सोमवार, 18 मई 2026

दानवी सुकन्या स्काडी

स्काडी, असुर कुल में जन्मी युवती थी किन्तु उसे सुर कुल में जन्मी किसी देवी की तरह से जंगल की सत्ता हासिल थी । वो अमूमन जंगल और पहाड़ों में शिकार किया करती थी, हालांकि उसकी पुरुषोचित वेशभूषा के कारण से, ज्यादातर सामान्य लोग , उसे एक आकर्षक पुरुष ही मानते थे । स्काडी को कुलीन देवताओं से शत्रुता की हद तक घृणा थी और वो उनसे, अपने पिता असुर राज थियाजी की हत्या का बदला लेना चाहती थी । इसीलिए एक दिन वो बदले की भावना से वशीभूत होकर युद्ध के तमाम हथियारों और जिरह बख्तर के साथ देवताओं से युद्ध करने के लिए, उनके राज्य असगार्ड जा पहुंची और फिर उसने देवताओं को युद्ध की चुनौती दी ।

देवता उससे युद्ध नहीं करना चाहते थे, तो उन्होंने स्काडी से कहा तुम मुआवजा ले लो । बतौर मुआवजा तुम किसी एक देवता से ब्याह कर सकती हो लेकिन तुम्हें ब्याह के लिए देवता का चयन उसके पैर देखकर करना होगा, तुम उसका चेहरा नहीं देख सकोगी । स्काडी ने सोचा कि सबसे खूबसूरत पैर देवता बाल्डर के होंगे । दरअसल वो बाल्डर से ब्याह की इच्छुक भी थी, लेकिन उससे फैसला लेने में चूक हो गई , असल में देवताओं में सबसे खूबसूरत पैर समुद्र के देवता न्योर्ड के थे । शर्त के अनुसार ये स्काडी की मजबूरी थी कि वो न्योर्ड से ब्याह कर ले ।

स्काडी ने बदला ना लेने के लिए एक शर्त देवताओं के सामने रखी थी कि देवताओं को उसे हंसाना होगा तभी युद्ध टाला जा सकता है । शर्त को सुनकर देवता लोकी ने रस्सी का एक सिरा  बकरे की दाढ़ी में और दूसरा उसके अडंकोश मे बांध दिया , बकरा जब भी उछलता, लोकी चीखता चिल्लाता और स्काडी की गोद में जा गिरता । इस अभिनयात्मक कृत्य से स्काडी की हंसी फूट पड़ी । तभी देवता ओडिन ने असुर राज थियाजी की दोनों आंखे , आकाश में फेंक दीं जहां वो तारों की तरह से चमकने लगीं , इससे स्काडी को हार्दिक प्रसन्नता हुई और उसने बदले की भावना को छोड़कर समुद्र के देवता न्योर्ड  से ब्याह कर लिया ।

किन्तु आकर्षक असुर देवी स्काडी  और समुद्र के देवता न्योर्ड का ब्याह असफल हो गया क्योंकि न्योर्ड अपने समुद्र तटीय घर नोआतुन में रहना चाहता था , जहां उसे सीगल की आवाजें सुनाई दें जबकि स्काडी, पहाड़ों पर रहना चाहती थी जहां वो रात में , भेड़ियों की आवाजें सुन सके इसलिए दोनों का साथ रहना असंभव हो गया था । बहरहाल उन्होंने वैवाहिक संबंध बनाए रखने के जतन बतौर एक दूसरे के साथ , क्रमशः नौ , नौ दिन के अनुक्रम में , पहाड़ और समुद्र तट पर रहने का सुनिश्चय किया , यद्यपि यह व्यवस्था ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी और वे एक दूसरे से अलग अलग जीवन बिताने लगे ।

यह लोक आख्यान स्केन्डेनेवियाई देशों में बहुश्रुत और प्रचलित है । इस मिथक के अनुसार असुर और देवताओं की प्रतिद्वंदिता का परिणाम था कि असुर राज थियाजी की हत्या, देवताओं द्वारा कर दी गई थी । अगर हम स्केन्डेनेवियाई परिदृश्य की इस कथा को भारतीय परिदृश्य की तुलना में देखें तो देवताओं और असुरों की चिरपरिचित प्रतिद्वंदिता का साम्य , भू भौतिक विविधता के बावजूद बेहद दिलचस्प लगेगा । वर्तमान समय में मानवीय बसाहटों की दूरियों और सामाजिक , सांस्कृतिक वैविध्य के बावजूद देवताओं और असुरों की दुश्मनी का एक सूत्रीय कथन कहीं ना कहीं मनुष्यों की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक सह धार्मिक और संसाधनगत कब्जेदारियों की विरासत की वैमनस्य कथा से पूर्व के आदिम युगीन सामीप्य का उदघोष तो करता ही है ।

जन सामान्य में प्रचलित विश्वास यह है कि देवताओं द्वारा, अपनी स्वयंभू कुलीनता सह स्वर्ग पर आधिपत्य के श्रेष्ठी-बोध की धारणा के तहत असुरों को पाताल लोक में ढकेला गया और वे असुरों को निम्न वर्गीय सामाजिक संस्तरण मानते हैं जबकि असुर-गण, देवताओं की इस धारणा को मिथ्या सिद्ध करने के लिए बारम्बार देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ते हैं और अक्सर उन्हे स्वर्ग से बेदखल कर देने के नाम पर भयभीत भी करते है । ऐसा प्रतीत होता है कि असुर राज थियाजी की हत्या के बाद देवतागण युद्ध से बचना चाहते थे और उन्होंने स्काडी के सामने समझौते का प्रस्ताव किया जिसमें ब्याह के नाम पर वे स्वयं विचारित, स्वघोषित अभिजात्यता से नीचे झुककर असुर कुलीन युवती स्काडी को  किसी भी देवता से ब्याह करने का प्रस्ताव देते हैं । हालांकि इस प्रस्ताव में एक सामाजिक परंपरा और एक कपट शामिल था ।

सामाजिक परंपरा यह कि ब्याह के लिए स्त्रियां निचले कुल से भी लाई जा सकती हैं और कपट  यह कि स्काडी को पति स्वरूप देवता का चयन, केवल पैरों के सौन्दर्य के आधार पर करना था , उसे देवताओं का मुख या देह देखने की छूट नहीं दी गई थी । प्रतीकात्मक रूप से इस कथन से पति परमेश्वर के चरणों की दासी जैसा भाव बोध होता है । स्काडी को देवता बाल्डर से मोह था कदाचित उसने, उसे, कहीं, कभी, किसी अवसर पर देखा जरूर होगा । उसे प्रतीत हुआ कि सबसे सुंदर पैर भी बाल्डर के ही होंगे पर उसका अनुमान गलत सिद्ध हुआ । पैरों के सौन्दर्य के आधार पर चुना गया देवता न्योर्ड निकला  । कथनाशय यह है कि न्योर्ड, देवताओं का एक कूटनीतिक पांसा था जो बाल्डर से स्काडी के मोह को ध्वस्त कर गया ।

देवताओं की कूटनीतिक चरणकमल-वत नीति ने स्काडी को ऐसे बंधन में बांध दिया जो उसने सोचा भी नहीं था । बहरहाल ये नार्स मिथक संबंधों की टूटन पर समाप्त होता है क्योंकि न्योर्ड और स्काडी अलग बसाहटों, अलग अलग परवरिशों में समाजीकृत हुए थे । भारतीय संदर्भों में कुलीन देवता और असुर-गण एक ही पिता किन्तु दो भिन्न माताओं की संतान थे पर यह संकेत इस स्केन्डेनेवियाई मिथक मे स्पष्ट परिलक्षित नहीं होता । इसे आदिम युगीन लघु समाज के क्रमशः विस्तारित होते जाने और भिन्न भूभागों में बसाहट की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो आदिकालीन सामाजिक धार्मिक और विश्वासगत एक्य से यह अनुमान किया जा सकता है कि उक्त एक्य में कुलीनता आधारित संस्तरण का सूत्रपात, विमाताओं की परवरिश का परिणाम रहा होगा ।

बहरहाल वैवाहिक संबंध स्थापित करने की कूटनीतिक पहल ने उक्त कालखंड में, स्काडी और देवताओं के मध्य युद्ध को भले ही टाल दिया हो, पर वैमनस्य और कुलीनता आधारित ऊंच नीच के कथित विश्वास इन दोनों समुदायों के अंतस में गहरे पैठ चुके थे । कथा में उल्लिखित ब्याह भिन्न पर्यावासों और भिन्न संस्तरणात्मकताओं के कृत्रिम गठजोड़ जैसा था जिसे टूटना ही था और जो टूट गया । असुर राजकुमारी को इस ब्याह रूपी समझौते से, केवल मृत पिता की आंखों के सितारों जैसा चमकने का एहसास या आभास मिला पर उसका वैवाहिक जीवन विफल रहा और देव, असुर समझौता भी छलावा सिद्ध हुआ । स्काडी, देवता बाल्डर की पति रूप में कामना करती थी और उसे ब्याह से पूर्व न्योर्ड से कोई प्रेम नहीं था ।

स्काडी को पहाड़ों में गुर्राते भेड़ियों की आवाजे प्रिय थीं और न्योर्ड को समुद्र में गूंजती हुई सीगल की आवाजें मुग्ध करती थीं । वैवाहिक जीवन की निरन्तरता का उनका नौ, नौ दिवसीय क्रमिक प्रबंधन, अंततः ध्वस्त हो गया । कथा से यह निष्कर्ष निकलता है कि दाम्पत्य जीवन की सुखद परिणति के अवसर तभी बढ़ते हैं जब युगल द्वय में सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक और पर्यावासीय भिन्नता न्यूनतम हो अथवा एक समान । वे दोनों पूर्वजों की साम्यता के बावजूद एक दूसरे के शत्रु समाज की तरह से विकसित हुए थे अतः युद्ध टालने का कोई कृत्रिम समझौता, उन्हें स्थायी गठबंधन में रख ही नहीं सकता था । अतः देवता और असुर ही नहीं, बल्कि जनसामान्य में भी इस तरह के युद्ध होते ही रहेंगे । कथासार यह है कि देवताओं ने दुर्लभ और अनमोल संसाधनों पर एक पक्षीय तौर पर जो एकाधिकार बना लिया था वंचित असुर जन उसका विरोध करते ही रहेंगे... 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें