गुरुवार, 7 जून 2012

ईश्वर ने उसे हुक्का दिया ही क्यों था ...?

आकाश से धरती पर सबसे पहले एक बुज़ुर्ग ‘एतिम ने’ और उसकी पत्नि ‘एजाव’ आये थे ! उन दिनों धरती पर जल नहीं था इसलिए ‘एतिम ने’ ने ईश्वर ‘ओबास्सी ओसाव’ से जल के लिए प्रार्थना की ! इस पर ईश्वर ‘ओबास्सी ओसाव’ ने ‘एतिम ने’ को सात साफ़ सुथरे पत्थर और एक हुक्का दिया ! ईश्वर से उपहार पाकर 'एतिम ने'  मैदान में आया और उसने एक छोटे से छेद में जैसे ही एक पत्थर रखा तो उस जगह से जल का सोता उबल पड़ा / स्रोत फूट गया , जिसके कारण से वहां एक बड़ी सी झील बन गई ! कुछ समय बाद इस बुज़ुर्ग जोड़े से सात पुत्र और सात पुत्रियों का जन्म हुआ , जिन्होंने बड़े होकर आपस में शादी कर ली और फिर उनके भी बच्चे हुए ! ‘एतिम ने’ ने प्रत्येक गृहस्वामी को एक झील / एक नदी / एक जल स्रोत भेंट किया किन्तु कुछ समय बाद उसने अपने तीन पुत्रों से ये जल स्रोत वापस ले लिये क्योंकि वे निर्धन शिकारी थे और अपना शिकार / मांस अपने शेष स्वजनों से हिस्सा बांट / शेयर नहीं करते थे ! जब इन तीनों शिकारियों के पुत्रगण यानि कि ‘एतिम ने’ के प्रपौत्र बड़े हो गये और अलग घर में रहने चले गये तो शिकारी पुत्रों ने ‘एतिम ने’ से अनुरोध किया कि , उनसे वापस लिये गये जल स्रोत उन्हें दोबारा लौटा दिये जायें और ‘एतिम ने’ ने ऐसा ही किया  !

बुज़ुर्ग ‘एतिम ने’ ने अपने सभी बच्चों से कहा कि वे अपने पितरों के जल स्रोतों / जलधाराओं से सात पत्थर लेकर , उनमें एक एक पत्थर नियमित अंतराल में रखते जायें , ताकि उनके लिए नई जलधारायें / जल स्रोत बन सकें ! यद्यपि एक पुत्र को छोड़ कर सभी ने ऐसा ही किया ! इस पुत्र ने टोकरी भर पत्थर एक साथ , एक ही स्थान पर रख दिये , जिसके कारण से बहता हुआ जल अवरुद्ध हो गया और सारे खेत डूबने लगे ... यहां तक कि पूरी धरती के डूबने का खतरा पैदा हो गया ! जलप्रलय का माहौल देख कर सारे बच्चे दौड़कर ‘एतिम ने’ के पास पहुंचे ! ‘एतिम ने’ ने बाढ़ को रोकने के लिए ईश्वर ‘ओबास्सी ओसाव’ से प्रार्थना की , तो उसने बाढ़ रोक दी ! इसके बाद एक खेत को छोड़कर , बाढ़ का जल सारे खेतों से नीचे उतर गया ! यह खेत उस बुरे पुत्र का था , जिसने ‘एतिम ने’ का कहना नहीं माना था ... और फिर उस खेत में हमेशा हमेशा के लिए एक झील बन गई ! इस घटना क्रम के बाद ‘एतिम ने’ ने शेष पुत्रों के जल स्रोतों का नामकरण किया और उनसे कहा कि वे उसे धरती पर जल लाने वाले इंसान के रूप में याद रखें ! ठीक दो दिन बाद ‘एतिम ने’ की मृत्यु हो गई !

इस नाईजीरियाई लोक आख्यान में धरती के पहले दो मनुष्य आकाश से आये हुए बताये गये हैं और हैरान करने वाली बात ये है कि उन्हें बुज़ुर्ग कहा गया है ! संभवतः इस जोड़े को बुज़ुर्ग कहे जाने का मंतव्य , उन्हें विचार परिपक्व दिखलाने का रहा हो अन्यथा आयु से वृद्ध जोड़े के चौदह बच्चे पैदा होना , कहीं अधिक आश्चर्य का विषय माना जा सकता है ! इस आख्यान में 'एतिम ने' और 'एजाव' के सातों पुत्र , पुत्रियां , जो कि आज की स्वजनता के अनुसार सगे भाई बहन हैं , परस्पर विवाह करते हैं और उनके बच्चे भी होते हैं तथा उनकी सामाजिक जैविक वंशबेल आगे बढ़ती है ! बहुत संभव है कि उक्त समय में इस तरह के वैवाहिक संबंधों को लेकर कोई सामाजिक वर्जनायें प्रचलन में नहीं रही होंगीं ! इसलिए इस मुद्दे पर किसी विस्तृत टिप्पणी का कोई औचित्य भी नहीं है ! 'एतिम ने' और 'एजाव' के जोड़े के आगमन के समय , धरती पर जल नहीं था , तो उसे ईश्वर से मांगा गया ! यानि कि जोड़ा जानता था / मानता था कि ईश्वर सामर्थ्यशाली है और उसमें धरती को जल युक्त करने की क्षमता है ! 

धरती पर जल की उपलब्धता की प्रार्थना किये जाने पर ईश्वर ‘एतिम ने’ को एक हुक्का और सात पत्थर देता है ! हालांकि आगे की सारी कथा में पत्थरों का बहुविध उपयोग दिखाई देता है , किन्तु कथा , हुक्के को लेकर सर्वथा मौन है ! बुज़ुर्ग जोड़ा अथवा उसके वंशज कथा के किसी भी अंश में हुक्के का प्रयोग करते नहीं दिखाई देते , इसलिए प्रश्न यह है कि ईश्वर ने 'एतिम ने' को हुक्का दिया ही क्यों ? कहीं ऐसा तो नहीं कि कथा के समय का नाईजीरियाई समाज तम्बाखू की खेती करता रहा हो या फिर हुक्का उसकी नियमित दिनचर्या का अंग रहा हो , वर्ना कथा में हुक्के को ईश्वर का उपहार बताये जाने का औचित्य ही क्या है ? एक विचार यह भी है कि चूंकि हुक्का व्यसन का प्रतीक है और तत्कालीन मनुष्य अपने व्यसन को दुर्गुण कहे / समझे जाने / स्वीकारे जाने की अपेक्षा उसे ईश्वर का उपहार बता कर ‘जस्टीफाई’ करने की कोशिश / औचित्यपूर्ण ठहराने का उपक्रम कर रहा हो !

'एतिम ने' को ईश्वर प्रदत्त पत्थरों में से एक के माध्यम से , मैदानी धरती के छिद्र को जलछिद्र में परिवर्तित होना बताया गया है , शायद कुंवें और कुंवें की मुंडेर बांधने जैसा कोई यत्न  ! धरती से फूट पड़ने वाली कोई धार जिसे पत्थर से नियंत्रित किया गया हो ! पिता अपनी जल संपदा पुत्रों को विरासत में बांटता है और उन तीन पुत्रों से छीन भी लेता है , जो कि अपनी आय (मांस) शेष स्वजनों में नहीं बांटते हैं ! जलस्रोतों से वंचित किये गये पुत्रों के इस व्यवहार की पृष्ठभूमि में उनकी निर्धनता के औचित्य की मौजूदगी के बाद भी पिता , उन्हें जल विरासत से वंचित कर दण्डित करता है , क्योंकि तीनों शिकारी पुत्रों का यह व्यवहार उसे असामान्य / असहज / असामाजिक / असहिष्णुता का लगता है , भले ही आय / उपलब्धियों / शिकार की न्यूनतम / किंचित मात्रा भी स्वजनों को पारस्परिक हिस्सेदारी से वंचित करने का कारण बन रही हो !  ज़ाहिर है कि ‘एतिम ने’ चाहता है कि पुत्रों / मनुष्यों के मध्य सहकारिता / हिस्सेदारियों / साझेदारियों / मेलमिलाप की भावना प्रबल ही नहीं हो बल्कि व्यवहारिक धरातल पर दिखनी भी चाहिये  !

बुज़ुर्ग की इस इच्छा का एक बार पुनः प्रकटीकरण तब होता है जबकि वह सभी पुत्रों से एक एक पत्थर का समान उपयोग करके , नियमित अंतराल वाली जलधाराओं का बटवारा चाहता है , किन्तु उसका एक पुत्र एक समान संख्या में पत्थरों के उपयोग से जल के समान वितरण का सिद्धांत तोड़ बैठता है और सांकेतिक रूप से एक टोकरी भर पत्थरों से जल धारा को अवरुद्ध करके असमान बटवारे की चेष्टा करता है , असमान बटवारे की यह कोशिश ऐसी बाढ़ के लिए उत्तरदाई है , जिसके कारण से सबके खेत डूब जाते हैं , किन्तु 'एतिम ने' ईश्वर की सहायता से इस प्रक्रिया / बाढ़ को बाधित कर देता है और परिणाम स्वरुप दण्डित केवल वही पुत्र होता है जिसने ज्यादा पत्थरों से जल के असमान बटवारे की कोशिश की थी ! जहां सबके खेत जल मुक्त हो जाते हैं वहीं दोषी पुत्र बाढ़ के बाद शेष रह गई झील में अपने खेत गवां बैठता है  !  अंततः इस कथा से एक सन्देश और कि अपने अनुभवी पितरों का कहा मानना चाहिये , अन्यथा ...



[  मित्रो जितनी जल्दी संभव होगा , एक दो अंक ठेल कर , लोक आख्यान की श्रृंखला कुछ दिन के लिए स्थगित रखने और विषयान्तर का इरादा है ! ये श्रृंखला आगे भी ज़ारी रहेगी किन्तु अन्य विषयों के साथ टुकड़ा टुकड़ा ! जब मुझे स्वयं भी विषयगत एकरसता की अनुभूति हो रही है तो फिर आपकी बर्दाश्त की हद तो मैं समझ ही सकता हूं  :)  ]

19 टिप्‍पणियां:

  1. इस आख्यान का एक सन्देश मुझे समझ में आता है कि जो प्रकृति हमारा जीवन है,उसके विरुद्ध जाने पर वही विनाश का कारण भी बनती है.यह आज भी देखा जा सकता है.

    ...यह भी कि सहकारिता की सोच बहुत पहले से हमारे समाज में रही है.

    ...यह भी कि बुरे को दण्डित करने के लिए बहती हुई नदी नहीं,ठहरी हुई झील का सहारा लिया गया है !

    ...और यह भी कि अन्य कथाओं की तरह इसमें भी भाई-बहन में वैवाहिक-संबंधों को लेकर कोई वर्जना नहीं है!

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    1. ...और हाँ,हुक्के को मनुष्य के प्रसाधन के लिए दिया गया हो सकता है |

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    2. संतोष जी ,
      (१) लालसा अतिरेक और नियमों से विचलन अगर हो तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिये का सन्देश बहुत स्पष्ट है ! आपकी प्रतिक्रिया सही है !

      (२) प्रसाधन से , मैं ये समझ रहा हूं कि उन्हें सुबह / शाम , निवृत्ति से पूर्व हुक्का गुड़गुड़ाना अनिवार्य हो गया होगा :)

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    3. सञ्जय जी ,
      :) सही है !

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  2. क्‍या क्‍या कहानि‍यां गढ़े बैठे हैं दुनि‍या भर के लोग

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    1. काजल भाई ,
      बेशक , समझ और अनुभवों की समृद्धि के स्तर पर , जहां आज हम हैं उसकी तुलना में वे कहां थे ?

      ...पर हमारी बौद्धिक अनुभवगत सम्पन्नता में उनका भी , एक अंश ही सही , हिस्सा / योगदान तो है ही :)

      बहरहाल आपकी टिप्पणी से सहमत !

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  3. कहीं का 'एतिम' शायद कहीं पर 'आदम'
    सात जोड़े शायद सात महाद्वीपों के आदिम वासी,
    राम जाने !!

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    1. संजय जी ,
      अदभुत प्रतिक्रिया !

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  4. विषय से इतर टिप्पणी कर रही हूँ...
    लोक आख्यान कहीं लिखे हुए नहीं थे....एक से दूसरे...दूसरे से तीसरे सुनते हैं और पीढ़ियों दर पीढ़ियों...ये कथा सुनी सुनाई जाती है...
    हो सकता है...शुरुआत की कथा में हुक्के से सम्बंधित कोई बात भी कही गयी हो....पर उसके बाद के सुनने सुनाने वाले सम्बंधित बात तो भूल गए हों...बस हुक्का याद रह गया हो.
    (एक गेम होता है 'चाइनीज़ व्हिस्पर ' जिमसे आठ-दस लोग गोल बना कर बैठते हैं..एक व्यक्ति दूसरे के कान में एक वाक्य कहता है..फिर वह व्यक्ति अगले के कान में...और अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते पहुंचते कई बार वाक्य पूरी तरह बदल गया होता है..:)

    कभी कभी लगता है...लोक आख्यान भी कुछ ऐसे ही नहीं...हर काल का समाज उस कथा में कुछ जोड़ता गया...और कुछ घटता भी गया..

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  5. यह विषयान्तर नहीं है ! आपसे सहमत ! हमने पहले भी कहा है कि वाचिक परम्परा से आगे बढ़ती कथाओं में पीढ़ी दर पीढ़ी जोड़ घटाव हो सकते हैं !

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  6. सात पत्थर कर्म और हुक्का मौज के प्रतीक लगते हैं। ईश्वर ने दोनो साथ-साथ मनुष्यों की परीक्षा लेने के लिए दिया कि देखें ये करते क्या हैं। इस कथा में जल के स्रोत को अनवरत ढूँढते रहने का प्रयास अद्भुत है। जल का असमान वितरण आज भी भंयकर बाढ़ का कारण बनते हैं। वे, भूमि के साथ-साथ, बूँद-बूँद जल के लिए भी सचेत रहते होंगे।

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    1. सत्यवचन ! आपसे पूर्ण सहमति ! आभार !


      देवेन्द्र जी,
      मैं सोच रहा हूं कि , यदि मित्रों के प्रातःकालीन भ्रमण और टिप्पणी लेखन के बीच का असमान वितरण समाप्त कर दिया जाये तो कितने ही लेखकों का हौसला बढ़ेगा , कितनी सारी पोस्ट असमय काल के गाल में समाने से बच जाया करेंगी :)

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  7. अपनी आमदनी मे से स्वजनों का हिस्सा रखना , अनुभवी पित्तरों का कहना ना मानने से होने वाले नुकसान के कारण सजा का पात्र बनना ...पंचतंत्र की कथाओं से ही रोचक है ये लोक आख्यान !

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    1. जी हां , रोचक भी हैं और शिक्षाप्रद भी ! आभार !

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  8. यह पत्थर चमत्कारी थे ...
    काश एक ऐसा पत्थर हमें भी मिल जाए....

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    1. सतीश भाई ,
      ईश्वर से लौ लगाईयेगा तो शायद ये भी हो जाये :)

      आप तो कहते हैं ना कि ईश्वर की देहरी ना जायें मेरे गीत :)

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  9. सभी के दृष्टिकोण सही है, प्रस्तर परिश्रम के तो हुक्का प्रमाद का प्रतीक है।

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  10. प्रिय सुज्ञ जी ,
    मैंने 'व्यसन' कहा था ! शब्द 'प्रमाद' भी बहुत पसंद आया !

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