वो दोनों गहरे दोस्त थे किन्तु उन दोनों को दुःख यह था कि उन्होंने
कभी गोदना नहीं गुदवाया था ! उन्हें लगता था कि वे अपने अन्य दोस्तों की तुलना मे
खूबसूरत नहीं हैं ! एक दिन उन दोनों ने तय किया कि वे एक दूसरे को गोदना गोदेंगे,
सो उनमें से एक युवक ने दूसरे युवक के सीने, पीठ, हाथों, पैरों, यहां तक कि चेहरे
पर भी गोदना गोद दिया ! अपना काम / अंकन पूरा होते ही उसने खाना बनाने के बर्तन के
निचले तल से कालिख निकाल कर, गोदने के सभी निशानों पर लगा / मल दी, इस तरह से उसके
दोस्त की गोदना गुदाई का काम अच्छी तरह से पूरा हुआ !
इसके बाद, पहले दोस्त ने दूसरे से कहा कि गोदना गुदवाने के बाद, तुम
बहुत खूबसूरत दिख रहे हो, इसलिए अब तुम्हारी बारी है कि तुम मेरे शरीर पर गोदना
गोदने का काम जल्द से जल्द पूरा करो, लेकिन, इससे पहले कि वो कुछ समझ पाता, उसके
दोस्त ने बर्तन के तल से ढेर सारी कालिख लेकर, उसके सिर से लेकर पैर तक मल / पोत
दी, जिसके कारण से पहला दोस्त बेहद काला और चिकनाई युक्त दिखने लगा ! उसे अपनी
कालिमामय हालत को देखकर बहुत गुस्सा आया और उसने चिल्ला कर कहा, मैंने तुम्हे
कितनी सावधानी के साथ गोदा था और तुमने मेरे साथ ऐसा दुर्व्यवहार किया !
वो दोनों आपस में लड़ने लगे, लेकिन अचानक ही सुंदर गोदने वाला युवा
महाकाय छिपकली में बदल गया और...फिर छिपने के लिये लंबी / ऊंची घास के मैदान की ओर
भागा...जबकि कालिख पुते शरीर वाला युवक, कौव्वा बन कर गांव के ऊपर मंडराने लगा !
वैसे तो ये जनश्रुति, फिलीपींस से ताल्लुक रखती है पर...पूरी में दुनियां
गोदना, मनुष्यों की देहों के कैनवास पर सौन्दर्यात्मक अभिरुचियों की अभिव्यक्ति है,
हालांकि कई समाजों में इसके प्रचलन की पृष्ठभूमि में आध्यात्मिक / पारलौकिक कारण भी
उद्धृत किये जाते हैं ! यह जानना रुचिकर है कि चरम आदिम समुदायों से लेकर परम आधुनिक
समाजों में भी गोदना, बहुप्रचलित सौंदर्य प्रसाधन / अलंकरण / आभूषण और फैशन बतौर
अस्तित्वमान है ! साधारण, निर्धन लोगों से लेकर ख्यातिनाम तथा धन धान्य से
परिपूर्ण लोग भी गोदने के आकर्षण से बच नहीं पाते !
समाज विज्ञानियों ने गोदने को लेकर अनगिनत अध्ययन किये हैं, जिनका उल्लेख
इस आख्यान की व्याख्या के लिये कतई आवश्यक नहीं है, फिर भी ये जान लेना ज़रुरी है कि
मिस्र में पाई गई, स्त्रियों की ममियों में गोदने के चिन्ह मिले हैं जोकि उनके शरीर
के विभिन्न अंगों...यहां तक कि जांघों के ऊपरी हिस्सों पर अंकित किये गये थे, वे
संभवतः वेश्याएं थी, याकि राज नर्तकियाँ अथवा काम व्याधि से ग्रस्त स्त्रियां रही
होंगी, जिनकी पहचान गोदने के अलंकार से की जाती होगी ! काल गणना के अनुसार ये
ममियां 4000 ईसा पूर्व की हो सकती हैं !
इटालियन आस्ट्रियन सीमा पर 5200 ईसा पूर्व, जितने पुराने गोदने के संकेत तथा
पूर्व इंका सभ्यता में स्त्री ममी की खोपड़ी में गोदने के चिन्ह मिले ! ग्रीको रोमन
सभ्यता, चीन के हान राजवंश और जापान के कुलीन लोगों में गोदने का प्रचलन रहा है !पोलिनेशियाई लोग अपनी संस्कृति के प्रतीक गोदने में इस्तेमाल करते रहे हैं,
प्रशांत द्वीपीय आदिम कबीलों, खासकर ताहितियन समाज के लोगों में कूल्हों / शरीर के
पृष्ठभाग में गोदने का चिन्हांकन, विगत 12000 वर्षों से काम वयस्कता / बालिग़ होने बतौर स्वीकार
किया गया है, गौर तलब है कि ताहितियन शब्द टाटू से टैटू शब्द प्रचलन में आया जोकि
हमारे लिये गोदना नामित है !
न्यूजीलैंड के माओरी लोग अपने चेहरे पर गोदना गुदवाते हैं जबकि हवाई
द्वीप समूह के लोग अपनी जुबानों पर तीन डाट्स अंकित करवाते हैं ! हमारे अपने देश भारत
में भी गोदना आदिम जातीय समूहों के आकर्षण का केन्द्र बिंदु है, भले ही इसके कारण
अलग अलग हो सकते हैं ! योद्धा, साधारण जन, स्त्री, पुरुष, बूढ़े, बच्चे सब के सब गोदने
से अभिभूत...गोदने को लेकर काल खंड, स्थान का कोई भेद नहीं, हालांकि लैंगिक, आयु, व्यक्तिगत रूचि और व्यवसायगत कारणों से गोदने के अभिविन्यास अलग अलग हुआ करते
हैं ! बहरहाल हम इस फिलीपीनी आख्यान की व्याख्या की ओर वापस आते हैं !
कथा के अनुसार दो अभिन्न मित्र हैं, जिन्हें अन्य युवाओं की तुलना
में स्वयं के खूबसूरत नहीं होने का दुःख है ! उन्हें विश्वास है कि गोदना गुदवाने
से उनके दैहिक सौंदर्य की अभिवृद्धि होगी, इसलिए वे एक दूसरे को गोदना गोदने के
लिये सहमत होते हैं, यहां यह कहना कठिन है कि इस कार्य के लिये वे, सामान्यतः गांव
में मौजूद गोदना विशेषज्ञ के पास क्यों नहीं जाते ? क्या गांव में उनका कोई निषेध
था ? याकि उनके पास, गोदना विशेषज्ञ के कार्य के प्रतिसाद स्वरुप कोई राशि या वस्तु
नहीं थी ? बहरहाल कारण जो भी हो, वे दोनों एक दूसरे के सौंदर्य की श्रीवृद्धि के
लिये, परस्पर सहमत हुए थे !
उन दोनों मित्रों की कुंठा यह थी कि वे तुलनात्मक असौंदर्य के शिकार
हैं और उनके कुंठा मुक्त होने का सबसे बेहतर तरीका है, देह पर अलंकारिक अभिविन्यास
बतौर गोदने का अंकन ! यहां यह ध्यान देना होगा कि पहले मित्र ने दूसरे मित्र के
शरीर पर बड़ी ही सावधानी से गोदने का अंकन किया और कालिख रगड़ रगड़ कर उस अंकन को चमकदार
बना दिया ! कहन के मुताबिक उसने अपने काम
को बखूबी अंजाम दिया और अब उसकी अपेक्षा थी कि उसका मित्र भी, उसे गोदना गोद कर
सुंदर बना दे ! जनश्रुति के इसी मोड़ पर दूसरे युवा की मौलिक प्रवृत्ति उभर कर सामने आती
हैं...
जैसा कि हमने पहले ही कहा है कि गोदने का उद्देश्य, आध्यात्मिक या सौन्दर्यात्मक
अभिरुचियों को प्रकटित करना होता है, अब इस कथन में जोड़ ये कि सौन्दर्यात्मकता की
अभिव्यक्ति के बहुतायत हिस्से में कामुकता / विषम लिंगी आकर्षण प्रबल रूप में
विद्यमान हुआ करते हैं, सो माना यह जाए कि, भले ही दोनों मित्रों की मित्रता गहन थी और उनका दुःख एक समान था, असुंदर दिखना ! इसलिए यह कहना कठिन नहीं है कि मित्रों
की कुंठा की पृष्ठभूमि में यौन आकर्षण संबंधी प्रवृत्तियां भी शामिल हो सकती हैं यानि
कि असौंदर्यगत कारणों से युवतियों के साहचर्य से वंचित होने / बने रहने का अहसास !
कथा को पढ़ते हुए लगता यही है कि पहले युवक ने मित्रता का समुचित निर्वहन
किया, किन्तु गोदने के दैहिक आभूषण धारण करने के बाद, सुंदर / आकर्षक हो जाने के उपरान्त
दूसरे युवक की नीयत में खोट आ गया और उसने पहले युवक की देहयष्टि को कालिख पोत कर
असुंदर कर दिया ! उनकी मित्रता, सौन्दर्यात्मकता की बढ़त / अग्रता की बलि चढ़ गई !
आख्यान में दूसरे युवक का बड़ी छिपकली के रूप में, घास की ओट में, पलायन
प्रतीकात्मक है, जहां वह अपनी करनी / मित्रता से घात को छुपाना चाहता है, जबकि
कृष्णवर्ण कौव्वे का गांव / आबादी के ऊपर मंडराना पहले युवक की अतृप्त लालसाओं का द्योतक
है...