुट्टों के दाने पीस कर मिला दिये, इस खाद्य सामग्री के साथ, उसने नौ तरह की शराब बनाई ताकि उससे, मनुष्य को ऊर्जा और शक्ति मिले, इसके बाद ईश्वर ने इसकी लोई से चार सुंदर और शक्तिशाली पुरुष बनाये जिन्हें, घातक हंसी, लापरवाह, कालिमा और रात का जादूगर कहा गया ! ईश्वर ने उन्हें बुद्धिमत्ता और समझ, उपहार स्वरुप प्रदान की ! 

जब ये चारों पुरुष सो रहे थे तो ईश्वर ने बहुत सावधानी  के साथ चार स्त्रियां बनाईं ! जब वे जागे तो उन्हें अपने पहलू में सुंदर पत्नि मिली ! वे समझ गये कि वे, चहुँ दिश घटित को देख सकते हैं, यहां तक कि आकाश का मेहराब और पृथ्वी का गोल चेहरा भी, उन्होंने कहा, हमारे जीवन के लिये धन्यवाद ! हम, देख, सुन, बोल और चल सकते हैं ! हम, धरती और आकाश पर घटित, सब जान सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं...ओ पिता, इसके लिये धन्यवाद ! ये सुनकर ईश्वर को बड़ी चिंता हो गई कि ये मनुष्य तो बहुत ज्यादा और बड़ी दूर तक देख सकते हैं ! ये लोग, मनुष्य के बजाये देवता तुल्य हो गये हैं ! ईश्वर को लगा कि, थोड़ा बदलाव ज़रुरी है सो, उसने नीचे झुक कर, उनकी आंखों में धुंध फूंक दी और उनकी दृष्टि में थोड़े से बादल भी, जैसे कि किसी आईने में भाप फूंक दी जाए, अब वे ज्यादा दूर तक साफ़ साफ़ नहीं देख सकते थे !

उन चारों स्त्री पुरुषों ने पहाड़ से नीचे उतरने के लिये, सुबह का इंतज़ार किया, उन्हें सबसे पहले भोर का तारा नज़र आया,फिर सूरज, जिसकी धूप ने तीन उपहारों के बाहरी आवरण जला दिये / खोल दिये ! तब पहाड़ी बिलाव और तेंदुआ गुर्राये और सभी परिंदों ने अपने पंख फैलाये तथा चहचहाने लगे, उनके साथ ही साथ, चारों पति पत्नि, आनंद विभोर होकर नृत्य करने लगे ! सूरज आकाश पर चढ़ने लगा था...  
  
इस जनश्रुति का सम्बन्ध,प्रख्यात क्यिचे माया सभ्यता से है, जिसका आद्योपांत विवरण १५०० ईसा पूर्व से लेकर १६ वीं शताब्दी के मध्य सिमट कर रह जाता है, माया समुदाय में प्रचलित सृष्टि सृजन, विशेष कर मनुष्यों की निर्मिति, संबंधी बयान इस कथा के माध्यम से प्रकटित होते हैं ! वे मानते हैं कि ईश्वर ने सबसे पहले कीचड़ से मनुष्य को रचा था, ऐसे में उक्त मनुष्य की देह रचना का मुलायम तथा पिलपिला होना और भीगने पर खड़े नहीं हो पाना अस्वभाविक कथन नहीं है, इसके इतर उनका अंधत्व और वाचिक अर्थहीनता, उनके नष्ट हो जाने का कारण बनी ! कालांतर में ईश्वर ने काष्ठ से मनुष्यों का निर्माण किया, जिनके चेहरे, काष्ठ की तरह पीले और भावहीन थे, यह कथन बेहद दिलचस्प है ! उनमें बुद्धि, हृदय और आत्मा का अभाव था, अतः वे क्रूर थे !

उनकी स्मरण-हीनता का आलम ये कि वे ईश्वर का कोई एक नाम भी याद नहीं रख सकते थे, अतः उन्हें जल समाधि दे दी गई ! रोचक बयान ये कि उनमें से कुछ के वंशज बंदर हुए, जोकि ऊंचाइयों में चढ़कर जीवित बचे, सो आज भी नीचे नहीं उतरते ! ध्यान रहे कि काष्ठ मनुष्यों के आपात समय में पशुओं, बर्तनों और पेड़ों की शाखाओं ने, साथ नहीं दिया क्योंकि वे सभी काष्ठ मनुष्यों द्वारा प्रताड़ित किये गये थे, यह विशुद्ध सामाजिक व्यवहार है, जैसा बोया, वैसा ही काटोगे की, तरह से ! ईश्वर सच्चे मनुष्य के सृजन में दो बार चूका था, इसका मतलब ये हुआ कि चूक, ईश्वर से भी हो सकती है ! तीसरी बार मनुष्य का सृजन करते हुए ईश्वर ने मकई के आटे के साथ ही साथ, नौ तरह की उत्तेजक और शक्तिवर्धक शराब का इस्तेमाल भी किया ! आटे की लोई से बने मनुष्य में वो सभी खूबियाँ थीं जोकि ईश्वर चाहता था पर...इस बार भी उससे एक गलती हुई !

कथा से प्राप्त, यह संकेत मजेदार है कि आटे के मिश्रण और भिन्न शराबों से, मनुष्य बनाने वाला ईश्वर, देवता बना बैठा ! आटे और शराब के गठजोड़ से देवत्व प्राप्ति संबंधी यह विवरण, अप्रत्यक्ष रूप से देवताओं के साथ परिहास करने जैसा है या फिर मनुष्यों द्वारा शराब पीने को न्यायोचित ठहराने के उद्धरण के जैसा ! बहरहाल चारों मनुष्यों को अनायास ही प्राप्त देवत्व से वंचित करने के लिये ईश्वर द्वारा मनुष्य की आंखों में धुंध फूंकने और दृष्टि में भाप के जैसे बादलों को आरोपित करने का कथन सांकेतिक रूप से मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के जतन के तौर पर स्वीकार किया जाना चाहिए ! इस सम्बन्ध में आईने में भाप पड़ जाने वाली कहन अदभुत है ! ईश्वर ने मनुष्य को उपहार स्वरुप पत्नियां दीं, पशु दिये, परिंदे दिये और उल्लास की अभिव्यक्ति के लिये नृत्य निपुणता भी !  

शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

बिखरे रंग...

जब धरती नई नई थी, तब सृजनहारा अपने सृजन कर्म को देख देख कर खुश होता, उस समय दुनिया खूबसूरत थी और लोग भी खुश रहते थे, किन्तु समय गुज़रा और बढ़ती हुई उम्र साथ लोगों की मृत्यु, संसार में दुःख लेकर आई, लोगों के दुःख से सृजनहारा भी दुखी हुआ ! उसे लगा कि दुनियां में कुछ कमी रह गई है...सो उसे कोई नया सृजन करना चाहिए ! सृजनहारा, नये सृजन की लालसा के साथ, धरती पर आया और उसने एक थैले में, दुनिया के रंग एकत्रित करना शुरू कर दिया ! आसमान से नीला, पेड़ों से हरा, सूर्य से पीला...और सूर्यास्त के समय के आसमान से लाल, नारंगी और बैगनी रंग लिये, इसके बाद नन्हें बच्चों की मुस्कान से सुफैद तथा उनकी आंखों से भूरा रंग लिया,फिर परिंदों से गीत लिये और सभी को अपने थैले में भर लिया ! थैले में भरे हुए रंगों और गीतों को, उसने अच्छी तरह से मिश्रित कर दिया और लोगों को अपना नया सृजन कर्म, दिखाने जा पहुंचा !

सारे लोग, घेरा बना कर खड़े हो गये ताकि नये सृजन को देख सकें ! सृजनहारे ने जैसे ही थैला खोला, उसमें से हज़ारों तितलियाँ निकल पड़ीं, लोग खुश हुए, बच्चे नाचने गाने लगे, तितलियाँ भी, खुशी से झूमते हुए बच्चों के चारों तरफ, गाने / चहचहाने और इठलाने लगीं...दुनियां में खुशियां जैसे लौट आई हों, हालांकि सभी जीव इस नये सृजन से खुश नहीं थे, परिंदों ने शिकायती सुर में कहा, ओ महान सृजनहारे, तुमने हमारे गीतों / चहचहाहट को क्यों ले लिया ? इन गीतों के कारण से ही हमारी अलग पहचान थी ! इसे लेकर तुमने उचित नहीं किया ! सृजनहारे को परिंदों की ये बात ठीक लगी...सो उसने तितलियों से गीत वापस लेकर, परिंदों को सौंप दिये ! कहते हैं कि, इसके बाद से ही, तितलियाँ सृजन के सारे रंग, बेहद ख़ूबसूरती के साथ, बिखेरती फिरती हैं, लेकिन मौन रह कर...
 
उत्तरी अमेरिका के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र के अमरीकन लेनापे इन्डियन समुदाय की ये गाथा, कुछ मायनों में अदभुत है, मसलन नये सृजन के लिये, नन्हे बच्चों की मुस्कान से सुफैद रंग का लिया जाना, सुफैदी, जो शांति प्रियता, निश्छलता का प्रतीक है, उसका बच्चों की मुस्कान में निहित होना, बेहद दार्शनिक और मानीखेज़ कथन है ये ! इसके इतर जब कथा कहती है कि परिंदों से गीत, सूरज से पीला, पेड़ों से हरा, आसमान से नीला, सूर्यास्त के समय का नारंगी लाल और बैगनी और नन्हों की आंखों से भूरा रंग लिया गया तो इसका आशय ये है कि सारे रंग / गीत धरती पर पहले से मौजूद थे और उनका पुनर्संयोजन / पुनर्प्रयोग, नये सृजन का आधार बना है यानि कि सृजनहारे ने जो पहले पहल रचा, उसमें ही दूसरे सृजन की संभावनायें / तत्व मौजूद थे ! हम कह सकते है कि एकालाप-गत उदासीनता को नवोन्मेष / नव प्रयोग से खुशियों में बदला जा सकता है !

कथा कालीन आदिम समाज की ये समझ, कितनी गहरी है कि, रचनाधर्मिता बाँझ नहीं होती...उसमें उर्वरता के तत्वों की विद्यमानता, एकरसता को तोड़, नव-रस-गान सृजन मुफीद होती है ! इधर परिंदों को शिकायत है कि उनकी पहचान छिन गई, उधर सृजनहारे की संवेदनशील न्यायप्रियता, कि परिंदों की पहचान बनी रहे, यानि कि सर्वशक्तिमान सृजनहारा भी गलतियां कर सकता है, लेकिन ध्यानाकर्षित कराये जाने पर, भूल सुधार में कोई देर नहीं ! कथा संकेत ये कि गलतियों पर ध्यानाकर्षण, श्रेष्ठि के अहम को ठेस पहुंचाने का कारण अथवा प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं, बल्कि त्वरित सुधार का विषय है ! अंतत: उसके औचित्यपूर्ण होने को सर्वशक्तिमान का समर्थन जो प्राप्त है ! तितलियों की जन्म के लिये, सृष्टि में पहले से ही मौजूद तत्वों का उपयोग किया गया, वे परिंदों की तरह से चहचहाईं, उनकी खुशियाँ बच्चों के इर्द गिर्द नाचने और इठलाने में निहित थी किन्तु...

परिंदों की पहचान छीन कर तितलियों का सौंदर्य गान निःसंदेह अन्यायपूर्ण था ! बहरहाल तितलियाँ अब भी इतराती, इठलाती है, वे दुनिया की अलभ्यतम सौंदर्य देवियाँ, देव हैं, उनकी ख़ूबसूरती रंगों के चटख और विविधतापूर्ण संयोजनों से है, असीमित आकाश में उड़ान भरने के लिये, उनके रंगों को मौन के पंख लग गये हैं...

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

कांच का चाकू...

कहते हैं कि एज़्टेक कबीले के सृजन की कहानी देवी क्वाटिलिक्वे से शुरू होती है, जोकि सर्पों का परिधान पहनती और जिसके गले में नरमुंडों की माला पड़ी रहती...जो गहन आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति है ! देवी क्वाटिलिक्वे, प्रथम बार, लावा निर्मित कांच के चाकू से गर्भवती हो गई थीं और फिर उन्होंने, चंद्रमा की देवी क्वोयोलशाऊकी तथा पुरुष वंशजों के एक समूह को जन्म दिया जोकि तारे बन गये थे ! एक दिन देवी क्वाटिलिक्वे को पंखों का एक गोल पुलंदा मिला, जिसे उन्होंने अपनी सीने में लपेट लिया लेकिन दोबारा देखने पर उन्होंने पाया कि पंखों का गोल पुलंदा गायब हो चुका है और वो पुनः गर्भवती हो गई हैं, हालांकि उनकी पुत्री देवी चन्द्रमा और पुत्र तारों को अपनी मां क्वाटिलिक्वे की इस कहानी पर ज़रा भी विश्वास नहीं हुआ और वे लोग लज्जित अनुभव करने लगे, उन्होंने तय किया कि वे सभी मिलकर अपनी मां को मार डालेंगे !

वे लोग, यही मानते थे कि कोई देवी, केवल एक बार ही संतान को जन्म दे सकती है, जोकि उसके सच्चे देवत्व का प्रमाण होता है ! बहरहाल जब वे लोग अपनी मां की हत्या की योजना बना रहे थे, तब, देवी क्वाटिलिक्वे ने अग्नि सर्प की सहायता से, युद्ध के अग्नि देवता ह्यूइटज़िलीह्यूइटल को जन्म दिया, जिसने क्रोध में आकर अपने सभी भाइयों और बहन क्वोयोलशाऊकी को मार डाला ! उसने बहन का सिर, धड़ से अलग करके, पर्वतों के मध्य गहरे खड्ड में फेंक दिया, जहां वो सदा सर्वदा के लिये विखंडित पड़ा रहा ! ठीक उसी समय, स्वर्ग लगभग टुकड़ों में तब्दील हो गया और धरती मां नीचे गिर गई थीं, जिनके निषेचित बच्चों को, भ्रातघाती द्वारा टुकड़े टुकड़े कर के पूरे अंतरिक्ष में बिखेर दिया गया था ! इस तबाही के उपरान्त मूल अमेरिकन इंडियंस का प्राकृतिक ब्रह्माण्ड जन्मा,तब सर्वोच्च देवता ओमेटेकूटली और उसकी पत्नि ओमेसिहाउटल ने पूरे विश्व में जीवन का सृजन किया...

एज़्टेक, अर्वाचीन कबीले के लोग हैं, अन्य आदिम जातीय समूहों की तरह से सृष्टि की रचना को लेकर,उनकी अपनी परिकल्पनायें हैं ! उनके ब्रह्माण्ड की रचना भले ही देवत्व धारी व्यक्तित्व करते हों पर...उन सभी देवी देवताओं में मनुष्यगत, संवेदनाओं, भावनाओं, कल्पनाशीलता, सृजनशीलता, ईर्ष्या, द्वेष और कलह प्रियता जैसे, लक्षणों का विवरण मिलना आम बात है जैसे कि इस कथा में देवी क्वाटिलिक्वे नरमुंड की माला पहनने वाली तथा सर्पों को परिधान बतौर लपेटने वाली पारलौकिक शक्ति है, किन्तु वो ज्वालामुखीय लावे से निर्मित कांच से गर्भवती होकर देवी चंद्रमा और तारों को जन्म देती है ! आख्यान में उल्लिखित, इस देवी के, चमचमाते / रौशन रौशन / आलोकित, पुत्रों और पुत्री के जन्म के लिये, चमकदार कांच के चाकू को उत्तरदाई ठहराना प्रातीतिक है, रुचिकर है ! कांच के चाकू के...चांद सितारे जैसे बच्चे !

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपनी मां को पुनः गर्भवती देखकर देवी चन्द्रमा और पुत्र तारे क्षुब्ध हैं, उन्हें विश्वास  ही नहीं होता कि उन्हें, जन्म देने वाली दिव्य शक्ति,पुनः गर्भवती हो सकती है, वे इसे दिव्यता पर कलंक मानकर लज्जित हैं और अपनी कलंकित मां की हत्या का निर्णय ले लेते हैं, प्रतीत होता है कि मां के दोबारा गर्भवती होने का मुद्दा वास्तव में, गर्भवती होने के कलंक से कहीं अधिक, दिव्यता के प्रथम उत्तराधिकारियों तथा संभावित अतिरिक्त उत्तराधिकारी के मध्य, दिव्यता की विरासत के, बटवारे का मुद्दा रहा होगा ! विरासत के बटवारे के निषेध के लिये, गर्भवती मां को रास्ते से हटाने का निर्णय, ईर्ष्या जनित लगता है, बिलकुल मनुष्यों के स्वभाव और व्यवहार के अनुकूल होने जैसा...सो कथा संकेत यही हैं कि झगड़े का मूल कारण विरासत थी, किन्तु उसे कांच के चाकू बनाम पंखों के पुलंदे से गर्भ धारण करने वाली यौन अनैतिकता बतौर हवा दे दी गई !

कथा के अनुसार देवी क्वाटिलिक्वे सर्पों को परिधान बतौर लपेटती थी सो उसने, अग्नि सर्प की मदद से, पंखों के पुत्र, युद्ध के अग्नि देवता ह्यूइटज़िलीह्यूइटल को जन्म दिया, जिसने दिव्यता की विरासत के दावेदार उन सभी लोगों को मार डाला जो कि उसके जन्म का विरोध कर रहे थे, अतः एक ही मां की संतानों के मध्य वैमनस्य, ब्रह्माण्ड की बर्बादी और पुनर्जीवन का आधार बना ! नरमुंडों और सर्पों वाली दिव्यता तथा विनाश के बाद पुनर्सृजन के संकेत हमें अपनी पारलौकिक गाथाओं में भी मिलते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण तथ्य यह कि प्रस्तुत कथा मनुष्यों की प्रातीतिक परछाईं के जैसे बहुदेवतावाद को समर्पित है, जिसमें सृष्टि के विनाश का कारण कोई एक देवता है, तो सृजन के लिये उत्तरदाई कोई और...  

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

रस्सी के टूटते ही...

उस समय गहन अंधकार और ठंडापन था, व्यापक, अंतहीन सभी दिशाओं में पसरा हुआ ! आकाश के नीचे मौजूद, महाकाय पाषाण मेहराब में से, आश्चर्यजनक रूप से, नन्हें जीव जागृत होने लगे, उन्हें महसूस हुआ कि वे प्यासे हैं, वहाँ बेहद ठंड और जीवों का आधिक्य है ! सबसे पहले जागे जीव ने कहा मुझे जल की गंध आ रही है, मैं जल भृंग हूं...और वो मेहराब से नीचे कूद गया हालांकि छप छप की आवाज़ काफी देर बाद आई ! दूसरे क्रम में जागृत हुए जीव ने कहा, मैं रेशम बुन सकती हूं , मैं मकड़ी हूं...इसके बाद जागने वाला हर एक जीव, अपने अस्तित्व की घोषणा करता गया ! कुछ देर बाद जल भृंग की आवाज़ आई, उसने कहा, यहां नीचे पानी में कुछ कोमल और कुछ सख्त है, जिसमें हमें, सँभालने का सामर्थ्य है !

यहां हम सभी के रहने लायक जगह है, कोई रस्सी, नीचे फेंको ताकि हम इसे ऊपर खींच सकें ! मेहराब पर मौजूद अन्य जीवों ने मकड़ी से कहा, तुम कुछ करो, सो मकड़ी ने एक मजबूत जाल नुमा रस्सी बुनी और उसे जल भृंग के पास फेंका जिसे पकड़ कर जल भृंग ने पानी के नीचे डुबकी लगाई और जल तल में मौजूद मिट्टी, कीचड़, पाषाण के बड़े खंड को चारों तरफ से कसकर बाँध दिया, इसके बाद उसने पानी की सतह पर आकर, ऊपर मेहराब में मौजूद जीवों को आवाज लगाई, खींचो, ये सुनकर सभी जीव रस्सी को ऊपर खींचने लगे और इस तरह से जल तल में मौजूद धरती, जल की सतह से ऊपर आ गई ! धरती के उजागर होते ही सभी जीव आकाश की मेहराब से लटकी हुई उसी रस्सी पर रेंगते / लटकते / जूझते हुए नीचे आ गये !

यहां सभी के रहने लायक पर्याप्त जगह थी ! धरती की सतह पर पहुंचने के बाद सभी जीवों ने अपनी प्यास बुझाई, जिन जीवों को स्वयं के मछली होने का अहसास था वे पानी में तैर गये ! जिन जीवों को पता था कि वे उड़ सकते हैं वे धरती से आकाश की ओर उड़ान भरने लगे और कुछ जिन्हें अपने उभयचर होने का विश्वास था वे प्रसन्नतापूर्वक कीचड़ युक्त पानी में उतर गये, ये मेढक थे ! कहते हैं कि उसी दिन से धरती जल की सतह पर तिरती हुई आकाश के मेहराब पर लटकी है...और जिस दिन भी रस्सी टूट जायेगी, धरती फिर से जल तल में समा जायेगी...

ये मूल अमेरिकी इंडियंस की सृजन कथा है, जिसमें आकाश को साधने के लिये महाकाय पत्थर के मेहराब की कल्पना की गई है, उसके बेहद नीचे जल ही जल है, जिसके अंदर धरती डूबी हुई है ! अदभुत बात ये कि अंतरिक्ष स्थित मेहराब में, असंख्य जीव मौजूद हैं, जो गहन नींद से जागते ही स्वयं को पहचान लेते हैं ! एक जल भृंग जो सबसे पहले जागृत होता है, उसे जल गंध आने और फिर उसके, मेहराब से कूद पड़ने का कथन मज़ेदार है ! जल भृंग के नीचे कूद पड़ने के काफी समय बाद, छप छप की आवाज आना, आकाश और जल सतह की दूरी का बयान करती है ! जल भृंग द्वारा पानी की जांच पड़ताल किये जाने का कथन बेहद रोचक है , वो थोड़े मुलायम, थोड़े सख्त पदार्थ / वस्तु के जल तल में पड़ा होने का उल्लेख करता है !

जल भृंग विश्वास है कि जल तल में मौजूद पदार्थ में इतना सामर्थ्य है, कि वह समस्त जीवों को संभाल सके और इतनी जगह भी, कि सभी जीव उसमें आराम से रह सकें ! आकाशीय मेहराब के गहन अन्धकार और ठंडेपन के माहौल में, दूसरे क्रम मे जागृत हुई जीव, मकड़ी है जो स्वयं का परिचय बुनकर बतौर देती है ! वहाँ अन्य जीव भी जागे वे सभी अपने आत्म से परिचित हैं ! इधर जल भृंग की पर्यवेक्षणीय निष्पत्तियों और अन्य जीवों से सहयोग के आह्वान का दौर जारी है ! जल भृंग चाहता है कि जल तल में पड़े हुए पदार्थ / वस्तु को अन्य जीव जल तल से ऊपर लाने में मदद करें ताकि सभी मिलजुल कर उस पर निवास कर पायें ! जल भृंग का आह्वान समस्त जीवों की पारस्परिक सहभागिता और भविष्य के सहअस्तित्व का उदघोष है !

जल भृंग की पुकार और अन्य जीवों के आग्रह पर बुनकर मकड़ी द्वारा एक मजबूत रस्सी का जाल बुनने का कथन दिलचस्प है, इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उस जाल में जल तल की वस्तु / पदार्थ को बाँधने का दायित्व जल भृंग का है, क्योंकि वह जल जीव है और उसके ही पर्यवेक्षण के अनुसार कोई कार्य योजना संपन्न की जाना है ! बहरहाल मज़बूत रस्सी से बांधी गई धरती को जल तल से जल की सतह तक खींचने का काम सभी जीवों का समेकित प्रयास है, अन्ततोगत्वा ये सब उनके भविष्य को निर्धारित करने का उपक्रम जो है ! धरती के जल सतह से ऊपर आने के बाद सभी जीवों का आकाश से नीचे उतरकर, विशेष कर मछलियों का पानी में तैर जाना, मेढक का फुदक कर कीचड़ में उतर जाना और परिंदों का आकाश में उड़ने लग जाना, निज व्यक्तित्व / विशिष्टताओं की पहचान के अनुरूप दुनिया के ढूंढ लेने जैसा है !

इस आख्यान में, पाषाण के मेहराब पर आकाश के टिके होने का विवरण, भले ही हास्यास्पद लगे पर धरती और आकाश के पार्थक्य को बयान करने के लिये संभव है कि ये एक सांकेतिक कथन हो, जिसे ग्रहों, पिंडों, आकाशगंगाओं के एक दूसरे से निश्चित दूरी पर बने रहने के ब्रह्मांडीय नियम, गुरुत्वाकर्षण से जोड़ कर देखा जा सकता है ! ब्रह्मांडीय नीरवता, अन्धकार और ठंडेपन को लेकर तथा नन्हें जीवों के सुसुप्त बने रहने और फिर किसी कारणवश जागृत हो जाने को लेकर, कथाकालीन आदिम समुदाय का अभिमत स्पष्ट है ! ध्यान रहे कि धरती, या तो गुरुत्वाकर्षण के नियम से बंधी हुई, इस विराट अंतरिक्ष में गतिमान है या फिर बुनकर मकड़ी के द्वारा बुने गये जाल से बंधे रहे कर अपने मार्ग / स्थान से नहीं भटकती...वर्ना नियम / रस्सी के टूटते ही धरती फिर से... 

रविवार, 24 दिसंबर 2017

मादकता


ईश्वर धरती पर उतरा तो उसने पाया कि यहां, बहुत गंदगी है, बुरी चीज़ों से भरी हुई, दुष्ट लोग, रहस्मय और नरभक्षी ! ईश्वर ने सोचा कि धरती को साफ़ करने के लिये जल प्रलय लाई जाए...और गंदे लोगों, राक्षसों को डुबा कर मार दिया जाए, फिर उसने ऐसा ही किया पानी, पहाड़ों की चोटियों तक भर गया, तब एक व्यक्ति और उसकी दो पुत्रियों को छोड़कर, सारे मनुष्य जलमग्न हो गये ! दरअसल वो तीनों एक डोंगी में बैठकर बाढ़ से बच निकले थे ! जलस्तर घटने पर उन्होंने देखा कि धरती स्वच्छ हो गई है ! उन्हें बेहद भूख लगी थी, उन्होंने इधर उधर देखा, ढूँढा पर वहाँ खाने लायक कुछ भी नहीं था ! कंद मूल वाला कोई छोटा मोटा पौधा तक नहीं, केवल भिन्न प्रजातियों के कुछ बड़े पेड़ थे !

उन्होंने फर के टुकड़े को पत्थर से कूट कर काढ़ा बनाया पर...वह पीने योग्य नहीं था सो उसे फेंक दिया, इसके बाद उन्होंने पाइन, भिदुर और अन्य लकड़ियों के काढ़े बनाए पर सब व्यर्थ, अंतत बेरियों की लकड़ियों का काढ़ा तुलनात्मक रूप से पीने योग्य था ! लड़कियों ने उसे पिया और...दिया ! ये काढ़ा थोड़ा सा मादक / नशीला था ! उन्हें नशा हो गया, नशे की हालत में लड़कियों ने अपने पिता से यौन से सम्बन्ध बना लिये, पिता को कुछ पता ही नहीं चला ! इधर धरती धीरे धीरे सूख रही थी और उन तीनों की भूख बढ़ती जा रही थी, इसलिए वे तीनों लगातार बेरियों की लकड़ी का काढ़ा बना कर पीते रहे ! पिता इस मादक द्रव्य का आदी हो चला था और लड़कियां उससे अक्सर दैहिक सम्बन्ध स्थापित करती रहीं !

परिणाम स्वरुप लड़कियों ने कई बच्चों को जन्म दिया...जिस पर नशेड़ी पिता अचंभित हुआ कि वे दोनों किस प्रकार से गर्भवती हो गईं ! कालान्तर में, वयस्क होकर, इन्हीं बच्चों ने आपस में ब्याह किये और फिर उनके भी बच्चे पैदा हुए, इस प्रकार से धरती पर, मनुष्यों की पुनर्बसाहट का सिलसिला जारी रहा ! ऐसे ही पशु और पक्षी भी बहुतायत से धरती में आबाद होने लगे थे...

आर्कटिक उप-क्षेत्र के निकट अलास्का की टिलिंगिट कबीले की ये जनश्रुति, ईश्वर के हवाले से, धरती में दुष्ट लोगों की संख्या बढ़ने का संकेत देती है, जिन्हें ईश्वर, बाढ़ लाकर समाप्त कर देना चाहता है ! दुनियां में प्रचलित अन्य जल प्रलय कथाओं के इतर इस कथा में शेष बच गये पात्रों को, ईश्वर ने समय पूर्व कोई चेतावनी दी हो ऐसा उल्लेख इस कथा में नहीं मिलता और ना ही इस बात का कोई संकेत कि बर्फीले क्षेत्र के निवासियों के पास डोंगी के मौजूद होने का आशय क्या है ? क्या यह डोंगी स्लेज के साथ संबद्ध कोई लकड़ी का बड़ा टुकड़ा थी, जिसे सामान ढोने / लादने के उपयोग में लाया जाता रहा हो ? बहरहाल बाढ़ से बच गये पिता, पुत्रियों के लिये ये डोंगी, दैवीय ना सही, भौतिक / जागतिक वरदान / उपलब्धता अवश्य मानी जा सकती है !

जल प्रलय के बाद खाद्य पदार्थों की कमी स्वभाविक है और ये भी कि भूखे लोग अपने जीवन रक्षण के लिये बहुविध प्रयोग करें, जैसा कि पिता और पुत्रियों ने, कंद मूल फलों की अनुपलब्धता को देखते हुए, भिन्न भिन्न लकड़ियों को कूट कर, तरल काढ़ा बना कर, अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिये किया ! इसे तुलनात्मक संयोग ही माना जाएगा कि अन्य लकड़ियों का काढ़ा पीने योग्य नहीं था और बेरियों का काढ़ा पीने योग्य पाया गया ! इसमें कोई संदेह नहीं कि, आयुगत कारणों से, पिता की अपेक्षा पुत्रियों में यौनेच्छायें अधिक प्रबल रही होंगी ! उल्लेखनीय है कि, उस काल खंड में, उनके योग्य कोई युवा नर, धरती पर जीवित नहीं था और...जीवन रक्षण के उपरान्त निज मूल प्रवृत्ति का शमन करना, उनकी विवशता हो गई होगी !

ये कथा ईश्वरीय कोप और जल प्रलय के मानदंड से विश्व की बहुचर्चित कथाओं जैसी ही है, किन्तु पुत्रियों द्वारा, अपने ही सगे पिता से देह संसर्ग स्थापित करना और कालांतर में उनसे जन्में बच्चों के पारस्परिक ब्याह के फलस्वरूप वंश वृद्धियों के कथन, बहुत संभव है कि यौन नैतिकता के मानकों से विचलित दिखाई दे, हालांकि यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं है कि पुत्रियों ने अपनी मूल प्रवृत्ति का शमन करते समय यौन नैतिकता के उल्लंघन के अपराध बोध से उबरने के लिये मादक द्रव्यों का इस्तेमाल किया, यही कारण है कि पिता अपनी पुत्रियों के गर्भवती हो जाने को लेकर अचंभित बना रहा...

बुधवार, 23 अगस्त 2017

बूढ़े के बच्चे...

उस दिन चांद, सूरज, हवा, इंद्रधनुष, बिजली, अग्नि और पानी, एक बूढ़े से मिले ! बूढ़ा व्यक्ति ईश्वर था ! उन सबकी बैठक में एक इंसान को भी आमंत्रित किया गया था ! बिजली ने बूढ़े से पूछा, क्या आप दुनिया के इंसानों को मेरे बच्चे बना सकते हो ? नहीं वे तुम्हारे बच्चे नहीं हो सकते बल्कि पोते हो सकते हैं, बूढ़े ने कहा ! जब दुनिया के लोगों पर कोई मुसीबत आयेगी / बोझ आएगा तो तुम उसके निराकरण कर्ता होओगे, फिर सूरज ने यही सवाल,उस बूढ़े से किया, बूढ़े ने उत्तर दिया, नहीं, नहीं वे तुम्हारे बच्चे नहीं हो सकते बल्कि मित्र और पोते हो सकते हैं, तुम्हारा अस्तित्व उन्हें रौशनी देने के लिये है, बस !

इसके बाद चांद ने पूछा, क्या धरती के लोग मेरे बच्चे हो सकते हैं, बूढ़े ने कहा, नहीं मैं ये नहीं कर सकता, वे तुम्हारे भतीजे और मित्र हो सकते हैं ! अब अग्नि ने बूढ़े से कहा, क्या आप धरती के लोगों को मेरे बच्चे बना सकते हैं ? बूढ़े ने जबाब दिया, नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकता,लेकिन वे तुम्हारे पोते होंगे,वे तुमसे ऊष्मा पायेंगे और जीवित रहने के लिये तुम्हारा पकाया हुआ खायेंगे ! इसके बाद यही सवाल हवा ने पूछा तो बूढ़े ने कहा, नहीं वे तुम्हारे बच्चे नहीं हो सकते बल्कि वे तुम्हारे पोते होंगे ताकि तुम उनसे बीमारियों और प्रदूषण को दूर ले जाओ !

फिर इंद्रधनुष ने भी यही अभिलाषा व्यक्त की, तो उस बूढ़े ने कहा, नहीं वे तुम्हारे बच्चे नहीं हो सकते बल्कि तुम उन्हें बाढ़ और अति वर्षा से बचाओगे और तुम इसी तरह से सम्मानित होओगे ! इसके बाद पानी ने यही सवाल उस बूढ़े से किया तो बूढ़े ने उत्तर दिया, नहीं ऐसा नहीं हो सकता बल्कि तुम उन्हें स्वच्छ किया करोगे, जब भी वे गंदे हो जायेंगे ! इस के लिये तुम्हें लंबे आदमी के तौर पर जाना जाएगा ! अब उस बूढ़े ने कहा कि मैंने तुम सबको यह मार्गदर्शन दिया है कि क्या करना है और कैसे करना है, तुम सब यह अवश्य याद रखना कि धरती के लोग मेरे बच्चे हैं !

अनुभव समृद्ध को बूढ़ा कहने की परंपरा लगभग हर एक समय में, सभी समाजों में मौजूद रही है ! ग्राम्य व्यवस्था के अधीन जातिगत पंचायतें, परंपरा आधारित होती आई हैं, जिन्हें अक्सर वृद्धजन परिषद भी माना गया है ! इन परिषदों को विधायिका सह कार्यपालिका से लेकर न्याय पालिका तक के समेकित अधिकार प्राप्त राजनैतिक सामाजिक संगठन बतौर स्वीकार किया जा सकता है, यानि कि अनुभवी लोगों के मार्गदर्शन में चलने वाली समाज व्यवस्था ! डोकरा / सयान / बूढ़ा, बढ़ती आयु के लोगों के लिये प्रयुक्त किये जाने वाले सहज और सामान्य संबोधन हैं !

इसमें अचरज की बात नहीं कि यह आख्यान, ईश्वर को बूढ़ा व्यक्ति कहता है !  ईश्वर जो पारलौकिक शक्ति है, सर्वोच्च सत्ता शिखर है, सृजनहारा है, उसे अर्वाचीन समुदाय द्वारा बूढ़ा मान लेना कोई असामान्य बात नहीं है ! कथा में विविध प्राकृतिक शक्तियों के द्वारा ईश्वर उर्फ बूढ़े से यह कामना की जाती है कि, धरती के मनुष्य इन प्राकृतिक शक्तियों के बच्चे मान लिये जायें, किन्तु बूढ़ा व्यक्ति इन सभी शक्तियों को उनके पृथक पृथक दायित्वों से परिचित कराता है और स्पष्ट रूप से कह देता है कि मनुष्य, इन प्राकृतिक शक्तियों के बच्चे नहीं हैं !

वे मित्र हो सकते हैं, प्रपौत्र हो सकते हैं या अन्य कोई सगे संबंधी पर...बच्चे नहीं, क्योंकि धरती के सारे मनुष्य स्वयं इस बूढ़े व्यक्ति के बच्चे हैं ! बूढ़े व्यक्ति के अभिमत में मनुष्यों के प्रति सारी प्राकृतिक शक्तियां अलग अलग तरह से उत्तरदाई हैं ! बूढ़े व्यक्ति और अन्य प्राकृतिक शक्तियों के मध्य होने वाला वार्तालाप बहुत दिलचस्प है किन्तु सबसे अधिक महत्वपूर्ण कथन ये है कि पानी को मनुष्य की सहायता के एवज में लंबे व्यक्ति के रूप में जाना जाएगा ! नि:संदेह यह कथन जल बिन मनुष्य के अस्तित्व और स्वच्छता के कारण मनुष्य के दीर्घजीवी होने के आशय को लेकर किया गया कथन है ! 

सोमवार, 7 अगस्त 2017

इन्द्रधनुष

आज कल हम जिसे सांता क्रूज द्वीप कहते हैं, चुमाश लोगों का जन्म वहीं हुआ था ! उन्हें भूमि देवी हुताश ने जादुई दरख़्त के बीजों से पैदा किया था ! हुताश का ब्याह आकाश नाग / आकाश गंगा से हुआ था जोकि अपनी जीभ से विद्युत उत्सर्जित कर सकता था ! एक दिन आकाश नाग ने चुमाश लोगों को उपहार देने की बात सोची, जिसके लिए उसने धरती पर विद्युत प्रवाहित कर दी जिसके कारण से धरती पर आग लग गई !  इसके बाद चुमाश लोगों ने उस आग को लगातार जलाए रखा ताकि वे उसमें खाना पका सकें और स्वयं को गर्म रख पायें !

कहते हैं कि उन दिनों गिद्ध सफ़ेद रंग का हुआ करता था ! गिद्ध को बेहद उत्सुक्तता थी कि चुमाश गांव में आकाश से उतरी हुई शय क्या है ? सो उसने आग के बहुत निकट से उड़ान भरी ताकि वो उसे अच्छी तरह से देख पाए और समझ सके, लेकिन उड़ते हुए वह आग के इतने पास से गुज़रा कि उसके पंख झुलस कर काले हो गये, हालांकि पंखों का कुछ हिस्सा आग के संपर्क में नहीं आ पाया सो वो सफ़ेद बना रहा ! बहरहाल उसी दिन से गिद्ध सफ़ेद की बजाये काले रंग के होने लगे हैं !

आकाश नाग से अग्नि का उपहार प्राप्त करने के बाद चुमाश लोग बहुत आरामदायक जीवन जीने लगे, उनके बच्चों की संख्या हर साल बढ़ने लगी, यहां तक कि छोटे छोटे गांव, बड़े गांव में तब्दील होने लगे और सांता क्रूज द्वीप चुमाश लोगों से भर गया ! चुमाश जनसंख्या में बढोत्तरी के कारण शोर गुल बढ़ने लगा, जिससे हुताश को खीज होने लगी थी ! उसकी रातें जागते गुज़रतीं! इसलिए उसने निश्चय किया कि कुछ चुमाश लोगों को मुख्य भूमि में भेज देना उचित होगा क्योंकि उन दिनों मुख्य भूमि जन शून्य थी ! अब समस्या यह थी कि द्वीप और मुख्य भूमि के दरम्यान जो समुद्र था उसे प्रवासी चुमाश लोग कैसे पार करेंगे ?

हुताश ने सोचा कि द्वीप और मुख्य भूमि के पर्वतों की ऊंची चोटियों के मध्य इन्द्रधनुष का पुल बनाना उचित होगा ! उसने चुमाश लोगों से कहा कि वे पुल से होकर मुख्य भूमि में चले जायें और फिर वहां से पूरी दुनियां में फ़ैल जायें ! अनेकों लोग सुरक्षित उस पार जा पहुंचे पर कुछ लोगों ने ऊंचे पुल से नीचे समुद्र को देखने गलती की गहरी धुंध के कारण उन्हें दृष्टि भ्रम हुआ और वे लोग नीचे समुद्र में जा गिरे ! यह देख कर हुताश को बहुत दुःख हुआ क्योंकि वो उन्हें सुरक्षित मुख्य भूमि में भेजना चाहती थी ना कि समुद्र में बहते हुए देखना, इसलिए उसने नीचे पानी में गिर गये लोगों को डाल्फिंस में तब्दील कर दिया ! इसलिए चुमाश लोग डाल्फिंस  को आज भी अपना भाई मानते हैं !

जिस द्वीप में चुमाश लोगों के जन्म की बात कही गई है, वह पहले लिमूव के नाम से जाना जाता था ! कहते हैं कि भूमि देवी हुताश पहले पहल अकेले ही रहती थी, बाद में उसने सोचा कि चुमाश लोगों को जन्म दिया जाए, इसके लिये उसने अपनी दैवीय शक्तियों का प्रयोग करते हुए, लिमूव द्वीप में जादुई पौधे उगाये फिर उसके बीजों से मनुष्य सृजित किये, उसने यह ध्यान रखा कि मनुष्य ऐन उसके जैसे ही दिखाई दें ! गौर करें तो धरती स्वयं एक आकाशीय पिंड है, जिसका ब्याह, आकाश नाग उर्फ आकाशीय पिंडों के सर्पाकार समुच्चय, से होने की बात इस कहानी में मुखरता से कही गई है !

यानि कि चुमाश लोग इतना तो समझते ही थे कि धरती और अन्य आकाशीय पिंड परस्पर स्वजन हैं, ये बात अलग है कि वे इस स्वजनता को रक्त (तत्वगत / पदार्थगत) संबंधों में देखने के बजाये वैवाहिक संबंधों में देखते थे !आबादियों के हिमशीतित क्षेत्रों में निवासरत होने की स्थिति में, वनैले पशुओं से तुलनात्मक दैहिक दुर्बलता की स्थिति में तथा भोजन को कच्चा उदरस्थ करने के कष्टप्रद आयोजनों में, आबादियों की सबसे बड़ी उपलब्धि अग्नि थी, जो उन्हें गर्म रखती थी, वन्य पशुओं को उनसे दूर रखती थी और भोजन को उनके लिये सुपाच्य / सहज और अनुकूल बनाती थी !

स्वभाविक ही था कि आबादियां, यह अनुमान लगायें कि अग्नि का जन्म कैसे हुआ होगा? पाषाण घर्षण अथवा आकाशीय विद्युत या फिर कोई अन्य माध्यम ? चुमाश कबीले ने अग्नि की उपलब्धता को आकाशीय विद्युत से जोड़ा, जो उन्हें सृजित करने वाली हुताश के पति आकाश नाग द्वारा प्रदत्त उपहार था ! प्रतीकात्मक रूप से कहे गये इस कथन का आशय अत्यंत स्पष्ट है कि देवी हुताश, चुमाश लोगों की मां है और पिता आकाश नाग, सो संतति के लिये पिता की ओर से अग्नि बतौर सौगात मिली !  

आख्यान में, गिद्ध के सफ़ेद से काले हो जाने का कथन बेहद रोचक है, कथानुसार वह एक जिज्ञासु पक्षी है, जो नई नवेली शय अग्नि को निकट से जांचने की कवायद में खुद को झुलसा लेता है ! बिन गुरु, ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में यह सम्भावना तो खैर बनती ही है ! इस घटनाक्रम का विशिष्ट पक्ष ये भी है कि, मनुष्यों की बस्तियों में, गिद्धों की रुचि क्यों नहीं होना चाहिए ? चुमाश अनुश्रुति जनाधिक्य की समस्या का निराकरण देवी हुताश के हाथों होने का कथन करती है अर्थात मां अपने बच्चों की संख्या बढ़ने से हो रहे ध्वनि प्रदूषण और अन्य कारणों से दु:खी है और भविष्य की दृष्टि से उन्हें द्वीप से इतर विशाल भूक्षेत्रों में बस जाने के लिये प्रेरित भी करना चाहती है !

इंद्रधनुष के पुल होने का कथन नितांत सांकेतिक है, निश्चय ही ये एक झूलते पुल के जैसा निर्माण कार्य होगा, जिससे वो लोग नीचे गिर पड़े होंगे, जो कि कमजोर मनः स्थिति वाले रहे होंगे, ऊंचाई से डरने वाले लोग !  समुद्र में गिर पड़े लोगों का डाल्फिंस हो जाना दैवीय कृत्य है या कि नहीं यह जानना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह समझना कि डाल्फिंस मनुष्यों की तरह से स्तनपायी और मेधावी प्राणी हैं, वे चुमाश लोगों के भ्रातत्व कुल में सम्मिलित हैं क्योंकि समुद्र में गये मनुष्यों के संकट में पड़ जाने के समय में डाल्फिंस के सहयोगी व्यवहार के किस्से यूं भी सार्वजनीन हैं !
    

     

रविवार, 6 अगस्त 2017

आकाश नद

जब सृष्टि का सृजन अपने आरंभिक दौर में था, तब आकाश में तारे बहुत कम थे ! उन दिनों चेरोकी लोग भोजन के लिये मक्के की फसल पर निर्भर थे ! वे खेत से फसल काटने के बाद उसे सुखाते और फिर लकड़ी की बड़ी सी ओखली और मूसल की मदद से दाने दाने अलग कर के, बांस की बड़ी टोकरियों में सुरक्षित रख लेते ताकि सर्दियों में उनसे रोटियां बनाई जा सकें ! एक सुबह जब एक वृद्ध दंपत्ति अपने भण्डार कक्ष में गये ताकि वहां से मक्के का आटा निकाल सकें ! उन्हें लगा कि पिछली रात वहां कोई आया था ! वे इस घटना से बहुत परेशान हो गये क्योंकि इससे पहले चेरोकी गांव में चोरी की कोई घटना नहीं घटी थी ! उन्होंने देखा कि भण्डार कक्ष अस्तव्यस्त था और मक्के का आटा इधर उधर बिखरा हुआ था, जिसमें कुत्ते के पंजों के निशान दिखाई दे रहे थे !

निशान इतने बड़े थे कि उन्हें सामान्य कुत्ते के पंजे के निशान नहीं माना जा सकता था ! गांव के लोगों ने पंचायत में इस विषय में चर्चा की और लोगों को सावधान रहने की चेतावनी ज़ारी कर दी गई ! उन्हें पूरा विश्वास था कि ये कुत्ते की आत्मा रही होगी, जिसे डरा धमका कर गांव से भगा दिया जाना चाहिए ताकि वो फिर कभी वापस ना लौटे ! उन्होंने ढ़ोल और कछुवे के खोल वाले झुनझुने इकट्ठे किये और रात में उस जगह के आस पास छुप गये जहां पर चोरी की घटना घटी थी ! देर रात उन्होंने ढ़ेरों  चिड़ियों के पंख फड़फड़ाने जैसी आवाजें सुनी, उन्होंने देखा कि एक भीमकाय कुत्ता आकाश से नीचे, धरती की ओर झपट रहा है ! वो भण्डार कक्ष में आटे की टोकरी के पास उतरा और उसने अपने विशालकाय मुंह में भर भर कर आटा खाना शुरू कर दिया !

उसी समय लोगों ने ढ़ोल बजाना और शोर मचाना शुरू कर दिया! शोर इतना तेज था, जैसे कि आकाश में बिजलियां कड़क रही हों! कुत्ता वापस मुड़ा और सड़क पर भागने लगा ! लोग जितना भी तेज शोर कर सकते थे उतना ही करते हुए कुत्ते का पीछा करने लगे ! कुत्ता भागते हुए पहाड़ की चोटी पर जा पहुंचा और वहां से उसने वापस आकाश में छलांग लगा दी !  इस दौरान कुत्ते के मुंह के दोनों तरफ से मक्के का आटा आकाश में बिखर रहा था ! बहरहाल वो कुत्ता आकाश में अन्तर्ध्यान हो गया, लेकिन उसके मुंह से बिखरे हुए आटे का हर एक कण, एक तारा बन गया ! आकाश में बिखरे हुए, आटे का स्वरुप, तारों की एक विशाल नदी के जैसा था, यानि कि तारों भरा आकाश नद ! चेरोकी लोग कहते हैं कि ये वो रास्ता है, जहां से कुत्ता भागा था ! 

कथा सृजन का समय निश्चित रूप से चेरोकी समुदाय के खेतिहर हो जाने का समय है, जबकि वे लोग मक्के की फसल उगाते और तब उन्हें, सर्दियों के कठिन समय के लिये, फसल के भण्डारण और संरक्षण का, आरंभिक तकनीकी ज्ञान था ! आख्यान कहता है कि चेरोकी गांव में चोरी की घटना परेशान करने वाली थी,यानि कि चेरोकी लोगों को चोरी जैसे असामाजिक / आपराधिक कृत्य का कोई पूर्व अनुभव नहीं था ! उनके लिये यह असहज समय था, उनके समुदाय के लिये नितांत अस्वीकार्य घटनाक्रम, जिसके विरुद्ध पूरे गांव का एकजुट हो जाना महत्वपूर्ण है ! उस गांव में पंचायत की मौजूदगी, विषय विचारण के लिये न्यायालय जैसी और संकट के समाधान के लिये कार्यपालिका के जैसी थी ! उन सभी ने चोरी के लिये जिम्मेदार ठहराई गई कुत्ते की आत्मा से एक साथ जूझने का निश्चय किया, वे चोरी की पुनरावृत्ति और चोर के पुनरागमन को रोकने के लिये कृत संकल्प थे !

चेरोकी लोगों का अस्तित्व इस बात पर निर्भर था कि वे मक्के की फसल का सदुपयोग करें, इस कथा में सांकेतिक रूप से प्रस्तुत कथन यह कि मक्का, चेरोकी जीवन की संजीवनी है ! आधार तत्व है...सो तारों की उत्पत्ति, उनके जीवन चक्र और अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों सह आकाशीय संरचनाओं के अस्तित्व के लिये भी, उसे ही उत्तरदाई होना चाहिए ! धरती और आकाशीय जीवन के लिये उत्तरदाई, एक ही तत्व की कल्पनाशीलता अद्भुत है ! संभव है कि मक्के के सूखते / फूटते दानों की चमक और तारों की चमक में साम्यता का आभास इस कहन की पृष्ठभूमि में मौजूद हो, इसके अतिरिक्त ध्यान रखने योग्य कथन यह कि कुत्ते की आत्मा, आकाश से धरती पर उतरती है, लेकिन संकट में पड़ जाने की स्थिति में भागते हुए, उसे पहाड़ की ऊंचाई का सहारा है, जहां से, वो वापस ऊंचे आकाश में उड़ान भर सकती है, गज़ब का विचार है...    

सोमवार, 24 जुलाई 2017

असुर को पाताल लिखो !

उन दिनों दुनियां का सृजन एक द्वीप के रूप में किया गया था जो कि आकाश में तैरती रहती थी, तब उसमें आकाश मानुष सुख और शांति से रहा करते, उन्हें दुःख का बोध ही नहीं था ! वे ना तो जन्म लेते और ना ही उनकी मृत्यु हुआ करती ! बहरहाल एक दिन एक स्त्री को यह अनुभूति हुई कि वह जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली है, उसने ये बात अपने पति को बतलाई, जिसे सुनकर पति रोष से भर गया और उड़ते हुए द्वीप के मध्य स्थित उस पेड़ तक जा पहुंचा, जो सारे द्वीप को रौशन करता था, क्योंकि तब तक सूर्य का सृजन नहीं किया गया था ! पति ने पेड़ को बीच से फाड़ डाला और द्वीप के बीच-ओ-बीच एक बड़ा सा छेद कर दिया, जिज्ञासावश स्त्री ने उस छेद से नीचे झांका, तो उसे चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दिया, इसी क्षण पति ने उसे पीछे से धक्का दिया तो वो नीचे पानी की ओर गिरने लगी !  

आकाश में तैरते उस द्वीप के बहुत नीचे मौजूद पानी में अनेकों जल जीव रहा करते थे ! जिसमें से दो परिंदों ने द्वीप से नीचे गिरती हुई स्त्री को देख लिया था, सो पानी में गिरने से पहले ही उन्होंने उसे लपक कर अपनी पीठ में रख लिया और अन्य जल जीवों तक पहुंचाया ! सारे जल जीव स्त्री की मदद करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने, पानी में गहरी डुबकी लगा कर तल से कीचड़ / मिट्टी निकालने का यत्न किया पर एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा और फिर...फिर...फिर...वे सभी असफल रहे, अंततः एक मेढ़क ने गहरे तल की ओर डुबकी लगाई और जब वह वापस लौटा तो उसके मुंह में कीचड़ भरा हुआ था, जिसे जल जीवों द्वारा विशाल कछुवे की पीठ पर फैला दिया गया, इसके बाद कीचड़ खुद ब खुद बढ़ने लगा और उसने एक महाद्वीप जितना विस्तार पा लिया, फिर वो स्त्री इस नवनिर्मित भूमि पर चढ़ी और उसने हवा में धूलि कण बिखेर कर तारों की रचना की, यहां तक कि सूर्य और चंद्रमा की भी ! कुछ समय के बाद स्त्री ने जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया !

उसने एक पुत्र का नाम अंकुर रखा जो कि सहृदय और सौम्य था जबकि दूसरे शिशु का नाम चकमक रखा जो कि पाषाण हृदय और ठन्डे स्वभाव वाला था ! दोनों बच्चे शीघ्र ही युवा हो गये और धरती को अपने सृजनशीलता / विनाश लीला से आबाद-ओ-बर्बाद करने लगे ! अंकुर अच्छे स्वभाव का था, सो उसने मनुष्यों के लिये उपयोगी पशु बनाये ! उसने दो दिशाओं में बहने वाली नदियां बनाईं और उनमें बिना कांटों वाली मछलियां डालीं और ऐसे पौधे / वनस्पतियां बनाईं जिन्हें मनुष्य आसानी से खा सकें ! अंकुर ने यह कार्य स्वयं किया बिना थके बिना कष्ट ! दूसरी तरफ चकमक ने अंकुर के सारे सृजन को तहस नहस कर दिया और मनुष्यों को दुःख देने वाली निर्मितियां कीं ! उसने नदियों को एक ही दिशा में बहने वाला बना दिया ! उसने मछलियों में कटीली हड्डियां डाल दीं और बेरियों / झाड़ियों में कांटे लगा डाले !

चकमक ने सर्दियां बनाई तो अंकुर ने सर्दियों में जान डाल दी ताकि वे आगे बढ़ें और वसंत ऋतु उनका स्थान ले सके ! चकमक ने राक्षस बनाये तो अंकुर ने उन्हें धरती के नीचे पाताल में धकेल दिया ! अंततः अंकुर और चकमक ने किसी एक के विजयी होने तक युद्ध करने का निर्णय लिया, दोनों ने लंबे समय तक भयंकर रण किया ! कोई किसी से कम नहीं था लेकिन विजय अंकुर की हुई, चूंकि चकमक भी देवता था सो उसे मारा जाना संभव नहीं था, इसलिए उसे भूमि के नीचे विशाल कछुवे की पीठ में जाकर रहने के लिये विवश किया गया ! कहते हैं कि उसका क्रोध अक्सर ज्वालामुखी के रूप में फूटता रहता है ! इरोक्योइज लोग जीव जंतुओं को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि अगर जीव जंतुओं ने स्त्री को गहरे पानी में डूबने से नहीं बचाया होता तो धरती का...और फिर धरती पर किसी भी तरह का, सृजन ही नहीं होता ! 
  
आख्यान में उल्लिखित, आकाश में तैरते द्वीप, जहां ना कोई जन्मता है और ना ही मृत्यु होती है, केवल सुख ही सुख मौजूद, दुःख की लेश मात्र भी अनुभूति नहीं !  सोचें तो इस आकाशीय दुनिया से, धरती की अग्रणी सभ्यताओं में मौजूद स्वर्ग की अवधारणा की प्रतीति होती है, जहां सब लोग अमर यानि कि देव तुल्य हैं ! बहरहाल स्वर्गलोक जैसे इस स्थान पर किसी देवी तुल्य स्त्री का गर्भवती हो जाना और उसके पति द्वारा रुष्ट होकर, पत्नि को अगाध जल में धकेल देने के दो प्रातीतिक अर्थ हो सकते हैं, एक यह कि उक्त युवती का गर्भवती हो जाना, देवताओं के अयोनिज होने की धारणा खंडन करता है और दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह कि धरती सृजन की पूर्व निर्धारित योजना / लीला के अंतर्गत पत्नि को जानबूझ कर उस जलीय संरचना की ओर भेज दिया गया, जिसकी कोख से धरती का सृजन संभव था !

यह जानना रुचिकर है कि आकाश द्वीप में एक वृक्ष, रौशनी का स्रोत है जबकि सूरज और चांद, धरती की निर्मिति के उपरान्त, उसकी आवश्यकता के अनुसार सृजित किये जाना हैं ! कथा गहरे पानी में, अन्य जल जीवों की तुलना में मेढक के अधि-सामर्थ्य का बयान करती है और देवलोक से निष्कासित गर्भवती की प्राण रक्षा करने के आशय से, जल जीवों के दयावंत होने का कथन करती है और यह सन्देश भी देती है कि मनुष्यों को, जल जीवों की इस कृपा के लिये सदैव कृतज्ञ बने रहना चाहिए ! अतल जल से मेढ़क के मुंह भर कीचड़ का प्राप्य और फिर सभी जल जीवों द्वारा विशाल कछुवे की पीठ पर उस कीचड़ को बिखेर देने का कथन सांकेतिक है, अगर हम स्मरण करें, तो पाते है कि अन्य बड़ी और महान सभ्यताओं में भी धरती के, विशाल कछुवे की पीठ पर टिके होने के वृत्तान्त सहज उपलब्ध हैं !

यही नहीं देवताओं और असुरों के एक ही पिता की संतान होने के कथन भी सर्व सुलभ हैं, यदि इसे भारतीय सन्दर्भ में देखा जाये तो देवताओं और असुरों की मातायें परस्पर बहने थीं लेकिन पिता एक ही, ऋषि...देवतुल्य ! धरती, तारों और ब्रह्माण्ड की निर्मिति में पदार्थों की समरूपता के विवरण विज्ञान देता है , अगर इस अनुश्रुति को ध्यान से पढ़ा जाए तो हम पाते हैं कि गर्भवती स्त्री ने धूलि कणों को बिखेर कर चांद, तारों और सूरज की रचना की, प्रतीकात्मक रूप से धूल को ब्रह्मांडीय पिंडों के निर्मायक तत्व / पदार्थ के रूप में स्वीकार करना कठिन नहीं है, खासकर तब जब कि निरक्षर आदिवासी यह कथन कर रहे हों ! बहरहाल गर्भवती स्त्री के दो पुत्रों का देव और दानव के रूप में जन्म लेना सर्वथा सांकेतिक कथन है, जो मनुष्यों के अच्छे और बुरे होने, फिर सृजन और विनाश में लग जाने की प्रवृत्तियों का विवरण देते हैं !

अच्छी और बुरी / दैव और आसुरी शक्तियों के मध्य सतत संघर्ष धरती की सर्वकालिक गाथाओं में मौजूद अनिवार्य, आधार तत्व है, इन सभी गाथाओं का अंत, देव-तुल्य के धरती और देवलोक में बने रहने तथा पराजित आसुरी शक्तियों को पाताल लोक में धकेल दिये जाने, पर होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि इस कथा के नायक अंकुर और खलनायक चकमक के युद्ध के बाद हुआ...    

बुधवार, 19 जुलाई 2017

ढ़ोल

कहते हैं कि जब सृजनहारा धरती मां में बसाहट के लिये आत्माओं को स्थान दे रहा था तभी कहीं दूर बूम की जोरदार आवाज़ हुई जो कि क्रमशः सृजनहारे के निकट आती गई और सृजनहारा उसे तेजतर होते सुनता रहा ! जब आवाज़ सृजनहारे के ऐन सामने पहुंच गई तो सृजनहारे ने उससे पूछा तुम कौन हो ? आवाज़ ने कहा मैं ढ़ोल की आत्मा हूं ! कृपया आप मुझे आपके अद्भुत कार्य में भागीदार होने की अनुमति प्रदान करें ! सृजनहारे ने कहा भला तुम क्या योगदान दोगी ? आवाज़ ने कहा मैं लोगों के हृदय से निकली गायकी में उनका साथ दूंगी ठीक वैसे ही जैसे कि मैं स्वयं धरती मां के हृदय की धड़कन हूं / आवाज़ हूं ! इस तरह से सारा सृजन समस्वर / अनुकूलता  में गायेगा ! सृजनहारे ने यह सुन कर आवाज़ को सृजन कार्य में सहभागिता के लिये अनुमति प्रदान कर दी और तभी से ढ़ोल लोगों के सुरों की संगत करता है !

यहां तक कि  समस्त अर्वाचीन जातियों में ढ़ोल, गीतों का केन्द्र बिंदु बना रहता है वो गीतों की आत्माओं का उत्प्रेरक है , जिससे गीत सृजनहारे तक अथवा जहां तक वे प्रार्थना बन कर पहुंचना चाहें , पहुंच सकते हैं ! समस्त समयों में ढ़ोल ध्वनि को सम्पूर्णता प्रदान करता है ! दुःख, विस्मय, उत्तेजना, गंभीरता, शक्ति, साहस और गीतों में पूर्णता लाता है ! ये धरती माता पर निर्भर लोगों को धरती माता की धड़कनों की सहमति / स्वीकृति का बोध कराता है ! यह उस ईगल की निर्मिति करता है जो सृजनहारे तक संदेशों को लाता और ले जाता है ! यह लोगों के जीवन को बदल देता है !  

अनक्षर आदिम समाजों में प्रचलित अनुश्रुतियों के अध्ययन से कम-ओ-बेश ये तो स्पष्ट होता ही है कि व्यक्तिगत और समुदायगत अनुभवों के संचयन, में प्रकृति और मानवीय पर्यवेक्षण की सुसंगति अनिवार्य शर्त है ! अद्यतन अनुभवों / ज्ञान और विज्ञान के लिये पर्यवेक्षण, अनक्षर काल में जितना महत्वपूर्ण था उससे कहीं अधिक वह आधुनिकतम समाजों की अपरिहार्यता है ! विवेचनाधीन आख्यान अबनाकी आदिम समुदाय की सृष्टि सृजन विषयक मान्यताओं पर आधारित है, वे आश्चर्यजनक रूप से सृष्टि सृजन के समय नाद / ध्वनि की उपस्थिति की परिकल्पना करते हैं, जैसे कि उनके स्वयं के दैनिन्दिक, व्यक्तिगत या सामुदायिक जीवन घटनाक्रम, जनम, मरण, उल्लास, शोक समय में ध्वनि की भूमिका दिखाई देती है, बिलकुल वैसी ही सृष्टि सृजन के समय भी रही होगी, की धारणा पर आधारित है ये कथा !  

सृजनहारा धरती में बसाहट के लिये, आत्माओं को भूमिकायें और प्रस्थितियां सौंप रहा है, तभी सुदूर कहीं तुमुल नाद का प्रकटीकरण, नाद से सृजनहारे की अनभिज्ञता और परिचय अलबेला है ! नाद स्वयं कहे कि वह ढ़ोल की आत्मा है और उसे धरती में हो रहे अद्भुत सृजन कार्य में भागीदारी की लालसा है, ठीक वैसे ही जैसे कि आदिम समुदाय के दिन प्रतिदिन के जीवन में उसकी सक्रिय भागीदारी है,सशक्त हस्तक्षेप है ! नाद स्वयं को धरती मां के हृदय की धड़कन कहे और मनुष्यों के गीतों में अनुकूलता और समस्वरता के रूप में स्वयं के अभिव्यक्त होने का कथन करे तो इसे आख्यान कहने, रचने वाले समुदाय की सृजनशीलता / कल्पनाशीलता का सर्वश्रेष्ठ ही माना जाएगा ! सृजन कर्म में नाद की भूमिका को ईश्वर का स्वीकरण, गीतों / गायन और सुरों में, ढ़ोल की सुसंगति को मनुष्यों के समर्थन जैसा है !

कथा में ढ़ोल को समस्त आदिम समुदायों के गीतों का केन्द्र बिंदु माना गया है ! आशय यह कि ढ़ोल गीतों से लेकर दुःख,उल्लास,विस्मय, उत्तेजना और शक्ति प्रदर्शन के समयों में तथा मनुष्यों की प्रार्थनाओं में परिपूर्णता का प्रतीक है, यानि कि ढ़ोल नाद की पूर्णता है, वो सृजनहारे तक पहुंचने की आकांक्षा रखने वाले मनुष्यों की सफलता की आश्वस्ति है, संदेशों के सम्प्रेषण साफल्य और एक एक एकाकी मनुष्यों के सम्पूर्ण समुदाय में बदलते जाने का महती माध्यम है ! कुल मिलाकर यह आख्यान ईश्वर, मनुष्य और धरती के मध्य एक-लय होने का कथन है ! सृष्टि में नाद की अनिवार्य उपस्थिति जो कि ईश्वरीय सृजन को सम्पूर्णत्व, धरती मां के हृदय को धड़कन और मनुष्यों को सामाजिक सांस्कृतिक प्राणी हो जाने का वरदान दे !

शुक्रवार, 14 जुलाई 2017

सिरजनहार

तब हम महान आत्मा को नहीं जानते थे, उसने देखा, कहीं कुछ भी नहीं था, कोई रंग नहीं, कोई सौंदर्य नहीं ! समय, अन्धकार की कोख में दुबका हुआ ! सब अदृश्य, कोई शय / तत्व अनुभूति योग्य नहीं ! महान आत्मा ने निर्णय लिया कि वो इस रिक्तता को जीवन और प्रकाश से भर देगा ! अपने असीम सामर्थ्य से उसने सृजन की चिंगारी को प्रकटित किया और महाकाय कछुवे, तोल्बा को निर्देश दिया कि वो पानी से बाहर निकल कर धरती बन जाए ! इसके बाद महान आत्मा ने कछुवे की पीठ पर मैदान, घाटियां और पर्वत बनाए ! ...फिर उसने नीले आसमान पर सफ़ेद बादल बिखेर दिये ! वो बहुत खुश था और बुदबुदाया...सब तैयार है, अब मैं इस स्थान को जीवन के खुशनुमा पलों से भर दूंगा !

उसने सोचाबहुत सोचा कि, किस तरह के जीव उसे बनाना चाहिए ? वे कहां रहेंगे ? क्या करेंगे ? उनका जीवन लक्ष्य क्या होगा? वो एक त्रुटिहीन योजना बनाना चाहता था ! उसने गंभीर चिंतन किया, इतना कि, थक कर चूर हुआ और सो गया ! उसकी नींद उसके सृजन स्वप्नों से परिपूर्ण थी ! स्वप्न में उसने अनजानी और विलक्षण चीजें देखीं ! उसने देखे...रेंगते हुए, दो और चार पैरों से चलते हुए जीव, कुछ पंखों से उड़ान भरते...कुछ तैरते हुए भी ! धरती पर हर ओर पेड़ पौधे, रंग बिरंगे भांति भांति के ! चहुंदिश लघु कीट भिनभिन, भुनभुन, गुंजन करते, कुत्ते भौंकते हुए, पंछी गाते हुए...और मनुष्य एक दूसरे से बातें करते हुए !

सभी कुछ, उस स्थान से बाहरी जैसा आभासित, महान आत्मा ने सोचा यह एक बुरा सपना था, एक अपूर्ण / अशुद्ध विचार !  नींद से जागते ही उसने देखा कि एक ऊदबिलाव लकड़ी की टहनियों को दक्षता से एक आकार दे रहा है ! अपने परिवार के लिये एक घर, एक काष्ठ बांध और परिजनों के तैरने के लिये एक कुंड !  महान आत्मा ने समझ लिया कि उसके स्वप्न ने आकार ले लिया है ! पीढ़ी दर पीढ़ी इस कथा को कहते हुए, अबनाकी इंडियंस मानते हैं कि, हमें अपने स्वप्नों पर सवाल नहीं उठाने चाहिए, क्योंकि वे हमारा सृजन होते हैं !

इस आख्यान में पारलौकिक अधिसत्ता के हाथों धरती और जीव जगत की निर्मिति के संकेत दिये गये हैं ! कथा को बांचो तो मिलते हैं, कुछ विरोधाभासी कथन जैसे कि, पानी था और महाकाय कछुवा भी, साथ ही ये कि, कहीं कुछ भी नहीं था, ना रंग, ना सौंदर्य और ना ही अनुभूति योग्य कोई तत्व सह धरती भी ! बहरहाल पानी और कछुवे के इतर एक परम आत्म / सर्व शक्तिमान था और एक अन्धकार भी, अपनी कोख में समय को समेटे हुए ! कहन की दृष्टि से यह आख्यान अद्भुत है, एक ईश्वर जो सिरजनहार है / सृजन करता है और इस हेतु योजनाबद्ध गहन चिंतन मनन भी ! वो मनुष्यों की तरह से परिश्रम करता है, रचता है, मैदान, घाटियां, पर्वत वगैरह वगैरह !

सिरजनहारे को जीव जगत की निर्मिति के पूर्व त्रुटिहीन योजना बनाने के लिये, गहन विचारण करना पड़ता है और वो थक कर चूर हो जाता है, ऐन मनुष्यों की तरह से ! उसकी नींद, स्वप्नों से परिपूर्ण है, बिलकुल मनुष्यों की नींद के जैसी ! प्रतीत होता है कि, सारे का सारा ईश्वरीय सृजन, मनुष्यों के स्वयं के प्रकृति पर्यवेक्षण का हिस्सा है ! महाकाय कछुवे की पीठ पर स्थित धरती की कल्पना, कछुवे के कवच की सुदृढता के आलोक में, की गयी लगती है, या फिर संभव है कि अबनाकी लोग, महाकाय कछुवे को भी पारलौकिक शक्ति मान कर उसकी पीठ पर अधिकाधिक सपाट, किंचित उन्नतोदर और कुछ गर्त युक्त धरा के अस्तित्व पर  विश्वास करते  हों !

लोक कथाओं की विवेचना करते समय हम अक्सर, कथा स्रोतों को निरक्षर अथवा गंवार मान लेते हैं, किन्तु ये आख्यान मनुष्यों के सपनों को सृजन घोषित कर, कदाचित सपनों का आधार / आद्य बिंदु कह कर, हमारी इस मन:विकृति को क्षण में धूल धूसरित कर देता है !   

मंगलवार, 25 जून 2013

और यूं जग उपजा...!

उन दिनों जबकि यह जग उपजा ही नहीं था तब , एक पाषाणवत अंडा मौजूद था ! परिपक्वता की अवधि के उपरान्त एक दिन उस अंडे में से पान गु बाहर आया जो कि पर्वतों से अधिक ऊंचा और समुद्रों से अधिक महाकाय था ! गौर तलब है कि , तब स्वर्ग और धरती एक दूसरे में गुत्थमगुत्था / समाहित थे !  पान गु ने धरती और स्वर्ग को अपनी पूरी शक्ति के साथ एक दूसरे से अलग कर दिया , जिसके कारण से जोर की ध्वनि हुई ! उसे लगा कि धरती और स्वर्ग फिर से ना मिल जायें , सो वो लंबे समय तक इन दोनों को अलग थलग किये हुए खड़ा रहा !  इसके बाद अपनी सम्पूर्ण / प्रचंड शक्ति का प्रयोग कर चुकने के कारण मृत होकर गिर पड़ा !

उसके मृदु रक्त से नदियां बनीं तथा लंबे केशों से लकड़ियां और उसकी देह से धरती का सारे का सारा भूदृश्य (लैंड स्केप) ऊंचे पहाड़ , समतल मैदान , घाटियाँ वगैरह वगैरह अस्तित्वमान हुए ! उसकी साँसों ने हवाओं और बादलों की शक्ल ले ली और इस तरह से यह जग सृजित हुआ , फिर एक परी जिसका नाम नू वो था , जब धरती पर विचरण करने आई तो उसने कहा , यह जग कितना नीरस है ! धरती की नीरसता दूर करने के ख्याल से नू वो , ने नदी तट की गीली मिट्टी से एक मानव पुतले का निर्माण किया और उसमें खोखले नरकुल / सरकंडे के माध्यम से प्राण फूंके !

अब वो पुतला चल फिर सकता था और बातचीत भी कर सकता था , लेकिन वो नितांत अकेला था , अस्तु परी ने उसकी सहचरी स्त्री के रूप में एक और मानव पुतले का निर्माण किया और उसमें भी प्राण प्रतिष्ठित किये ! सृजन की इस प्रक्रिया के दौरान नू वो को लगा कि निज हाथों से मानव सृजन एक थकाऊ प्रक्रिया है , अतः उसने चहुँ दिश कीचड़ बिखेर दिया , जिसके फलस्वरूप अनेकों स्त्री और पुरुषों की निर्मिति हुई !  कालान्तर में ये सब लोग चतुर सुजान अथवा सरल स्वभाव के प्राणियों की तरह सारी धरती पर व्याप्त हो गये !

चीनी पृष्ठभूमि के इस लोक आख्यान के कई और विस्तारित संस्करण भी मौजूद हैं , किन्तु आदिम जागतिक मन,  सृष्टि के सृजन के विषय में,  क्या सोचता है ? को समझने के लिए कथा का यह लघु संस्करण ही पर्याप्त है !  उस समय, जबकि इस आख्यान को पहले पहल कहा गया होगा तब के , लोक जीवन में , नि:संदेह नितांत अनक्षरता  की परिस्थितियां व्यापित रही होंगी ! इसके बावजूद धरती से आकाश की ओर मनुष्य के अपने प्राथमिक पर्यवेक्षण उसे सुदूरस्थ ग्रहों के वर्तुलाकार होने का संज्ञान  / अनुभूति दे गये होंगे !

जग के जन्म से पूर्व , अंडाकार प्रारूप में अन्तर्निहित बीज / तत्वों ने समय पूरा होने के बाद ना केवल स्वयं आकार लिया बल्कि धरती और स्वर्ग को पृथक करने वाली शक्ति का कार्य भी किया ! इतना ही नहीं एक निश्चित समय सीमा के उपरान्त इन शक्तियों का क्षय और उसके बाद इन तत्वों के रूपान्तरण / ट्रांसफार्मेशन बतौर ही जग की भू-दृश्यावलियां गढ़ी गईं ! एक अदभुत परिकल्पना यह है कि अंडा यानि कि वर्तुलाकार प्रारूप , उसमें अन्तर्निहित महाकाय जीवन , यानि कि शक्तियां / एलिमेंट्स / तत्व अथवा ऊर्जा जो निरंतर रूपांतरण कर नव-स्वरुप / नव-आकार लेती रहीं !

अब अगर गौर करें तो अंडें में निहित सारे एलिमेंट्स अपनी आरंभिक अवस्था में वैसे ही गुत्थमगुत्था थे  / उतने ही अनिश्चित थे जैसे कि अपनी आरंभिक अवस्था में ब्रह्माण्ड में निहित ब्रह्माण्ड के निर्मायक तत्व ! एक निश्चित समय की पूर्णता और पारिस्थितिकीय कारणों से दोनों की टूटन / विस्फोट और उसके बाद नव सृजन की कल्पना और रूपांतरण का साम्य चकित करता है ! नि:संदेह आदिम जीवन की इस गाथा से इस तरह के संकेत मिलते हैं कि जैसे मनुष्य उस समय भी अपने ब्रह्माण्ड के निर्माण की प्रक्रिया से परिचित ही रहा होगा या फिर उसके अनुभवों ने घट रहे घटनाक्रम की सही सही दिशा / सही सूत्र पकड़ लिए थे !  

मनुष्यों को गीली मिट्टी से गढ़ने का उल्लेख अर्ध- धार्मिक और अर्ध- वैज्ञानिक प्रकृति का है , एक परी के द्वारा  मिट्टी से आदम का गढा जाना अगर धार्मिकता के सन्दर्भ में स्वीकार किया जाए तो जल तत्व की मौजूदगी में मनुष्य के जन्म के वैज्ञानिक पहलू / समझ को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता !