बुधवार, 30 मई 2012

इस तरह से धरती आबाद हुई !

उन दिनों परमात्मा के दो पुत्र धरती पर रहते थे ! तब धरती सपाट हुआ करती थी और उसमें पर्वतों की निर्मिति नहीं हुई थी ! परमात्मा के पुत्रों को शिकार का बेहद शौक था , किन्तु धरती के समतल होने के कारण सूकर और हिरन आदि जीवों को पकड़ने का कोई अच्छा स्थान नहीं था ! शिकार की असुविधा को देखते हुए बड़े भाई ने सोचा कि धरती पर पानी भर दिया जाये तो पर्वत ऊपर उठेंगे और शिकार के लिए उपयोगी जगह बन जायेंगी ! अपनी सोच के अनुसार उन्होंने धरती पर पानी बहाया और धरती को पानी से भर दिया ! इसके बाद , उन्होंने एक फंदा लगाया और शिकार के कटे हुए सिर रखने वाली बांस की टोकरी ले ली ! वे यह देख कर बहुत प्रसन्न हुए कि बाढ़ आप्लावित धरती पर , उनके शिकारी फंदे में अनेकों जंगली सूकर , हिरन और अन्य बहुतेरे जीव / मनुष्य फंस गये थे ! 

जब परमात्मा ने आकाश से धरती की ओर देखा , तो पाया कि उसके पुत्रों ने धरती पर बाढ़ ला दी है और इस बाढ़ग्रस्त धरती में केवल एक स्थान डूबने से बचा है , जहां एक , भाई बहन को छोड़ कर सारे लोग पानी में बह गये हैं ! वो नीचे उतरा और उसने उन दोनों से पूछा क्या तुम लोग जीवित हो ? उन्होंने ने कहा हां...पर हम ठण्ड से पीड़ित हैं ! यह सुनकर परमात्मा ने अपने श्वान और हिरन को अग्नि लाने के लिए भेज दिया ! कहते हैं कि जब सारी धरती पर पानी भर गया तो अग्नि के रहने के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा ... और फिर वो बांसों , पत्थरों और लोहे में रहने के लिए चली गई ! श्वान और हिरन के बहुत देर तक वापस नहीं लौटने के कारण परमात्मा को चिंता हुई और वो स्वयं उनके पीछे / प्रस्थान दिशा में , गया और अग्नि लाने में देर करने के लिए फटकार लगाई और कहा जल्दी करो ! 

परमात्मा से डांट खाकर , श्वान और हिरन , अग्नि लेकर तैरने लगे , किन्तु थोड़ी दूर जाकर , अतिशय पानी के कारण अग्नि बुझ गई ! यह देखकर परमात्मा ने श्वान और हिरन को पुनः अग्नि लेकर आने के लिए कहा ! इस बार अग्नि लेकर तैरते हुए हिरन की अग्नि फिर से बुझ गई ...और श्वान की अग्नि बुझने ही वाली थी कि परमात्मा ने उसे शीघ्रता से स्वयं ले लिया ! धरती पर जीवित शेष बचे भाई बहन को ठण्ड से बचाने / गर्म रखने के लिए जलाई गई अग्नि के कारण बाढ़ का सारा पानी वाष्प बन कर उड़ गया और धरती फिर से पहले जैसे हो गई , यद्यपि इस बार उसमें पर्वत उभर गये थे ! परमात्मा द्वारा बचाए जाने के उपरान्त भाई बहन ने विवाह कर लिया ,उनके , अनेकों बच्चे और फिर उन बच्चों के , अनेकों बच्चे हुए और इस तरह से धरती आबाद हुई ... !

दक्षिण पूर्व एशियाई प्रशांत क्षेत्र की इस गाथा की शुरूवात में ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे धरती पर परमात्मा के दो पुत्रों और वन्य जीवों के अतिरिक्त अन्य कोई मनुष्य निवास नहीं करता था , किन्तु आगे चल कर कथा रहस्योद्घाटन करती है , कि ईश पुत्रों द्वारा लाई गई बाढ़ और लगाये गये फंदे में वन्य जीवों के साथ मनुष्य भी फंसते हैं ! यह कहना कठिन है कि ईश पुत्र शिकार के रूप में वन्य जीवों को फंसे हुए पाकर प्रसन्न हुए थे कि मनुष्यों को देख कर भी ! यदि वे वन्य जीवों के साथ मनुष्यों को भी शिकार के रूप में देखकर प्रसन्न हुए होंगे तो यह विचार अत्यन्त भयावह है कि ईश पुत्र ना केवल शिकारी और मांसाहारी थे बल्कि आदमखोर भी रहे होंगे ?  बहरहाल , कथा ईश पुत्रों के , मांसाहारी होने का संकेत कथन तो करती ही है ! 

कोई आश्चर्य नहीं कि , यह कथा भी धरती के आदि सृजन की कथा नहीं है बल्कि जल प्रलय के उपरान्त पुनर्सृजन की गाथा है , जिसमें देवताओं के अपने शौक / शायद कहर / या जल प्रलय की नियति , के कारण से मनुष्य जाति नष्ट होकर एक बार फिर से पनपती है  !  सृष्टि के प्रारम्भ में धरती के सपाट होने और पर्वतों के नहीं होने का कथन अदभुत है , जैसा कि आज के समय में हम भी मान रहे हैं कि पर्वत श्रृंखलायें धीरे धीरे ऊंचाई की ओर अग्रसर हैं ...और वास्तव में उनका निर्माण कैसे हुआ होगा / हो रहा है ? भाई बहन का ठण्ड से कांपना / पीड़ित होना , शायद जलातिरेक अथवा हिमयुग के संकेत देता हो , परन्तु अग्नि के विषय में इस आख्यान के विवरण हैरान कर देने वाले हैं ! कथा कहती है कि अतिशय जल के कारण अग्नि के रहने का कोई स्थान नहीं बचा और वो बांस , पत्थरों और लोहे में रहने के लिए चली गई ! नि:संदेह पाषाण घर्षण , लौह घर्षण और बांसों के घर्षण से अग्नि प्रज्ज्वलित करने वाले मनुष्य के अपने , प्रारम्भिक अनुभव और सुदीर्घकालिक व्यवहार की निष्पत्ति यही है कि अग्नि , बांस / पत्थर / लोहे से उपजी ,पैदा हुई अथवा वहां निवास करती थी ! 

अन्य कई लोक आख्यानों की तरह इस भूभाग के जल प्रलय में भी , केवल भाई बहन ही जीवित बचते हैं ! यह महज़ एक संयोग है या फिर संकट के समय , अपने निकट स्वजन को बचा पाने की मानवीय प्रवृत्ति का परिणाम ? पक्का कुछ कह नहीं सकते , पर संभावना निकट स्वजनता के प्रति हमारी भावनाओं के पक्ष में तो झुकती ही है ! अंततः कथा जीवित शेष रह गये भाई बहन के वैवाहिक जीवन और उनकी संतानों से धरती के आबाद हो जाने की कहन के साथ समाप्त हो जाने के बजाये आगे बढ़ती है ...



36 टिप्‍पणियां:

  1. अधूरी कथा भी लिख डालिए सर जी। रोचक सीरियल में ब्रेक बहुत खलता है।

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    1. देवेन्द्र जी ,
      मुझे लगा कि कथा का ये टुकड़ा अपने आपमें पूर्णता का आभास कराके , आपसे बढ़िया सी प्रतिक्रिया खींच लेगा और इसी चक्कर में मैंने इसकी विवेचना भी कर डाली पर अफ़सोस , आपकी प्रतिक्रियात्मक कृपणता के आगे सारा जतन फेल हो गया :)

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    2. रोचक सीरियल में ब्रेक बहुत खलता है। ब्रेक में कमेंट किया डायरेक्टर ने दूसरी व्याख्या कर दी तो अपन गये काम से। इसे कृपणता नहीं सजगता कहिए। दूसरे टीपाकार भी यही किये हैं।:) चलिये सजगता छोड़ कुछ लिखने का प्रयास करता हूँ....

      ईश पुत्रों ने जब धरती को पानी से भर दिया और टोकरी फैलायी तो उसकी टोकरी में जानवरों के साथ मनुष्यों का भी फंसना स्वाभाविक है। मनुष्य फंसते नहीं तो कहाँ जाते? इससे यह सिद्ध नहीं हो रहा है कि वे आदमखोर भी थे।

      धऱती के पहाड़ के रूप में ऊपर उठने की कल्पना अद्भुत है।

      जब धरती नष्ट हो रही थी तब भाई-बहन ही बचे थे। इसे कथन में (या दूसरे लोक आख्यानो में भी) भाई-बहन की कल्पना नई सृष्टि के बाद प्रचलित धर्म, सामाजिक कानून के तहत जीवन जी रहे लोगो ने की है। इससे यह भी नहीं सिद्ध होता कि प्रलय से पहले प्रचलित समाज में आज जैसे धर्म हैं वैसे ही धर्म रहे होंगे या नहीं, आज जैसे सामाजिक रीति रिवाज हैं वैसे रहे होंगे या नहीं। निश्चय ही कुछ भिन्न तो होंगे ही। इतना ही क्यों..इससे यह भी सिद्ध नहीं होता कि प्रलय से पहले जो सृष्टि थी उसमें भाई-बहन जैसे शब्द भी हुआ करते थे या नहीं। यह सब तो इस सृष्टि के पूर्वजों के दिमाग की उपज हैं।

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    3. देवेन्द्र जी ,
      मेरी द्वारा कही गई कृपणता के स्थान पर आपके द्वारा स्थापित सजगता के लिए धन्यवाद :)

      ईश पुत्रों के आदमखोर होने का कथन प्रश्नवाची है / शंकावाची है , 'रहे होंगे ?' और ये भयावह विचार इसलिये किया गया क्योंकि वे शिकार ( जिसमें मनुष्य भी सम्मिलित है ) को फंसे हुए देखकर प्रसन्न हुए ! ज़ाहिर ये है कि हमने ईश पुत्रों का आदमखोर होना सिद्ध नहीं किया है !

      निश्चय ही उस समय का समाज / धर्म / जीवन शैली आज के जैसी नहीं थी और आने वाले कल का समाज भी आज जैसा नहीं रह जाएगा ! सामाजिक बदलाव की आपकी सोच सही है ! वे सरल समाज थे और हम अपेक्षाकृत विकसित और जटिल समाज ! तबके समाज की गाथा कहने वाले बंदे ने अगर भाई बहन 'शब्द' का उपयोग किया है तो यह ज़रूर चलन में रहा होगा पर...प्रलय से पूर्व क्या था ? कह नहीं सकते !
      प्रलय का सामान्य कारण ये बताया जाता है कि ईश्वर तब के मनुष्य की ईश विमुखता / दुष्टता / खुराफातों से कुपित था ! क्या पता कि प्रलय पूर्व के मनुष्य किस किस किस्म की दुष्टतायें कर रहे थे :)

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  2. आह ... लगता है ब्‍लॉग पर भी रि‍मोट लेकर ही आना होगा... ब्रेक आया नहीं कि‍ से गए वो गए..

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    1. काजल भाई ,
      मामला कुछ ज्यादा ही लंबा होते दिखा सो टुकड़े कर दिये वर्ना मैं खुद इस पक्ष में नहीं रहता हूं :)

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  3. ..इसमें अग्नि के बांस,पत्थर और लोहे में निवास की कथा तो वास्तविक लगती ही है,अन्य दृष्टान्त भी मानव के पुनर्सृजन की कहानी कहते हैं.इससे सम्न्बंधित निष्पत्तियां भी साथ में आपने दे दी हैं,अब पूरा होने पर शायद और कुछ कह सकूँ !

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    1. संतोष जी ,
      यही बेहतर है , आपके कह पाने का इंतज़ार रहेगा !

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  4. पंडित जी, (अली सा - इस संबोधन के लिए बुरा नहीं मानेगे - मेरी नज़र में जो विद्वान वो पंडित - बाकि कबीर ने तो ढाई अखर की बात की थी) लगता है आप धरती पर मानव जीवन के उत्थान पर एक एन्केसाईलोपिडिया बनाने में व्यस्त हैं - और आपकी पिछली पोस्टें उन्हीं की एक कड़ी हैं.

    मानव जाति की हर सभ्यता ने एक कहानी पेश की है - दुनिया बनने से लेकर - विनाशकाल तक...

    इंसानियत के नाते ये तय है कि सभी में कहीं न कहीं भाई बहिन का रिश्ता ही है - ये फिलोसोफी ब्रह्मकुमारी मिशन से मेल खाती है....

    गर इंसान सभी एक थे - या फिर एक है - इंसानियत नाम कि कोई वस्तु है तो फिर कोई ईमान वाले क्यों ओर कोई काफ़िर क्यों. ये हम लोग क्यों नहीं सोचते.

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    1. दीपक जी ,
      आप प्रेम से जो भी संबोधन दें स्वीकार है ! सच कहूं तो ये कथायें , मित्रों द्वारा मुझसे जबरिया लिखवाई जा रही हैं , वर्ना आपको याद ही होगा कि मैं , पांच छै अंक पहले प्रेम पर लिखने में भिड़ा हुआ था !

      मुझसे पूछें तो एक ही बात कहूं कि जो आप हैं , वही मैं हूं , सो और सब भी ...पर उन महापुरुषों का क्या करूं जिन्हें ये छोटी सी बात समझ में नहीं आती !

      लोक आख्यानों और आगे चलकर विकसित हुई ब्रह्म कुमारी मिशन जैसी अन्य फिलासफी में सातत्य ज़रूर हो सकता है !

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    2. "मित्रों द्वारा मुझसे जबरिया"

      हम्म तब तो हमे आपका नही मित्रों का धन्यवाद करना होगा। वैसे इस श्रृंखला मे एक पूरी पुस्तक की संभावना है!

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    3. आशीष जी ,
      :)
      मैंने आख्यानों का एक छोटा सा हिस्सा छुआ है वर्ना ये तो अपने आपमें एक असीम संसार है ! पुस्तक की संभावना तो खैर बनती है पर जल्द ही मेरी थोड़ी बहुत फुर्सत / छुट्टियों का वक़्त छू हो जाने वाला है , देखें कहीं लय टूट ना जाये !

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  5. एक नए लोक आख्यान से परिचित कराने का आभार....अगले भाग का इंतज़ार

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    1. जी , बहुत बहुत शुक्रिया !

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  6. बढ़िया कथा है भाई जी ,
    ऐसा लगता है ...
    ....जारी

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    1. सतीश भाई ,
      आपका इंतज़ार रहेगा !

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  7. जारी का इन्तजार हमें भी है, फिलहाल हाजिरी दर्ज कर ली जाए.

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  8. ये भाई बहन की ग्रंथि कैसे इन कथाओं की स्मृति शेष है यह बात हैरान करती है ....
    आज ये कथाएं हमारे सामने लोकाख्यानों दंतकथाओं या मिथकों के अवशेष रूप में जिन्दा हैं...मगर इंटर प्रेटेशन बड़ा रिस्की मामला है -जग हंसाई भी और बुद्धिजीवियों की ओर से आलोचना -प्रत्यालोचना का खतरा भी है ! मगर फिर भी आपने ऐसे रिस्की विषय को उठाया है तो पूरा निर्वाह कर ही डालिए ..मुझे अगर कुछ ख़ास खटका तो टोकूंगा ..अभी तक तो यह भाई बहन वाली गुत्थी ही कुछ असहज कर रही है !

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    1. अरविन्द जी ,
      रिस्क तो खैर हैं हीं ! कब किसे क्या बुरा लग जाये कह नहीं सकते :)

      आप से बेहतर कौन जानेगा कि खास तो दूर लोगों को आम सी बातें भी बुरी लग जाती हैं :)

      सामाजिक जटिलताओं के समय वाली हमारी परवरिश , सामाजिक सरलताओं वाले समय की सहजताओं के प्रति हमें असहज करे तो इसमें आश्चर्य कैसा :)

      आलोचनाओं की परवाह नहीं पर कुंठाओं का क्या करूं , सलवटें इतनी हैं कि हटाये नहीं हटती :)

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  9. अपने निकट स्वजन को बचा पाने की मानवीय प्रवृत्ति का परिणाम ?
    इस पर एक चुटकुला याद आ रहा है . पत्नी अपने पति से पूछती है यदि मै और आपकी माँ एक साथ डूबने लगे तो आप पहले किसे बचाओगे . पति को असमंजस में देख पत्नी कहती है कि रहने दो, तुम तो अपनी माँ को ही बचा लेना , मुझे तो कोई भी बचा लेगा :)... हास्य है मगर इन लोक आख्यानों से जुड़ जाने पर गंभीर दर्शन नजर आता है इसमें ...क्या आवशयक है कि भाई बहन ही बचे होंगे , लगभग हर कथा में सिर्फ भाई बहन का बच जाना असहज करता है , मगर लोक आख्यानों में जो है वह है ही ..
    यह भी हैरान करता है कि नवसृजन की अवधारणा को ब्रह्मकुमारियों से कैसे जोड़ा जा सकता है !!

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  10. ये भाई-बहन जैविक हैं या सामाजिक या फिर एक ही योनि के दो सदस्‍य होने के कारण, उत्‍पत्ति-स्रोत-अस्तित्‍व समानता के कारण भाई-बहन कहे जाते हैं.

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    1. राहुल सिंह जी ,
      एक बेहतरीन प्रश्न...पर इसका जबाब सभी मामलों में पक्का है ये कह भी नहीं सकते , इसका कारण आपको स्वयं पता है :)

      ग्रीक / रोमन / मिस्री और कतिपय अन्य क्षेत्रों के आख्यानों से वे सगे भाई बहन (जैविक) माने जा सकते हैं क्योंकि वहां पर इसका उल्लेख भी मिल जाता है ! इन क्षेत्रों की कथायें मेरे लेखन एजेंडा में हैं , अब देखिये कि उनका नम्बर कब आएगा !
      अनेकों आख्यानों में केवल भाई बहन का संबोधन तो है किन्तु उसका पैतृक / जैविक / पुष्टिकरण / उल्लेख नहीं है ! ऐसे में आपकी दूसरी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता , बल्कि मेरा तो ख्याल है कि इससे बहुतों को राहत मिलेगी :)

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    2. इस मुद्दे पर, आपकी ओर से फिल्‍म ब्‍लू लगून की चर्चा रोचक और महत्‍वपूर्ण हो सकती है, यानि अगर आप एक पोस्‍ट की तैयारी करें. किमी काटकर वाली टारजन जैसी कुछ और फिल्‍में हैं, जिनमें दिखाया जाता है कि दो हमउम्र विपरीत लिंगी का आपसी व्‍यवहार भाई-बहन और मित्र (थोड़ी खींचतान के बावजूद सहयोगी) जैसा होता है फिर बिना किसी सामाजिक संदर्भ और परिप्रेक्ष्‍य के इस राग का आकर्षण-प्रबल दैहिक अनुवाद होने लगता है. भारतीय परम्‍परा में श्रृंगी ऋषि की कथा मजेदार है. शायद कोई भी (दंत-लोक कथाकार) आदिम स्थितियों की कथा कहने का प्रयास करे और कुछ रूपक के साथ कहें, तो इसी तरह यानि भाई-बहन और उनकी शादी की तरह से ही कहा जाएगा. परिवार संस्‍था की आवश्‍यकता और रिश्‍तों की सामाजिकता और उसके ऐतिहासिक संदर्भों से जो अच्‍छी तरह परिचित न हो, उन्‍हें आपके द्वारा इस तरह प्रस्‍तुत कहानियों से अवश्‍य ठेस लग सकती है, बात को आपने तथ्‍यतः (निर्दोष नादानी से) रखा है, ऐसा मान कर आपकी जिम्‍मेदारी कम नहीं हो जाती :). उपयुक्‍त और आवश्‍यक संदर्भ न हो तो ऐसी बातों में, बातों पर कम आपकी नीयत पर अधिक विचार होने लगता है. :):)

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    3. राहुल सिंह जी ,
      ब्ल्यू लैगून की चर्चा जहां उचित लगी थी कर चुका हूं ! किसी आदिम कथा को उसके कथाकार ने किस हाल में कहा है , इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हुआ करता क्योंकि वह वाचिक परम्पराओं का हिस्सा है उसके बारे सभी अध्येता अपने अपने ढंग से सोच सकते हैं ! इसलिए जो उपलब्ध है उसपर मैंने भी अपने ढंग से व्याख्या करने की कोशिश की , आप भी कर सकते हैं ! इन कहानियों के संकलनकर्ताओं के वास्तविक 'संदर्भ होने' पर मैं आपसे पहले भी कभी चर्चा कर चुका हूं ! फिलहाल इतना ही कह रहा हूं कि इन कहानियों के वृहत पुनर्प्रस्तुतिकरण की मेरी अपनी कोई योजना है ! सो अवसर आने दीजिए वहां आख्यान संकलनकर्ताओं / सन्दर्भों पे भी चर्चा की ही जायेगी ! भले ही कथायें बहिरागत संसार की हैं पर उनसे ठेस देशज समुदाय के पाठकों को लग सकती है ? क्या कहूं ? हतप्रभ हूं ! पाठकों की बौद्धिकता और निर्णय लेने की क्षमता पर मेरा ऐसा अविश्वास कभी नहीं रहा है ! इसलिए केवल इतना ही कहूंगा कि अगर कोई बंदा जानबूझकर ठेस का लगना तय ही कर ले तो मेरे सामने विकल्प ही क्या शेष रह जायेगा ? ...निर्दोष नादान प्रस्तुतिकरण के स्वतः संज्ञान और उसके फलस्वरूप निज जिम्मेदारियों के कम नहीं होने तथा 'बातों' की बजाये मेरी ही नियत पर विचारण जैसी निष्पत्तियों पर क्या प्रतिक्रिया दे सकता हूं :)

      आपका हार्दिक आभार :)

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  11. वाणी जी ,
    सबसे पहले चुटकुले का आनंद लिया :)
    ज़रा गौर से देखें तो , पत्नि का कथन भी , समाज में मौजूद , एक खास मानवीय प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है :)

    अब टीप का शेष भाग...प्रश्न वाचक चिन्ह एक संभावना ही है , साबित क्या होगा कह नहीं सकते !

    बिल्कुल भी आवश्यक नहीं है कि भाई बहन ही बचें ! कई आख्यानों में यह एलीमेंट नहीं भी है , पर बात घूम फिर कर वही कि लोक आख्यानों में जो है वो है !

    ब्रह्म कुमारी वाली फिलासफी और लोक आख्यानों में समानता वाला कथन मूलतः दीपक बाबा जी का है , मैंने केवल, इस वाक्य में "ज़रूर हो सकता है" जोड़ा है ! अब निवेदन ये है कि "हो सकता है" मात्र संभावना है और "ज़रूर" उस पर दिया गया जोर ! इसलिए इस मसले में , मैं अपने दोनों हाथ ऊपर खड़े कर रहा हूं :) इस मुद्दे पर चर्चा दीपक जी को करनी चाहिए !

    कुल मिलाकर आपका कमेन्ट मुझे पसंद आया !

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    1. मुझे आपका जवाब पसंद आया ||

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    2. वाणी जी / संतोष जी ,
      चुटकुले से उपजे हास्य ने एक पुरानी पोस्ट याद दिला दी है लिंक दे रहा हूं http://ummaten.blogspot.in/2009/02/blog-post_27.html

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  12. लगता है अपना तो इवोल्यूशन ऑफ़ मैंन के बारे में पढ़ा लिखा सब बेकार हो गया :)
    वैसे भी स्कूल कॉलिज में पढ़ा लिखा काम ही कितना आता है असल जिंदगी में !

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    1. डाक्टर साहब ,
      आपका पढ़ा कुछ भी बेकार नहीं गया , वो सब आज के काम आ ही रहा है , मगर हम जो बांच रहे हैं उसे आपके पढ़े से माइनस करके आने वाले कल में होने वाले बदलाव को जानना आसान हो जायेगा :)

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  13. वस्त्रहीन नृतत्व शास्त्री सामाजिक आदिम स्थितियों में स्वयं को रख कर बिना स्माईली के भी कुछ विचार करना चाहेगें। :))

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    1. @ वस्त्रहीनता ,
      नि:संदेह नृतत्वशास्त्र के विद्यार्थियों को अध्ययन करने के लिए ऐसा भी करना पड़ सकता है !

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  14. लोक आख्यानों पर यह आपके दृष्टिकोण आधारित समीक्षा ही तो है। और चर्चा को अवकाश भी है। किन्तु प्रतिक्रियात्मक सारे भिन्न दृष्टिकोणों को आप असहिष्णुता से खारिज कर देते है। कहीं यह आपके समीक्षीय धारणाओं का खांचा तो नहीं? या असम्मानजनक नकार:)
    क्योंकि, जब सभी तथ्यों को रूपक की तरह विश्लेषित किया जा रहा है तो रिश्ते भी रूपक की तरह प्रस्तुत करना सम्भव है ऐसे में आप विचार को अवसर न देकर "मैं क्या कर सकता हूँ?" में सलटा देते है।

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  15. किन्ही मित्र ने मुझसे क्या कहा है ? उनसे हुई 'पिछली चर्चा' हवाला देकर मैंने उनके कमेन्ट पर क्या कहा है ? यह दो व्यक्तियों के बीच का संवाद है ! ज़ाहिर है कि इसकी 'पृष्ठभूमि से अपरिचित' होकर भी आप जंप लगाकर निर्णय ले बैठे !

    कभी आप मेरे विचारों को विष से जोड़ते हैं , कभी असहिष्णुता से और कभी असम्मानजनक नकार से ! बहरहाल आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद !

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  16. माननीय अली सा,

    ब्लॉग सार्वजनिक मंच तो है ही साथ ही उस पर चर्चा मनन मंथन सार्वजनिक पठन में आता ही है। सदाशयता का तकाज़ा है कि दो व्यक्तियों के बीच का संवाद में बलपूर्वक सम्मलित नहीं होना चाहिए किन्तु उनके प्रस्तुत विचारों पर मनन तो किया ही जा सकता है। नेट खुल्ला मंच है और यत्र तत्र प्रस्तुत हमारे विचारों से हमारी विचारधारा की मैपिंग होती रहती है। कुलमिलाकर हम जो कहते है वही तो हमारी धारणाएँ होती है।

    मैं किसी के एक आध विचार से प्रभावित हो जब उनके व्यक्तित्व में रूचि लेता हूँ तो उनके कृतित्व को पढ़ता हूँ। मैनें आपके अधिकांश आलेखों को पढा है। बहरहाल… आपकी 'उन दिनों…' वाली पोस्ट भूमिका के कथन- "इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि चिंतन और समझ के स्तर पर हम स्वयं को , स्वनिर्धारित खांचे से बाहर जाकर दूसरी परवरिशों के सत्य को स्वीकार करने की अनुमति तक नहीं देते ! बौद्धिक परिमार्जन के द्वार बंद रखने की इस कवायद में , हद दर्जे की सनक , असहिष्णुता और पूर्वाग्रहों से गहन मैत्री के भाव लिए हुए हम , अपने कूप से बाहर के संसार और उसके आलोक सह अन्धकार के प्रति केवल नकार के सुर उचारते हुए जीवन गुज़ार देते हैं !" से आपको 'विचारों' के प्रति भी हद दर्जे की सहिष्णुता का पक्षधर महसुस किया था। अब यहां आपको 'भिन्न विचारों के प्रति असहिष्णुता' और 'असम्मानजनक नकार' करते देखा तो कह उठा। हालांकि मैं स्वयं इस विचार से सहमत नहीं था। मैं मानता था व्यक्ति या जनसमुदाय का सम्मान तो किया जा सकता है पर किसी विचार का सम्मान करना अर्थात् उससे सहमत होने के समान है।

    आपके विचारों को विष से मैने कभी नहीं जोडा। यह तो आपको सामान्यतः खुले मन से चर्चा करते देखता हूं तो जो मैं सोचता हूँ कहने का साहस कर लेता हूँ। लेकिन द्वेषभाव से नहीं, बस कुछ परस्पर विरोधाभासी भासित होता है तो सौहार्द देखकर व्यक्त करता हूँ। ठेस पहुँचाना मेरा लक्ष्य नहीं न आपके प्रभाव को चोट पहुँचाना। फिर भी आपको अन्यथा महसुस हुआ तो क्षमा चाहता हूँ।

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    1. इस मुद्दे से जुड़े कुछ पहलुओं पर हम पिछले एक वर्ष से चर्चा कर रहे हैं , वो चर्चा आगे भी जारी रहेगी ! इसकी तुलना में इस श्रृंखला की आयु एक माह भी नहीं है !

      खैर...आपने जो भी कहा , मैं उसके लिए आपको धन्यवाद दे ही चुका हूं ! पुनः आभार !

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