शनिवार, 2 जून 2012

अग्नि का जन्म ...!

मूल अमेरिकी आदिवासी समुदाय में कही जाने वाली इस कथा के अनुसार , बहुत समय पहले की बात है ,जबकि दरख्त और जानवर एक दूसरे से बात कर सकते थे , लेकिन उस ज़माने में धरती पर अग्नि नहीं थी ! उन दिनों लोमड़ी सबसे होशियार जानवर थी , सो उसे अग्नि को बनाने का ख्याल आया ! एक रोज उसने कलहंसों से मिलने की बात सोची क्यों कि , वो उनके उड़ने / चीखने  / कलरव की नक़ल करना सीखना चाहती थी ! कलहंसों ने लोमड़ी को सब कुछ सिखाने का वादा किया  !  इसके लिए उन्होंने लोमड़ी को कृत्रिम पंख बांध दिये और कहा कि उड़ते समय वह अपनी आंख ना खोले ! इसके बाद कलहंसों ने आकाश की ओर उड़ान भरी ! उनसे उड़ना / कलरव सीखने की कोशिश के तहत लोमड़ी ने भी अपने कृत्रिम पंखों के साथ , ऊपर की दिशा में उड़ान भरी ! जब वे जुगनुओं के गांव के ऊपर से उड़ रहे थे कि अचानक अंधेरा घिर आया ! जुगनुओं की चमक / झिलमिलाहट के कारण लोमड़ी अपना मकसद भूल गई और उसने आंखें खोल दीं  ! बस इसी क्षण उसके कृत्रिम पंख नीचे गिर गये और वो स्वयं अनियंत्रित होकर जुगनुओं के गांव की दीवाल वाले घेरे के अन्दर जा गिरी ! गांव के बीचो बीच लगातार अग्नि जल रही थी !

तभी दो दयावान जुगनू नीचे गिरी हुई लोमड़ी को देखने आये तो लोमड़ी ने उन दोनों को हपुषा फल / जुनिपर बेरीज का एक एक हार दिया ! लोमड़ी उनसे फुसला कर पूछती है कि वह गांव की दीवाल वाले घेरे से बाहर कैसे निकल सकती है ? तो जुगनुओं ने उसे बताया कि वो देवदार की टहनी को इतना नीचे झुकाये कि टहनी वापस पलट कर , गुलेल की तरह से उसे , दीवाल के बाहर फेंक दे , जैसा कि वो चाहती है ! शाम को लोमड़ी ने वो झरना देखा , जहां से जुगनू पानी प्राप्त करते थे ! उसने वहां रंगीन मिट्टी भी देखी जिसे पानी में घोलकर अनेक रंग बनाये जा सकते थे ! उसने तय किया कि वह अपने आपको सफ़ेद रंग से रंग लेगी और फिर जुगनुओं को सुझाव दिया कि हमें मिलकर एक उत्सव मनाना चाहिये , जिसमें सारे जुगनू नृत्य करें और वो स्वयं उनके लिए संगीत बजाये ! जुगुनू इसके लिए तैयार हो गये और उन्होंने लकडियां इकठ्ठा करके बड़ी सी अग्नि प्रज्ज्वलित कर ली ! इस बीच लोमड़ी ने गुप्त रूप से अपनी पूंछ में देवदार की छाल बांध ली और फिर एक ढ़ोल तैयार किया , जोकि शायद दुनिया का पहला ढ़ोल था ! फिर उसने उत्साह पूर्वक नाचते हुए जुगनुओं के लिए जोर जोर से ढ़ोल बजाना शुरू किया और स्वयं धीरे धीरे खिसकते हुए अग्नि के पास पहुंचती गई ! 

कुछ देर बाद लोमड़ी ने ढ़ोल बजाने से थकने का नाटक करते हुए , ढ़ोल तथा उसे बजाने वाली लकड़ी , उन जुगनुओं को दे दी , जोकि थकी हुई लोमड़ी की , मदद बतौर  ढ़ोल बजाना चाहते थे और फिर उसने जल्दी से अपनी पूंछ में बंधी हुई छाल में अग्नि सुलगा / जला ली ! इसके बाद उसने कहा कि यहां बहुत गर्मी है , मैं एक ठंडी जगह में जाना चाहती हूं ! वह भाग कर सीधा देवदार के पास पहुंची और कहा , मेरे लिए नीचे झुको , ओ देवदार...नीचे झुको ! देवदार की डाल जैसे ही नीचे झुकी , वह उस पर लटक गई और फिर डाल ने गुलेल की तरह से वापस पलट कर , उसे गांव की दीवाल के उस पार फेंक दिया ! वह तेजी से भागी जबकि जुगनू उसका पीछा कर रहे थे ! लोमड़ी जितना तेजी से भाग रही थी उसकी पूंछ में बंधी छाल से गिर रही चिंगारियों से भागने वाले रास्ते की झाड़ियां और लकड़ियां सुलग उठीं ! जब लोमड़ी भागते भागते थक गई तो उसने जलती हुई छाल , बाज़ को दे दी ! जोकि उसे भूरी सारस तक ले गया ! भूरी सारस अग्नि को लेकर तेजी से दक्षिण दिशा की ओर उड़ी और चारों ओर चिंगारियां बिखेरती गई ! इस तरह से अग्नि पूरी धरती पर फ़ैल गई ! जुगनू इसके बावजूद भी लोमड़ी का पीछा करते हुए उसके बिल तक गये और घोषणा की , कि ऐ चालाक लोमड़ी तुमने हमारी अग्नि चोरी की है किन्तु अब तुम स्वयं अपने लिए , इसका कभी भी उपयोग नहीं कर पाओगी ! 

दक्षिण पूर्व एशियाई प्रशांत क्षेत्र की कथा के इतर इस आख्यान के अनुसार अग्नि , पत्थरों और बांस के घर्षण के बजाये , जुगनुओं की देन है ! कथा , पशुओं और वृक्षों में पारस्परिक संवाद की कल्पना करती हैं , यही कारण है कि लोमड़ी , देवदार से सहायता मांगते समय , उससे बात कर सकी  !  आशय यह कि बातचीत के लिए कोई विशेष भाषाई बंधन , शायद ज़रुरी ना रहा हो तब , वर्ना , पशु / वृक्ष / पक्षी / जुगनू आपस में बातें कैसे कर पाते  ! मोटे तौर पर इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि इस कथा को कहने वाला समाज , संकीर्ण भाषावादी आग्रहों से मुक्त अथवा बहुभाषी समाज रहा होगा ! एक चालाक जानवर के तौर पर लोमड़ी अग्नि की चोरी करती है , किन्तु स्वयं उसका उपयोग स्वयं नहीं कर पाती , संभवतः लोमड़ी , यहां पर एक चतुर सुजान / मनुष्य का प्रतीक है , जोकि समाज हित में चोरी जैसा कर्म करके भी स्वयं का अहित कर लेने में कोई कोताही नहीं करती ! यानि कि लोमड़ी के बहाने कथा , समाज के चतुर / बुद्धिमान सदस्यों को समाज के हित में अपने व्यक्तिगत हित त्यागने के लिए तत्पर रहने , यहां तक कि अवांछित काम करने जैसा सन्देश देती है ! मेरे विचार से आजकल की जासूसी विधा / कृत्य इस श्रेणी का एक सर्वोत्तम उदाहरण है !

लोमड़ी मिट्टी में रंगों की खोज करती है ! वह रंगों और नृत्य तथा संगीत को उत्सव / उल्लास से जोड़ती है तथा यह संकेत भी देती है कि उत्सव प्रियता में लीन होकर हम अपनी किसी महत्वपूर्ण वस्तु को गवां भी सकते हैं ! वस्तुओं को दूर तक फेंके जाने के लिए , गुलेल बतौर वृक्ष की टहनी को नीचे झुका कर झटके से वापस छोड़ने की तकनीक वह दूर देश के जुगनुओं को उपहार / रिश्वत देकर प्राप्त करती है ! यही नहीं वो कलहंसों से उड़ना / कलरव सीखना चाहती है  ! गौर तलब है कि आकाश में पक्षियों सी उड़ान के लिए नकली पंखों का उपयोग भी आदिम मनुष्य की आकांक्षाओं का उदाहरण है  ! बेशक यह कथा , राईट बंधुओं के जन्म से पूर्व की है , जिसमें प्रतीकात्मक तौर पर लोमड़ी के रूप में चतुर मनुष्य पक्षियों से उड़ने की तकनीक / कृत्रिम पंख / प्रेरणा प्राप्त करता दिखाई देता है ! अगर गौर करें तो बाज़ / सारस और लोमड़ी की जुगलबंदी समाज हित में समाज के भिन्न सदस्यों के योगदान को रेखांकित करती है ! संभवतः कथा ये भी कहती है कि अपने समाज के लिए ज्ञान / तकनीक , अगर कलहंस से मिल सके तो सीख लो और अगर दूसरे देश के जुगनुओं को उपहार देकर अथवा छल से भी संभव हो , तो प्राप्त कर लो ! अपने समाज के लिए अलग अलग रंग रूप / कद काठी / हैसियत के होकर भी आपस में एक बने रहो !


24 टिप्‍पणियां:

  1. एक दूसरे का मन पढ़ने के लिए भाषा की जरूरत कम ही होती है और कई बार भाषा, समझ कम, भ्रम अधिक पैदा करती है.

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    1. आज दिन भर बिजली गोल रही , सो समय पर आभार भी नहीं कह सका !

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  2. न बोलने और चुप रहने दोनो के मायने बड़े गहरे हैं।

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  3. @ यह कथा , पशुओं और वृक्षों में पारस्परिक संवाद की कल्पना करती हैं , यही कारण है कि लोमड़ी , देवदार से सहायता मांगते समय , उससे बात कर सकी

    इस कथा से बहुत कुछ सीखने को मिलता है , शायद किसी जमाने में मूक जीवों (जानवर,पक्षी और वृक्ष) से बात करने की कला विकसित हुई हो शायद इसी को अतीन्द्रिय शक्ति प्राप्त होना कहते हैं !
    आशा करें कि मानव की यह कल्पनाएँ, हकीकत का रूप लें.....
    आभार आपका !

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  4. आज कोई शिकायत नहीं ,बस सवाल . :)
    आप ऐसी कथाएं कहाँ से ढूंढ कर लाते हैं ?
    क्या ये कथाएं किसी स्कूल या कॉलिज में पढाई जाती हैं ?

    जब पेड़ थे , जानवर थे , गाँव थे -- यानि सब कुछ था लेकिन अग्नि नहीं , यह कैसे संभव हो सकता है !
    आखिरी पंक्ति से पूर्णतया सहमत .

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    1. डाक्टर साहब ,
      देश विदेश की कितनी सारी यूनीवर्सिटीज में लोक अध्ययन विभाग ( Department of Folk Studies ) हैं और कितनीं में ही इसे सोशल साइंस के साथ पढ़ाया जाता है :)

      इन कथाओं में कुछ बातें सांकेतिक और कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण (Hyperbolic) भी हो सकती हैं , आखिर इन्हें कहा तो इंसान ने ही है ना :)

      एक जमाना था जब इंसान लिखना और प्रिंट करना नहीं जानता था तब "उसके अनुभव / उसका ज्ञान" मौखिक परम्परा (Oral Tradition) से अगली पीढ़ी तक पहुंचता रहा है , तब कहने में थोड़ी बहुत हेर फेर ज़रूर हो सकती थी ! चूंकि वो जमाना हिस्ट्री रिकार्ड कर पाने का जमाना नहीं था इसलिए , आज हम इन्हीं कथाओं को सूचना स्रोत मानकर उस जमाने को पढ़ने / समझने की कोशिश करते हैं !

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  5. सभी पशु-पक्षी आदि मानव के विशिष्ट स्वभाव, गुण, क्रियाक्लाप आदि के प्रतीक है।
    अग्नी की खोज के लिए लोमडी सम चतुरता व चालाकी की आवश्यकता है, किन्तु खोज यात्रा के लिए पंख और मनोरंजन हेतु कलरव आदि कलाएं सीखने की आवश्यकता थी। सभी जगह सही विद्या व कौशल के रूप में पशु-पक्षी बिंब का सहारा लिया गया है। गुण पशु स्वरूप में कल्पित किए गए है।

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  6. @गौर करें तो बाज़ / सारस और लोमड़ी की जुगलबंदी समाज हित में समाज के भिन्न सदस्यों के योगदान को रेखांकित करती है ! संभवतः कथा ये भी कहती है कि अपने समाज के लिए ज्ञान / तकनीक , अगर कलहंस से मिल सके तो सीख लो और अगर दूसरे देश के जुगनुओं को उपहार देकर अथवा छल से भी संभव हो , तो प्राप्त कर लो ! अपने समाज के लिए अलग अलग रंग रूप / कद काठी / हैसियत के होकर भी आपस में एक बने रहो !


    यह लोक आख्यान हमेशा की तरह तिलिस्म जैसा लगता है,पर इसका लब्बो-लुबाब आपने आखिरी पैरे में कर दिया है.फ़िलहाल उससे सहमत हो जाता हूँ |

    ...और हाँ,जो चीज़ तब से लेकर अब तक नहीं बदली वह है लोमड़ी और इस पर मुझे कुछ नहीं कहना है !

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    1. संतोष जी ,
      कथा मात्र पर आपकी टीप के लिए हार्दिक आभार !

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  7. अग्नि..जुगनुओं की देन है...ऐसी कल्पना बहुत ही सहज है...
    आज भी जिनलोगों ने इतिहास नहीं पढ़ा हो....अग्नि की उत्पत्ति के विषय में सही जानकारी ना हो,उनके लिए जुगनुओं से अग्नि की उत्पत्ति की कल्पना बहुत ही स्वाभाविक है.

    सुन्दर कथा..

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  8. पहले आग लगे तब पानी से बुझाई जाती है..आपने पहले जलमग्न किया फिर जलन की चर्चा की.. इस पर लोकाख्यान की दृष्टि से स्पष्टीकरण बनता है.. यह क्रम आपके द्वारा निर्धारित है अथवा इसका कोई विशेष प्रयोजन है...
    पशु-पक्षियों और वनस्पतियों के बीच संवाद को लेकर मुझे तो कोई भ्रम नहीं.. न यह सोचकर वे बोलते होंगे या कौन सी भाषा बोलते होंगे.. काम से घर लौटने पर पालतू कुत्ता पैर चाटता है तो हम कहते हैं - अरे भाई! आज देर हो गयी काम ज़्यादा था!" और कुत्ता जाकर सोफे के नीचे बैठ जाता है.. हो गई बातचीत.. मैंने हिन्दी में कहा मगर पता नहीं कुत्ते ने कौन सी भाषा में सवाल किया था..
    एक और सवाल..
    @और कहा कि उड़ते समय वह अपनी आंख ना खोले !... जुगनुओं की चमक / झिलमिलाहट के कारण लोमड़ी अपना मकसद भूल गई..!"
    जब लोमड़ी ने आँखें बंद कर रखी थीं तो उसे जुगनुओं की झिलमिलाहट का पता कैसे चला जो उसने आँखें खोल दी? या शायद जुगनुओं की चमक इतनी तीव्र रही होगी कि बंद आँखों में भी चुभ रही हो जैसे सोते हुए व्यक्ति की आँखों में टॉर्च जलाने पर वो जग जाता है!!
    लोकाख्यान लोमडी की चालाकियों और भोले हंस और वनस्पतियों के ठगे जाने की कथा है.. वर्त्तमान व्यवस्था की तरह!! एक और बात सिद्ध हुई कि लोमडी भी विदेशी आख्यानों में चालाक मानी जाती है. अरे हाँ..एक बात और रह गई कहने को!! रंगे सियार की कहानी (जो अपने चिल्लाने के कारण पकड़ा गया) और यह रंगी लोमडी की कथा.. अर्थात अगर ये पशु अपनी आवाज़ से पकडे जाते होंगे तो अवश्य ही उनकी बातचीत की भाषा मौन ही रही होगी.. नहीं तो अपना शरीर रंगने की बजाए उनका ध्यान आवाज़ छिपाने पर होता. वरना रंगे शरीर के बावजूद भी वे आवाज़ से पकडे जाते!!
    इति!!

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    1. सलिल जी ,
      भीग कर ठण्ड लग रही हो तो गरमाने का ख्याल :)

      खैर...मजाक से आगे बात ...ये कि , जलप्रलय पर और भी लिखना है पर पठनीयता में एकरसता के भय से थोड़ा सा चेंज कर दिया है ! लगातार एक ही मुद्दा ऊब पैदा कर सकता है बस ये ख्याल डरा गया !

      आपके श्वान से आपका संचार बराबर हो रहा है , भाषा को कोई नाम दिया जाना जरूरी नहीं है !

      लोमड़ी की बंद पलकों पे जुगनुओं की झिलमिलाहट का असर , लिखते वक़्त मैंने भी तौला था , फिर लगा कि कथा में जो है , सो है ! मुद्दे पर ख्याल यही है कि उनकी झिलमिलाहट काफी तेज मानी गई होगी !

      टीप के तीसरे पैरे से पूर्ण सहमति !

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  9. अग्नि की चोरी और भी जन कथाओं में मौजूद है ...
    लोमड़ी आज तक मानवता का पीछा करती रही हैं ,गुफा से ब्लॉग पोस्टों तक .
    कितनी हैरत में डालती हैं न ये बात ....

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    1. सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात न ब्रूयात सत्यमप्रियं :)

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  10. आदिमानव की पत्थरों से घिसकर अग्नि प्राप्त करने से अलग यह कहानी ख़ासा रोचक है . लोक कहानियों के विभिन्न प्रतीकात्मक अर्थ को सरल भाषा में समझाने से कहानी की उपयोगिता साबित होती है . आप वाकई अच्छे प्रोफ़ेसर रहे होंगे ,मतलब अभी भी है :)

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    1. ये क्या कह दिया आपने :)
      अब तो मेरे शर्माने की नौबत है :)

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  11. समाज शास्त्र के रोचक पहलू से अवगत कराती यह श्रृंखला अद्भुत है। अनुरोध है कि जितना आपके पास हो वह सब हमसे साझा करें। इन कथाओं की रोचकता अपनी जगह जो है सो है लेकिन इन पर आपने जो दृष्टि डाली है वह मंत्रमुग्ध कर देती है। हम खुद को आपकी इस कक्षा के विद्धार्थी बन कर ही इसे पढ़ना चाहते हैं।

    इस कथा में मनुष्यों का दरख्तों से संवाद यह बताता है कि अभिव्यक्ति के लिए किसी भाषा की आवश्यकता नहीं होती। मैने अपने प्रोफाइल में भी लिखा है..जड़-चेतन मे अभिव्यक्त हो रही अभिव्यक्ति को अपने शब्दों में कहने का प्रयास करता हूँ। दरअसल जर्रा-जर्रा अभिव्यक्त हो रहा होता है। उसको समझने के लिए भाषा नहीं, संवेदना होनी चाहिए। पेड़-पौधे तो जीवधारी हैं।

    राइट बंधुओं ने पंछियों को देख कर यह सोच लिया कि मनुष्य भी उड़ सकता है। और उनकी इस सोच को उनके नाम पेटेंट मान लिया गया! जबकि इस कथा को पढ़कर पता चलता है कि अमेरिका के ही आदिवासी बहुत पहले ऐसा सोच चुके थे!! वैज्ञानिक समाजशास्त्र के इस पहलू को पढ़े होते तो संपूर्ण श्रेय राइट बंधु नहीं पाते।

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  12. धन्यवाद , टीप के अंतिम पैरे के लिए विशेष धन्यवाद !

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