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सोमवार, 14 अगस्त 2017

फंदे में हवा

शुरुआत में हवा, बेहद हिंसक गति के साथ बहा करती थी ! वो अक्सर, आदिम धरती के वाशिंदों की जान ले लेती और उनकी संपत्ति तहस नहस कर डालती ! उन दिनों झूलते पुल के पास एक व्यक्ति अपने तीन पुत्रों के साथ रहता था, उसके पुत्रों में सबसे छोटा, बहुत महत्वाकांक्षी था, वो नित नये और अद्भुत कार्य करता रहता ! एक दिन उसने अपने पिता और भाइयों से कहा, मैं हवा को फंदे में फंसाना चाहता हूं, ये सुनकर वे सभी उस पर हंसे ! उन्होंने कहा, हवा तो दिखती ही नहीं, तुम उसे कैसे फांसोगे ? खिल्ली उड़ाये जाने के बाद भी, वो बाहर गया और उसने फंदा लगाया !

वो कई रातो तक असफल रहा, क्योंकि उसका फंदा बहुत लंबा था, बहरहाल वो हर एक रात उस फंदे को छोटा करता जाता और सुबह आकर फंदे को देखा करता, एक सुबह उसने देखा कि हवा उसके छोटे से फंदे में फंस गई है ! बड़ी मशक्कत के बाद उसने हवा को अपने कम्बल में लपेटा और घर की तरफ चल पड़ा ! घर पहुंचकर उसने कम्बल को नीचे रखा और गांव के लोगों से कहा, अंततः मैंने हवा को पकड़ लिया है ! वे सभी उस पर हंसने लगे ! गांव वालों को विश्वास दिलाने के लिये, उसने कम्बल का एक छोर ढ़ीला किया तो हवा उग्रता के साथ बाहर निकलने लगी !

उसका निवास अस्त व्यस्त होकर लगभग गिरने ही वाला था ! लोगों ने चीख कर उससे कहा, हवा की तीव्रता / गति कम करो, उसने कम्बल का कोना फिर से बांध कर ऐसा ही किया ! अन्ततोगत्वा उसने हवा को इस शर्त के साथ बंधन से मुक्त किया कि वो दोबारा फिर कभी, आदिम धरती पर रहने वाले लोगों को चोट पहुंचाने वाली गति से नहीं बहेगी...और हवा ने सदैव इस शर्त का पालन किया !

उन दिनों मनुष्यों को प्रकृति के साथ अपने संबंधों को निर्धारित करना था ! ये दिन, उनके सीखने / अनुभव संजोने के आरंभिक दिन थे, जब कि उन्होंने प्राकृतिक शक्तियों को स्वयं की तुलना में अधिक बलशाली मानकर, देवताओं में गिन लिया था ! उनके महीनों/ वर्षों के सृजन कर्म को प्राकृतिक शक्तियां क्षण में तहस नहस कर डालती, यथा वे कई कई दिनों में अपना आशियाना बना पाते, लेकिन बाढ़ / आंधियां / अग्नि, कुछ एक पल में ही सब स्वाहा कर देते / तिनका तिनका बिखेर देते ! तब मनुष्यों का तकनीकी सामर्थ्य अपने शैशव काल में था, सो प्राकृतिक शक्तियों के समक्ष डट कर खड़े रहने की अपेक्षा यह स्वभाविक ही था कि वो काल्पनिक धरातल पर ही सही, इन शक्तियों के आगे समर्पण कर दे !     

अमेरिकन इंडियंस में बहुश्रुत, ये आख्यान संकेत देता है कि हवा, मनुष्यों के जीवन और संपत्तियों की क्षति का कारण थी, उसकी गति मनुष्यों के नियंत्रण से बाहर और अक्सर होने वाली विनाश लीला के लिये उत्तरदाई थी, सो उसे हिंसक कहा गया है ! कथा के पात्र, बूढ़े पिता और तुलनात्मक रूप से आयु में बड़े भाइयों की तुलना में छोटे भाई को अधिक जिज्ञासु / ज्ञान पिपासु / नवाचारी माना गया है, इसलिए वो युवा, अपने पिता और भाइयों की तरह से हवा के समक्ष समर्पित बने रहने की बजाये मुक्त होना चाहता है, हवा को अपने नियंत्रण / आधिपत्य में लेना चाहता है ! पुरानी और नई पीढ़ी की मनः स्थितियों का यह अंतर सहज है ! स्वभाविक है !

कथा समय तक संचित अनुभव / ज्ञान यह है कि हवा दिखती नहीं और क्षति पहुंचाने की हद तक शक्तिमान है, तो पुरानी पीढ़ी का यथास्थिति वाद नई पीढ़ी के उपहास की शक्ल में अभिव्यक्त होता है, हालांकि युवा नवाचारी, उपहास से हतोत्साहित नहीं होता बल्कि हवा को नियंत्रित करने के अपने निश्चय पर कायम बना रहता है ! कह नहीं सकते कि उसने हवा पर नियंत्रण स्थापित करने के लिये क्या क्या प्रयोग किये होंगे ? पर...अनुश्रुति कहती है कि वह हर रात अपने फंदे को छोटा करता जाया करता था, इसे हम प्रतीकात्मक रूप से अध्येता / प्रयोगकर्ता के दृष्टिकोण, उसकी धारणाओं के परिष्कृत / शुद्ध ( Precise) होते जाने के तौर पर स्वीकार कर सकते हैं !

विज्ञान सम्मत कथन यह है कि हवाओं पर अपने नियंत्रण को सिद्ध करने के लिये उस युवा ने गांव वालों के समक्ष, सार्वजानिक तौर पर प्रदर्शन किया था / प्रस्तुतीकरण दिया था ! कम्बल और फंदे को सांकेतिकता के लिहाज़ से ऐसा उपकरण माना जाना चाहिए, जिसे कि अन्वेषण कर्ता ने अपने प्रयोग के दौरान इस्तेमाल किया होगा ! इन दिनों हम हवा से बिजली बनाते हैं, तब संभवतः नाव चलाने के लिये, खलिहान में अन्न से भूसे को हटाने के लिये, चूल्हे में धुंधवाती आग को प्रज्वलित करने के लिये, जैसे अनेकों छोटे छोटे उद्धरणों में परिलक्षित, हवा के नियंत्रित इस्तेमाल की सफलता के लिये उक्त युवा को उत्तरदाई माना गया हो...

गुरुवार, 6 मार्च 2014

पहले पहल...!

एक समय धरती पर मनुष्य और पशु पक्षी सब मिलजुल कर रहते थे ! वे परस्पर बातचीत करते, मित्रवत साथ रहते किन्तु आगे चलकर मनुष्यों की जनसँख्या तेजी से बढ़ने लगी, सो पशु पक्षियों को अपनी बसाहट के लिये जंगलों और रेगिस्तानों की ओर जाना पड़ा ! इधर मनुष्य, ना केवल खाने के लिये, बल्कि फर और चमड़े के लिये भी जीव जंतुओं का अधाधुंध शिकार करने लग गये ! अपने कुछ समय पूर्व के मित्रों तथा पड़ोसी मनुष्यों के इस व्यवहार से सभी जीव जंतु अत्यधिक व्यथित / आक्रोशित थे और उन्हें इस मामले का कोई त्वरित समाधान खोजना आवश्यक लग रहा था ! सबसे पहले भालुओं की परिषद में इस मामले पर विचार किया गया, जिसमें कई वक्ताओं ने मनुष्यों के खूनी स्वभाव और तौर तरीकों की जम कर निंदा की !

इस विचार परिषद की अध्यक्षता श्वेत भालुओं के मुखिया द्वारा की गई थी, जिसमें सभी भालुओं ने सर्व सम्मति से मनुष्यों के विरुद्ध खुलकर युद्ध छेड़ना तय किया !  इसके आगे चर्चा का विषय यह था कि शिकारी मनुष्यों के विरुद्ध किस तरह के हथियारों का प्रयोग किया जाये, चर्चा के दौरान श्वेत भालुओं के मुखिया ने सुझाव दिया कि मनुष्य का मुकाबला उसके ही हथियार धनुष बाण से किया जाना उचित होगा ! अध्यक्ष के इस सुझाव को सभी भालुओं का एक मतेन समर्थन प्राप्त हो गया, किन्तु समस्या यह थी...कि प्रत्यंचा का जुगाड़ कैसे किया जाये ? इस बीच कुछ भालुओं ने बाणों के लिये अच्छी लकड़ी ढूंढ ली थी ! बहरहाल प्रत्यंचा के लिये एक भालू ने अपने जीवन का बलिदान कर दिया और फिर उसकी खाल से प्रत्यंचा बना ली गई !  

धनुष का परीक्षण करते समय देखा गया कि भालुओं के पंजे मनुष्यों की तरह से शर-संधान नहीं कर सकते, उन्हें और अधिक लचीला होना चाहिये था ! एक भालू ने प्रस्ताव दिया कि उसका पंजा काट कर उसे संधान के अनुकूल बना लिया जाये लेकिन  इस प्रस्ताव को श्वेत भालुओं के मुखिया ने सिरे से ही ख़ारिज कर दिया, क्योंकि वह जानता था कि पंजे के बिना भालू ना तो पेड़ पर चढ़ कर अपनी जान बचा सकता है और ना ही अपने लिये खाद्य पदार्थ की व्यवस्था कर सकता है, बल्कि उसके भूखा मरने की संभावनायें प्रबल हो जायेंगी ! भालुओं की विचार परिषद भले ही अनिर्णीत समाप्त हुई...हालाँकि हिरणों ने इस समस्या पर विचारण के लिये पृथक से बैठक आयोजित की, जिसकी अध्यक्षता छोटे हिरण द्वारा की गई !

हिरणों की आम सभा में यह निर्णय लिया गया कि शिकारी मनुष्यों को सन्देश दिया जाये कि वे अपने भोजन मात्र के लिये शिकार करने से पहले, शिकार होने वाले हिरण से क्षमा प्रार्थना किया करें कि, हम मनुष्य, आपको अपनी क्षुधा पूर्ति के लिये मजबूरी में ही मार रहे हैं, यदि शिकारी मनुष्य सीमित शिकार की इस शर्त को नहीं मानें तो उन पर गठिया की भयावह बीमारी आरोपित कर दी जाये ताकि वे असहाय होकर, घिसट घिसट कर शिकार करने में नाकाम हो जायें, सभा के अध्यक्ष छोटे हिरण को यह जिम्मेदारी दे दी गई कि वो शिकार हुए हिरण की आत्मा से फ़ौरन पूछ ले कि शिकार से पूर्व उससे क्षमा माँगी गई थी अथवा नहीं...और निर्णय ये भी कि, ना की स्थिति में शिकारी मनुष्य पर तत्काल गठिया व्याधि से हमला कर दिया जाये !

बहरहाल शिकारी मनुष्यों से पीड़ित मछलियों और अन्य सरीसृप वर्गीय जीव जंतुओं ने भी अपनी अपनी जातीय परिषदों में यह निर्णय लिया कि चेरोकी कबीले के लोगों को प्रत्येक रात्रि को स्वप्न में ये चेतावनी दी जाये कि अगर वे अधाधुंध शिकार करना बंद नहीं करेंगे तो इस जातीय वर्ग के महाकाय सांप और भीमकाय मछलियाँ उन शिकारियों पर हमला कर देंगे और उन्हें जीवित निगल लेंगे और जल्द ही इस निर्णय पर अमल भी शुरू हो गया, निरंतर आने वाले दु:स्वप्नों से चेरोकी कबीले के शिकारी मनुष्य बेहद डरे हुए थे ! उन्हें भयावह परिणामों की आशंकाये घेर रही थीं, घबरा कर उन्होंने अपने जादूगर / शमन से मछलियों और साँपों वाले इन डरावने सपनों से मुक्ति दिलवाने की प्रार्थना की ! 

इधर मनुष्य हितैषी घास / पौधों / वृक्षों को जीव जंतुओं की परिषदों द्वारा मनुष्यों के विरुद्ध लिये गये निर्णयों की जानकारी हो गई थी अतः प्रत्येक पौधे / घास / कंद मूल / फूल / जड़ और वृक्षों ने अपने मित्र मनुष्यों की सहायता का निश्चय किया ! उन्होंने जीव जंतुओं द्वारा फैलाई जाने वाली तमाम व्याधियों के प्रतिरोध स्वरुप स्वयं को प्रस्तुत किया ! चेरोकी कबीले के जादूगर / शमन को जिन जिन व्याधियों की चिंता थी, वनस्पतियों की आत्माओं ने उन सब का उचित समाधान प्रस्तुत किया ! बस इसी समय से धरती पर पहली बार व्याधियों के उपचार के लिये दवाओं की उत्पत्ति हुई, हर्बल औषधियां तथा अन्य जादुई उपाय जो कि संकट के समय, चेरोकी राष्ट्र / सम्पूर्ण मानवता की रक्षा के लिये, मनुष्य हितैषी वनस्पति मित्र आत्माओं की अनुपम भेंट थी !
 
प्रतीत होता है कि इस आख्यान के समय के कबीलाई मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिये वनस्पतियों की तुलना में जीव जंतुओं को अधिक नुकसान पहुंचाया था, या फिर वनस्पतियां, उसकी आक्रामक नीतियों का प्रतिकार, अन्य जीव जंतुओं की तरह से नहीं कर सकती थीं यानि कि जीव जंतुओं की तुलना में वनस्पतियों द्वारा मनुष्य को नुकसान पहुंचाये जाने की सम्भावना न्यूनतम मानी गई हो ! संभव है कि औषध गुणों के हिसाब से तत्कालीन मनुष्य, वनस्पतियों को पशुओं से अधिक उपयोगी मानता रहा हो ! बहरहाल इस कथा में मनुष्य और पशुओं तथा वनस्पतियों के त्रिकोणीय पारस्परिक रहवास, उपयोगिता, मित्रता, द्वेष भाव, संकट के समय के स्व-जातीय विमर्श तथा मित्र चयन की प्राथमिकताओं और व्याधियों की उत्पत्ति के कारणों सहित औषधियों के विकास के लिये मनुष्यों और उसके नैसर्गिक पड़ोसियों के पारस्परिक संबंधों / अ-संबंधों का विशेष कथन किया गया है !

आदिम युगीन मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा स्वयं के जीवन मरण के प्रश्न के समुचित प्रत्युत्तर के लिये अपने नैसर्गिक पड़ोसियों यानि कि पशुओं और वनस्पतियों पर ही निर्भर था, हालाँकि, कालांतर में आदिम अर्थव्यवस्था के मौलिक असंचयी गुण धर्म के संचयी प्रवृत्ति में बदलते जाने को लेकर, पारस्परिक झगड़े और द्वेष भाव की उत्पत्ति का उल्लेख, इस कथा में प्रमुखता से मिलता है ! विशेषकर हिरणों की आम सभा के हवाले से देखें तो उन्हें, मनुष्य की भोजन प्रणाली का हिस्सा बने रहने में कोई आपत्ति नहीं थी ! वे मनुष्य के भोजन की अनिवार्यता के लिये समुचित और पर्याप्त आखेट तथा क्षमापूर्ण / विनम्र आखेट के लिये अपनी सहमति जतलाते हैं, स्पष्ट है कि वे सभी अपने पूर्व पड़ोसी मनुष्य की अति संचय प्रवृत्ति, लोलुपता और क्रूरता का निषेध करना चाहते हैं, जैसा कि इस आख्यान में साफ तौर पर मनुष्यों को भोजन से इतर फर और चमड़े का संग्राहक कहा गया है !

पशु पक्षी, मनुष्यों की बढ़ती आबादी के कारण अपने मूल रहवास से विस्थापित हुए, किन्तु वे अपने विस्थापन को लेकर अधिक व्यथित नहीं हैं बल्कि उन्हें अपने पूर्व मित्र के बदलते हुए स्वभाव से कष्ट हो रहा है ! आख्यान में स्वप्न से भय का उल्लेख प्रतीकात्मक रूप से मनुष्यों के अपने, स्वयं के अपराध बोध की स्वीकृति है, जोकि वे अपने प्राकृतिक जागतिक पड़ोसियों और पूर्व मित्रों के विरुद्ध करने लगे हैं, इस भय की अभिव्यक्ति के लिये विशालकाय साँपों और मछलियों का उल्लेख रुचिकर है, अगर गौर से देखा जाये तो वे अपनी दैहिक दक्षता / विकसित आखेटीय कुशलता / तकनीकी निपुणता के बावजूद इन महाकाय जीवों से पिछड़ जाने और तुलनात्मक क्षति का भय, अपने मन से निकाल नहीं सके हैं ! उनका अचेतन मन उनकी पराजय और संभावित किन्तु अपूरणीय क्षति के भय से व्याकुल है, अस्तु समस्या के निदानार्थ वे, अपने अनुभवी / ज्ञान श्रेष्ठ / अगुवा शमन से मिलते हैं !

शमन एक औषध ज्ञानी होने के साथ ही साथ अचेतन / अ-जागतिक समस्याओं का विशेषज्ञ भी है ! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कथा में मनुष्यों की मानसिक समस्या / अपराध बोध के निदान के लिये पशुओं की तुलना में वनस्पतियों को गहन मित्र की तरह से प्रस्तुत किया गया है ! नि:संदेह पूर्व मित्रों में से, वनस्पतियों का मित्रवत चयन और पशुओं का परित्याग, मनुष्यों को संभावित क्षति पहुंचा सकने की पशुओं की क्षमता के कारण से किया गया है, यहां यह उल्लेख समीचीन होगा कि शर-संधान में भालुओं के पंजों की प्रतीकात्मक असफलता का कथन, मनुष्यों की देहयष्टि के अनुसन्धान के अनुकूल होने तथा पशुओं पर उनकी बढ़त के, कारणों का संकेत करता है ! वे अपनी देहयष्टि (मस्तिष्क सहित) का इस्तेमाल अपने आयुधों, उपकरणों के निर्माण और...अंततः औषधियों के विकास के लिये कर पाये, अन्यों के तुलना में प्रकृति से मिले अवसरों का लाभ उन्होंने उठाया, हमेशा पहले पहल...!
  

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

स्त्री देह से भयभीत सुधिजन !

यूं तो स्त्री देह से भयभीत होने का कोई कारण नहीं बनता पर सुधिजनों का क्या ? समाज की चिंता में दुबले होने का कोई अवसर नहीं छोड़ते ! असल में चिन्तित बने रहना उनकी नियति है या फिर चिंतायें उनके साथ के लिए अभिशापित हैं ! अक्सर ये ख्याल आता है इंसान ने धरती में पैदा होने से पहले खुद के लिए कपड़े ईजाद किये और उसके बाद मय कपड़ा संसार सागर में अवतरित हो गया ! आदिम सभ्यताओं में भी नैतिकता की ऐसी जोर जबरदस्ती कहीं देखी ना सुनी ! अगर इंसान इस तरह पैदा ना होता तो दुनिया तहस नहस हो गई होती , वेश्यालयों और देहाधारित जीविकोपार्जन के अवसरों की बाढ़ आ गई होती ! सतत सुचिंतित सुधिजनों ने भूलोक के कल्याणार्थ नैतिकता और कपड़ों के जो कड़े प्रावधान किये थे उससे धरती का कल्याण हुआ हो कि नहीं उनकी खुद की नींदे हराम ज़रूर हो गईं ! कारण ये कि अपने ही कड़े प्रावधानों के अभ्यस्त वे कपड़ों के फटने / छोटे होते जाने और नैतिकता के टूटने की आशंका में अपना आत्म विश्वास खो बैठे ! प्रावधान उन्होंने इतने कड़े किये / करते गये कि उनके अपने आत्म संयम का माद्दा बेहद कमज़ोर हो गया उसकी मजबूती पर ध्यान ही नहीं दे सके ! ध्यान तो ध्यान है वो नैतिकता और कपड़ों पर ऐसा टिका कि आत्मसंयम सामर्थ्य रसातल को जा पहुंचा ! 

यहां आदिवासी क्षेत्रों में और उस संसार में जहां निर्धन बसते हैं सुधिजनों की चिंता खासकर बढ़ा दी है खाने को रोटी हो ना हो कपड़े और नैतिकता का साथ कभी ना छूटे दिन दहाड़े तो कभी भी नहीं ...हां रात की गहन कालिमा कपड़ों का विकल्प हो सकती है और नैतिकता का बदल भी ! यानि इन इलाकों के लोगों को दिन वाले कपड़े या रात वाले अन्धियाले कपड़ों के अलावा तीसरा कोई विकल्प नहीं है ! मेरे ख्याल से सुधिजन उस पालतू घोड़े की तरह से हैं जिनकी आँखों पे चढी पट्टी / खब्त उन्हें आजू बाजू देखने नहीं देती ! उनके लिए ग़ुरबत और रोजगार के सन्दर्भ मायने नहीं रखते मायने रखते हैं तो सिर्फ कपड़े  !  कपड़े पहनों कपड़े नहाओं कपड़े निचोड़ों  !  सोना गाछी सलामत रहे  ! कपड़े सलामत रहे  !  नैतिकता सोना गाछी में रोजगार देती है ! रात के रोजगार सलामत ,नैतिकता सलामत ! हर शहर , एक सड़क , एक मोहल्ला रात वाली रोजी रोटी वाला ! मय कपड़ा मय नैतिकता ! अन्धेले कपड़ों वाली नैतिकता ! आसन्न संकट  !  सुधिजनों की चिंताओं का स्रोत स्त्री देह  !  उनके भय का कारण स्त्री देह  !  देह के रास्ते , देह का शहर ,देह का देश ,भूखे मर जाओ पर वस्त्र ना छूटें ! एक दिन एक शाम एक रोटी ना बांट सकने वाले सुधिजन किस मुंह से दिशा निर्देश जारी करते हैं ! स्त्री के पिता से अपने पुत्र का मोल वसूलने वाले सुधिजन स्त्रियों को उपदेश देते अच्छे तो नहीं लगते पर उनके भयग्रस्त चेहरे उनके अपौरुष की यकीन दिहानी ज़रूर कराते हैं ! उन्हें स्त्री देह आतंकित करती है ! जिस देह से उपजे वही देह उनकी चिंता का सबब ,खुद पे काबू नहीं ,देह के लिए आवरण चाहिये ! मनः दुर्बल सुधिजन ! कामुक साइट्स पे अंगुलियां चटकाने और हिट्स बढ़ाने वाले पाखंडी सुधिजन  ! रात्रि के अखंड यात्री , उजालों से डरे हुए हैं ! उन्हें स्त्री देह भयभीत करती है !

नौटंकियां होती हैं  , वेश्यालय चलते हैं  , कोठे भी सुधिजनों की कृपा से आबाद हैं  , सब चलें  , चला करें पर कपड़े पहन के ! सुधिजनों की नैतिकता रात्रि कालीन अंधियाले कपड़ों वाली ! वे समाज को अपनी जागीर समझते हैं  ! इंसान गोया उनके इशारों पे नाचने वाली कठपुतलियां हों ! असहमतियां उन्हें बर्दाश्त नहीं ! कपड़े की सामर्थ्य पर इतना भरोसा कि अपनी खुद की सामर्थ्य से भरोसा उठ गया ! उन्हें परवाह नहीं कि दुनिया में जीवित रहने के अवसरों में भारी असंतुलन है ! अपने जीवन के हर मौके का फायदा उठाने की कोशिश करने वाले गरीब गुरबा बिना रेफरेंस / अकारण उनके निशाने पर हैं ! वे नहीं चाहते कि कोई बालिग / परिपक्व बंदा अपनी जिंदगी अपनी मर्जी से गुज़ार सके ! अपनी सोच की तानाशाही उन्हें समाज की बहबूदी का रास्ता नज़र आती है ! रेत के ढ़ेर में सिर घुसाए हुए शुतुरमुर्ग जैसे सुधिजन ! बदलाव को तुम रोक नहीं सकते ,कोई भी नहीं रोक सकता ,मैं भी नहीं ! धार के साथ बहो वर्ना तालाब के ठहरे पानी की तरह सडांध मारते हुए खुद भी दुखी होओगे और दूसरों का जीवन तो पहले ही दूभर किये हुए हो ! नैसर्गिकता बदलाव में है ! सहजता बदलाव में है ! स्त्रियों को तुम्हारी मुट्ठी में बाँधने की कोशिश मत करो ! वो जो चाहती हैं वह उनका हक़ है ! अपनी निर्बलता का इलाज़ करो ,आत्मसंयम की साधना करो ! तुम्हारे रोकने से हवाएं रुकने वाली नहीं ! ख़ारिज कर दिए जाने से पहले सुधर जाओ ! ओ कायर स्त्री देह से भयभीत होकर तुम अनजाने में ही कुदरत से भी द्रोह कर रहे हो !





ये दोनों चित्र संजीव तिवारी जी के सौजन्य से प्रकाशित और ग़ुरबत की पृष्ठभूमि में अश्लीलता अथवा यथार्थ उदभूत श्लीलता के निर्णय के लिए पारखी मित्रों के समक्ष प्रस्तुत  !









गुरुवार, 12 जनवरी 2012

पहले उसने कहा फिर मैंने !

इंसानों के दरम्यान अपनी भाषा के सौंदर्य / माधुर्य और दीगर समूहों की भाषा के कथित असौंदर्य / खुरदरेपन को लेकर होने वाले बहस-ओ-मुबाहिसे के अवसरों के समानांतर अक्सर ये ख्याल आता कि अगर भाषा ना होती तो ?   सभ्यता और संस्कृति के विकास में भाषा की लगातार अपरिहार्य मौजूदगी के चलते अक्सर एक धारणा बनती और बिगड़ती है कि , अखिल ब्रह्मांड में किसी ईश्वर के होने या ना होने से इंसानों को क्या फर्क पड़ता ? ...और फिर ये कि इंसान क्या होता जो उसके साथ कोई भाषा ना होती तो  ? 

अब ये कल्पना करने में क्या हर्ज़ है कि , यदि डाक्टर अरविन्द मिश्र यू.पी. के बजाये तेलंगाना में अवतरित होकर तेलगु को अपनी मातृभाषा कहते और मैं खुद इसी तर्ज़ पर तमिल , डाक्टर दराल असमिया होते , फिर संतोष त्रिवेदी मणिपुरी और देवेन्द्र पाण्डेय काश्मीरी या डोगरी वापरते ,सुब्रमनियन जी बलोचिस्तान में पैदा होते तो ?  राहुल सिंह कुरुख बोलते तो कौन सी कयामत टूट पड़ती  !  संजीव तिवारी पश्तो और घुघूती बासूती स्पेनिश , रश्मि रविजा पंजाबी और वाणी गीत सिंधी बोलतीं तो कौन से पहाड़ ढह जाने वाले थे ! सरदार बी.एस.पाबला कन्नड़ होते और सलिल वर्मा जेस्मिन क्रांति के सूत्रधार होते ,सतीश सक्सेना रास गरबा खेल रहे होते तो ? यकीनन दुनिया तब भी वैसी ही चलती जैसी आज है और अगर कुछ बदलता तो वो है एक विशिष्ट संपर्क सूत्र के प्रति हमारा मोह / हमारा अपनत्व !

और भी कई ब्लागर मित्र हैं जिन्हें अलग अलग भाषाओँ में फिट करके देखने की ख्वाहिश तो है पर ऐसा करने से इस पोस्ट की उम्र अयाचित ही लंबी करने का खतरा मैं मोल नहीं लेना चाहता...खैर भाषावाद के खास खांचे में ढले बगैर और किन्ही खास लिपियों की पैरोकारी के बिना सिर्फ एक तर्क को आगे बढ़ाना चाहूंगा कि भाषा भली वो जो मनुष्यों को आपस में संवाद करने की सलाहियत दे , चाहे ध्वनियों में या फिर निःशब्द ही !  अपने इसी कथन के समर्थन में दो अलग अलग लिपि वाली भाषाओँ में संवाद /अभिव्यक्ति के उद्धरण पेश कर रहा हूं ...                                        

उसने कहा 
यहां उनके चित्र को देखते हुए सोच रहा हूं कि पार्श्व में हरियाली और पाषाण भित्ति ,नीचे एक खाली पात्र और नहाने योग्य स्थान के ठीक सामने कुर्सी पर ठाठदार अंदाज में फोटो खिंचवाने में उनके व्यक्तित्व के कितने ही रंग उजागर हो जाते हैं ! शर्ट का गहरा चटख नीला रंग , ब्ल्यू प्लेनेट के 'मूल पर आधिक्य' लिए हुए फिर उसपर श्वेत वर्ण पैंट का काम्बीनेशन थोड़ा सा 'शांति के सहअस्तित्व जैसा' और इसके साथ ही फाइबर कुर्सी का सिंहासननुमा इस्तेमाल जैसे साधारणपन की स्वीकार्यता के साथ एक ठाठपन ! चित्र में शारीरिक दुबलेपन को हाबी नहीं होने देने की झलक स्वयमेव स्पष्ट है ! आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए जो उन्होंने सबसे आगे लगभग रक्तवर्णी पादुकाओं को प्रस्तुत किया हुआ है ! उनके स्याह केश और चश्में की मौजूदगी पर कोई वक्तव्य ना भी दूं तो पढ़े गये बाकी सारे रंग उन्हें उद्घाटित तो करते ही हैं !  कहने का आशय यह है कि उनके बारे में आपका अंदाज-ए बयां जो भी हो पर वे स्वयं भी अपने व्यक्तित्व को विविध रंगों और पाश्चर में उजागर करते हैं !
उसने कहा 
गहरी कृष्णवर्ण पृष्ठभूमि में निहित प्राइवेसी / गोपनीयता / अमुक्त अनिश्चित सत्य की तुलना में काव्य संकलन शीर्षक और कवि के नाम का धवलवर्णी प्राकट्य और रक्तवर्णी दो बिंदुओं का छोटा सा संयोजन कहता है कि कवि सायास ही ज्यादातर अव्यक्त (श्यामवर्ण) रहते हुए केवल दो रंगों की शब्द / रेखीय लघुता में नियोजित ढंग से प्रकट / अभिव्यक्त होता है ! अब ज़रा इसकी तुलना दूसरे पृष्ठ से करें जहां रंगों में अधिक वैविध्य नहीं है किन्तु पार्श्व के रंग के अनुपात में कवि स्वयं के रंगों को अधिक चटख / शोख तरीके से पेश करता है !  यदि आप दोनों पृष्ठों में तुलना करते हुए , शब्द और पार्श्व अनुपात तथा कवि स्वयं और उसके पार्श्व के अनुपात को देखें तो मेरे कथन की कदाचित पुष्टि ही होगी !

अब सवाल ये है कि क्या हममें से कोई भी बन्दा यह तय कर सकता है कि अभिव्यक्ति / संवाद के लिहाज़ से दोनों में से कौन सी लिपि श्रेष्ठ है और कौन सी भाषा ?

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

साजण प्रीत लगाके दूर देस मत जात !


अपने ना कुछ से कुछ हो पाने की कोशिशों की दरम्यानी सहूलियात को कभी , निज प्रदर्शन में सुधार के विरुद्ध , आ खड़ी हुई बाधा की तरह से देखा ही नहीं ! मसलन नदी के इस पार से उस पार तक के बीचो बीच हरहरा कर बहने वाले पानी को तैर कर या चल / बैठ कर पार करने के विकल्पों में से यदि किसी एक को चुनना हो, तो फिर चुना गया कोई भी विकल्प ना चुने गये विकल्प की तुलना में ज्यादा बेहतर और आरामदायक ज़रूर होना चाहिए ! इस हाल में ना चुने गये विकल्प में जो भी कठिनाई तुलनात्मक रूप से सन्निहित  रही होगी, वह निश्चित ही मेरे दैहिक सामर्थ्य के विस्तार का कारण बन सकती थी ! कहा यह जा सकता है कि मैं, दूसरे विकल्प को ना चुनते वक़्त अपनी दैहिक क्षमताओं के विस्तार के प्रति हतोत्साहित था याकि उस पार जाने के लिए मेरे पास पर्याप्त मानसिक संबल नहीं था !  मुद्दा यह कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सुविधा सम्पन्नता एक अर्थ में बाधाओं के विरुद्ध मेरी शौर्यहीनता या मानसिक दुर्बलता  भी कही जा सकती है ! 

अगर नदी के उस पार जाना मेरे लिए अबुद्ध से बुद्ध हो पाना भी  हो , तो क्या मैं एक पुल / एक नाव की बेहतर सुविधा को ना चुन कर खुद ही तैर कर पार लगना चुनूं ? बुद्ध (नरेंद्र) ने नाव चुनी और साधु पानी पर पैदल चलना सीखने में ही जीवन के पच्चीस बरस होम कर बैठा, कुछ पैसा बनाम सिद्धि के लिए पच्चीस साल ! बेशक नरेंद्र के बुद्ध हो जाने और साधु के जल सिद्ध हो पाने के मध्य चंद सिक्कों वाले सामान्य बोध / व्यावहारिकता ने ही सामुदायिक सार्थकता बनाम व्यक्तिगत चमत्कारिक उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त किया होगा ! बहस ये कि सिक्के / नाव और पुल बनाम तैरना जैसे दैहिक सामर्थ्य विस्तार के अवसरों में से किसे चुनूं कि बुद्ध हो पाऊं ! गौतम ने भटकते हुए वृक्ष की छांह पाई और मुझे पुल का आसरा है, उस पार जाने के लिए ! अगर  पुल होता तो सोहनी कच्चे घड़े सी भाभी से धोखा ना खाती,  उसे भी उस पार जाना था अपने प्रेम के लिए !

इधर गौतम को बोध, मुझे थोड़ा सा बुद्धत्व और सोहनी को पूर्ण प्रेम चाहिए था ! उधर उद्धव, गोपियों और कान्हा के बीच / अपने आराध्य से जुड पाने की एक मात्र आस ! उद्धव, एक पुल / एक सुविधा / एक माध्यम, सो गोपियों ने उनकी सुनी ही नहीं, बस अपनी कह कर पार उतर गईं ! अगर उस पार जाने का लक्ष्य साफ़ हो तो उद्धव की सुनता ही कौन है ? तब वे केवल एक सुविधा / एक माध्यम मात्र रह जाते हैं ! ज्ञान और प्रेम यदि जागतिक प्रतीत हों और उन्हें लेकर हमारे लक्ष्य स्पष्ट हों तो हमें साधु की जल सिद्धता...भाभी प्रदत्त कच्चे घड़े के विश्वास और उद्धव के निराकार बोध की आवश्यकता नहीं है...पर जहां ज्ञान और प्रेम पारलौकिक छोर की ओर जाने का संकेत दें...वहां नरेंद्र को रामकृष्ण की अंगुली चाहिए ही पड़ेगी ! कठिनाई यह है कि ज्ञान और प्रेम अपने दोनों ही आयामों में अमूर्त है सो इन्हें साधने के लिए हमें बेहतर सुविधा और माध्यमों की आवश्यकता होगी और ऐसे में व्यक्तिगत ऊर्जा का क्षय अनावश्यक ही माना जायेगा ! 

ज्ञान और प्रेम को लेकर मनुष्य की उपलब्धियां शून्य से लेकर असीम विस्तार वाली हो सकतीं हैं और यह भी कि मनुष्य साधारण और असाधारण के बीच केवल अबुद्ध रह जाये ! यह कहना कठिन है कि हम ज्ञान और प्रेम से विरक्त होकर जी सकते हैं पर यह मानना आसान है कि हमें अपने अपने हिस्से का और अपनी अपनी औकात के अनुपात का बोध होना ही चाहिए ! ईश्वर और महिवाल, इहलोक और परलोक, भौतिकता और आध्यात्मिकता हमारे लक्ष्यों की सीमायें निर्धारित कर सकते हैं ! इन दिनों प्रेम और ईश्वर को लेकर एक गीत पर  फ़िदा हूं ! मुझे लगता है कि यह गीत ईश्वर और प्रियतम को एक साथ संबोधित करता है ! प्रियतम / ईश्वर के लिए  प्रियतमा / भक्त का आर्तनाद...कोई सिद्धि नहीं...खालिस प्रेम का पुल...


साजण प्रीत लगाके
दूर देस मत जात
बसो हमारी नगरी
मोंहें सुन्दर मुख दिखलात
कदि आ मिल सांवल यार  वे
मेरे रूं रूं चीख पुकार वे                                    
मेरी जिंदड़ी  होई  उदास वे
मेरा सांवल आस ना पास वे
मुझे मिले ना चार कहार वे
तुझ हरजाई की बांहों में
और प्यार  परीत की राहों में
मैं तो बैठी सब कुछ हार वे
कदि आ मिल सांवल यार वे





टीप : इस गीत पर जिनका भी कापी राईट हो उनसे सखेद , अकादमिक इस्तेमाल की अनुमति  की अपेक्षा सहित ! 

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

उसे तो बुद्ध होना था ...


अगस्त 82 के आस पास के ही दिन रहे होंगे तब ! वो हर रोज राह की एक पुलिया के अनकरीब  मिलता ! स्याह सुफैद खिचड़ी दाढ़ी, बढे...बिखरे बेतरतीब बाल, सांवली रंगत जो उसके बेनहायेपन की वज़ह से उसको अश्वेत वर्णी होना साबित करती ! कपड़े पैबंदों के साथ तार तार और एक गहरा कत्थई काला सा कम्बल ! वो राहगीरों को देखता,बोधित करता और उचारता कुछ अर्थहीन से शब्द हवाओं में...हालांकि किसी भी राहगीर पर जिस्मानी तौर पर झपटा नहीं वो कभी भी ! उसे देखकर हमने पहली यह बार जाना कि कुछ शब्द अर्थहीन भी हो सकते हैं और उनके साथ जड़ी हुई कुछ ध्वनियां भी...फिर भले ही उन्हें कोई इंसान अपने कंठ से साधता हो और अपनी जुबान  देता हो  !

लगता कि जैसे अपनी सारी बेमानी ध्वनियों और शब्दों को हवा में बिखेर कर,कह रहा हो कि मैंने जो कहा नहीं...उसे सुनो ! मैंने जो सुना नहीं...उसे कहो ! मैंने जो लिखा नहीं...उसे पढ़ो ! मैंने जो पढ़ा नहीं...उसे लिखो ! पर कुछ ऐसा...ऐसा कुछ भी, कि मैं इन्सान हो जाऊं ! इंसान उसे  पागल कहते ! अरसे तक वह उसी सड़क पर झूमता रहा, अपने उस वजूद के साथ, जिसे उसपर चस्पा करके लोग उसे चीन्हते रहे, जबकि पहले के किसी एक दिन वह ऐसा नहीं भी रहा होगा ! तब शायद उसकी परसोना, उसे अब हिकारत से देखने वालों जैसी ही रही होगी !

अक्सर ये ख्याल आता कि दो मजबूत पैरों पर टिके हुए जिस्म और हाथों की दसों अंगुलियों की जीवित थिरकन के साथ चेहरे की कोटर में चिपकी हुई मशाल सी जलती बुझती आंखों के अलावा उसमें ज़िंदा इंसान होने की वो सारी निशानियां मौजूद थीं जो उसे फिलहाल होशमंद नहीं मानने वाले इंसानों में हुआ करती हैं...तो क्या दैहिक विशिष्टताओं की मौजूदगी और ध्वनियुक्त शब्दाचार की अपनी क्षमताओं के बावजूद वह एक इंसान इसलिए नहीं है कि उसका ध्वन्यात्मक आग्रह अर्थहीन है! यह तो तब भी मुमकिन था जब वह संकेतों की मौन भाषा पे आरूढ़ होकर भी, दूसरे मस्तिष्कों में अर्थयुक्त ढंग से प्रविष्ट होने में असफल रहता ! यानि कि इंसान होने के लिए एक जीवित देह मात्र की उपलब्धता पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे दूसरे इंसानों तक अर्थपूर्ण ढंग से पहुंचने  का हुनरमंद भी होना होगा ! साबित यह कि शब्द और संकेत...ध्वनियां  और अध्वनियां...यदि बेमानी हुआ करें तो इंसान का इंसान होना ही बेमानी हो जाएगा जैसे कि वो अपनी जीवित देह और अपनी सम्पूर्ण वाक् क्षमता के बावजूद इंसान नहीं माना गया कभी  !  


सुना था कि उसने जीवन और मृत्यु के सभी रहस्यों को जानने की उत्कंठा में अपनी सांसे होम कर दीं, कितने ही गुरुओं और ग्रंथों की शरण नहीं गया वो...! उसे अपने भीतर कुण्डलिनी जागृत करना थी और शायद इसी यत्न में ,वो एक होशमंद इंसान नहीं रहा ! अपनी कोशिश के हिसाब से उसे तो बुद्ध होना था...लेकिन अब वो अपने पूरे वजूद और पूरी अभिव्यक्तियों केआलोक में अर्थहीन शब्दों सा एक अर्थहीन जिस्म होकर रह गया है ! पता नहीं कैसे मैं , ब्लॉग जगत की कुछ चौड़ी कुछ तंग गलियों से गुज़रते हुए किसी एक पुलिया के एन सामने ठिठक जाता हूं और मेरे सामने वही अर्थहीन शब्द गूंजने लगते हैं, फिर मैं इस निष्कर्ष पर जा अटकता हूं कि इसे तो बुद्ध होना था ...

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

चोरी कहीं खुले ना नसीम-ए-बहार की !


कल शाम तकरीबन सात  बजे  , बेटे का बुलावा , पापा...आपके स्टुडेंट्स आये हैं  !  उन्हें बैठा दो अभी आता  हूं  , सोचा इंटरनेट बंद करने की जरुरत नहीं है...ये गया और वो आया  !   वे  दो  लडकियां  उम्र  कोई  २०-२२ साल  के आस पास , उनमें से एक जिसे मैं पहचान सका , मोहल्ले  के  विद्युत  कार्यालय  से  रिटायर्ड  बड़े  बाबू  की  बेटी  थी  पर दूसरी को पहचानना मुमकिन नहीं लगा  !  उसे सवालिया निगाहों से देखता हूं  !   सांवली , दुबली  पतली , दरम्याने कद वाली उस लड़की  को समझते देर नहीं लगती कि मैं उसका परिचय जानना चाहता हूं  ! वो कहती है ...আমার  মা  আপনার  ছাত্রী  ছিলো   ! ओह ... তোমার  মায়ের নাম কী  ?  ... রীনা মন্ডল  !  मैं हंसता हूं ...इससे पहले तुम्हें देखा नहीं कभी !  अच्छा कहो , कैसे आना हुआ  !  सुनते ही , वो अपने हाथ आगे बढ़ाती  है  , जिनमें पिछले  सालाना इम्तहानात की दो फोटोस्टेट कापियां थीं , ज़ाहिर है कि  इन्हें उसने सूचना के अधिकार के तहत विश्वविद्यालय से हासिल किया  होगा  ! 

उसने कहा मैंने एम .ए. फाइनल का इम्तहान दिया था  !  दूसरे और तीसरे पेपर में कम नंबर मिलने की वज़ह से पुनर्मूल्यांकन करवाया  लेकिन  इसके बाद तीसरे पेपर में मेरे नंबर और भी कम हो गये हैं  ! कापियों को  एक बार आप देख लीजिए ! अगर आप कहेंगे तो फिर से जांच की अपील करूंगी  !  मैंने कहा , देखो ...मैडम के पास चली जाओ  वहां मेरा नाम लेना वो तुम्हारी कापियों का वाजिब मूल्यांकन कर देंगी  ! उसने कहा मां  ने कहा है , जो भी कहेंगे बस आप ही कहेंगे ! उसकी ज़िद को देखते हुए मैंने कापियां देखना शुरू किया और ...पूछा , तुम्हें लगता है कि तुमने सारे सवालों के जबाब एकदम सही दिए थे ,उसने सहमति में सिर हिलाया  !  मैंने फिर से पूछा कौन कौन सी किताबें पढीं थीं ...तुमने इम्तहान देने से पहले  , उसने कहा ट्वेंटी क्वेश्चन सीरीज से  तैय्यारी की ... अब सिर पीटने की बारी मेरी थी ! 

सवाल बेहद आसान थे पर लड़की उतनी ही संभ्रमित  !  हिंदू विवाह को संस्कार साबित करने के लिए उसके पास कोई तर्क ही नहीं थे और ना ही कोई कंटेंट ,  बस एक दो पैरा फिजूल से शब्द जाल में लपेटे हुए  !  उसे यह तक पता नहीं था कि जाति क्या होती है ? और यह भी कि यह खालिस हिन्दुस्तानी अवधारणा है  ! कापी में जबाब दर्ज करते हुए उसने बड़ी ही मासूमियत से लिखा ... जाति भाषा के आधार पर बांटी जाती है ...उड़िया , तमिल  , तेलगु , गुजराती वगैरह वगैरह  और  हद तो  यह हुई  जब उसने कहा कि वर्ग से हमारा मतलब है ...ब्राह्मण , क्षत्रिय ,वैश्य , शूद्र !  यहां तक कि उसे वर्ण और वर्ग में फ़र्क ही महसूस नहीं हुआ !  कापी में उसके लिखे को तूल देने का कोई कारण ही नहीं था सो मैंने उससे दो चार छोटे मोटे सवाल किये और कहा अब तुम ही कहो , क्या  फिर से जांच की अपील करना सही होगा , उसने कहा नहीं मुझसे ही गलती हुई है  ! 

वो चली गई पर मैं सोचता हूं कि उसमें खुद के अधपके ज्ञान पर अति आत्मविश्वास क्यों था  ? अव्वल तो उसे यह फ़िक्र भी नहीं थी कि मास्टर्स डिग्री की तैयारी ट्वेंटी क्वेश्चन सीरीज से करने पर हासिल क्या होगा ? वो नौजवान लड़की शार्टकट से ज्यादा नंबर पाने की ख्वाहिश मंद थी  सो पाये  हुए नम्बरों का बीस फीसदी पुनर्मूल्यांकन के नाम पे गवां बैठी ...उस पर  हौसला ये कि एक बार और जांच की अपील करने  का ख्याल  !  मास्टर्स डिग्री के इम्तहानात के लिहाज़ से उसने जो पढ़ा वो  कतई अपर्याप्त था ...और जो लिखा वो भी गलत था  !  इस उम्र में , सही और गलत समझने का विवेक विकसित हो जाये  , उसमें ऐसी कोई ललक भी ना थी...वो एक बर्बाद शुद पीढ़ी के प्रतिनिधि सी , मुझे नाउम्मीद कर गई  ! उसे समझना चाहिए था कि उसके पैरों पर अंततः उसे ही खड़े होना है  !  शार्ट कट  बैसाखी तो हो सकते हैं पर वे जीवन संघर्ष का माद्दा / हौसला पैदा नहीं कर सकते...बुद्धि  को  तराश नहीं सकते ... विवेक को जागृत भी नहीं कर सकते  !  एक बोध , एक समझ , जिसकी ज़रूरत  तमाम ज़िन्दगी पड़ती ही रहेगी  !  उसे नसीम-ए-बहार होना चाहिए ...होना ही होगा  !  वो महज़ एक नौउम्र लड़की नहीं ,आखिर को उसे नस्लों की विरासत का मुहाफिज़  भी  होना  है   !


* আমার  মা  আপনার  ছাত্রী  ছিলো  =  मेरी मां आपकी छात्रा थीं  !
* তোমার  মায়ের নাম কী  ?  =  तुम्हारी मां का नाम क्या है  !
* রীনা মন্ডল  =  रीना मन्डल !


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

ये बेनाम कोई अपने ही रहे होंगे !


सच तो ये है कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट को खुद की मसरूफियात के खबरनामे की तरह से अंतरजाल पृष्ठ के हवाले किया था !मंतव्य ये कि कहीं ब्लॉग-जागतिक बंधु बांधव अपने एक पाठक की गुमशुदगी का भ्रम ना पाल बैठें !  हुआ ये कि एन उसी वक़्त क्रिकेट के विश्वविजय अभियान के समापन समारोह की एक नाज़ुक सी घटना का ज़िक्र भी कर बैठा ! मुझे लगा कि राष्ट्रीय प्रतीक और विजय आनंद के दरम्यान होश-ओ-हवास की बारीक सी ही सही पर विभाजक और विवेक सम्मत रेखा होनी ही चाहिए !

समारोह के समय खिलाडियों के व्यवहार को लेकर अपने असहमति कथन में मैंने खिलाडियों के अनजानेपन की एक ढ़ाल भी रख छोड़ी थी !  घटनाक्रम में जिस  संभावना की अनुभूति हुई उसे दर्ज़ करना  मेरा फ़र्ज़  था सो किया !  आलेख पर ब्लॉग-जागतिक मित्रों ने बेहद संतुलित और लाज़बाब प्रतिक्रियायें दर्ज कराईं ! बहरहाल काम काज के बीच जब भी मौका मिलता मित्रों के अभिमत माडरेशन से मुक्त कर जाता !  इस बीच तारीख  आठ  अप्रेल  दो  हज़ार  ग्यारह  को , एक  बेनाम  सुर स्पैम में जा अटका...पहले सोचा कि उसे  वहीं पड़ा रहने दूं पर अब लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार उस पर्देदार  को भी है !   ज़रा गौर फरमाइयेगा कि वे क्या कहते हैं ...

"तुम तो वो लोग हो जो पी के झूमते रहे इंडिया इंडिया करते रहे और उतरने पर तिरंगे का ख्याल आया या अल्ला...इन महान खोजो को करने वालों के लिए नोबुल पुरस्कार की व्यवस्था क्यों नहीं की ?? "

सोचता हूं कि ये बेनाम कोई अपने  ही रहे  होंगे जिन्हें  शराब और तिरंगे बाबत मेरी फिक्र कुछ ज्यादा ही आहत कर गई वर्ना शेष सारे टिप्पणीकारों की प्रतिक्रिया में ये तल्खी कहां है ?   खैर... उन्होंने मुझे विश्वविजय के इस ज़श्न में शरीक माना और पिलाई भी :)  उतारे के बाद ही सही पर ईश्वर और तिरंगे के ख्याल से जोड़ा और इससे आगे भी मेरा हौसला बनाये रखा :)  मुझे उनकी प्रतिक्रिया पर कोई प्रति-प्रतिक्रिया नहीं देनी है पर कहना इतना ही है कि उन्होंने जो भी कहा वो सब अगर अपने नाम से ही कह देते तो क्या मैं बुरा मान जाता :) 



रविवार, 15 अगस्त 2010

ग़ुरबत के हिस्से की चिल्हर धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...!

कल शाम से सरकारी महकमों की इमारतें जगमग कर रही है...सुबह ध्वजारोहण पर जाने से कब्ल नहाना चाहता हूं , हल्की सी ठण्ड है सो पड़ोसी का सुझाव है कि मुंह हाथ धोकर निकल चलो...कौन सा नमाज़ पढ़ने जा रहे हो  ?  सोचता हूं जन गण मन की शान में पहले कभी बे नहाया गया नहीं ,  तो फिर आज कैसे ?  इधर खब्ती शौहर की फ़िक्र में बीबी गर्म पानी का इंतजाम पहले ही कर चुकी  है  !  दूर किसी  इमारत  में सरकारी आदेश से तैनात लाउड स्पीकर शिद्दत से चीख रहा है और उसके साथ बाथरूम  में , मैं  भी...अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद है ,रूह गंगा की हिमाला...

वक्त कम है गाड़ी तेजी से सड़क पर मोडता हूं , सामने स्कूल के बच्चे भागते नज़र आ रहे हैं , उन्हें भी देर हो गई लगती है , वे सब मेरे घर के दक्षिणी छोर वाले स्कूल में पढते हैं  !  हुई देरी से उनके पिटने के ख्याल से मेरे अंदर बैठा मुकम्मल आज़ादी का फरिश्ता सहम सा जाता है  !  मुझे उत्तर दिशा में जाना है वर्ना मैं... !   उनकी प्रिंसिपल को फोन करता हूं...सिस्टर कुछ बच्चे देर से पहुंचेंगे खुदा के लिए उन्हें पनिश मत करियेगा कम से कम आज के दिन  !  दो बाथरूम वाले घर में आश्रम की तर्ज़ पर रहने वाले बीसियों बच्चे समय पर तैयार कैसे हो पायंगे  ?  ये वो भी जानती हैं  ! ...पता नहीं कैसे  ?  ख्याल कौंध सा जाता है...नौनिहाल आते हैं...को किनारे कर दो मैं जहां था , इन्हें जाना है वहां से आगे...

चंद नारे और त्योहार खत्म , दोस्त बतला रहा था कि आज उसका क्लब अस्पताल में फल...फल माने , केले...बांटेगा  !  ना चाहते हुए भी मन ही मन में गाली देता हूं...सा...sss ढोंगी , केले बांटेगे और न्यूज पेपर में उससे ज्यादा अपनी समाज सेवा का ढिंढोरा पीटेंगे ! तुम्हारी...समाज सेवा का बिजनेस क्या मैं जानता  नहीं?अंतिम आदमी के लिए सरकारी मदद को रास्ते में हाइजैक करने वाले समाज सेवी ............ कहीं के  !  वो पूछता है चलोगे क्या  ?  मैं कहता हूं , बिलकुल नहीं  ! ...अभी चुप क्यों थे  ?  बस यूं ही तुम्हें गरियाने का दिल किया इसलिए  !  वो बेशर्मी के साथ हंसता है उसे पता है कि मुझे धन पिशाच पसंद नहीं  हैं  !  मैं एक बार फिर से उसे अपनी सर्द निगाहों से टटोलता हूं  !  क्या देख रहे हो वो पूछता है ?  तुम्हारे जिस्म की बनावट देख रहा हूं ...कल्पना कर रहा हूं कि इसपर लदी फंदी चर्बी किस किस बंदे का हक मार कर जुटाई होगी तुमने  !  वो फिर से हंसते हुए कहता है ...ओ यू आउट डेटेड मैन... घर चलें ?  मै सहमति में सिर हिलाता हूं  ! 

इधर टीवी चैनल्स आजादी के परवानों के भाषणों के टुकड़े सुनवाये जा रहे हैं , पर मेरे कान बंद हो चुके है...कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा !  मै सिर्फ देख पा रहा हूं देश के लिए भाग रहे अधिकारी , नये जूते...नई कैप , नई टीशर्ट , बमुश्किल छुपती हुई सेहत , उपदेश देते नेता , खादी के कलफदार कुर्तों से झांकती उनकी विराट देहयष्टि ,मेरा जेहन जानवर खरीदने  गये ग्राहक  सा , उनके बदन की चर्बी टटोलता है  !  कल ही किसी अधिकारी  के लॉकर से  कुछ करोड की चिल्हर बरामद होने की खबर थी , कुछ  किलो सोना  भी  !  लगता है जैसे सोना...रुपया...चर्बी सब गडमड हो रहे हों  !  स्वतंत्रता दिवस अमर रहे , कहता तो हूं पर आवाज गले से बाहर नहीं आती , मेरा दाहिना हाथ बेदम सा हवा में उठा हुआ  !  मुझे लगता है कि आज़ाद भारत के इन आबाद जिस्मों में जमा चर्बी बाहर निकालने से पहले तेज चाकू से इनकी खाल खींचना होगी  !  मै क्रूर होना चाहता हूं पर आंखें साथ नहीं देतीं...वहां कुछ भीगा हुआ खारापन सा है !  फिलहाल तो ग़ुरबत के हिस्से की धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...उनके लहलहाने के दिन हैं  !   

रविवार, 11 जुलाई 2010

ओ देव...

कहते हैं यहां खर दूषण का राज था कभी , उनकी अपनी रक्ष प्रजा , अपनी रक्ष संस्कृति !  तब रक्ष कुल की युवतियां अपने पति का वरण अपनी मनमर्जी से कर पाने के लिये स्वतंत्र हुआ करतीं !  वेश भूषा...खान पान...रहन सहन के उनके अपने तौर तरीके थे !  देवताओं को यज्ञं भाग देने वाले ऋषि उनके परम शत्रु हुआ करते !  राजकन्या सूर्पनखा इन्हीं परम शत्रुओं के अभयार्थ आहूत देव पुरुषों के प्रेम में क्या पडी , अपने ही कुल के विनाश का कारण बन गई !  उस प्रेमातुर राजकन्या को इस सत्य का भान ही नहीं हुआ कि विजातीय संस्कृतियों में प्रेम और दैहिक संबंधों के स्वीकरण के नैतिक मानदंड भिन्न हैं अतः उसका प्रणय निवेदन ठुकराया जाना निश्चित है...शेष कथा इतिहास हुई !  इसके बाद शताब्दियों का लंबा अंतराल और ...अब तो ये तय कर पाना भी मुश्किल है कि सांस्कृतिक सहवास और सम्मिश्रण के परिणाम क्या हुए ?  कौन शुद्ध रक्ष कुलीन और कौन शुद्ध देव पूजक शेष रहा यहां  !  पर अब भी ... 

कहते हैं ये खर दूषण की धरती है यहां प्रेम से पहले संस्कृति...धर्म...भाषाओं और विजातीयताओं का ख्याल नहीं किया जाता , परिणाम चाहे कुछ भी हो ! पता नहीं वे लोग कौन होंगे जो ये सब पूछ परख करनें के बाद प्रेम करते होंगे पर यहां की स्त्रियां और पुरुष अब भी कैलकुलेटेड प्रेम नहीं कर पाते, बल्कि उन्हें तो प्रेम करना ही नहीं पड़ता , बस हो जाया करता है...ये देस प्रेम की परम स्वतंत्रता का देस है !  उत्तर दिशा से देवता अब भी आते जाते हैं यहां...पर वे किसी यज्ञं और संस्कृति की रक्षा के लिए नहीं पधारते और ना ही प्रेम की किन्हीं खास मर्यादाओं से बंधे हुए  होते हैं ! उनके अपने एजेंडे के पूर्ण होने तक वे राजकन्याओं के प्रणय निवेदन को बाकायदा स्वीकार भी करते हैं ,यहां तक कि उन्हें एक पत्नी व्रत से भी कोई लेना देना जरुरी नहीं रह गया शायद !...संभव है इंसानों के तौर पर अवतार लेते रहने की लंबी और एकरस प्रक्रिया के चलते कुछ इंसानी दुर्गुण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गये हों  ? 

ऋषि आश्रम का स्थाई सदस्य होने के नाते ऐसी कई प्रेम गाथाओं को रचते हुए देखा है मैंने...लगभग १६-१७ वर्ष पूर्व हमारे आश्रम में एक सुदर्शन देव पुरुष का आगमन हुआ वे काव्य रचते...उनकी ऋचायें , पाषाण खण्डों से टकरा कर अदभुत सम्मोहन संसार सृजित करतीं !  शीघ्र ही वे विवाहोत्सुक युवतियों के आराध्य की तरह स्थापित हो गये !  उनके प्रति युवतियों का प्रबल आकर्षण आश्रम के निकटवर्ती आवास क्षेत्रों के अन्य वाचाल युवकों के रागद्वेष का कारण बन गया !  बिगड़ती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए,  उन्होंने आश्रम का त्याग कर दिया और वापस उत्तर दिशा की ओर प्रस्थित हो गये किन्तु उनसे अशेष / सीमाहीन प्रेम करने वाली युवती रेत सम देव पुरुष को मुट्ठी में कैद करने की लालसा लिए इधर उधर भटकती रही !  उसकी मुट्ठी से फिसलती रेत के चिन्ह साफ़ नज़र आते और मैं किसी अनहोनी से आशंकित बना   रहता क्योंकि इस धरती का इतिहास...?

शायद समय किसी भी स्पर्श और उसके निशानों को खुरच कर फेंक देने में मददगार हो गया हो !  लिहाजा ताजातरीन घटनाक्रम की सूचना मैंनें खुद उस प्रस्थित प्रेमी को दे दी है और कहा कि ... ओ देव...राजकन्या तुम्हारे प्रेम पाश से मुक्त हो किसी साधारण मनुष्य से शादी कर रही है , फिलहाल इस प्रकरण में प्रेम के लिए कुल विनाश या फिर आनर किलिंग की संभावना समाप्त हुई...भले ही खर दूषण की धरती है ये ! 


रविवार, 4 जुलाई 2010

पार: पार: हुआ पैराहने जां : अ'रीना में निओ - ग्लेडिएटर्स ?

अपने प्रोफाइल में पसंदीदा फिल्मों का ज़िक्र करते  वक़्त ग्लेडिएटर्स  टाइप करते हुए मेरी  अंगुलियां कांप रहीं थीं...धड़कने औसत से ज्यादा रफ़्तार पर...और  बेहद  ज़ज्बाती  तौर पर  मैं उन परिजनों के बारे में सोच रहा था,जिनके बच्चे विषम  परिस्थितियों का शिकार होकर सरे बाज़ार बेचे गये होंगे...तब के हालात ,बिकने वाली शय भी इंसान और खरीदार भी ! उन  दिनों प्राचीन रोमन एम्पायर ही क्यों सारी की सारी दुनिया गरीब  इंसानों की मंडी में तब्दील हो चुकी थी  !  वे  बिकते  इंसानों  का क़त्ल करने  के लिये...या फिर इंसानों से क़त्ल हो जाने के लिये ! तमाशाई भी इंसान हुआ करते और तमाशेबाज़ भी !  बारहा सोचता हूं कि तब के हालात ऐसे थे कि पूंजी इंसानों के लिये नहीं बल्कि इंसान पूंजी के लिये बा-आसानी मयस्सर हुआ  करते थे !...शायद पूंजी का आविष्कार ही उन्हें , उनकी औकात दिखाने के  लिये हुआ होगा ? ...कहते हैं वो बर्बरियत का दौर  था जो गुज़र गया ! 

आहिस्ता आहिस्ता नव-सभ्यतायें विकसित हुईं और इंसानियत का  इकबाल बुलंद हुआ ! दुनिया के नक्शे में जुग्राफियाई /  प्रजातीय / धर्माधारित / भाषाई या फिर भिन्न राजनैतिक विचारधाराओं पर आधारित राष्ट्रीयतायें जन्मीं, जिन्होंने पारस्परिक  तुलना में खुद को इंसानियत का सबसे बड़ा अलम्बरदार घोषित करना अपना परम लक्ष्य बना लिया...भले ही अंदरूनी  वास्तविकतायें  कुछ  और  बनी  रही  हों  !  निजी तौर  पर  मुझे  ये  बदलाव  बहुत  बड़ा  दिखता  है , जहां रोमन सम्राटों के  पसंदीदा अ'रीना , बड़े बड़े राष्ट्रों में तब्दील गये हों और 'एम्परर' 'लोकशाहों' का मुखौटा पहन कर अभिनय कर रहे हों ! तब के  परिजनों के बच्चे दासों की शक्ल में बिकते और अब के बच्चे , नौकर / कर्मचारियों की शक्ल में ! खरीदार तब भी इंसान थे,  खरीदार अब भी इंसान हैं ! कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ चिल्लर और कुछ थोक व्यापारी !  व्यापार की टर्म्स एंड कंडीशन्स में  बड़ा फर्क दिखता है अभी...तब माल की कीमत एकमुश्त चुकाई जाती थी अब रकम माहवाराना किश्तों में तय होती है ! जिस  तरह से बर्बरियत के उस युग में सभी दास ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते थे लगभग उसी तर्ज़ पर आज भी सभी नौकर  ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते  ! 

वक़्त का फर्क बहुत लंबा है और सभ्यतायें भी विकसित हुई हैं इसलिए ग्लेडियेटर्स के साज़-ओ-सामान में भी भारी बदलाव  नज़र आता है मसलन तलवार के बदले ए.के.४७ , कलम, टाइपराइटर,कम्प्यूटर्स वगैरह वगैरह और जिरह बख्तर की जगह  वर्दियां / यूनिफार्म वगैरह वगैरह ! मुमकिन है मेरी सोच , मेरा चिंतन उन 'दासों' को मजाक लगे जो बैंकों ,शिक्षण संस्थानों  जैसे शालीन अपेक्षाकृत निरापद  खरीदारों के पास बिके हैं , पर उन दासों का क्या ? जिन्हें रक्षा संस्थानों जैसे रफ एंड टफ  खरीदार नसीब हुए हैं !  बुरा मत मानिये...इंसान तब भी बिकता था और इंसान आज भी बिकता है...पेट के लिये ? अस्तित्व के  लिये ? परिजनों के लिये ? आपको क्या लगता है ?  दुनिया में अ'रीना कहां नहीं हैं ?  ग्लेडियेटर्स कहां नहीं हैं ? तब सम्राट दिलजोई के लिये ग्लेडियेटर्स के तमाशे करते थे आज राष्ट्रीयतायें ,विचारधाराओं और इंसानियत की आज़ादी के नाम से तमाशे  करती हैं ! दिलजोई करने वाला भी इंसान...दिलजोई के लिये शहीद होने वाला भी इंसान ! राष्ट्रीयताओं और विचारधाराओं का  राग अलापने वाला भी इंसान और इस राग पर कुर्बान होने वाला भी इंसान ! शताब्दियों बाद बहाने भले ही बदल गये हों पर  रिज़्क ( रोजी रोटी ) के लिये ग्लेडियेटर्स होना और ग्लेडियेटर्स के परिजनों की पीड़ा शाश्वत है !    

मेरी धरती.. माफ कीजिये...हम सबकी धरती...लहूलुहान, क्षत विक्षत धरती के लिये 'स्लेव' अली गाते रहेंगे "पार: पार:  हुआ पैराहने जां" वे सब गाने के लिये अभिशप्त  हैं ,क्योंकि उनके दिल में रोमान हैं , माशूकायें हैं , बीबियां हैं ,बच्चे हैं , परिजन हैं ,  अस्तित्व की आरजूएं हैं , जिम्मेदारियां हैं !...और हैं...शिद्दत से नफरतें भी ,खरीदारी के ज़ज्बे के साथ ! मैं खुद थक चुका हूं  सोच सोच कर कि दुनिया में अ'रीना कहां पर नहीं है यहां , जहां मैं रहता हूं ,बस्तर भी तो...? हमेशा की तरह अपने अस्तित्व /  अपने परिजनों के लिये मंडियों में बिकते इंसान...शहीद होते...परिजनों को बिलखता छोड़ कर जाते निरंतर...अ'रीना में निओ ग्लेडियेटर्स  ?

गुरुवार, 24 जून 2010

ओ भानुमति...मेरे ख्याल...ये जिस्म नीला पड़ने लगा है अब ...

कहते हैं कि भानुमति बेहद खूबसूरत और ज़हीन स्त्री थी लेकिन पुरुष प्रबल राजनीति ने उसके सौंदर्य और ज़हानत पर ग्रहण लगा दिया ! उसे  एक बेमेल कुनबा जोड़ने वाली खातून के मुहावरे की तर्ज़ पर स्थापित कर दिया गया... शायद नियति यही है , जो सुजनो को भी अप्रतिष्ठा के पंक में गारत कर देती है , मसलन बेचारा विभीषण , जिसे सत्य...धर्म और न्याय का साथ देने के बावजूद घर के भेदी बतौर याद किया जाता है...गरियाया जाता है यहां तक कि जयचंद और मीर जाफर के समतुल्य उद्धृत किया जाता है !  निवेदन ये कि आलेख में उल्लिखित भानुमति बतौर मुहावरा तो पढ़ी जायें लेकिन उन्हें मूल भानुमति से जोड़कर ना देखा जाये क्योंकि मेरी समझ में ऐसा करना एक निरपराध के प्रति अपराध सा होगा ! ...तो मुहावरा ये हुआ कि भानुमति मौलिक चेतना हीनता की प्रतीक स्त्री है जो केवल बेमेल ईंटों और रोडों के जुगाड से कुनबा निर्मिति की हैसियत रखती है !  उसके पास केवल 'स्वत्व-शून्य-परजीवी' व्यक्तित्व है !  आशय ये कि भानुमति अमौलिकता / वैचारिक शून्यता और परजीविता आधारित चरित्र बतौर अधिष्ठित कर दी गई है ! 

मेरे ख्याल से , बतौर स्त्री , भानुमति प्रेम की देवी हो सकती है लेकिन बतौर मुहावरा , उसे ज़लालत की दृष्टि से देखा जाना चाहिये क्योंकि इस रूप में उसके पास परदोहन के अलावा अन्य कोई दक्षता नहीं हुआ करती... इस अर्थ में वो मौलिक चिंतन और बौद्धिकता की सबसे बड़ी दुश्मन भी है ! उसके कारण नव-पीढियां स्वतंत्र / सतर्क / निरपेक्ष / मौलिक अध्येता होने के बजाये वैचारिक दासता / पराश्रित चिंतन की मिसाल बनती जा रही है ! भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध प्रबंधों को लेकर इस तरह की चिंता परसाई ने भी व्यक्त की थी !  गोंद कैंची मास्टर के रूप में एक बन्दा दूसरों के ख्यालात कट पेस्ट कर रातों रात ख्यातनाम स्कालर आरोपित हो जाता है और बौद्धिक दिवालियेपन उर्फ उठाईगिरी की यह परम्परा लंबे समय तक चलती रहती है ...भले ही इस परंपरा की वज़ह से 'स्व विवेक' पर धूल की स्थायी परत जम कर कांक्रीट सी ठोस हो जाती हो !  आहिस्ता आहिस्ता गर्द में दबी हुए कृत्रिम बौद्धिकता स्वयं की महानता के आख्यान गढ़ने लग जाती है कुछ मित्र इसे बतर्ज कोरस और कुछेक ज्ञान की मछलियां  एकला चलो रे की धारणा पर आधारित गीत सा गाने लगती हैं  !  अपनी अपनी खाप...अपना अपना कुलगीत  !  महान लोग ...भानुमतीय प्रवृत्ति के    सूमो !  मुहावरे से नक़ल चिंतन परम्परा की यात्रा के दौरान भानुमति एक स्त्री प्रतीक के रूप में शेष नहीं रह जाती बल्कि यह एक प्रवृत्ति ,एक नज़रिया , धीमा जहर बन जाती है जो लिंग भेद से इतर है और जो मानवीय चिंतन / सोच / बुद्धि को गहरे दंश दे रही हो !  कई बार तो ये अहसास भी होता है कि ख्यालों का अपना हुस्न / अपना जिस्म , कुदरत की उम्मीदों के खिलाफ इस दंश की नींद सो ना जाये कही ?   ओ भानुमति मेरे ख्याल...ये जिस्म नीला पड़ने लगा है अब...


मंगलवार, 22 जून 2010

उसकी खुश्बू में बसे खत मैं जलाता कैसे...? नो आनर किलिंग !

उन दिनों का ख्याल कुछ शहद सा कुछ नीम सा ...मैने सोचा भी कहां था...प्रेम...उसे होना था सो हो गया एक दम अनियोजित ! क्या पता शायद प्रेम ऐसे ही हुआ करता हो...सहज ही बिना विचारे , बिना यत्न , अपने आप ! मेरी मां....मेरे परिजन... और बहुतेरे मित्रों से भी कहां...किसी योजना के अधीन प्रेम किया मैने...उसे होना था...सो हुआ...शायद इसीलिये मैने 'फिरोज़ा' से हो चुके प्रेम की पृष्ठभूमि में किसी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं देखी...मुझे लगा कि प्रेम के लिये अपने आप हो जाना ही नियत है !  यूं तो इस फन में महारत रखने का दावा करने वाले दोस्तों ने प्रेम हासिल करने के ढेरों नुस्खे ईजाद कर रखे थे और वे दोस्त समझ कर छोटी मोटी टिप्स देने के लिये बर-हमेश तैय्यार रहते ...पर प्रेम मुझ पर यूं ही मेहरबान हुआ तो दोस्तों की कंटियां / जाले मेरे किस काम आते !  खैर हैरानी तो उन्हें भी थी कि लड़की  को मुझ जैसे नातजुर्बेकार में दिखा क्या ? कमाल ये कि बिना दस्तावेजी अपील...बिना भाग दौड ये परियोजना मंजूर हुई भी तो कैसे ? ...दोस्त थे बुरा भी लगा होगा तो दिल में दबाकर , आशीष के हाथ आगे बढा दिये ...कभी कोई जरुरत पडे तो ...वैसे इस मामले में जरुरत पड़ती  भी किसे है !

उसके पिता मेरे कस्बे में ट्रांसफर पर आये थे किराये के मकान की तलाश मेरे पड़ोस  पर खत्म हुई और फिर पता नहीं चला कि सिलसिला कैसे शुरु हुआ ...वो मुझे अच्छी लगती , जो मैं कभी कह भी नही पाया... पहल शायद उसने ही की और आहिस्ता आहिस्ता मुझ पर काबू पाती गई !  जब जैसा उसका जी चाहता मैं वैसा ही करता ! एक अजीब सा बडप्पन हुआ करता उसके व्यवहार में एक बच्चे सा दुलार करती मुझसे ...कभी सलाह मशविरा की नौबत आती भी तो मैं उसका एहतराम करता ! वो कहती शादी के बाद मायके जाउंगी तो क्या करोगे मैं कहता बडी मुश्किल होगी ...वो ठठाकर हंसती , कहती तुम्हें भी मायके ले जाया करुंगी , मैं सहमति में सिर हिलाता !  प्रेम हुआ तो कुछ अड़चने  भी नज़र आनें लगीं कुल / मज़हब वगैरह वगैरह ...आगे क्या होगा ?  अक्सर हमारा चिंतन इसी मुद्दे पर हुआ करता पर उसका आत्म विश्वास सारी शंकाओं पर भारी पडता !  वक्त गुजरता रहा ...आमने सामने की मुलाकात के बावजूद हमें खत किताबत की जरुरत भी पडने लगी , खतों को सम्भाल कर रखना जरुरी था अगर किसी के हाथ लग गये तो रुसवाई का ख्याल भय पैदा करता !  छुट्टियों में वो अपने 'देस' जाती तो मेरे प्राण लेकर ...फोन का जुगाड था नही ...छटपटा कर रह जाते ...मुझे समझ में नही आता कि उसका चेहरा भीगा हुआ क्यों दिखाई देता है जुदाई के वक्त यही शिकायत उसकी भी थी ! उसके खत बेसहारे का सहारा होते बार् बार हज़ार बार पढते...जी ना भरता !

और फिर एक दिन उसका आत्म विश्वास डूब गया उसने कहा हमारी बिरादारी अलग है मैने कहा हां पहले से ...हमें अपने परिजनों का कहना मानना होगा !  मैं खामोश रहा उसने पूछा मेरे बिना रह सकोगे ?  मैं खामोश रहा ...मुझे उसकी बात माननें की आदत पडी हुई थी ! मै रोना चाहता था पर उसने कहा भी नही कि रो लेने से दर्द का अहसास कम हो जायेगा सो मै उसकी इजाजत के बिना रो भी नही सका ...उसने कहा मेरे खत लौटा दोगे ...मैने कहा हाँ  वे तुम्हारे है ले लो ...उसने उन्हें वहीं खाक कर दिया ...मैने पूछा ...डरती थीं ...उसने कहा नहीं ...मैने कहा विश्वास नही था ?  उसने कहा खुद से ज्यादा फिर भी... ! ...उसका चेहरा धुंधला हो चला था और मैं खुद भी आखिरी बार उसे ढंग से देख भी नहीं पाया !
 
 

रविवार, 19 जुलाई 2009

...नक्सलवाद ... युद्धोन्माद और ...जानम समझा करो !

कल रात उसने टी.वी.पर समाचार देखा और सुबह...सुबह प्रिंट मीडिया की सुर्खियाँ भी, लिहाजा वो बहुत उत्साहित है कि सरकार और पुलिस ने मदनवाडा के अनुभव से सबक लिया है इसलिए रक्षा बलों की त्वरित तैनाती / मूवमेंट, की गरज से हेलीपैड की तात्कालिक व्यवस्था के साथ ही साथ रणनीतिक मोर्चे पर भी विचार मंथन का दौर चल रहा है ! इतना ही नहीं सरकार के नेक दिल मुखिया नें भी नक्सलियों के विरुद्ध आर पार युद्ध की घोषणा कर दी है ! उस पर खुशी ये भी कि हताहतों* के परिजनों को समकक्ष पदों पर अनुकम्पा नियुक्ति देने का फ़ैसला कर लिया गया है !

(*हताहत इसलिए लिख रहा हूँ कि इसमें आगे चल कर वो इंसान भी शामिल किए जा सकें जो पुलिस में नहीं थे परन्तु इस विभीषिका का शिकार हुए हैं ! )

मैं भी उसकी खुशियों के गुब्बारे को बेवक्त पंक्चर करने के मूड में नहीं हूँ, भला क्यों...?...जरा सोचिये...क्यों नहीं ? अरे भाई वो भी तो मेरी जिन्दगी की दुआएं मांगती है...जैसे कि उन हताहतों की पत्नियां मांगती रही होंगी ! अब कौन जाने कि अपना ईश्वर अधिक क्रूर है याकि नक्सली या फ़िर सरकार, जो जीवन माटी के मोल हो चला है ! पता नहीं कब कौन परिवार अनुकम्पा नियुक्तियों के लिए कतार में खड़ा होने को मजबूर हो जाए !... र अगर घर का मुखिया अपने अकाल स्वर्गारोहण से पूर्व सरकारी नौकरी में ना हों तो...?...तो ?

फिलहाल तो मेरी पत्नी नक्सलियों के विरुद्ध सरकारी युद्धघोष और हताहतों के परिजनों के प्रति उसकी करुणा से गदगद है ! मैं नहीं जानता कि रणक्षेत्र में तैनात अन्य सरकारी अधिकारी / कर्मचारियों में से अगली बारी किसकी होगी ? शायद मैं ? या फ़िर कोई और ?...या फ़िर कोई और...! क्या उस दिन भी मेरे परिजन / मेरी पत्नी समकक्ष पदेन करुणा के मुआवजे से संतुष्ट हो जायेंगे / जायेगी ? क्या मुझ जैसे किसी भी हतभागे के परिजन अपने प्रियजन के असामयिक विछोह के उपरांत सहज जीवन जी सकते हैं ! वो खुश है ! मैं सोच रहा हूं और मेरा सिर दर्द कर रहा है ! अख़बारों की सुर्खियाँ , शब्दों से ध्वनियों में बदलती हुई !...तेज दर तेज होती हुई, मेरे कानों में हथोडों सी बज रही हैं ! मुझे अहसास दिलाती हुई कि एक दिन तुम भी सुर्खियाँ बन सकते हो तुम्हारे परिजन भी तुम्हारे बिना...अमां...लाहौल बिला कुव्वत ! मैं भी...क्या अगड़म बगड़म सोचे चला जा रहा हूं !

आवाज देता हूं मुझे चाय चाहिए ! पत्नी खुश है, उसे इस क्षण, मेरी ब्लागिंग से कोई शिकायत नहीं ! वाव...आज चाय में अदरक भी... ?...और कोई वक़्त होता तो कहता बेहतरीन, मजा आ गया ! लेकिन अभी तो मुंह कसैला हो चला है ! अकाल मृत्यु की परिकल्पना के दरम्यान कौन सी चाय जायकेदार लगेगी भला ? कोशिश कर रहा हूं, कि दिमाग सोचना छोड़ दे, फिलहाल मुझे और मुझ जैसे शान्तिकामी लोगों को इसकी सख्त जरुरत है कि दिमाग सोचना बंद कर दे क्योंकि...?

मध्यप्रदेश के ज़माने में स्वर्गीय भास्कर दीवान के परिजनों को भी समकक्ष पदेन अनुकम्पा नियुक्ति दी गई थी ! अब स्वर्गीय चौबे के परिजनों को दी जायेगी बाद में शायद...कोई और...फ़िर से...नये हैलीपैड, नई रणनीतियां, नये युद्धघोष ?...नई मृत्यु...नई अनुकम्पा, नई सुर्खियाँ...सब कुछ नया और निरंतर ! तब शायद किसी और की नई नवेली पत्नी खुश हो रही होगी ? जैसा का तैसा ! मानव जीवन को अकारथ / व्यर्थ करता हुआ !

मेरा दिमाग, क्या करूं मैं इसका ! कमबख्त सोचना बंद क्यों नहीं करता...हैलीपैड, नये अस्त्रों की दौड़, रक्षा बलों का तीव्र मूवमेंट ! थाने पक्के बंकरों से सुरक्षित ! पुलिस चौकियां फोर्टीफ़ाइड़ फ़िर लाखों करोड़ों जनगण अपनी अपनी झोपड़ पट्टी के पास बने बंकरों /फोर्टीफ़ाइड़ थानों के, अहसास मात्र से सुरक्षित ! अब मैं बडबडा रहा हूं और पत्नी भौंचक मेरा मुंह ताक रही है ! उसे लगता है कि रात मेरी नींद पूरी नहीं हुई या फ़िर काम का तनाव है ! अरे नहीं ये शब्द मेरे नहीं हैं !

हैलीपैड...अनुकम्पा नियुक्तियां, युद्धघोष...बंकर, जंगल, गाँव, पुलिस, मंत्री, संतरी, आदिवासी, जनगण, झोपडे, जीवन, मृत्यु...अनाथ...विकलांग...शहीद...भूखे...नंगे...आह मैं मरा !
कौन सी शान्ति ?... काहे की शान्ति ?

यहाँ नक्सलवाद...युद्धोन्माद और...शान्ति की कब्रगाह है... जानम समझा करो ! फिलहाल , पत्नी मेरे माथे पर हाथ रख कर, हरारत को महसूस करने की कोशिश कर रही है ! वैसे मेरे लिए , उसके हाथ में सिर दर्द और नींद, दोनों की गोली है !

बुधवार, 6 मई 2009

इक शम्मा है दलीले सहर सो ख़मोश है !

सुबह सुबह औघड़ चाय* का वक़्त है ! दर-ओ- दीवार पे हर सिम्त जगजीत भाई की पुर- नूर आवाज़ अनहद से अनगढ़ रिश्ते का सबब बनी हुई है ~~ ज़ुल्मतकदे में ................ इक शम्मा है दलीले सहर सो ख़मोश है ~~
बीबी किचन में , बच्चे नींद की आगोश में और मैं ख़ुद चाय की उम्मीद के साथ ग़ालिब ,जगजीत और अनहद की सोहबत में हूं ! सामने टेबिल पर पड़ा अख़बार अपनी सुर्खियों के साथ अंगडाइयां लेते हुए मुझे दुनियाये फ़ानी की आगोश में ढकेलने की फिराक़ में है ! फ़िर क्या... हर दिन की तरह आज भी अख़बार आहिस्ता आहिस्ता अपनी गिरफ्त मज़बूत करता जा रहा है और फिजाओं में गूंज रहे अल्फाज़ अपने मानी खोने लगे हैं ~~
सत्र न्यायाधीश बस्तर नें , अल्फ्रेड महरा निवासी आवास प्लाट करकापाल ,जगदलपुर को अपने साले मंगलू के कत्ल के जुर्म में , उम्र कैद की सजा सुना दी है ! रिक्शा चलाकर गुज़ारा करने वाले अल्फ्रेड को अपने बेटे सुहेल के जन्मदिन के लिए सिर्फ़ १०० रुपये उधार की दरकार थी ! ताकि बच्चा नए कपड़े पहन सके ! साला मंगलू एक दिन पहले सीमेंट खरीद चुका था सो उधार दे ना सका ! अल्फ्रेड नें गुस्से में साले को पीटा और वह मर गया ! अब मेरे दिल -ओ -दिमाग में अल्फाज़ अपनी शिद्दत से गूंज रहे हैं ~~
अल्फ्रेड ... मंगलू ... सुहेल ... जन्मदिन ... मृत्यु ... बेटा ... साला ... सौ रूपये ... उधार ... सीमेंट... सजा ... रिक्शा ... उम्रकैद... नए कपड़े ... जेल... इक शम्मा ... सरकार ... समाज ... गरीबी ...दलीले सहर... आज़ादी ... विकास ...विश्वगुरु... विकसित देश... भारत... लोकतंत्र ... नेता ...अम्बानी ... मित्तल...फोर्ब्स... विधवा ... पितृहीन ... अनाथ... परिवार ...सो ख़मोश है !

बुधवार, 11 मार्च 2009

पूरे जिस्म पर ......

एक समाचार लेखक की आप बीती :
होली से पहले :
उनकी उम्र ज्यादा नहीं लिहाज़ा ख्यालात भी रूमानी हैं और उन्हें ईश कृपा से एक अदद लैला भी दस्तेयाब है सो जनाब पिछले साल भर से राह तक रहे थे कि होली आएगी तो कौन कौन से रंग किस किस तरह से और कहाँ कहाँ लगायेंगे ! मगर सत्यानाश हो ऑफिस वालों का , फरमान ज़ारी कर दिया , इस साल तिलक होली से गुज़ारा करो , मानवता को विश्व युद्ध से बचाना है ! इसलिए तिलक होली को जन आन्दोलन बना डालो ! अब बेचारा खादिम भला अपने मालिक से कैसे कहे जनाबे आली ख़ुद की होलियाँ तो भले से गुज़ार लीं अब पैर कब्र में क्या लटके , हमारी होली का दहन करने पे उतारू हो गए ! खैर ........मालिक का हुक्म सिर माथे की तर्ज़ पर भाई साहब , पिछले कई दिनों से तिलक होली के तराने गाने पर मजबूर थे !
होली के दिन :
आज भाई साहब नें सारी फिक्रें छोड़ कर होली को होली की तरह से मना डाला है और अपनी तमाम हसरतें खुलकर पूरी कर डाली हैं ! लेकिन दोस्त , दुश्मनी पर उतारू हैं और धमका रहे है कि मालिक को बता देंगे कि तुमने नाफ़रमानी की है ! जन-आन्दोलन की पीठ पर छुरा भोंका है ! ..... अब भाई साहब को कल की फ़िक्र है !
कल क्या होगा :
भाई साहब ने तय कर लिया है कि कह देंगे ! हुजूर हमने इस आन्दोलन को मजबूती देने के ख्याल से ज़्यादा से ज़्यादा जगह पर ज़्यादा से ज़्यादा तिलक लगाये हैं !

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

बेवकूफ़ कौन ..

कल मैंने अपने संस्मरण में यह बताने की कोशिश की थी कि आंख मूंद कर किसी को बेवकूफ़ या अक्लमंद नहीं माना जा सकता ! अब मैं आपको यह बताने की कोशिश करूंगा कि किस तरह से लोगों को अक्लमंद या बेवकूफ़ ठहराने के नुस्खे(पैमाने ) हम लोगों ने ईजाद कर रखे हैं और क्या वाकई में ये पैमाने इतने फूल प्रूफ़ हैं कि जिनसे बिना भूल चूक ये पक्का तय हो जाए कि कौन कितना अक्लमंद है !
हमारे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में अक्लमंदी के ग्रेडेशन - थर्ड , सेकंड और फर्स्ट डिवीजन की शक्ल में निर्धारित हैं और यहां पर अक्ल को नापने के पैमाने (स्केल )पांच या दस उत्तरों वाले प्रश्नपत्र हुआ करते हैं ! परिस्थितियां जो भी हों , जैसी भी हों ,छात्र जिसे तीन घंटे में लिखे उसे परीक्षक कुछ मिनटों में जांच कर सब कुछ निर्धारित कर डाले , वाले इस पैटर्न में छात्र को स्थायी रूप से थर्ड , सेकंड या फर्स्ट लेवल अक्लमंद होने का ग्रेडेशन दे दिया जाता है !
इसी तरह से नौकरियों के लिए जो भी बुद्धिमत्ता परीक्षण किए जाते हैं उनमे से अधिकांश वस्तुनिष्ठ तरह के प्रश्नों वाले पैमाने हुआ करते हैं जो तय करते हैं कि अभ्यार्थी कितना बुद्धिमान है ! चलिये इनमे से एक नमूने को आगे की चर्चा के लिए चुनते हैं :-
प्रश्न : 'अमुक ' कम्पनी के शेयरों के मूल्य पता करने के लिए आप किसी एजेंसी में जाते हैं किंतु एजेंसी उक्त दिवस बंद है तो आप क्या करेंगे ?
उत्तर विकल्प :
अ : एजेंसी बंद है तो वापस लौट आयेंगे !
ब : दूसरी एजेंसी में पता करेंगे !
स : कुछ भी नहीं करेंगे !
मोटे तौर पर देखा जाए तो इस प्रश्न का 'ब ' उत्तर देने वाले अभ्यार्थी तर्कवान / बुद्धिमान और 'अ' तथा 'स' उत्तर देने वाले तर्कहीन तथा बेवकूफ़ श्रेणी के अभ्यार्थी माने जायेंगे और सामान्यतः प्रतियोगी परीक्षाओं में सब कुछ इसी तर्ज़ पर होता भी है ! लेकिन ...
क्या यह सही है ?
कल्पना कीजिये कि अभ्यार्थी तीन अलग अलग क्षेत्रों के निवासी हैं ( हमारे देश में यही विविधता सही है ) एक शहरी क्षेत्र ,दूसरा कस्बाई क्षेत्र और तीसरा ग्रामीण क्षेत्र का निवासी है तो यह निश्चित जानिए कि तीनो अभ्यार्थी अलग अलग उत्तर देंगे ! चूँकि शहरी पृष्ठभूमि में ,कई एजेंसियां उपलब्ध हैं इसलिए उत्तर मिलेगा 'ब' ! कस्बे में शायद दूसरी एजेंसी न हो तो उत्तर मिलेगा 'अ' और गांव में कोई एजेंसी होती ही नहीं इसलिए उत्तर 'स' मिलना सही है ! सच पूछिए तो अभ्यर्थियों की पृष्ठभूमियों के हिसाब से तीनों ही उत्तर जायज़ हैं !
फ़िर प्रतियोगी परीक्षा में ' ब' उत्तर का बुद्धिमान होना सही कैसे हुआ ?
चूंकि हमारा देश भिन्न पृष्ठभूमियों वाला देश है तो क्या प्रश्नों और उत्तरों के , एकाकी पृष्ठभूमि वाले ,फिक्स फार्मेट , सभी अभ्यार्थियों के साथ न्याय कर सकते हैं ? क्या ऐसे वस्तुनिष्ठ प्रश्न और उनके उत्तरों वाले स्केल किसी की अक्लमंदी और मूर्खता के पैमाने बन सकते है ?
मेरे विचार से बिल्कुल भी नहीं ?
इसीलिए किसी परीक्षा में किसी की सफलता ,उसकी बुद्धिमत्ता है , बधाई हो ? किंतु दूसरे की असफलता उसकी बेवकूफी है ? यह मानना भी बेवकूफी है !

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

बेवकूफ..

उन दिनों मैं तकरीबन हर दिन , डाक्टर शिरीन लाखे की यायावरी से लुत्फंदोज़ हुआ करता था ! उसे घूमने का बेहद शौक था इसलिए ऑफिस से छूटते ही वो मुझे अपनी लक्ष्मी सुवेगा मापेड में बैठाता और हम लोग गांव , जंगल की खाक छानने निकल जाया करते , फ़िर पहाड़ , झरनों , नदी नालों के चक्कर लगाकर अक्सर देर रात ही घर लौट पाया करते थे ! तब उसे पीएच.डी.अवार्ड हुए ज्यादा दिन नहीं हुए थे ! भाषा विज्ञान के शोधार्थी के रूप में उसने मुझे काफी प्रभावित किया था ! यही वज़ह थी कि उसके साथ घूमना मुझे फिजूल तो क़तई भी नहीं लगता था !
एक बड़ी सी लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन के तौर पर वो दिन तमाम किताबों के ढेर पर बैठा दिखाई दिया करता और कुल मिलकर मेरे लिए एक बुद्धिमान युवा दोस्त था ! उसे सिगरेट पीने का बेहद शौक था ! शायद उन दिनों लोग बौद्धिक दिखावे के तौर पर , चुरट /सिगार / सिगरेट जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल बहुतायत से किया करते थे !
हुआ यूं कि एक दिन हम लोग इन्द्रावती के घाट पर खड़े गपशप कर रहे थे और गांव के आदिवासी डोंगी के सहारे नदी पार कर रहे थे ! वहां एक छोटी सी झोपड़ी , एक छतरी और एक मोटा सा दरख्त भी था ! शिरीन काफी देर से सिगरेट जलाने की नाकाम कोशिश कर रहा था , तेज हवा के झोंकों से माचिस की तीलियाँ लगातार दम तोड़ती जा रही थीं ! वो बेहद परेशान हो चला था क्योंकि माचिस लगभग ख़त्म होने को थी और सिगरेट जलने का नाम ही नहीं ले रही थी अचानक उसके चेहरे पर शरारत की झलक दिखाई दी और उसने नाव से उतरते हुए ग्रामीण का लगभग उपहास उड़ाते हुए पूछा कि क्या तुम सिगरेट पियोगे ? उसे यकीन था कि अनपढ़ ग्रामीण , उसकी ही तरह से सिगरेट जलाने में नाकाम हो जाएगा !
मगर आश्चर्य , ग्रामीण नें एक झटके में जमीन पर पड़ी छतरी उठाई उसे खोला और हवा के रुख के खिलाफ तानते हुए सिगरेट जला डाली !
शिरीन हतप्रभ ! मैं अवाक ! छतरी वहां पर पहले से थी और हम दोनों पढ़े लिखे बुद्धिमान लोग ?
उस दिन से मेरी जिन्दगी बदल गई , अब मैं किसी को भी बेवकूफ नहीं समझता ! किसी को धोखे से भी बेवकूफ नहीं कहता हूं क्योंकि मै जान गया हूं कि बुद्धि अक्षर ज्ञान की दासी नहीं है ! बुद्धि को अभिव्यक्त होने के लिए केवल और केवल परिस्थतियों की दरकार होती है !