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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

मैंने रखा है मुहब्बत...3

औरों की तरह उसे भी इश्क हो गया था, इससे कब्ल, भले ही उसके ताल्लुकात अपनी ही बिरादरी की ढ़ेरों ज़नानियों से रहे होंगे पर ये पहला मौक़ा था कि उसका इश्क खूबसूरत मानुष सुकन्या से वाबस्ता था । बहरहाल इश्क में जोर जबरदस्ती से काम लेने के बजाये उसने सुकन्या के माता पिता से विधिवत सुकन्या का हाथ मांग लिया । इस दफा वो परम्परा अनुसार और मय रीति रिवाज़ के पत्नि हासिल करना चाहता था क्योंकि उसे सुकन्या से सच्ची मुहब्बत थी । बहरहाल मुश्किल ये थी कि लड़की के वालदैन गैर बिरादरी में अपनी लड़की का ब्याह करने के लिए राज़ी नहीं थे, उसपे तुर्रा ये कि याची के हिंसक स्वभाव में उन्हें अपनी लडकी का मुस्तकबिल स्याह नज़र आ रहा था, सो उन्होंने विवाहोत्सुक वनाधिराज को नाराज़ किये बिना अपनी बात कही ।

उन्होंने कहा महामहिम, आपका प्रस्ताव पाकर हम गौरवान्वित हुए, लेकिन हमारी कुछ समस्यायें हैं, जिनकी तरफ आपका ध्यान आकर्षित कराना ज़रूरी है । हमारी लड़की अभी कमसिन है, सो मुमकिन है कि आपके इश्क की शिद्दत की ताब ना ला सके । हमें लगता है कि आपके नुकीले दांतों से वो घायल हो सकती है । इसके अलावा आपके पंजो के पैने नाखून भी उसे, जिस्मानी तौर पर नुकसान पहुंचा सकते हैं । इसलिए हम आपसे, बा-अदब ये अर्ज़ करते हैं कि आप अपने पैने नाखून हटवा दें और नुकीले दांत भी । अगर यह मुमकिन हो पाया तो हम आपके प्रस्ताव पर, सहर्ष पुनर्विचार कर सकते हैं ।

चूंकि शेर बेहद इश्कियाया हुआ था, सो उसने आगा पीछा सोचे बिना अपने नाखून और दांत निकलवा दिए और फिर से सुकन्या के माता पिता के पास जा पहुंचा । नख दंतहीन शेर को देख कर लड़की के अभिभावक हंसने लगे। उनके लिए शेर, अब किसी काम का नहीं था । बेबस और लाचार, जो किसी को भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं था । कहते हैं कि इश्क, हिंसक, पशुवत और भयंकर को भी पालतू बना सकता है ।
यूं तो ये कहानी, शेर के नाम से कही गई है, जिसे आदमजाद सुकन्या से इश्क हो गया है और वो अपनी जिस्मानी हरारत, अपनी शक्तिमत्ता के दम पर उतारने के बजाये सामाजिक तौर तरीकों से शांत करने का इच्छुक है । या ये मान लिया जाए कि शेर को उस लड़की का इश्क, बलपूर्वक हासिल करने की ख्वाहिश नहीं थी । इसलिए उसने बाकायदा लड़की का हाथ, लड़की के माता पिता से मांगा । यहां कथा में निहित हास्य संकेत ये कि शेरों के माता पिता, सात फेरों / निकाह के कायल नहीं होते, बल्कि उन्हें गन्धर्व विवाह या लिविंग इन जैसी नव-विवाही परम्पराओं के निर्वहन का अभ्यास / शौक होता है । कुल मिलाकर विवाहोत्सुक शेर के वालदैन या तो शेर का साथ देने के लिए मौजूद नहीं थे या फिर उन्हें गैर बिरादरी में शेर का ब्याह पसंद नहीं था, सो विरोध स्वरुप, उन्होंने इस पहल का बायकाट / बहिष्कार किया ।
बहरहाल शेर के हवाले से कही गई इस कथा को इस नज़रिये से भी देखा जा सकता है कि शेर वास्तव में वनाधिराज होने के बजाये, गली का कोई गुंडा, मवाली, कोई बाहुबलि, डॉन माफिया, दस्यु सम्राट, आपराधिक प्रवृत्ति का मनुष्य रहा होगा जोकि लड़की की जाति से अलग जाति में जन्मा होगा और उसकी कुख्याति के चलते, लड़की के अभिभावकों ने उसे असामाजिक जीवन शैली छोड़कर सज्जनता पूर्वक जीवन यापन की सलाह दे दी होगी, जिसमें आत्मसमर्पण और गुनाहों की सजा भुगतना भी शामिल हो सकता है । प्रतीत यही होता है कि जंगल का राजा एक प्रतीक है जिसे दुस्साहस और राजतान्त्रिक / तानाशाही पूर्ण निर्णयों से जोड़ कर देखा जा सकता है, इसलिए शेर के हवाले से कही गई यह कथा निश्चित रूप से इंसानी बस्तियों की ही कथा रही होगी, जिसमें सुकन्या के अभिभावकों ने सुकन्या के हित में जो उचित जान पड़ा, वो निर्णय लिया ।
कथा सार ये कि इश्क बड़े बड़ों के चूल्हे ठंडे कर देता है । सेनापति को प्यादा और महामहिमों को हक़ीर कर देता है । मुमकिन है कि ये सारी बातें इसके उलट भी कही जा सकें । पर ये कथा... 

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

मैंने रखा है मुहब्बत...1


उसका नाम चाहे जो भी हो, पर उसे मुहब्बत थी, इक सुफैद पोश से । यूं तो वो ‘केइ’ द्वीप का रहने वाला था...और वज़ूद बचाये रखने की गरज से शिकारी भी । उस रोज उसका मददगार कुत्ता गहरी घाटी में जा गिरा जिसे बचाने की गरज़ से वो खुद भी जैसे तैसे घाटी के निचले हिस्से में जा पहुंचा जहां उसकी मुलाकात एक बूढ़ी औरत से हुई जोकि उसी घाटी में रहती थी । बूढ़ी ने उसे भूखा जान कर खाने के लिए कंद और अधकच्चे चावल परोसने चाहे तो उसने कहा, चावल मुझे पकाने दो और फिर उसने लकड़ियों की मद्धम आंच में चावल पकाये जिनकी खुशबू पूरी घाटी में फ़ैल गई । बहरहाल भूखे को खाने की पेशकश और कच्चे चावलों को बेहतरीन तरीके से पकाने की कला के दरम्यान इश्क जाग उट्ठा और उन दोनों ने शादी कर ली । 
उधर घाटी में ये खबर दूर दूर तक फ़ैल गई कि चावलों को पकाने का कोई खास तरीका भी हो सकता है । जिन्हें सीखने की चाहत थी शिकारी उन सबको अपने हुनर से आगाह करने लगा । जब कुछ वक्त गुज़रा तो उसे अपने पुश्तैनी गांव की याद सताने लगी । उसने घाटी से वापस, अपने घर लौटने का फैसला कर लिया । उसकी बूढ़ी बीबी उसके साथ उसके गांव आने के लिए तैयार थी पर रास्ते में उन दोनों में झगड़ा हो गया जो शायद अपने घर वापस जाने और अपना घर छूट जाने वाली मुहब्बतों का झगड़ा रहा होगा। शिकारी ने बूढ़ी से कहा ठीक है, तुम अपने घर में ही रहो, हम एक दूसरे से अलग हो जाते हैं । बूढ़ी ने कहा, कोई बात नहीं तुम मुझे मेरे चावल लौटा दो । जो मेरा है उसे लेकर कहीं और ले जाने का तुम्हें हक़ नहीं । इस पर दोनों तैयार थे ।
हालांकि शिकारी ने चोरी से चावल के दो दाने अपने नथुनों में छुपा लिए और अपने गांव वापस लौट आया । कहते हैं कि उनमें एक दाना सुफैद और दूसरा भूरा था । शिकार करने के दौरान मुतवातिर भटकने और खाना मिलने ना मिलने की अनिश्चितता से तंग आ चुका शिकारी खेती करना चाहता था । उसने उन दो बीजों से पौधे उगाये और फिर और ज्यादा पौधे । उसे सुफैद चावलों से मुहब्बत थी...पर गांव वालों को हर किस्म के चावल की ज़रूरत, सो शिकारी से किसान हुआ इंसान, भूरे चावलों को दूसरे लोगों को बेचने लगा । वो अपनी चाहत के सुफैद चावल सिर्फ अपने लिए रखता और भूरे चावल बाज़ार में । भूरे चावलों को इस बात का बेहद रंज था कि शिकारी किसान उन्हें प्यार नहीं करता बल्कि पैसों से बदल लेने वाली शय समझता है ।
वे खेत दर खेत आहिस्ता अहिस्ता समुन्दर के तटों की जानिब भाग निकले ।  गहरी शामों के गहरी रात हो जाने तक अलावों के इर्द गिर्द बुनी गई कहानियों में सुनते हैं कि उन खेतों की मालकिन भी एक बूढ़ी औरत थी, जिसे लगा कि ये चावल बेस्वाद होंगे...पर फसल पकने के बाद उसका शक बेबुनियाद निकला । तटों की माटी और मौसम, भूरे चावलों का हमदर्द निकला । वे जब भी पके बा-स्वाद हुए । बूढ़ी औरत का ख्याल था कि भूरे चावल उसके खेतों तक कोई भी लाया हो, दिखने में चाहे उनकी रंगत कैसी भी हो...पर हैं वो कमाल, उस ईश्वर को धन्यवाद, जिसने उसकी धरती पर नियामत बिखेरी, इंसानी ज़िंदगियों को उपहार दिया ।
कहन के हिसाब से शिकारी समाज के खेतिहर हो जाने का आख्यान है ये । एक इण्डोनेशियाई द्वीप की भूस्थैतिक परिस्थतियों में ऊंची जंगली भूमि में कुत्ते जैसे जानवर को पालतू बना चुकने और शिकार के समय में उसका सहयोग लेने का उद्घाटन करती यह कथा कुत्ते के घाटी में गिर जाने और शिकारी को सहयोगी की चिंता हो जाने का बयान करती है । घाटी में चावल की खेती का स्रोत एक बूढ़ी से जोड़े जाने का आशय कदाचित उसके अनुभव समृद्ध होने से हो । बूढ़ी स्त्री, भूखे शिकारी को भोजन पर आमंत्रित कर, अपने मेहमान नवाज़ होने और सामाजिक शिष्टाचार युक्त होने का परिचय देती है । किन्तु चावल के अधकच्चे होने का कथन उस बूढ़ी की पाक कला पर प्रश्न चिन्ह खड़े करता है यानि कि वो चावल की काश्तकार / मातृदेवी तो है पर भोजन बनाने में निपुण नहीं है । जबकि शिकारी प्रतिदिन कच्चे मांस को मद्धम आंच में पका कर खाने का हुनर ज़रूर जानता होगा ।
कुल मिलाकर अनुभवी काश्तकार और अनुभवी शिकारी रसोइये के अलग अलग नैपुण्य का मिलन था यह, जो उन्होंने ब्याह कर लिया । कथा में उम्र का स्पष्ट उल्लेख ना होने के बावज़ूद प्रतीत यह होता है कि शिकारी उस स्त्री से कम उम्र रहा होगा ? उसे अपनी पाक कुशलता / ज्ञान को अन्य ग्रामीणों से साझा करने में कोई उज़्र ना था...पर अपनी जन्मभूमि / अपने गांव के प्रति उसका मोह और गांव में खेती करने का निश्चय उसे चावल के बीज चुराने और आश्रयदाता, मेहमान नवाज़ पत्नि से छल करने वाला बना देता है यानि कि वो शिकार से अस्तित्व रक्षा के बजाये खेती में अपना भविष्य सुरक्षित मान लेता है । शिकारी की तरह से स्त्री भी अपने गांव से मोहासक्त है और गांव को छोड़ने ना छोड़ने की कशमकश में पति को छोड़ देना मुनासिब समझती है, किन्तु उसे यह मंज़ूर नहीं है कि शिकारी उसके जीवन रक्षण का रहस्य / चावलों की काश्तकारी का ज्ञान खासकर बीज, उससे लेकर चला जाए । वे दोनों बिछड़ने पर सहमत हैं पर उन दोनों में से शिकारी यानि कि पुरुष पात्र छलिया है ।
शिकारी को सुफैद चावलों से मुहब्बत थी सो उसने उन्हें कभी बेचा ही नहीं पर...भूरे चावलों को घर में सहेजा भी नहीं । भूरे चावल बेचे गये, यह खेतिहर व्यवस्था में बाज़ारीकरण के प्रवेश जैसा संकेत है...और अद्भुत कथन ये कि शिकारी की उपेक्षा से भूरे चावल दुखी थे, सो वे खेत दर खेत दूर तक बिखरते चले गये । असल में ये कथन प्रकृति के जीवित होने और वनस्पतियों में मनुष्यों जैसी संवेदनायें / अनुभूतियां होने का कथन है । बहरहाल प्राकृतिक तौर पर आप्रवासी हुए भूरे चावल अनुकूल मौसम और माटी में समृद्ध हुए । संयोगवश यहां भी एक बूढ़ी स्त्री किसान है जो शुरू में भूरे चावलों की खेती के प्रति सशंकित है, लेकिन अनुकूलता में फसलें लहलहाती हैं और उन्हें प्रेम मिलता है जैसा संकेत देती हुई ये कथा समाप्त हो जाती है । आबादियों में भूख और कामुकता नैसर्गिक अपरिहार्यतायें है और अपरिहार्य है प्रेम, स्त्रियों से, भोजन से...   

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

गोदना


वो दोनों गहरे दोस्त थे किन्तु उन दोनों को दुःख यह था कि उन्होंने कभी गोदना नहीं गुदवाया था ! उन्हें लगता था कि वे अपने अन्य दोस्तों की तुलना मे खूबसूरत नहीं हैं ! एक दिन उन दोनों ने तय किया कि वे एक दूसरे को गोदना गोदेंगे, सो उनमें से एक युवक ने दूसरे युवक के सीने, पीठ, हाथों, पैरों, यहां तक कि चेहरे पर भी गोदना गोद दिया ! अपना काम / अंकन पूरा होते ही उसने खाना बनाने के बर्तन के निचले तल से कालिख निकाल कर, गोदने के सभी निशानों पर लगा / मल दी, इस तरह से उसके दोस्त की गोदना गुदाई का काम अच्छी तरह से पूरा हुआ !

इसके बाद, पहले दोस्त ने दूसरे से कहा कि गोदना गुदवाने के बाद, तुम बहुत खूबसूरत दिख रहे हो, इसलिए अब तुम्हारी बारी है कि तुम मेरे शरीर पर गोदना गोदने का काम जल्द से जल्द पूरा करो, लेकिन, इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता, उसके दोस्त ने बर्तन के तल से ढेर सारी कालिख लेकर, उसके सिर से लेकर पैर तक मल / पोत दी, जिसके कारण से पहला दोस्त बेहद काला और चिकनाई युक्त दिखने लगा ! उसे अपनी कालिमामय हालत को देखकर बहुत गुस्सा आया और उसने चिल्ला कर कहा, मैंने तुम्हे कितनी सावधानी के साथ गोदा था और तुमने मेरे साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया !

वो दोनों आपस में लड़ने लगे, लेकिन अचानक ही सुंदर गोदने वाला युवा महाकाय छिपकली में बदल गया और...फिर छिपने के लिये लंबी / ऊंची घास के मैदान की ओर भागा...जबकि कालिख पुते शरीर वाला युवक, कौव्वा बन कर गांव के ऊपर मंडराने लगा !

वैसे तो ये जनश्रुति, फिलीपींस से ताल्लुक रखती है पर...पूरी में दुनियां गोदना, मनुष्यों की देहों के कैनवास पर सौन्दर्यात्मक अभिरुचियों की अभिव्यक्ति है, हालांकि कई समाजों में इसके प्रचलन की पृष्ठभूमि में आध्यात्मिक / पारलौकिक कारण भी उद्धृत किये जाते हैं ! यह जानना रुचिकर है कि चरम आदिम समुदायों से लेकर परम आधुनिक समाजों में भी गोदना, बहुप्रचलित सौंदर्य प्रसाधन / अलंकरण / आभूषण और फैशन बतौर अस्तित्वमान है ! साधारण, निर्धन लोगों से लेकर ख्यातिनाम तथा धन धान्य से परिपूर्ण लोग भी गोदने के आकर्षण से बच नहीं पाते !  

समाज विज्ञानियों ने गोदने को लेकर अनगिनत अध्ययन किये हैं, जिनका उल्लेख इस आख्यान की व्याख्या के लिये कतई आवश्यक नहीं है, फिर भी ये जान लेना ज़रुरी है कि मिस्र में पाई गई, स्त्रियों की ममियों में गोदने के चिन्ह मिले हैं जोकि उनके शरीर के विभिन्न अंगों...यहां तक कि जांघों के ऊपरी हिस्सों पर अंकित किये गये थे, वे संभवतः वेश्याएं थी, याकि राज नर्तकियाँ अथवा काम व्याधि से ग्रस्त स्त्रियां रही होंगी, जिनकी पहचान गोदने के अलंकार से की जाती होगी ! काल गणना के अनुसार ये ममियां 4000 ईसा पूर्व की हो सकती हैं !

इटालियन आस्ट्रियन सीमा पर 5200 ईसा पूर्व, जितने पुराने गोदने के संकेत तथा पूर्व इंका सभ्यता में स्त्री ममी की खोपड़ी में गोदने के चिन्ह मिले ! ग्रीको रोमन सभ्यता, चीन के हान राजवंश और जापान के कुलीन लोगों में गोदने का प्रचलन रहा है !पोलिनेशियाई लोग अपनी संस्कृति के प्रतीक गोदने में इस्तेमाल करते रहे हैं, प्रशांत द्वीपीय आदिम कबीलों, खासकर ताहितियन समाज के लोगों में कूल्हों / शरीर के पृष्ठभाग में गोदने का चिन्हांकन, विगत 12000 वर्षों से काम वयस्कता / बालिग़ होने बतौर स्वीकार किया गया है, गौर तलब है कि ताहितियन शब्द टाटू से टैटू शब्द प्रचलन में आया जोकि हमारे लिये गोदना नामित है !  

न्यूजीलैंड के माओरी लोग अपने चेहरे पर गोदना गुदवाते हैं जबकि हवाई द्वीप समूह के लोग अपनी जुबानों पर तीन डाट्स अंकित करवाते हैं ! हमारे अपने देश भारत में भी गोदना आदिम जातीय समूहों के आकर्षण का केन्द्र बिंदु है, भले ही इसके कारण अलग अलग हो सकते हैं ! योद्धा, साधारण जन, स्त्री, पुरुष, बूढ़े, बच्चे सब के सब गोदने से अभिभूत...गोदने को लेकर काल खंड, स्थान का कोई भेद नहीं, हालांकि लैंगिक, आयु, व्यक्तिगत रूचि और व्यवसायगत कारणों से गोदने के अभिविन्यास अलग अलग हुआ करते हैं ! बहरहाल हम इस फिलीपीनी आख्यान की व्याख्या की ओर वापस आते हैं !

कथा के अनुसार दो अभिन्न मित्र हैं, जिन्हें अन्य युवाओं की तुलना में स्वयं के खूबसूरत नहीं होने का दुःख है ! उन्हें विश्वास है कि गोदना गुदवाने से उनके दैहिक सौंदर्य की अभिवृद्धि होगी, इसलिए वे एक दूसरे को गोदना गोदने के लिये सहमत होते हैं, यहां यह कहना कठिन है कि इस कार्य के लिये वे, सामान्यतः गांव में मौजूद गोदना विशेषज्ञ के पास क्यों नहीं जाते ? क्या गांव में उनका कोई निषेध था ? याकि उनके पास, गोदना विशेषज्ञ के कार्य के प्रतिसाद स्वरुप कोई राशि या वस्तु नहीं थी ? बहरहाल कारण जो भी हो, वे दोनों एक दूसरे के सौंदर्य की श्रीवृद्धि के लिये, परस्पर सहमत हुए थे !

उन दोनों मित्रों की कुंठा यह थी कि वे तुलनात्मक असौंदर्य के शिकार हैं और उनके कुंठा मुक्त होने का सबसे बेहतर तरीका है, देह पर अलंकारिक अभिविन्यास बतौर गोदने का अंकन ! यहां यह ध्यान देना होगा कि पहले मित्र ने दूसरे मित्र के शरीर पर बड़ी ही सावधानी से गोदने का अंकन किया और कालिख रगड़ रगड़ कर उस अंकन को चमकदार बना दिया ! कहन के मुताबिक उसने अपने काम को बखूबी अंजाम दिया और अब उसकी अपेक्षा थी कि उसका मित्र भी, उसे गोदना गोद कर सुंदर बना दे ! जनश्रुति के इसी मोड़ पर दूसरे युवा की मौलिक प्रवृत्ति उभर कर सामने आती हैं...

जैसा कि हमने पहले ही कहा है कि गोदने का उद्देश्य, आध्यात्मिक या सौन्दर्यात्मक अभिरुचियों को प्रकटित करना होता है, अब इस कथन में जोड़ ये कि सौन्दर्यात्मकता की अभिव्यक्ति के बहुतायत हिस्से में कामुकता / विषम लिंगी आकर्षण प्रबल रूप में विद्यमान हुआ करते हैं, सो माना यह जाए कि, भले ही दोनों मित्रों की मित्रता गहन थी और उनका दुःख एक समान था, असुंदर दिखना ! इसलिए यह कहना कठिन नहीं है कि मित्रों की कुंठा की पृष्ठभूमि में यौन आकर्षण संबंधी प्रवृत्तियां भी शामिल हो सकती हैं यानि कि असौंदर्यगत कारणों से युवतियों के साहचर्य से वंचित होने / बने रहने का अहसास !

कथा को पढ़ते हुए लगता यही है कि पहले युवक ने मित्रता का समुचित निर्वहन किया, किन्तु गोदने के दैहिक आभूषण धारण करने के बाद, सुंदर / आकर्षक हो जाने के उपरान्त दूसरे युवक की नीयत में खोट आ गया और उसने पहले युवक की देहयष्टि को कालिख पोत कर असुंदर कर दिया ! उनकी मित्रता, सौन्दर्यात्मकता की बढ़त / अग्रता की बलि चढ़ गई ! आख्यान में दूसरे युवक का बड़ी छिपकली के रूप में, घास की ओट में, पलायन प्रतीकात्मक है, जहां वह अपनी करनी / मित्रता से घात को छुपाना चाहता है, जबकि कृष्णवर्ण कौव्वे का गांव / आबादी के ऊपर मंडराना पहले युवक की अतृप्त लालसाओं का द्योतक है...

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

सुफैद घोड़ा


अंतरीप के मुखिया की पुत्री बहुत सुंदर थी जिसे ब्याहने के लिये अनेकों योद्धा उत्सुक थे लेकिन बात अंतिम रूप से दो योद्धाओं पर अटक गई थी, उनमें से एक अंतरीप की विन्नीपेगोसिस झील का मुखिया था और दूसरा राक्षस ताल का सिओक्स मुखिया ! कुल मिलाकर उस युवती से ब्याह के दावे को लेकर उन दोनों में शत्रुता पनप गई थी !  हालांकि युवती स्वयं अंतरीप के योद्धा के पक्ष में थी और जब विन्नीपेगोसिस झील के मुखिया ने युवती के पिता को मेक्सिको से लाकर एक सुफैद घोड़ा, उपहार स्वरुप सौंपा तो वो भी अपनी पुत्री का हाथ उस अंतरीप योद्धा को देने के लिये सहमत हो गया ! उधर सिओक्स मुखिया स्वयं के दावे को खारिज किये जाते ही क्रुद्ध हो गया और उसने ब्याह के दिन एक बड़ी सेना लेकर युवती के घर पर आक्रमण कर दिया !

आकस्मिक आक्रमण को देखकर अंतरीप योद्धा ने अपनी पत्नी को सुफैद  घोड़े पर बैठाया और स्वयं धूसर रंग के घोड़े पर बैठ कर सिओक्स मुखिया की सेना से विपरीत दिशा की ओर चल पड़ा ! प्रेरीज घास के मैदानों की भूल भुलैयों में उन्हें देख पाना मुश्किल था, एक समय उन्हें लगा कि सिओक्स मुखिया की सेना से पीछा छूट गया है तो वे फिर से समतल मैदान में आ गये किन्तु अप्सरा जैसी उस युवती के सुफैद घोड़े को मीलों दूर से भी देखा और पहचाना जा सकता था इसलिए उन दोनों प्रेमियों के ऊपर तीरों की बरसात जैसी होने लगी, परिणाम स्वरुप प्रेमी द्वय काल के गाल में समा गये ! उनकी मृत देहें घोड़ों से नीचे गिर गईं ! सिओक्स मुखिया ने धूसर घोड़े को अपने कब्ज़े में ले लिया लेकिन सुफैद घोड़ा वहाँ से भाग गया !

इस घटनाक्रम के एक प्रत्यक्षदर्शी ने दावा किया कि उसने वधु की आत्मा को सुफैद घोड़े में समाते हुए देखा है, उसके बाद ही वह घोड़ा सिओक्स मुखिया के चंगुल से निकल भागा था ! कहते हैं कि सुफैद घोड़ा, अंतरीप योद्धा और उसकी ब्याहता पत्नि की मृत्यु के सालों बाद तक उस मैदान में भटकते हुए देखा गया था ! स्थानीय निवासी उस घोड़े के निकट जाने से डरते थे क्योंकि उसमें मृत युवती की आत्मा का वास था ! वे तो ये भी मानते हैं कि घोड़े की स्वयं की मृत्यु के बाद भी, घोड़ा उस मैदान में भटकता रहता है ! आज भी उस मैदान को उस घोड़े के नाम से जाना जाता है !

मूल रूप से यह एक दुखांत प्रेम कथा है, जिसमें प्रेम की वैवाहिक परिणति / पारिवारिक स्वीकृति का आधार, सुकन्या के पिता को उपहार स्वरुप प्राप्त एक सुफैद घोड़ा है ! इस आख्यान से प्राप्त संकेतों के आधार पर सुफैद घोड़े की उपलब्धता दुर्लभ मानी जानी चाहिये क्योंकि उसे दूसरे देश मैक्सिको से लाया गया है ! गौर तलब बात ये कि सुफैद घोड़ा, सुकन्या के पिता को दिया गया है, यानि कि यह अलभ्य वधु मूल्य है, जिसे विवाह के पूर्व ही चुका दिया गया है ...स्पष्ट तथ्य ये कि उक्त समाज में लड़की के पिता को अपने दामाद को क्रय करने के लिये दहेज की व्यवस्था नहीं करनी पड़ी, बल्कि दामाद ने स्वयं वधु मूल्य चुकाया ! स्मरण रहे कि तमाम दुनिया के आदिम जातीय समाजों, यहां तक कि पुरुष सत्तात्मक समाजों में भी, स्त्री पक्ष के महत्व को रेखांकित करने वाला बिंदु / कथन / चलन है, यह ! 

ये जनश्रुति विशुद्ध रूप से आदिम कबीलों के मुखिया / राज कुलों / अभिजात्य परिवारों के दरम्यान स्थापित होने वाले रिश्तों का कथन करती है, जिसमें विवाहोत्सुक, प्रतिभागी राज प्रमुख / मुखिया अपनी सफलता के लिये प्रयत्नरत है ! बहरहाल, विवाह के लिये, वधु मूल्य चुकाए जाने और चुकाए गये मूल्य को कन्या पक्ष द्वारा स्वीकार्य किये जाने के दौरान, हमें इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि विवाह के लिये स्वीकृति प्राप्त जामाता को सुकन्या की प्रेम सहमति भी प्राप्त थी ! मुखरित तथ्य यह कि उक्त समाज में वर के चयन के लिये, सुकन्या की संस्वीकृति / सहमति भी अनिवार्य तत्व रही होगी ! इसमें, कोई आश्चर्य नहीं कि कथा में उल्लिखित पिता अपनी पुत्री के लिये वर चुनते समय तीन मुद्दों पर खास ध्यान देता है, एक तो वधु मूल्य, दूसरा सुकन्या की सहमति और तीसरा रिश्तों के लिये चयनित परिवार की समकक्ष प्रतिष्ठा / समतुल्य कुलीन हैसियत !

प्रथम दृष्टया यह आख्यान, बहुश्रुत प्रेत कथाओं जैसा लगता है, जिसमें नवविवाहित दम्पत्ति अपनी, अतृप्त कामनाओं के साथ अशरीरी रूप से, आज भी इस भौतिक जगत में भटकते फिरते हैं ! अतृप्त जागतिक इच्छाओं वाली, दिवंगत देहों की आत्माओं की भटकन की कथाएं, कमोबेश पूरी दुनिया में ऐसे ही कही सुनी जाती हैं जैसे कि इस कथा में, नायक प्रदत्त, उपहार पशुसुफैद घोड़ा, अकाल काल कवलित नायिका की भटकन का प्रतीक बन गया है ! इस कथा को बांचते समय हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आरंभिक समाजों से लेकर आज तक के समाजों में, प्रणय संगिनी चुनने की प्रक्रिया में असफल पुरुष अक्सर हिंसक पशु जैसा व्यवहार करने लगता है जैसा कि इस कथा में सिओक्स मुखिया...जोड़ा चुनने में असफल होते ही वधिक / हत्यारा हो गया, उसमें इतना भी विवेक शेष नहीं रहा कि उसे, सुकन्या का प्रणय समर्थन प्राप्त नहीं है और प्रतिस्पर्धी मुखिया द्वारा चुकाए गये वधु मूल्य की अलभ्यता, उसकी अपनी तुलनात्मक पराजय है / अक्षमता है !  

मुमकिन है कि सुफैद घोड़ा प्रणय प्रतीक हो, निश्छल, पवित्र, निष्कलंक प्रेम का...अथवा अपने स्वामी की यौन आकांक्षाओं के अतृप्त रह जाने का...   
  

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

उल्लू

शताब्दियों पहले की बात है जब एक उल्लू अपनी पत्नि और बच्चों के साथ मूल अमेरिकन इन्डियंस के एक गांव में रहता था ! लेकिन वो जब भी शिकार के लिये जाता, उसे हिरण का शिकार नहीं मिलता...इस कारण से उसके पूरे परिवार को बलूत के बीजों को खाकर गुज़ारा करना पड़ता ! उसके परिजन भुखमरी का शिकार होने लगे थे ! एक रात उसकी पत्नि ने ये महसूस किया कि उल्लू घर के शेष सदस्यों जैसा दुर्भिक्ष पीड़ित / सूखा दिखाई नहीं देता, सो उसने सोने का नाटक करते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं !

पत्नि को सोता हुआ समझ कर उल्लू उठा और पत्थर के नीचे छिपा कर रखे गये मांस के टुकड़े को निकाल कर खा गया ! उसकी पत्नि ने सोने का अभिनय करते हुए यह सब देखा ! अगली बार जैसे ही उल्लू शिकार के लिये घर से बाहर निकला, उसकी पत्नि ने मांस छिपाने की जगह से मांस निकाला और बच्चों के साथ ही साथ खुद भी खा लिया ! बच्चों को खाने से ताकत मिली और वे खेलने के लिये बाहर चले गये ! जब उल्लू घर वापस आया तो बच्चों को बाहर खेलते देख कर बहुत नाराज हुआ ! वो पत्नि पर चिल्लाया !

लेकिन पत्नि उससे ज़रा सा भी भयभीत नहीं थी, उसने कहा, मैंने मांस पा लिया है जोकि तुमने छिपाया था ! तुमने अपने ही बच्चों को भूख से मरता हुआ छोड़ दिया था ! इसलिए मैं तुम्हें घर से बाहर निकाल रही हूं, तुम स्वयं ही यहां से चले जाओ वर्ना मैं अपने भाइयों को बुलाऊंगी ! उल्लू वहां से चला गया...उसी दिन से वो, मनुष्यों के निकट नहीं रहता ! अंधेरे में रहता और खाता है !

कथा का खलनायक पति, वास्तव में उल्लू नहीं है बल्कि उसे अपने पारिवारिक दायित्वों से विमुख बने रहने, निजहित केंद्रित / स्वार्थी होने के कारण से उल्लू कह कर संबोधित किया गया प्रतीत होता है, इस तथ्य कि पुष्टि, कथा में मौजूद इस संकेत से भी की जा सकती है कि वो हिरण के शिकार की सामर्थ्य रखता था जोकि उसे कथित रूप से मिलता ही नहीं था ! बहरहाल इस आख्यान को मोटे तौर पर सपाट बयान आख्यान के तौर चिन्हित किया जा सकता है ! एक पत्नि की अपेक्षाओं के प्रति उदासीन और उसके शिशुओं के पालन पोषण के दायित्वों से विमुख पति के गृह निषेध का परिणाम अनपेक्षित नहीं है !

महत्वपूर्ण उल्लेख यह कि पति के रंगे हाथों पकड़े जाने के समय, पत्नि, सजा की उद्घोषणा के समय, सजा को लागू करने की प्रतिबद्धता इस कथन के साथ स्पष्ट करती है कि सजा को स्वीकार करने में पति की आनाकानी की स्थिति में वो अपने भाइयों की सहायता लेगी, स्पष्टतः प्रत्येक समाज की तरह से यहां भी सम्बन्धियों के हस्तक्षेप की संभावना मुखर बनी हुई है ! परिवार / समाज बहिष्कृत व्यक्ति के मनुष्यों से दूर, अंधेरे में बने रहने और खाने का उल्लेख सांकेतिक है, कहने का आशय यह कि पति अपने अपराध के लिये दिन के उजाले में मुंह दिखाने योग्य नहीं है !  

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

बाज़ के पंख

तब एक बूढ़ा, एक युवा और उसकी दो पत्नियां, साथ में रहते थे ! युवा को अपने तीरों के लिये पंखों की ज़रूरत थी, उसे पता था कि दूर. ऊंचे पेड़ पर बाज़ का घोंसला हैं, वो वहां गया और पंख इकठ्ठा करने की गरज़ से पेड़ पर चढ़ने लगा, चूंकि बूढ़ा, युवा के प्रति जलन का भाव रखता था इसलिए उसने जादू से, पेड़ को बहुत ऊंचा कर दिया और पेड़ की छाल भी निकाल दी, जिसके कारण से पेड़ का तना बेहद चिकना हो गया ! युवा उस समय नग्न था अतः फिसलन भरे तने से होकर नीचे उतरना, उसके लिये असंभव हो गया था ! विवशतावश वो पेड़ के ऊपरी हिस्से में बना रहा और रात में अपने घर वापस नहीं लौट सका!उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठा कर बूढ़े ने युवा की पत्नियों से कहा, हमें ये घर छोड़कर, कहीं और जाना होगा ! अगली सुबह वे सभी घर छोड़ कर निकल पड़े ! युवा की पत्नियों में से एक संतानहीन थी और उसे, बूढ़े का कहना मानने में कोई संकोच नहीं था किन्तु दूसरी पत्नि अपने शिशु को लेकर बूढ़े के साथ जाने के लिये तत्पर नहीं थी, खास कर तब, जबकि उसका पति पीछे छूट रहा हो !

अगली रात, दूसरी पत्नि ने बूढ़े से कुछ दूरी पर कैम्प बनाया और अलाव जलाकर अपने शिशु के साथ रुक गई जबकि निःसंतान पत्नि ने बूढ़े के साथ रात बिताई, अगले कई दिन और रात ऐसा ही होता रहा,इस दौरान युवा पेड़ के ऊपर ही अटका रहा ! उसके पास कपड़े नहीं थे इसलिए ठण्ड से बचने के लिये उसने अपने लंबे बालों से अपना तन ढांक लिया था, यही नहीं, उसने बाज़ के पंखों को भी अपने बालों में जहां तहां खोंस लिया था ताकि बालों और पंखों से, उसे कम्बल के जैसी सुरक्षा मिल जाए ! जिन छोटी चिड़ियों ने आस पास के पेड़ों की टहनियों पर घोंसले बनाए हुए थे, उन्होंने बहुत कोशिश की, कि युवा जैसे तैसे पेड़ के नीचे उतर सके पर...उनकी मदद युवा के किसी काम नहीं आई और वो बदस्तूर पेड़ पर अटका रहा ! अंततः एक दिन एक बूढ़ी स्त्री अपने दोनों हाथों में नुकीली छड़ी लिये हुए पेड़ के नीचे आई और पेड़ पर चढ़ने लगी ! वो युवक तक पहुंची और फिर मकड़ी में तब्दील हो गई, उसने ऊपर से नीचे तक जाल बुना, जिसकी सहायता से युवा धरती पर उतरने में सफल हुआ !

जब वो अपने घर पहुंचा तो उसने देखा कि घर उजाड़ पड़ा हुआ है, वहां उसे कुछ पद चिन्ह दिखाई दिये, जिनका पीछा करते हुए वो कई दिनों तक चलता रहा और फिर उसे अपनी दूसरी पत्नि और पुत्र दिखाई दिये ! बच्चा चिल्लाया, मेरे पिता, युवती ने कहा, लेकिन वो तो मर चुके हैं...तब तक युवा उनके निकट पहुंच चुका था ! पत्नि ने पति से पूरा अहवाल कहा ! उसने कहा कि बूढ़ा हम दोनों स्त्रियों को अपने साथ ले जाना चाहता था किन्तु मैं उसके साथ जाने के लिये इच्छुक नहीं थी इसलिए अलग ठहरी हुई हूं जबकि आपकी पहली पत्नि उस बूढ़े के साथ अगले कैम्प में ठहरी हुई है ! इसके बाद वो अपने पति को बड़ी सी टोकरी में छिपा कर बूढ़े के कैम्प तक पहुंची और उसने टोकरी अलाव के पास रख दी, जिसे बूढ़े ने हटा कर दूर रख दिया लेकिन वो, उसे फिर से अलाव के पास ले आई ! युवक तेजी से बाहर निकला और उसने बूढ़े तथा धोखेबाज़ पत्नि की हत्या कर दी, फिर अपनी सच्ची और अच्छी पत्नि के साथ शिशु को लेकर पुराने घर लौट आया, जहां वे सभी लंबे समय तक, सुखपूर्वक रहे !

इस आख्यान को बांचने से यह तो स्पष्ट नहीं होता कि बूढ़े और युवा के मध्य कोई रक्त सम्बन्ध था लेकिन उनके दरम्यान मौजूद किसी ना किसी प्रकार की स्वजनता की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे दोनों एक साथ रहते थे ! उस युवा की दो पत्नियां थीं, जिनमे से एक निःसंतान थी जबकि बूढ़ा संभवतः परित्यक्त अथवा विधुर रहा होगा ! कथा संकेत यह है कि बूढ़ा व्यक्ति, स्त्री सानिध्य / यौन सुख से वंचित व्यक्ति माना जाएगा, जिसमें अनिवार्य, नैसर्गिक, दैहिक लालसायें शेष रह गई हों, इसी प्रकार से दूसरी पत्नि, निःसंतान रह जाने के कारण कदाचित स्वयं को उपेक्षित / पति साहचर्य से वंचित मानने लगी हो ! स्पष्ट ये कि उस समूह में दो व्यक्ति, निश्चित रूप से ऐसे थे जिन्हें दाम्पत्य जीवन से बाहर का यौनाकर्षण प्रभावित कर सकता था, एक वो बूढ़ा, जो कि विधुर अथवा परित्यक्त था और दूसरी निःसंतान स्त्री ! ये अनुश्रुति प्रत्यक्षतः यौनाकर्षण की बात नहीं करती, किन्तु परिस्थितिजन्य साक्ष्य कहते हैं कि बूढ़े का अनुसरण करना पहली पत्नि की कर्तव्य पारायणता या बुज़ुर्ग के प्रति आदर की अभिव्यक्ति नहीं था बल्कि उन दोनों का साथ, एक प्रकार से वंचित द्वय का सहज गठबंधन था !

कथा मोटे तौर पर यह घोषित करती है कि युवक आखेटक था, उसे बेहतर शिकार के लिये अपने तीरों को दुरुस्त रखना ज़रुरी था इसलिए परिंदों के पंख उसकी पहली प्राथमिकता थे जबकि काम सुख वंचित बूढ़े को इस अवसर की तलाश थी कि युवा घर से बाहर जाए और सुरक्षित घर वापस ना लौट सके ! प्रतीकात्मक रूप से जादू का उल्लेख कर, पेड़ की ऊंचाई बढ़ाने और पेड़ के तने से छाल उतार देने का कथन संभव है कि पूर्णतः असत्य हो ! लेकिन यह भी संभव है कि वो युवा स्वयं ही अपने हथियार को अधुनातन / मारक / घातक और अचूक बनाए रखने की लालसा के अंतर्गत, बेहद ऊंचे पेड़ पर जैसे तैसे चढ़ तो गया हो पर उतरते समय उसका हौसला पस्त हो गया हो और उसने, उसी ऊंचाई पर सुस्ताने का निर्णय लिया हो या फिर बूढ़े ने उसे ऐसा करने के लिये प्रेरित किया हो ताकि वह रात में उसकी अनुपस्थिति का फायदा उठा कर, उसकी दोनों पत्नियों को लेकर किसी अपरिचित स्थान की ओर पलायन कर जाए और घर वापसी के बाद युवा उन्हें ढूंढ ना सके, हालांकि दूसरी पत्नि के असहयोगी रवैय्ये के कारण से बूढ़े की योजना निष्फल हो गई !

युवा की पहली पत्नि, बूढ़े व्यक्ति के लिये पुत्रवधु तुल्य थी, उनमें आयु का वैषम्य था पर...कामुकता, नैतिकता की चेरी नहीं होती, वे दोनों परस्पर असमान होकर भी देह सुख गठबंधन धर्मी माने जायेंगे ! कथा कहती है कि दैहिकता कभी भी, किसी भी जगह या समय में सामाजिकता के तट बंध तोड़ सकती है ! उसके लिये सामाजिक मूल्य / आदर्श मायने नहीं रखते ! यौनिकता से इतर, उजाड़ पड़े घर से मिले पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए पहली पत्नि और संतान से मिलन तथा व्यभिचार के आरोपियों / विश्वासघातियों को दण्डित करने के उपरान्त, युवा की घर वापसी की कहन में कोई नयापन नहीं है किन्तु पेड़ की ऊंचाई पर अटके हुए उस युवा की मददगार, नन्हीं चिड़ियों और मकड़ी के उल्लेख का सांकेतिक अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रकृति, यौन नैतिकता / देह शुचिता के पक्ष में खड़ी हुई है ! दिलचस्प बात ये है कि बूढ़ी स्त्री के हाथों में नुकीली छड़ियां थीं यानि कि बुनाई करने वाली तीलियों के समान या चिकने पेड़ में सहजता से चढ़ने के उपकरण जैसी कोई वस्तु !

झुक कर चलने वाली बूढ़ी स्त्री और मकड़ी का सांकेतिक साम्य अद्भुत है, बूढ़ी स्त्री के  हाथ की नुकीली छड़ियां, मकड़ी के नुकीले पंजों के जैसी ! कह नहीं सकते कि वो मकड़ी का जाला था या फिर बूढ़ी स्त्री के द्वारा फेंकी गई रस्सी / रेशे निर्मित कोई संरचना, जिसकी सहायता से युवा, पेड़ से नीचे उतर पाया हो ! यह भी संभव है कि नुकीली टहनियों और छाल के रेशों की मदद से चिकने पेड़ से उतरने का प्रतीकात्मक सुझाव, बूढ़ी स्त्री / मकड़ी के द्वारा उस युवा को दिया गया हो / मिला हो ! ...हो सकता है कि इस कहानी में बूढ़ी स्त्री का उल्लेख, विश्वासघाती बूढ़े के प्रतिकार स्वरुप / स्त्री मददगार बतौर किया गया हो ! विशेष कर समाज में अच्छे बुरे के काउंटर बैलेंस / संतुलन के दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर ! बहरहाल यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं है कि कथाकालीन समाज आखेटक समाज था और वहां पर बहु-विवाह / बहु-स्त्री गामिता प्रचलन में थे, जिसके पश्चातवर्ती प्रभाव / परिणाम, कहे गये आख्यान का मूल आधार बन गये हैं !  

सोमवार, 24 जुलाई 2017

असुर को पाताल लिखो !

उन दिनों दुनियां का सृजन एक द्वीप के रूप में किया गया था जो कि आकाश में तैरती रहती थी, तब उसमें आकाश मानुष सुख और शांति से रहा करते, उन्हें दुःख का बोध ही नहीं था ! वे ना तो जन्म लेते और ना ही उनकी मृत्यु हुआ करती ! बहरहाल एक दिन एक स्त्री को यह अनुभूति हुई कि वह जुड़वां बच्चों को जन्म देने वाली है, उसने ये बात अपने पति को बतलाई, जिसे सुनकर पति रोष से भर गया और उड़ते हुए द्वीप के मध्य स्थित उस पेड़ तक जा पहुंचा, जो सारे द्वीप को रौशन करता था, क्योंकि तब तक सूर्य का सृजन नहीं किया गया था ! पति ने पेड़ को बीच से फाड़ डाला और द्वीप के बीच-ओ-बीच एक बड़ा सा छेद कर दिया, जिज्ञासावश स्त्री ने उस छेद से नीचे झांका, तो उसे चारों ओर पानी ही पानी दिखाई दिया, इसी क्षण पति ने उसे पीछे से धक्का दिया तो वो नीचे पानी की ओर गिरने लगी !  

आकाश में तैरते उस द्वीप के बहुत नीचे मौजूद पानी में अनेकों जल जीव रहा करते थे ! जिसमें से दो परिंदों ने द्वीप से नीचे गिरती हुई स्त्री को देख लिया था, सो पानी में गिरने से पहले ही उन्होंने उसे लपक कर अपनी पीठ में रख लिया और अन्य जल जीवों तक पहुंचाया ! सारे जल जीव स्त्री की मदद करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने, पानी में गहरी डुबकी लगा कर तल से कीचड़ / मिट्टी निकालने का यत्न किया पर एक के बाद दूसरा, फिर तीसरा और फिर...फिर...फिर...वे सभी असफल रहे, अंततः एक मेढ़क ने गहरे तल की ओर डुबकी लगाई और जब वह वापस लौटा तो उसके मुंह में कीचड़ भरा हुआ था, जिसे जल जीवों द्वारा विशाल कछुवे की पीठ पर फैला दिया गया, इसके बाद कीचड़ खुद ब खुद बढ़ने लगा और उसने एक महाद्वीप जितना विस्तार पा लिया, फिर वो स्त्री इस नवनिर्मित भूमि पर चढ़ी और उसने हवा में धूलि कण बिखेर कर तारों की रचना की, यहां तक कि सूर्य और चंद्रमा की भी ! कुछ समय के बाद स्त्री ने जुड़वां पुत्रों को जन्म दिया !

उसने एक पुत्र का नाम अंकुर रखा जो कि सहृदय और सौम्य था जबकि दूसरे शिशु का नाम चकमक रखा जो कि पाषाण हृदय और ठन्डे स्वभाव वाला था ! दोनों बच्चे शीघ्र ही युवा हो गये और धरती को अपने सृजनशीलता / विनाश लीला से आबाद-ओ-बर्बाद करने लगे ! अंकुर अच्छे स्वभाव का था, सो उसने मनुष्यों के लिये उपयोगी पशु बनाये ! उसने दो दिशाओं में बहने वाली नदियां बनाईं और उनमें बिना कांटों वाली मछलियां डालीं और ऐसे पौधे / वनस्पतियां बनाईं जिन्हें मनुष्य आसानी से खा सकें ! अंकुर ने यह कार्य स्वयं किया बिना थके बिना कष्ट ! दूसरी तरफ चकमक ने अंकुर के सारे सृजन को तहस नहस कर दिया और मनुष्यों को दुःख देने वाली निर्मितियां कीं ! उसने नदियों को एक ही दिशा में बहने वाला बना दिया ! उसने मछलियों में कटीली हड्डियां डाल दीं और बेरियों / झाड़ियों में कांटे लगा डाले !

चकमक ने सर्दियां बनाई तो अंकुर ने सर्दियों में जान डाल दी ताकि वे आगे बढ़ें और वसंत ऋतु उनका स्थान ले सके ! चकमक ने राक्षस बनाये तो अंकुर ने उन्हें धरती के नीचे पाताल में धकेल दिया ! अंततः अंकुर और चकमक ने किसी एक के विजयी होने तक युद्ध करने का निर्णय लिया, दोनों ने लंबे समय तक भयंकर रण किया ! कोई किसी से कम नहीं था लेकिन विजय अंकुर की हुई, चूंकि चकमक भी देवता था सो उसे मारा जाना संभव नहीं था, इसलिए उसे भूमि के नीचे विशाल कछुवे की पीठ में जाकर रहने के लिये विवश किया गया ! कहते हैं कि उसका क्रोध अक्सर ज्वालामुखी के रूप में फूटता रहता है ! इरोक्योइज लोग जीव जंतुओं को अत्यंत आदर की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि अगर जीव जंतुओं ने स्त्री को गहरे पानी में डूबने से नहीं बचाया होता तो धरती का...और फिर धरती पर किसी भी तरह का, सृजन ही नहीं होता ! 
  
आख्यान में उल्लिखित, आकाश में तैरते द्वीप, जहां ना कोई जन्मता है और ना ही मृत्यु होती है, केवल सुख ही सुख मौजूद, दुःख की लेश मात्र भी अनुभूति नहीं !  सोचें तो इस आकाशीय दुनिया से, धरती की अग्रणी सभ्यताओं में मौजूद स्वर्ग की अवधारणा की प्रतीति होती है, जहां सब लोग अमर यानि कि देव तुल्य हैं ! बहरहाल स्वर्गलोक जैसे इस स्थान पर किसी देवी तुल्य स्त्री का गर्भवती हो जाना और उसके पति द्वारा रुष्ट होकर, पत्नि को अगाध जल में धकेल देने के दो प्रातीतिक अर्थ हो सकते हैं, एक यह कि उक्त युवती का गर्भवती हो जाना, देवताओं के अयोनिज होने की धारणा खंडन करता है और दूसरा सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह कि धरती सृजन की पूर्व निर्धारित योजना / लीला के अंतर्गत पत्नि को जानबूझ कर उस जलीय संरचना की ओर भेज दिया गया, जिसकी कोख से धरती का सृजन संभव था !

यह जानना रुचिकर है कि आकाश द्वीप में एक वृक्ष, रौशनी का स्रोत है जबकि सूरज और चांद, धरती की निर्मिति के उपरान्त, उसकी आवश्यकता के अनुसार सृजित किये जाना हैं ! कथा गहरे पानी में, अन्य जल जीवों की तुलना में मेढक के अधि-सामर्थ्य का बयान करती है और देवलोक से निष्कासित गर्भवती की प्राण रक्षा करने के आशय से, जल जीवों के दयावंत होने का कथन करती है और यह सन्देश भी देती है कि मनुष्यों को, जल जीवों की इस कृपा के लिये सदैव कृतज्ञ बने रहना चाहिए ! अतल जल से मेढ़क के मुंह भर कीचड़ का प्राप्य और फिर सभी जल जीवों द्वारा विशाल कछुवे की पीठ पर उस कीचड़ को बिखेर देने का कथन सांकेतिक है, अगर हम स्मरण करें, तो पाते है कि अन्य बड़ी और महान सभ्यताओं में भी धरती के, विशाल कछुवे की पीठ पर टिके होने के वृत्तान्त सहज उपलब्ध हैं !

यही नहीं देवताओं और असुरों के एक ही पिता की संतान होने के कथन भी सर्व सुलभ हैं, यदि इसे भारतीय सन्दर्भ में देखा जाये तो देवताओं और असुरों की मातायें परस्पर बहने थीं लेकिन पिता एक ही, ऋषि...देवतुल्य ! धरती, तारों और ब्रह्माण्ड की निर्मिति में पदार्थों की समरूपता के विवरण विज्ञान देता है , अगर इस अनुश्रुति को ध्यान से पढ़ा जाए तो हम पाते हैं कि गर्भवती स्त्री ने धूलि कणों को बिखेर कर चांद, तारों और सूरज की रचना की, प्रतीकात्मक रूप से धूल को ब्रह्मांडीय पिंडों के निर्मायक तत्व / पदार्थ के रूप में स्वीकार करना कठिन नहीं है, खासकर तब जब कि निरक्षर आदिवासी यह कथन कर रहे हों ! बहरहाल गर्भवती स्त्री के दो पुत्रों का देव और दानव के रूप में जन्म लेना सर्वथा सांकेतिक कथन है, जो मनुष्यों के अच्छे और बुरे होने, फिर सृजन और विनाश में लग जाने की प्रवृत्तियों का विवरण देते हैं !

अच्छी और बुरी / दैव और आसुरी शक्तियों के मध्य सतत संघर्ष धरती की सर्वकालिक गाथाओं में मौजूद अनिवार्य, आधार तत्व है, इन सभी गाथाओं का अंत, देव-तुल्य के धरती और देवलोक में बने रहने तथा पराजित आसुरी शक्तियों को पाताल लोक में धकेल दिये जाने, पर होता है, ठीक वैसे ही जैसे कि इस कथा के नायक अंकुर और खलनायक चकमक के युद्ध के बाद हुआ...    

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

स्त्रियों को भगवान भी...

चेरोकी कहते हैं कि जिस दिन ईश्वर ने प्रथम पुरुष का सृजन किया, उसी दिन, उसकी संगिनी का सृजन भी कर दिया, फिर...वो दोनों लंबे समय तक सुखपूर्वक, एक साथ रहे, हालांकि बाद में उनमें, झगड़े भी होने लगे ! एक दिन, पत्नि ने नाराज होकर पति का घर छोड़ दिया और पूर्व दिशा में, सूर्य की धरती की ओर चल पड़ी ! पत्नि त्यक्त, एकाकी और शोकाकुल पति, रूठी हुई पत्नि के पीछे पीछे चलने लगा, लेकिन वो...अनवरत आगे बढ़ती रही, उसने एक बार भी पीछे, मुड़कर नहीं देखा ! सृजनहारे / ईश्वर को दु:खी पति पर दया आ गयी, सो उसने पति से पूछा, क्या तुम अब भी अपनी पत्नि से नाराज हो ? पति ने कहा, नहीं, बिलकुल नहीं ! सृजनहारे ने फिर से पूछा, क्या तुम उसे वापस पाना चाहते हो ? पति ने बेताबी के साथ कहा, हां, ज़रूर !  

तब सृजनहारे ने, स्त्री के रास्ते के दोनों ओर हकलबेरीज की शानदार फसल उगा दी, पर वो हकलबेरीज की तरफ ध्यान दिये बगैर आगे बढ़ गयी, फिर सृजनहारे ने ब्लेकबेरीज की फसलें उगाई, लेकिन स्त्री ने उन पर भी ध्यान नहीं दिया ! स्त्री को आकर्षित करने के लिये सृजनहारा, एक से बढ़ कर एक फलों वाले दरख़्त उगाता गया, यहां तक कि उसने खूबसूरत सुर्ख बेरियों से लदे फंदे झाड़ीनुमा दरख़्त भी लगाये पर...स्त्री इन सब को देखे बिना आगे बढ़ती गयी ! अचानक स्त्री ने अपने सामने स्ट्रॉबेरीज की लहलहाती फसल देखी, पहली बार, वो रुक गयी ! उसने कुछ स्ट्रॉबेरीज खाईं और फिर कुछ स्ट्रॉबेरीज तोड़ते हुए, उसका मुंह पश्चिम दिशा की ओर घूम गया...उसे अपने पति का ख्याल आया !

वो वहीं बैठ गयी, उसे आगे बढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई ! उस जगह, बैठे बैठे, पति के साहचर्य के लिये, उसकी अभिलाषा  बलवती ‍‌‌‌होती गयी, अंततः उसने पति की खातिर स्ट्रॉबेरीज के कुछ बेहतरीन गुच्छे तोड़े और वापस चल पड़ी घर की ओर ! पति लगभग सामने ही था, वो उससे मिला विनम्रता के साथ, प्रेमपूर्वक जैसे कि उनमें कोई झगड़ा हुआ ही नहीं था और फिर वे दोनों एक साथ बढ़ चले, अपने घर की ओर...   

वर्तमान समय में पति और पत्नि के संबंधों में प्रेम और झगड़े के सह अस्तित्व जैसी ये गाथा, सृष्टि के प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री के मध्य भी ठीक ऐसे ही संबंधों का बयान करती है, यानि कि प्रेम, सुख, झगड़े और फिर मान मनौव्वल ! संबंधों की स्थायी टूट का कथन इस अनुश्रुति में नहीं मिलता, जिससे प्रतीत होता है कि कथाकालीन समाज में स्त्रियों और पुरुषों के मध्य असहमतियां अथवा झगड़े होने के बाद पारस्परिक संवाद / पुनर्विचार, तदुपरांत एकात्म हो जाना, अनिवार्य सामुदायिक मान्यता रही होगी तथा स्थाई अलगाव को निषिद्ध माना गया होगा ! यह भी संभव है कि संबंधों की टूट को हतोत्साहित करने की गरज से आख्यान में ईश्वरीय हस्तक्षेप का कथन, सायास जोड़ा गया होगा !

आख्यान में नवदम्पत्ति के लंबे समय तक सुखपूर्वक साथ रहने और फिर सतत असहमत हो कर, परस्पर झगड़ने का उल्लेख किया गया है, जिसके कारण पत्नि, पति का घर त्याग देती है, यानि कि यह पुरुष प्रधान समाज था, जहां संपत्ति / घर पति का था ! उस दिन पति और पत्नि के झगड़े के दौरान पत्नि आहत (मनः) हुई, फिर उसने अपना गार्हस्थ्य जीवन त्यागने का निर्णय ले लिया और पूर्व दिशा स्थित कथित सूर्य देश की ओर चल पड़ी ! वो दु:खी / कुपित, इतनी कि, पीछे मुड़कर भी नहीं देखती ! बहरहाल पति अपने जीवन में पत्नि की अनुपस्थिति और उसके साहचर्य के मोल को समझ, पत्नि के पीछे पीछे चलने लगता है ! निःसंदेह ये उसका अपराध बोध है कि, वो दौड़ कर, पत्नि को रोक नहीं पाता या कि आवाज देकर वापस बुलाने का हौसला नहीं जुटा पाता !

संभवतः पति के ग्लानि बोध को महसूस कर ईश्वर उसकी सहायता करना चाहता है, लेकिन सहायता से पूर्व, वो अपनी दया अनुभूति की पुष्टि के लिये पति से सवाल पूछता है ! आख्यान में उदास पति के मददगार ईश्वर का चित्रण एक नौसिखिये के जैसा है जो कि यह भी नहीं जानता / समझता / बूझता कि उसके ही द्वारा रची गई प्रथम स्त्री के मान मनौव्वल के लिये प्रथम उपहार क्या होना चाहिए ? कहन ये कि सृजनहार होकर भी, रूठी स्त्री के मन से, ईश्वर के, अपरिचय का हाल ये है कि वो तरह तरह के वानस्पतिक टोटकों को आजमाता रहता है और अन्ततोगत्वा उसका एक तुक्का निशाने पर लग भी जाता है !

इस कथा को बांचते हुए, प्रतीत ये होता है कि ईश्वर चाहता है कि, रूठी हुई पत्नियों को उपहार देकर, विनम्रता से पेश आकर तथा सफल सुफल दाम्पत्य संबंधों के लिये पत्नियों के प्रति, कृतज्ञता ज्ञापित करने का दायित्व पतियों का है !


रविवार, 9 जुलाई 2017

तुलुगाक

आदिम समय, जब धरती पर केवल अन्धकार था, यहां तक कि आलोक की नन्हीं सी किरण भी नहीं, तब अलास्का के सुदूर समुद्र तट पर एक युवती अपने पिता के साथ रहती थी ! एक दिन वो पानी लाने के लिये अपने घर से बाहर निकली और जलीय अंतर्धारा के ऊपर जमी हुई बर्फ को खुरचने लगी, तभी उसने देखा कि अंतर्धारा में, एक पंख उसकी ओर बहता आ रहा था ! उसने अपना मुंह खोला तो वह पंख उसके मुंह में आ गया जिसे वह निगल गयी और...परिणाम ये हुआ कि वो उसी समय गर्भवती हो गई ! शिशु जन्म के लिये निर्धारित काल के उपरान्त उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका मुंह काले कौव्वे की चोंच के जैसा था, शिशु की मुखाकृति को ध्यान में रखकर, शिशु का नाम तुलुगाक रखा गया !

युवती के समक्ष संकट यह था कि अन्धकार के कारण उसे अपने शिशु के लिये खिलौने ढूंढने में कठिनाई होती थी ! उन दिनों, घर की दीवार में लटकी हुई एक थैली, अक्सर हवा में लहराती रहती, जोकि तुलुगाक के आकर्षण का केन्द्र बन गयी थी ! थैली, पिता की थी, सो युवती उसे, तुलुगाक को नहीं देना चाहती थी, लेकिन तुलुगाक हमेशा थैली की ओर इशारा करके, उसे पाना चाहता था ! थैली को पाने के लिये वह क्रंदन करता रहता, अंततः थक हार कर युवती ने थैली तुलुगाक को सौंप दी, जिससे खेलते हुए तुलुगाक ने उस थैली को फाड़ दिया ! थैली के फटते ही आलोक की किरणे फूटीं ! कहते हैं कि तब ही से ये जग आलोकित हुआ, अब धरती पर अन्धकार के साथ आलोक भी था !

घर लौटने पर युवती के पिता ने अपनी पुत्री को फटकार लगाई कि उसने थैली उतार कर शिशु को क्यों दी ? पर अब तक देर चुकी थी और जग आलोकित होते ही तुलुगाक अंतर्ध्यान हो गया...!

इन्युइट आदिवासियों की ये लोक कथा धरती पर उजियारे के प्रकट होने का कथन, ईश्वरीयता के आवरण में लपेट, कर करती है ! आख्यान में पिता, पुत्री, हिमाच्छादित अलास्का, हिमनद, एक घर और उसकी दीवार पर लहराते थैले, निर्जन समुद्र तट और असीम अंधकार और काले कौव्वे रूपी तुलुगाक के अतिरिक्त अन्य किसी चरित्र अथवा मनुष्य की प्रारम्भिक उपस्थिति का उल्लेख नहीं किया गया है, कदाचित पुत्री, पिता की एकमात्र संतान अथवा एकमात्र जीवित संतान रही हो और पिता, विधुर हो गया हो ? क्या यह समय धरती पर किसी क्षुद्र ग्रह के टकराने, तद्जनित अन्धकार और धरती के हिमाच्छादित होने जाने का समय था ? अन्यथा कही गयी कथा, उक्त समय के अनुभव पर आधारित जैसी क्यों प्रतीत होती है ?

जमी हुई बर्फ के नीचे बहते हुए पानी का उल्लेख अस्वाभाविक नहीं है ! बर्फ को खुरच कर पानी का  जुगाड़ करती युवती अंतर्धारा में बहते हुए पंख को देखती है और उसे निगल भी लेती है, पंख रेवेन यानि कि काले कौव्वे का है जोकि आदिम और पाश्चात्य कथाओं में अधिप्राकृतिक शक्तियों के स्वामी के रूप में वर्णित है ! बहरहाल काले कौव्वे के पंख को निगल कर गर्भवती हो जाने का कथन यह संकेत देता है कि काला कौव्वा अंधकार में पहले से ही मौजूद आलोक को प्रकटित करने के लिये अवतरित हुआ और आलोक के प्रकट होते ही अंतर्ध्यान हो गया ! तुलुगाक का जन्म लक्ष्याधारित था अतः लक्ष्य  प्राप्ति के उपरान्त अंतर्ध्यान हो जाना, अन्य अवतार कथाओं, अवतारों और उनकी लीलाओं के जैसा है !  

पारलौकिक शक्तियों के धरती पर आने, अवतरित हो जाने के दृष्टान्तों में हम अक्सर युग्म के शारीरिक समागम को अनिवार्य नहीं मानते, सो छू लेने, देख लेने अथवा पंख के निगल लेने से युवती के गर्भवती हो जाने का कथन हमें आश्चर्य में नहीं डालता ! उल्लेखनीय यह कि कुंती और मरियम की तरह से इन्युइट युवती भी कुमारी / अविवाहित है जबकि कोई पारलौकिक शक्ति उसके गर्भवती होने का कारण बन जाती है ! बहरहाल इन तीनों प्रकरणों में चुनी गई युवतियों ने पुत्र / पुत्रों को ही जन्म दिया ! कहन संकेत ये कि पुरुष की सत्ता वाले समाजों में पुरुष के अवतार लेने के कथन बहुतायत से मिलते हैं ! अवतारी पुरुष शिशु काले कौव्वे ने काले अंधियारे समय में, अन्य पुरुष के स्वामित्व वाले थैले में बंदी उजियारे को मुक्त किया !     

                   

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

जुगनू...!

वो युवक मात्सू का रहने वाला था और उस रात एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के बाद अपने घर वापस लौट रहा था ! उसने देखा कि एक जुगनू उसके घर के एन सामने थिरक रहा है ! वो एक पल को ठहर सा गया ! बेहद सर्दीली / हिमवत , इस रात में एक कीट को , इस तरह से उड़ते देखकर उसे बेहद हैरानी हुई ! वो ध्यानमग्न होकर इस बारे में सोच ही रहा था कि जुगनू उड़कर उसकी ओर आने लगा ! जुगनू को अपने पास आते देखकर युवक ने उसपर छड़ी से प्रहार किया तो जुगनू उड़कर दूर , युवक के घर से सटे हुए बागीचे में दाखिल हो गया ! अगले दिन युवक अपने पड़ोसी के घर गया ! 

जहां वो अपनी पिछली रात के अनुभव के बारे में बात करना चाहता था , तभी पड़ोसी की बड़ी पुत्री वहां आई और उसने कहा कि , मुझे अभी अभी एक पल को तुम्हारा ख्याल आया , जबकि मुझे पता नहीं था कि तुम यहाँ आये हुए हो ! मैंने कल रात एक ख्वाब देखा कि मैं एक जुगनू बन गई हूं ! ये सब एक हकीकत जैसा और बेहद खूबसूरत था ! मैं इधर उधर उड़ रही थी , तभी मैंने तुम्हें देखा और तुम्हारे करीब आने लगी ! मैं तुम्हें बताना चाहती थी कि मैंने उड़ना सीख लिया है ! लेकिन तुमने मुझे अपनी छड़ी से मारना चाहा ! मुझे यह घटना अब तक भयाक्रांत कर रही है ! मंगेतर के मुंह से यह वाकया सुनकर युवक को तसल्ली हुई ! 

जापान के इस लोक आख्यान से , पड़ोस में रह रहे तथा परस्पर मंगनी कर चुके , एक युवा जोड़े के भावनात्मक खुरदरेपन और मृदुता का अंतर स्पष्ट परिलक्षित होता है ! कथा की नायिका जुगनू के सांकेतिक आशय में स्वयं आलोकित हो चुकी है , उसके अनुभवों का विस्तार हुआ है , सो उसने उड़ना भी सीख लिया है ! उस युवती के बोध / उसके संज्ञान और उड़ान के लिए हासिल उसकी नव-दक्षता के आलोक में , बेहद सर्दीली / हिमवत रात के विरुद्ध उड़ते फिरने का रहने का उसका हौसला, गज़ब के प्रतीकात्मक अर्थ लिए हुए है ! रात के अन्धकार के विरुद्ध जुगनू जैसी वो , गोया अज्ञान के विरुद्ध ज्ञान की आभा , एक किरण ! 

सर्द और ठिठुरन भरे माहौल में वो , आकाश को नापने / लांघने के अपने कौशल का परिचय अपने मंगेतर से कराना चाहती है ! उसका स्वप्न , उसके अवचेतन की थाथी है , जहां वो अपने भावी जीवन साथी को अपने अनुभवों में शामिल करना चाहती है ! उसका प्रयास सोचा समझा और जीते जागते का गणित नहीं है ! यहाँ कोई अवसरवाद नहीं है ! वो अपने अवचेतन से ही अपने भावी जीवन साथी की सहभागिता / हिस्सेदारी के लिए संकल्पित है ! उसके अंतर में अपने बोधत्व बनाम नव-स्वजन यानि कि आगत के जोड़ीदार को लेकर कोई दुराव छुपाव के संकेत नहीं हैं !

अपनी मंगेतर के बर-अक्स वो युवा एक साधारण से कीट के प्रति भी निर्मम हो उठता है , जबकि वो स्वयं भी हैरान था कि हिमवत रात में एक नन्हा सा जुगनू उसके घर के सामने कैसे थिरक रहा है ? वह एक सुखद आयोजन में शामिल होकर वापस लौटा है और अपने निकट आते लघु कीट पर बे-झिझक छड़ी से प्रहार करता है जोकि उस नन्हें की मृत्यु का कारण भी बन सकती थी ! वो अपनी मंगेतर के घर उस घटना का विवरण देने जाता है , जिसमें उसकी अपनी निर्ममता के संकेत निहित है ! एक क्षुद्र कोमल काया के विरुद्ध वो युवक और उसकी हत्यारी छड़ी , उसके अंतर की कठोरता की प्रतीति कराते हैं ...जबकि उसकी तसल्ली कुछ नये सवाल छोड़ जाती है !


[ बेशक,यह आख्यान, पिछली शताब्दियों में पुरुष और स्त्रियों के व्यक्तित्व / मानस में मौजूद आधारभूत तत्वों / लक्षणों की कलई खोलता है ! तो क्या आज के सामाजिक हालात बदल गये हैं ? ]