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रविवार, 13 सितंबर 2026

अतुकांत कविता जैसी कथा

ग्रीक-ओ-रोमन आख्यान कहता है, एगाडिस्टिस एक उभयलिंगी दैत्य था, जिससे देवता डरते थे इसलिए उन्होंने सोते हुए एगाडिस्टिस का लिंग काट दिया और वो अपने एकलिंगीय स्त्री रूप में बतौर देवी सायबेले जीवित बना रहा । आख्यान के अनुसार उसके कटे हुए शिश्न से धरती पर बादाम का दरख्त उपजा । कालांतर में संगारियस नदी के देवता की कुंवारी पुत्री, नाना ने उस पेड़ से एक बादाम तोड़कर अपने सीने से लगाया और वो चमत्कारिक ढंग से गर्भवती हो गईं और एट्टिस का जन्म हुआ ।  सो मिथक में विश्वास यह कि एट्टिस, उभयलिंगीय दानव एगाडिस्टिस या और कुंवारी जलपरी नाना का पुत्र है चूंकि देवी सायबेले, एगाडिस्टिस का शेष रह गया, अर्ध अंश है, तो सायबेले भी एट्टिस की मां मानी गई । हैरानी की बात ये है कि माता सायबेले अपने ही पुत्र एट्टिस  के प्रेम में पड़ गई जोकि खूबसूरत युवा चरवाहे का जीवन जी रहा था । गौरतलब तथ्य ये कि एट्टिस भी सायबेले से प्रेम कर रहा था । कथा में नया मोड़ तब आया जब एट्टिस ने स्थानीय बादशाह की पुत्री से ब्याह करने का निर्णय ले लिया ।

सायबेले गुस्से और जलन से भर गई उसने ब्याह के समय ही अपनी दैवीय शक्तियों का प्रयोग करके एट्टिस को उन्माद ग्रस्त कर दिया । आयु के अनुसार अपने स्वभाविक प्रेम से वंचित एट्टिस ने बदहवासी की हालत में , चीड़ के दरख्त के नीचे स्वयं को बंध्याकृत कर लिया।  फलतः अत्यधिक खून बहने से उसकी मृत्यु हो गई । माना जाता है कि वहाँ पर बैगनी फूल खिले । एट्टिस की मृत्यु के अपराध बोध से ग्रस्त सायबेले को पछतावा हुआ और उसने सर्वोच्च देवता जियूस से विनती की, कि वे एट्टिस को नवजीवन दें । देवता जियूस ने एट्टिस को चीड़ के दरख्त के रूप में नवजीवन दिया जो प्रतीकात्मक रूप से सर्दियों के मौसम में मरता है और बसंत ऋतु में पुनः जी उठता है । माना जाता है कि गल्लुस नदी के तट पर बसे हुए किन्नर पुजारी स्वयं को बंध्याकृत करके एट्टिस को श्रद्धांजलि देते हैं । यानि कि वे सामान्य देह का परित्याग करते हुए किन्नर पुजारी बनते हैं । एट्टिस के आख्यान के बर-अक्स ईसा पूर्व 3139 के लगभग कुंती पुत्र कर्ण का जन्म हुआ, कुंती जो अविवाहित और नाबालिग थी ।

कुंती को सुयोग्य संतान की प्राप्ति के लिए मिले वरदान के परीक्षण की उत्सुकता थी । उसने देवता सूर्य से कर्ण को पाया और फिर लोक लाज वश उसका परित्याग कर दिया । उच्च कुल में जन्मा कर्ण अपनी जननी माता से बिछड़ कर अनिश्चित भविष्य की ओर नदी की धार संग बह निकला, कथा लंबी है पर कहती है कि कर्ण को अपेक्षाकृत निम्न सामाजिक अधीरथ कुल में पाला गया और यहीं से उसे सामाजिक समानता के लिए जीने मरने का महती उद्देश्य मिला। कर्ण की कथा में माता की अल्पवय जनित चिंतन बोध का संकट है। परिणामतः शिशु  कर्ण के प्राण संकट में थे । संभव है कि वो अपने पिता देवता सूर्य की कृपा से जीवित बच निकला हो और पालक माता ने उसमें, जीवन की विषमताओं, सामाजिक असमताओं के विरुद्ध प्रतिकार करने का विचार रोपा हो । कर्ण सामर्थ्य शाली और स्वयं स्थापित योद्धा था जिसे बमुश्किल परशुराम जैसा गुरु मिला, जिस गुरु ने उसे दीक्षा दी उसी गुरु का अभिशाप, उलाहना उसकी मृत्यु का कारण बना । बहरहाल एट्टिस की तरह उसने आत्मघात नहीं किया ।

कथा सार यह कि यौन नैतिकता की दृष्टि से कर्ण ने एकाधिक विवाह और एकाधिक प्रेम किए । एट्टिस और कर्ण के प्रकरणों के समानांतर अविवाहित माता की संतान जीसस का जन्म 6 से 4 ईसा पूर्व के मध्य में गिना जाना चाहिए क्योंकि एनो डोमिनी या प्रभु का वर्ष और ईसा के पूर्व के मध्य कोई शून्य वर्ष नहीं होना चाहिए । बहरहाल जीसस का जन्म भी ईश्वर की कृपा से कुंवारी मरियम के गर्भ से हुआ उनके पिता यूसुफ पेशे से बढ़ई थे । कथनाशय यह है कि ईश पुत्र जीसस का सांसारिक परिवार निम्न आर्थिक संस्थिति वाला था और लगभग दो वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता को खो दिया था। जहां कर्ण ने एकाधिक स्त्रियों से प्रेम और ब्याह किए तथा एट्टिस एकाधिक स्त्री से प्रेम करने के उपरांत ब्याह की लालसा लिए परलोक सिधार गया, वहीं जीसस ने किसी स्त्री विशेष के साथ प्रेम और ब्याह का उद्धरण प्रस्तुत नहीं किया बल्कि उन्होंने पूरे के पूरे समाज से प्रेम किया और एक धर्म गुरु की तरह सांसारिकता से मुक्ति का द्वार खोला ।    

यूरोप, पश्चिम मध्य एशिया और भारत के तीन अलग अलग क्षेत्रों के इन आख्यानों को बांचने से कम से कम इतना तो पता चलता ही है कि अतीत काल में संतानों की महानता अथवा दिव्यता के लिए , उन संतानों की मां का ब्याहता होना आवश्यक नहीं था । जहां रोमन और भारतीय मिथक के महानायक बहु स्त्री गामिता और बहु स्त्री प्रेम के लिए अत्यंत उदार मनः है , वहीं पश्चिम मध्य एशिया का पुरोधा, लिंग भेद हीन प्रेम का मार्ग चुनता है , उसके प्रेम में सर्वजन हिताय और पारलौकिक सह आध्यात्मिक मुक्ति कामी जीवन जैसे भारतीय फलसफे की स्वीकृति का संकेत मिलता है । इसके इतर भारतीय महानायक जन्म के उपरांत की पारिवारिक विसंगतियों और जैविक मां से पुनर्मिलन की कड़वाहट में जीते हुए भी एकाधिक ब्याह करता है और अपने लिए दानवीरता के विशिष्ट मार्ग का चुनाव करता है इसके बरक्स रोमन महानायक अपने प्रारम्भिक प्रेम प्रसंग में, मां और पुत्र की बिन ब्याही दैहिक आसक्ति संबंधी सामाजिक निषेध का उल्लंघन करता है और कालांतर में अपनी हम उम्र शहजादी से ब्याह के लिए तत्पर हो जाता है

एट्टिस की कथा में तृतीय लिंग का प्राकट्य और किन्नर पुजारियों की सम्मानित सामाजिक धार्मिक उपस्थिति का उल्लेख मिलता है लेकिन सबसे बड़े देवता जियूस के आशीष के बावजूद एट्टिस का अमरत्व, वनस्पति और फूलों सी मौसमी क्रमिकता लिए हुए परिलक्षित होता है । ह्रास और विकास के जैसा । तीनों मिथक अमरत्व , क्रमिक अमरत्व और नश्वरता को उद्घाटित करते हैं । इन्हें स्त्री प्रेम, देह प्रेम और सम्पूर्ण सामाजिकता के लिए सर्व सुलभ प्रेम के उद्धरण माना जाना चाहिए । बहुश्रुत , बहुचर्चित इन आख्यानों में कतिपय विशिष्टताएं उल्लेखनीय हैं यथा बिन ब्याही मां की संतति होना , जिससे आधुनिक समय के सहजीवन, लिव इन रिलेशनशिप जैसे संकेत भी ग्रहण किये जा सकते हैं । केवल स्त्रियों से प्रेम अथवा सार्वजनीन सामाजिक सह सर्वलिंगीय प्रेम या फिर प्रेम में नैतिकता सह अनैतिकता की उपस्थिति , इसके अतिरिक्त सुस्पष्ट विशिष्टता यह कि तृतीय लिंग को सामाजिक धार्मिक प्रतिष्ठा की महती और निःशर्त उपलब्धि । इन आख्यानों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है , स्थाई अमरत्व , क्रमिक अमरत्व अथवा नश्वरता के साथ ही साथ नायकों का महानायक हो जाना ।