अपने ना कुछ से कुछ हो पाने की कोशिशों की दरम्यानी सहूलियात को कभी , निज प्रदर्शन में सुधार के विरुद्ध , आ खड़ी हुई बाधा की तरह से देखा ही नहीं ! मसलन नदी के इस पार से उस पार तक के बीचो बीच हरहरा कर बहने वाले पानी को तैर कर या चल / बैठ कर पार करने के विकल्पों में से यदि किसी एक को चुनना हो, तो फिर चुना गया कोई भी विकल्प ना चुने गये विकल्प की तुलना में ज्यादा बेहतर और आरामदायक ज़रूर होना चाहिए ! इस हाल में ना चुने गये विकल्प में जो भी कठिनाई तुलनात्मक रूप से सन्निहित रही होगी, वह निश्चित ही मेरे दैहिक सामर्थ्य के विस्तार का कारण बन सकती थी ! कहा यह जा सकता है कि मैं, दूसरे विकल्प को ना चुनते वक़्त अपनी दैहिक क्षमताओं के विस्तार के प्रति हतोत्साहित था याकि उस पार जाने के लिए मेरे पास पर्याप्त मानसिक संबल नहीं था ! मुद्दा यह कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सुविधा सम्पन्नता एक अर्थ में बाधाओं के विरुद्ध मेरी शौर्यहीनता या मानसिक दुर्बलता भी कही जा सकती है !
अगर नदी के उस पार जाना मेरे लिए अबुद्ध से बुद्ध हो पाना भी हो , तो क्या मैं एक पुल / एक नाव की बेहतर सुविधा को ना चुन कर खुद ही तैर कर पार लगना चुनूं ? बुद्ध (नरेंद्र) ने नाव चुनी और साधु पानी पर पैदल चलना सीखने में ही जीवन के पच्चीस बरस होम कर बैठा, कुछ पैसा बनाम सिद्धि के लिए पच्चीस साल ! बेशक नरेंद्र के बुद्ध हो जाने और साधु के जल सिद्ध हो पाने के मध्य चंद सिक्कों वाले सामान्य बोध / व्यावहारिकता ने ही सामुदायिक सार्थकता बनाम व्यक्तिगत चमत्कारिक उपलब्धि का मार्ग प्रशस्त किया होगा ! बहस ये कि सिक्के / नाव और पुल बनाम तैरना जैसे दैहिक सामर्थ्य विस्तार के अवसरों में से किसे चुनूं कि बुद्ध हो पाऊं ! गौतम ने भटकते हुए वृक्ष की छांह पाई और मुझे पुल का आसरा है, उस पार जाने के लिए ! अगर पुल होता तो सोहनी कच्चे घड़े सी भाभी से धोखा ना खाती, उसे भी उस पार जाना था अपने प्रेम के लिए !
इधर गौतम को बोध, मुझे थोड़ा सा बुद्धत्व और सोहनी को पूर्ण प्रेम चाहिए था ! उधर उद्धव, गोपियों और कान्हा के बीच / अपने आराध्य से जुड पाने की एक मात्र आस ! उद्धव, एक पुल / एक सुविधा / एक माध्यम, सो गोपियों ने उनकी सुनी ही नहीं, बस अपनी कह कर पार उतर गईं ! अगर उस पार जाने का लक्ष्य साफ़ हो तो उद्धव की सुनता ही कौन है ? तब वे केवल एक सुविधा / एक माध्यम मात्र रह जाते हैं ! ज्ञान और प्रेम यदि जागतिक प्रतीत हों और उन्हें लेकर हमारे लक्ष्य स्पष्ट हों तो हमें साधु की जल सिद्धता...भाभी प्रदत्त कच्चे घड़े के विश्वास और उद्धव के निराकार बोध की आवश्यकता नहीं है...पर जहां ज्ञान और प्रेम पारलौकिक छोर की ओर जाने का संकेत दें...वहां नरेंद्र को रामकृष्ण की अंगुली चाहिए ही पड़ेगी ! कठिनाई यह है कि ज्ञान और प्रेम अपने दोनों ही आयामों में अमूर्त है सो इन्हें साधने के लिए हमें बेहतर सुविधा और माध्यमों की आवश्यकता होगी और ऐसे में व्यक्तिगत ऊर्जा का क्षय अनावश्यक ही माना जायेगा !
ज्ञान और प्रेम को लेकर मनुष्य की उपलब्धियां शून्य से लेकर असीम विस्तार वाली हो सकतीं हैं और यह भी कि मनुष्य साधारण और असाधारण के बीच केवल अबुद्ध रह जाये ! यह कहना कठिन है कि हम ज्ञान और प्रेम से विरक्त होकर जी सकते हैं पर यह मानना आसान है कि हमें अपने अपने हिस्से का और अपनी अपनी औकात के अनुपात का बोध होना ही चाहिए ! ईश्वर और महिवाल, इहलोक और परलोक, भौतिकता और आध्यात्मिकता हमारे लक्ष्यों की सीमायें निर्धारित कर सकते हैं ! इन दिनों प्रेम और ईश्वर को लेकर एक गीत पर फ़िदा हूं ! मुझे लगता है कि यह गीत ईश्वर और प्रियतम को एक साथ संबोधित करता है ! प्रियतम / ईश्वर के लिए प्रियतमा / भक्त का आर्तनाद...कोई सिद्धि नहीं...खालिस प्रेम का पुल...
साजण प्रीत लगाके
दूर देस मत जात
बसो हमारी नगरी
मोंहें सुन्दर मुख दिखलात
कदि आ मिल सांवल यार वे
मेरे रूं रूं चीख पुकार वे
मेरी जिंदड़ी होई उदास वे
मेरा सांवल आस ना पास वे
मुझे मिले ना चार कहार वे
तुझ हरजाई की बांहों में
और प्यार परीत की राहों में
मैं तो बैठी सब कुछ हार वे
कदि आ मिल सांवल यार वे
टीप : इस गीत पर जिनका भी कापी राईट हो उनसे सखेद , अकादमिक इस्तेमाल की अनुमति की अपेक्षा सहित !