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सोमवार, 26 मई 2025

जीना और एतिबेन

जीना और एतिबेन मोपुंगचुकेट गांव में रहते थे।जीना,साधारण शक्ल-ओ-सूरत का युवा था जिसे कोटा-कोनी बजाने में महारत हासिल थी जबकि एतिबेन बेहद हसीन युवती थी। एक तरफ जीना बेहद गरीब  परिवार में जन्मा था और उसे अभावों में जीने की आदत पड़ चुकी थी,  दूसरी तरफ एतिबेन का जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ था और उसकी  खूबसूरती के चर्चे आस पास के गांव तक में, हुआ करते थे । अनेकों धन संपन्न घरानों के सुंदर युवा एतिबेन से विवाह करना चाहते थे लेकिन संयोग ऐसा बना कि एतिबेन,जीना के प्रेम मे मुब्तिला हो गई और उन दोनों ने एक साथ, जीने मरने की कसमें खाईं। वो दोनों पहाड़ों, नदी, तालाबों के आस पास छुप छुप कर मिला करते,जहां जीना, कोटा कोनी बजाता और एतिबेन अपने स्वर्ण आभूषणों को साफ किया करती थी। वक्त गुज़रा और ये प्रेम कथा पूरे गांव में आम हो गई। 

एतिबेन के समृद्ध परिजन इस रिश्ते से खुश नहीं थे । उन्होंने जीना से कहा अगर वो वधु मूल्य बतौर गाय और बैलों की व्यवस्था कर सकता हो, तो वो उससे, एतिबेन का विवाह कर सकते हैं अन्यथा ये रिश्ता उन्हें मंजूर नहीं है, चूंकि जीना बहुत गरीब था तो, वो वधु मूल्य की व्यवस्था नहीं कर पाया, नतीजतन एतिबेन के माता पिता इस रिश्ते के सख्त खिलाफ हो गए । इसी दौरान सुंगरात्सु गांव का तेन्यूर नाम का युवा एतिबेन से विवाह की लालसा लिए एतिबेन के माता पिता से मिला, वो अपने साथ अनेकों गायों और बैलों की व्यवस्था करके आया था अतः एतिबेन के माता पिता ने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी । अभिभावकों के फैसले से असहमत एतिबेन ने बीमार होने का अभिनय किया और भांति भांति के बहाने बनाए, लेकिन वो अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद तेन्यूर से अपना विवाह रोक नहीं पाई । 

एतिबेन के विवाह के तेन्यूर से विवाह के बावजूद दोनों प्रेमी छुप छुपा कर मिलने लगे, उन्होंने तय कर लिया था कि वे अपने प्रेम संबंध को बनाए रखेंगे । एतिबेन का पति तेन्यूर शक की बिना पर उन्हें अक्सर ढूंढता फिरता । वो एतिबेन को डांटता और जीना से नहीं मिलने की हिदायत देता रहता । एक दिन तेन्यूर ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया और गुस्से में एतिबेन को बुरी तरह से पीटा, इसके बाद घायल और बेहोश एतिबेन को खेत में छोड़ कर चल गया । जीना ने उसकी सेवा सुश्रुषा की लेकिन गहरी चोटों के कारणवश एतिबेन की मृत्यु हो गई इसके फौरन बाद प्रेमिका की जुदाई में शोकाकुल जीना ने भी दम तोड़ दिया । प्रेमी युगल ने मृत्यु से पूर्व एक दूसरे से वादा किया था कि वो पाताल लोक में दोबारा मिलेंगे । उन दोनों की अंतेष्टि के समय गांव वालों ने देखा कि दोनों चिताओं से धुवें की आकृति आसमान की तरफ उठ रही थी । यह आकृतियां एक दूसरे का हाथ इस तरह से थामी हुई थीं, कि जैसे, उनके प्रेम को हमेशा हमेशा के लिए जीवित रहना हो । 

वास्तव में ये कथा दुखांत प्रेम कथा है जो मृत्यु के उपरांत भी एक दूसरे का साथ देने की वचनबद्धता के प्रातीतिक संकेत पर समाप्त होती है उनकी अमर सहयात्रा को गांव वालों ने चिता से उठते धुवें के रूप में स्वीकार किया । धुवें के एक्य  पर गांव के लोग विस्मित थे । इस मिथक से कुछेक तथ्य स्पष्ट मुखरित होते हैं जैसे कि, प्रेमी जोड़ा नागालैंड के एक ही आदिवासी समुदाय से संबंधित था अतः उनके रिश्ते के सामने विजातीयता जैसी बाधा नहीं थी उनकी अमर सहयात्रा को अचंभित गांव वालों ने चिता से उठे धुवें के रूप में स्वीकार किया। उनमें अगर कोई भेद था तो वो विशुद्ध रूप से आर्थिक और दैहिक सौन्दर्य आधारित था । इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अन्य आदिवासी कबीलों की तरह से प्रेमी युवक को विवाह के लिए वधु मूल्य चुकाना प्रस्तावित था जिसमें वो अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के चलते असफल रहा और युवती के माता पिता ने इसी आधार पर प्रेम से विवाह तक की उनकी यात्रा पर पूर्णविराम लगा दिया यानि कि उक्त कबीले में वैवाहिक जीवन का प्रारंभ वधु मूल्य चुकाये बिना संभव नहीं था।

कालांतर मे एतिबेन के माता पिता को तेन्यूर मिला जो वधु मूल्य चुकाने मे पूर्णतः समर्थ और देह सुदर्शन युवक भी था अतः उसके विवाह प्रस्ताव को स्वीकार करने में युवती के माता पिता को ज़रा सी भी देर  नहीं लगी। युवती ने बहुविध चेष्टाओं से इस विवाह को टालने का यत्न किया किन्तु असफल रही और उसे तेन्यूर से विवाह करना ही पड़ा। अपने ही कबीले के धन सम्पन्न और सुदर्शन युवा से विवाह होने के बावजूद वो अपने प्रथम प्रेम से विमुख नहीं हुई और नायक जीना से छुप छुप कर मिलती रही । प्रथम प्रेम के लिए यह समर्पण अद्भुत है । आर्थिक भेदभाव के इतर लोक कथा कहती है कि जीना खूबसूरत युवा नहीं था किन्तु एतिबेन असाधारण सौन्दर्य की स्वामिनी थी ऐसे में उनके प्रेम का कोई निश्चित फार्मूला दिखाई नहीं देता । क्या जीना का कोटा कोनी बजाने में निष्णात होना इसका आधार हो सकता हैं ? हम साधिकार, कुछ कह नहीं सकते। निष्कर्ष शायद सांगीतिक दक्षता की हां या शायद ना हो ।

बहरहाल प्रेम कहीं भी, कभी भी घट सकता है जो वैवाहिक मान्यता प्राप्त पति के धन अथवा सौन्दर्य से बंध कर रहे ऐसा आवश्यक नहीं है। पति का संदेह प्रबल था और जैसे ही प्रेमलीनता उजागर हुई पति ने पत्नि को शारीरिक बलाधारित दंड दिया। पति का यह कृत्य निंदनीय माना जाएगा पर इसे उस पुरुष अथवा स्त्री का सहज स्वभाव भी माना जाए है , जोकि स्वयं को प्रेम में पराजित  / छला हुआ महसूस कर रहा हो । गंभीर चोटों से मृत हुई एतिबेन और प्रेमिका के वियोग में कदाचित, हृदयाघात से मृत जीना, मृत्यु पूर्व एक दूसरे को आश्वस्ति देते हैं कि वो दोनों सदैव एक दूसरे के साथ रहेंगे । कथा में दिलचस्प तथ्य यह कि मृत्यु के उपरांत उनका स्वर्गलोक वास्तव में पाताल लोक है । 

सोमवार, 19 अप्रैल 2021

तिसायक...

बरसों बरस देवी तिसायकयूसेमिते की खूबसूरत घाटी की अदृश्य संरक्षक बतौरलोक मानस में बहती फिरती । एक दिन उसने गांव में टूटोकनुला को देखासुंदर सुगठित देहयष्टि और लोक प्रिय युवाइसके बाद घाटी में तिसायक की आमद-ओ-रफ्त बढ़ गई ताकि वो टूटोकनुला को फिर, फिर देख पाये । एक दिन टूटोकनुला शिकार के लिए करीब के जंगल में गया था जहां उसनेपहली बार तिसायक को दरख्त के नीचे आराम करता हुआ पाया । अनिंद्य सौंदर्य की स्वामिनी तिसायक के सुनहले बाल और कमनीय काया देख कर टूटोकनुलाउसके इश्क में गिरफ्तार हो गया ।

हालांकि उसे महसूस हो गया था कि तिसायक ही यूसेमिते घाटी की संरक्षक देवी आत्मा है फिर भी उसनेतिसायक को उसके नाम से पुकाराउसे छूने की कोशिश कीइधर अपने अंतर की भावनाओं से भ्रमित तिसायक अंतर्ध्यान हो गई । हताश और निराश टूटोकनुला अगले कई दिनों तक तिसायक को ढूंढता रहा । उसमें दिल के टूटने की कसक थी सो वो, घाटी के लोगों को निराश छोड़ कर कहीं दूर देस चला गया । कुछ अरसे बाद तिसायकयूसेमिते लौटी तो हैरान रह गई, घाटी उजड़ चुकी थी । वो जान गई कि टूटोकनुलायूसेमिते छोड़ कर चला गया है और घाटी उसके बुद्धि कौशल से वंचित होकर बियाबान हो गई है ।

तिसायक निराशा में चिल्लाईअब उसेटूटोकनुला की तलाश थीउसने महा-पाषाण के ऊपर घुटनों के बल बैठ कर महान देवता से प्रार्थना कीवो चाहती थी कि घाटी एक बार फिर से हरियाये । तिसायक की प्रार्थना पर महान देवता को दया आ गईउन्होने घाटी के ऊपर अपना कृपा पूर्ण हाथ लहरायादेखते ही देखते दरख्त हरियाने लगेफूल खिलखिलाने लगेचिड़ियां चहकने लगींझरने बहने लगेझीलें मुस्कराईंखेतों में मक्के के भुट्टे अपने सुनहले केशों की आभा के साथ सीधे तन कर खड़े हो गयेयूसेमिते में एक बार फिर से जीवन पसर गया ।   

घाटी में तिसायक की वापसी की खबर पाकर टूटोकनुला वापस लौटा और पाषाण खंडों पर उस कथा को उकेरने लगा जबकि उसने अपनी पितृ-भूमि छोड़ी थीउसकी कामना थी कि पीढ़ियों तक घाटी उसे याद रखेकाम खत्म होने के बाद, उसने वर की तरह से परिधान पहने और महान देवता के झरने में जा पंहुचा ताकिअपनी प्यारी घाटी और स्वजनों को अलविदा कह सके । उसने देखा तिसायकझरने मेंजलधारा बन कर बह रही हैवो आनंदातिरेक में चिल्लाया और ऊपर से नीचे की ओर कूद पड़ा । अंततः उसने अपनी प्रियतमा को अपनी बांहों में भर लिया था ।

यूसेमिते में सबने देखाआसमान में दो इन्द्र धनुष बन गये थे । देवी तिसायक अपने साथ टूटोकनुला को ले गई सुदूर बादलों में और फिर सूरज डूब गया...

विवेचनाधीन आख्यान प्रथम दृष्टया, प्रणय की अनुभूति के प्रकटन से लेकर, उसकी अस्वीकार्यता, कदाचित संकोच / झिझक अथवा दैवीय अहम और अंततः स्वीकार्यता के घटनाक्रम के दरम्यान  झूलता दिखाई देता है । कथा लोक प्रिय देवी तिसायक की कमनीय काया, सुनहले बालों और अनिन्द्य सौन्दर्य के कथन से शुरू होती है जोकि, यूसेमिते घाटी की अदृश्य संरक्षक है । इस कथा को भारतीय सन्दर्भों में देखें / पढ़ें तो, तिसायक यानि कि एक अप्सरा, जो, स्वर्गलोक / देवलोक की निवासिनी है और इहलोक / भू-लोक की यूसेमिते घाटी पर मेहरबान है । यूसेमिते घाटी, तिसायक की कृपा से ख़ूबसूरत है । तिसायक, जो घाटी के जंगल में दरख्तों के नीचे आराम भी करती है ।   

तिसायक अप्सरा है, किन्तु गांव के युवा नायक टूटोकनुला की सुगठित देहयष्टि, उसकी बुद्धिमत्ता, लोक प्रियता और संभवतः जनप्रिय स्वभाव पर आसक्त है । वो नश्वर देह धारी / भूलोक वासी को देखने, घाटी में फिर फिर लौट आती है । आख्यान संकेत देता है कि टूटोकनुला शिकार के लिए जाता है, यानि कि कथा विवरण आखेटक युगीन समाज का है । अप्सरा तिसायक जानती है कि टूटोकनुला नश्वर देह धारी है किन्तु टूटोकनुला यह नहीं जानता कि वो अनजाने में ही जिस युवती पर अनुरक्त हो चुका है वो वास्तव में उसकी घाटी की संरक्षक देवी तिसायक है , उसने नायिका को छूने की कोशिश जोकि नश्वरता और अमरत्व के गठबंधन को लेकर भ्रमित थी, सो अंतर्ध्यान हुई ।            

अब तक टूटोकनुला जान चुका है कि वो अनजाने में ही सही, अपने लिए पारलौकिक नायिका का चयन कर बैठा है । वो नायिका को ढूंढता है और असफल रहता है । उसके लिए बिछोह का समय अत्यंत कष्टकर है । वो दु:खी है, संभव है उसमें, जीवनदायिनी यूसेमिते घाटी की संरक्षक देवी से प्रेम कर बैठने का अपराध बोध भी हो ? वो घाटी छोड़ देता है, अपने लोगों / अपने समाज से विमुख हो जाता है । घाटी के लोग निराश हैं, उनका नायक गुमशुदा है, घाटी, प्रेम को खो बैठी है और बियाबान हो गई है । कहना ये कि प्रेम के बिना नायक दु:खी, गांव के लोग दु:खी और घाटी उजाड़ है । उधर तिसायक, नश्वर देह युवा से प्रेम को लेकर भ्रमित है । बहरहाल वो अपनी वापसी के समय में, बिन प्रेम, उपजे शून्य को देख कर, निराश है ।

तिसायक को आगत जीवन के लिए समुचित निर्णय संकेत / भ्रम से मुक्ति के लिए महान देवता का आशीष चाहिये, वो घाटी को हरियाते हुए देखना चाहती है । जबकि टूटोकनुला की अनुपस्थिति, घाटी का उजाड़पन, उसका अपना किया धरा था ।  वो टूटोकनुला पर तबसे अनुरक्त थी, जबकि टूटोकनुला ने उसे देखा तक नहीं था । सो प्रेम और अप्रेम, दोनों ही, स्थितियां / पूर्णता और रिक्तियां, उसके अपने कृत्य का परिणाम थीं । वो देवी थी, उसकी जिम्मेदारियों के बोझ, टूटोकनुला से ज्यादा बड़े थे । अंततः वो पराजित प्रेमिका / निराश स्त्री के समान घुटनों के बल बैठ कर महान देवता से कृपा चाहती है ।  

आख्यान कहता है कि महान देवता प्रेम के लिए सुहृदय है, सो घाटी फिर से हरियाती है, वहां फूल खिलते हैं, चिड़ियां चहकती हैं और जीवन फिर से पसर जाता है । नायक टूटोकनुला के लिए, ये घाटी में, तिसायक की वापसी का संकेत है, इसलिए वो, पितृ भूमि में वापस लौट कर, भित्ति चित्रों / पाषाण खण्डों में स्वयं के पलायन के कारणों / आत्मकथा / इतिहास को दर्ज करता है । उसे अपने लोगों, पूर्वजों की घाटी से अंतिम विदा चाहिये, उसे, किसी और लोक / कदाचित भावी वधु तिसायक के लोक में जाने की कामना है । वो नये परिधान में सज धज कर महान देवता के झरने में, मृत्यु का आलिंगन करता है । मृत्यु के समय उसके चहुं दिश केवल और केवल तिसायक ही तिसायक है ।

फिर यूसेमिते के लोगों ने महान देवता के झरने के ऊपर दो इंद्र धनुष देखे और सूरज डूब गया...

रविवार, 18 अप्रैल 2021

ओहिया और लेहुआ...

पहले पहल वे एक नृत्य आयोजन में मिले और इक दूजे के हो गये । ओहिया ऊंची मजबूत कद काठी का खूबसूरत युवक था, जबकि लेहुआ, फूल सी नर्म-ओ-नाज़ुक जिसके सौंदर्य के चर्चे पूरे द्वीप में हुआ करते । वो अपने पिता की इकलौती संतान थी । लेहुआ ने अलाव के करीब ओहिया को देखा जो, उसके पिता से बात कर रहा था, शर्म से उसकी पलकें झुक गईं । उसी वक्त ओहिया की नज़र लेहुआ पर पड़ी और वो अवाक, उसे देखता रह गया । उन दोनों के दरम्यान अलाव था और पहली नज़र के आकर्षण की तपिश, बिखर बिखर, नये रिश्ते की बुनियाद डाल रही थी ।

लेहुआ के पिता ने ओहिया से बातचीत जारी रखने को कहा, सो वो लज्जित सा, टूट टूट गये, शब्दों में, अपनी बात को आगे बढ़ाने की कोशिश करने लगा, हालांकि वो, लेहुआ के चेहरे से अपनी निगाहें फेर ही नहीं पाया। लेहुआ के आश्चर्यचकित पिता, माजरा भांप गये और उन्होने ओहिया का औपचारिक परिचय, लेहुआ से करवाया क्योंकि वे खुद भी ओहिया को पसंद करते थे । बहरहाल उस वक्त, एक झिझक सी थी, सो, दोनों, आपस में बातचीत नहीं कर सके । कुछ अरसे बाद लेहुआ के पिता ने अपनी पुत्री को इजाजत दे दी कि वो, ओहिया को अपने साथ रख सकती है । ओहिया ने अपने हाथों, पत्नी के लिए इक घर बनाया और नवविवाहित युगल अगले कई महीनों तक आनंद पूर्वक वहां रहने लगा ।

और फिर एक दिन, जब देवी पेले, नवदंपत्ति के घर के करीब के जंगल से गुज़र रही थी, वहां उसने, ओहिया को देखा और मुग्ध हो गई, उसने बातचीत में उलझा कर ओहिया को अपनी खूबसूरती से प्रभवित करने की कोशिश की...हालांकि ओहिया, विनम्रतापूर्वक देवी पेले को जबाब देता रहा पर, देवी पेले के हुस्न-ओ-जमाल से अनासक्त बना रहा, तभी लेहुआ अपने पति के लिए दोपहर का खाना लेकर आ पहुंची, पत्नि को देखकर, ओहिया का उदासीन चेहरा खिल उठा । यह देख, देवी पेले, ईर्ष्या की अग्नि में जल उठी, उसने अपना मानवीय रूप त्याग दिया, वो आग के, आसमान छूते शोलों में तब्दील हो गई थी, उसने ओहिया को नीचे गिरा दिया और बेहद बदसूरत दरख्त में बदल दिया ।

हतप्रभ लेहुआ, देवी पेले के सामने घुटनों के बल झुक गई, उसका खूबसूरत चेहरा आंसुओं के सैलाब में डूबा जा रहा था, उसने देवी से याचना की, मेरे पति को फिर से इंसान बना दो या फिर मुझे भी बदसूरत दरख्त बना दो । उसने कहा मैं, अपने पति के बिना जीवित नहीं रह सकती । मगर देवी पेले, लेहुआ को अनदेखा करते, ऊंचे ठंडे पर्वत शिखरों की ओर चली गई,उसका बदला पूरा हो चुका था । महादेवता ने यह सब देखा, वो, देवी पेले की इस हरकत से बेहद खफा हुए, महादेवता स्वर्ग से धरती पर उतरे, जहां असहाय लेहुआ, धरती पर बिछ सी गई थी ।  महादेवता ने लेहुआ को खूबसूरत लाल फूल में बदल दिया और उसे ओहिया के दरख्त पर रख दिया ताकि प्रेमी युगल फिर कभी जुदा न हों ।

उस दिन से आज तक, ओहिया के दरख्त पर खूबसूरत लाल फूल खिलते हैं और जब तक फूल, दरख्त पर मुस्कराते रहते हैं, रूत, धूपदार और मौसम साफ, शफ़्फ़ाक बना रहता है, फिर जैसे ही फूल, दरख्त से टूटकर गिरते है, मौसम बदलता है, बारिश तेजतर होती जाती, पानी की बूंदें दरख्त की टहनियों को छूकर धरती पर यूं टपकती हैं,गोया लेहुआ,ओहिया से जुदाई बर्दाश्त न कर पा रही हो...

ये कथा पहले पहल प्रेम होने और फिर अभिभावक की सहमति से दाम्पत्य जीवन के आरम्भ तक जा पहुंचती है ओहिया ख़ूबसूरत और बलशाली कबीलाई / आदिवासी युवा है, उसकी भेंट, सौन्दर्यवती लेहुआ से किसी नृत्य आयोजन के समय हुई थी जहां लेहुआ के पिता से चर्चा करते हुए ओहिया का ध्यान लेहुआ पर जा अटका, उनके दरम्यान अलाव की तपिश सा रिश्ता पनप रहा था लेहुआ के पिता को इस रिश्ते से कोई एतराज ना था, इसलिए उन्होंने ओहिया के साथ अपनी पुत्री लेहुआ के दाम्पत्य जीवन को सहर्ष सम्मति दे दी ज़ाहिर है कि आख्यान अब तक इहलौकिक / धरती के, युवा प्रेमियों के पति पत्नि हो जाने का, बयान कर रहा था प्रेमी प्रेमिका से नव दंपत्ति बने युगल, जिनके पास अपना एक घर और साथ में गुज़ारने के लिए प्रेम से परिपूर्ण समय था

आगे की कथा में देवत्व का प्रवेश कुछ ऐसा है, जैसे कोई अभिशाप हो, जो नवदंपत्ति के सुख छीन लेने के लिए अवतरित हुआ हो हुआ यूं कि देवी पेले जंगल की रहगुज़र पर ओहिया को अपना दिल दे बैठती है  और उसे बहुविध अपने सौन्दर्य से प्रभावित करने की कोशिश करती है ओहिया विनम्र है और अपनी पत्नि लेहुआ के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित भी अतः वो देवी पेले के प्रति अनासक्त बना रहता है देवी पेले, लेहुआ के लिए ओहिया के प्रेम समर्पण को देखकर ईर्ष्यालु / दग्ध स्वभाव की हो जाती हैं आख्यान में इस बात को सांकेतिक रूप से आसमान छूते शोलों में तब्दील हो जाने का कथन किया गया है देवी पेले शक्ति सम्पन्न है और ईर्ष्यालु भी, उसे लेहुआ के सामने अपनी पराजय बर्दाश्त नहीं अतः वो ओहिया को बदसूरत दरख्त में बदल देती है और अपनी दैहिक, मनः दग्धता को शांत करने के लिए ऊंचे बर्फ़ीले पहाड़ों की ओर चली जाती है

कथा को ध्यान से पढ़ें तो, देवी पेले का व्यवहार एक सामान्य और दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य सा है, वो  अस्वीकृति के विरुद्ध अत्यंत असहिष्णु है और बदले की भावना रखती है, और अपने दैवीय गुणों को भूल कर लेहुआ की क्षमा याचना / प्रार्थना को अनदेखा करती है बहरहाल देवी पेले का ये व्यवहार महादेवता को पसंद नहीं आया और वो स्वयं धरती पर उतर कर लेहुआ की याचना का मान रखते हैं उन्होंने लेहुआ को खूबसूरत लाल फूल में बदल कर, ओहिया, लेहुआ के प्रणय संबंधों को अमरत्व प्रदान किया महादेवता की कृपा / अनुग्रह से, ओहिया की बांहों में लिपटी, लेहुआ आज भी मुस्कराती है...      

 

रविवार, 10 जून 2018

किन्नर -12


विश्व के अनेकों किन्नरों में से पीटर अबेलार्ड (सामान्य काल 1079-1142) इतिहास में बहुचर्चित नाम है । वो एक मशहूर तर्कशास्त्री और गणित का शिक्षक था । उसी समय शाही परिवार की कमसिन लड़की हेलोयिस को ट्यूटर की आवश्यकता थी सो हेलोयिस के चाचा ने पीटर अबेलार्ड को इस कार्य के लिये नियुक्त कर दिया । नव-उम्र हेलोयिस बेहद खूबसूरत थी और पीटर एक ज़हीन व्यक्ति, अध्ययन अध्यापन के दौरान दोनों को एक दूसरे को समझने का मौका मिला और दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये, अपनी ही शिष्या से रोमांस करते हुए अबेलार्ड ने, ना केवल प्रचलित सामाजिक निषेधों का उल्लंघन किया था बल्कि शाही परिवार के सम्मान को भी, चोट पहुंचाई थी ।

हम भले ही यह मान लें कि स्त्री पुरुष के लंबे साहचर्य के दौरान ऐसा होना सहज है, प्रेम का अनायास होना, स्वयमेव होना, स्वचलित होना, नितांत जैव-प्राकृतिक घटना है,किन्तु सामाजिकता, प्रेम के पूर्व नियोजित होने की धारणा पर विश्वास रखती है । बहरहाल अबेलार्ड और हेलोयिस का प्रेम परवान चढ़ा और उसकी जिस्मानी परिणति स्वरुप हेलोयिस गर्भवती हो गई । हेलोयिस ने एक पुत्र को जन्म दिया और फिर प्रेमी जोड़े ने ब्याह कर लिया । हेलोयिस के चाचा को यह बात पसंद नहीं आयी कि एक साधारण ट्यूटर, कुलीन युवती से प्रेम करे ।

वो अबेलार्ड की तर्क शीलता और गणित में निपुणता के बावजूद, अबेलार्ड को एक साधारण कर्मचारी मानता था, जिसे अपने काम के बदले पगार मात्र से मतलब होना चाहिए था । उसकी कुलीनता को ठेस पहुंचाने वाले, इस प्रेम से रुष्ट होकर, उसने सदल बल धावा बोला और अबेलार्ड के घर का दरवाज़ा तोड़ कर, सारा घर तहस नहस कर दिया फिर उसने, अबेलार्ड को बंदी बना कर, उसका बंध्याकरण कर दिया, इसके बाद अबेलार्ड को सुदूरस्थ पुरुष मठ में भेज दिया गया ताकि वह अपना शेष जीवन एक सन्यासी बतौर गुज़ारे । कुलीन परिवार की सुकन्या से प्रेम की कीमत, अबेलार्ड को अपना पौरुष खोकर चुकाना पड़ी । 

इतना ही नहीं, हेलोयिस के चाचा ने हेलोयिस को भी, अपने कुल / अपने परिवार में वापस नहीं लिया बल्कि उसे भी अबेलार्ड के मठ से मीलों दूर स्थित स्त्री मठ / नन गृह भेज दिया ताकि वो धार्मिक शिक्षा प्राप्त कर के अपने पाप का प्रायश्चित करे । इस तरह के वृत्तांत पूरी दुनिया में देखने को मिलते हैं,जहां प्रेमी जोड़ों के अभिभावक गण प्रेमियों के बिछोह को सुनिश्चित करते हैं ।आजीवन बिछोह अथवा मृत्योपरांत बिछोह का दंड, अभिभावकगणों के कथित कुल सम्मान को पहुंचने वाली ठेस की मात्रा पर निर्भर करता है । 

अबेलार्ड और हेलोयिस के प्रकरण में भी ऐसा ही हुआ । उन्हें एक दूसरे से मिलने का अधिकार ही नहीं था । सो वे एक दूसरे को प्रेम पत्र लिखा करते और जीवन पर्यंत लिखते रहे । पीटर अबेलार्ड भले ही ख्यातिनाम तर्कशास्त्री था और गणित के शिक्षक बतौर उसकी उपलब्धियां भी कमतर नहीं थी, लेकिन आज के दौर में उसे, शास्त्रीय प्रणय साहित्य सृजन के लिये जाना जाता है, उसके प्रेम पत्रों ने उसके तर्कशास्त्र पर बढ़त हासिल कर ली है । कहते हैं कि वे दोनों मृत्यु के बाद, पेरिस के कब्रिस्तान में फिर से मिले...