शुक्रवार, 11 मई 2012

तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो ...!

कह नहीं सकते कि जगजीत कौर साहिबा ने इसे पहली बार कब गाया और फिर हमने इसे पहली बार कब सुना लेकिन जब भी सुना , अच्छा लगा कि नायिका , नायक के रंज-ओ-ग़म बांटने के लिए सहर्ष तैयार है  ! इसे सुनते हुए एक फीलिंग ज़रूर होती कि कभी हम भी दुखी हुए तो  ? ... पर कौन  ?  जाने पहचाने चेहरे दर चेहरे धाड़ धाड़...धाड़ करके आंखों के सामने कौंधने लग जाते और फिर मिनटों में गाना खत्म की तर्ज़ पर रंज-ओ-ग़म बांट लेने वाली ‘अनिश्चया’ का हसीन ख्वाब भी खत्म हो जाया करता !  उस वक़्त यह अंदाज़ नहीं था कि रंज-ओ-ग़म बांटने का ये सिलसिला एकतरफा नहीं हुआ करता होगा !  कह नहीं सकते कि ये गीत में निहां ज़ज्बात और रूमानियत थी याकि अपने अन्दर का स्वार्थी जीव , जो , रंज–ओ-ग़म के एकतरफा डिस्पोजल के सिवा कुछ सूझता ही नहीं था !

आज सुबह सुबह बीबी ने जगा दिया...जाओ मेरे भाई को बस स्टेंड तक छोड़ कर आओ ! सुबह ठीक से जागी भी नहीं और हम जगा दिये गये ! मामला रंज-ओ-ग़म का नहीं था पर सुबह की नींद खोकर अहसास हुआ कि बांटना एकतरफा नहीं होता ! सड़क पर पसरे सन्नाटे के दरम्यान जो ज़रा सी चहल पहल नज़र आई वह चर्बी की अतिशयता वाली थुलथुल भदेस देहों और बेहद तनाव में नित्यकर्म निपटाते हुए जैसे चेहरों की वज़ह से खुशगवार तो क़तई भी ना थी ! किसी के हाथ में लकड़ी और किसी की चाल गोया उसे सिर्फ दाहिने बायें चलने के लिए ही ट्रेंड किया गया हो ! बहरहाल घर लौटते ही तुलसी पत्ती की चाय से सारा गिला जाता रहा ! अब बस एक ही ख्याल ये बीबियां कितना ख्याल रखती हैं अपने शौहरों का !

अभी कुछ रोज़ पहले ही काम से बाहर गये थे , वहां से बीमार वापस लौटे तो बीबी की फ़िक्रों और तीमारदारी ने अपने अंदर का हर कोना सुख से भर दिया ! उनकी सेवा का सम्मोहन इतना कि एक ही बार कहे से मान गये कि आजकल राजू की दुकान पर कपड़े अच्छे आये हैं ! बहरहाल पाकेट खाली ! अव्वल तो ये मालूम ना था कि बांटना दोतरफा होता है पर बीमारी के दौर से गुज़रते हुए खबर ये भी हुई कि बांटने से कई बार दुःख नहीं भी होता है ! अब सोचता हूं कि जगजीत कौर साहिबा ने जिस नायिका के लिए वो गीत गाया , वो खुद भी रंज को बांटने का सुख लूटना चाहती होगी और हम थे कि माने बैठे थे कि रंज बांटने से उसे भी थोड़ा बहुत रंज होने जाने वाला होगा ! धुत ...पुराना ख्याल ! 

कहना केवल ये है कि मोहतरमा ने उन दिनों रंज-ओ-ग़म बांटने के ख्याल को हवा क्या दी कि हम भी हवा में उड़ते फिरते...अपना भी , रंज-ओ-ग़म...कोई सुहृदया ?...पर कौन ? पता नहीं ?...वही जाने पहचाने चेहरे...तूफ़ान की रफ़्तार से नज़रों के सामने से भले ही गुज़र जाते पर अंदर ही अंदर देर तक अच्छा लगता रहता  !  अब लगता है कि गाने , अगर सुर में हों , तो अंदर ही अंदर की खुशनुमा फीलिंग्स और बाहर ही बाहर के कठोर यथार्थ के सारे भेद मिटा डालते हैं  !  इन लम्हों में , रंज-ओ-ग़म के लेन देन , कहे / बोले / गाये , भले ही जायें पर हकीक़त में वे लेन देन हुआ ही नहीं करते हैं  ! अपनों के चेहरों पे पसरे / बिखरे सुकून को लेकर भी कोई वणिकों की तरह से सोचता है भला ?



 ( जानता हूं कि ज्यादातर शौहर एक ही भट्टे के तपे हुए होते हैं सो मेरे लिखे को अपना ही सुख दुःख समझ कर बर्दाश्त कर लेंगे )

36 टिप्‍पणियां:

  1. ...बहुत पुराना और अपना गाना याद दिला दिया गुरूजी ! मैं जब भी एकांत में होता हूँ,सच पूछिए फरीदा खानम,मेहँदी हसन,मुन्नी बेगम या जगजीत कौर साहिबा जैसों को सुनना पसंद करता हूँ.यकीं मानिये ,मैं यह सब तब सुनता हूँ,जब बहुत खुश होता हूँ.इस तरह के गीत बिलकुल दिल को छूते हैं,रंज और गम भी दूर करते हैं !

    @बस एक ही ख्याल ये बीबियां कितना ख्याल रखती हैं अपने शौहरों का !
    बिलकुल मुरीद हूँ मैं भी इस बात का.मेरी पत्नी मुझसे कहीं ज़्यादा ख्याल रखती हैं मेरा और मैं बेख्याली में डूबा रहता हूँ ब्लॉगिंग की दुनिया में !

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    1. आप जिन्हें सुनते हैं वे सब अपने फन के माहिर हैं ! उन्हें जितना भी सुना जाये , जी नहीं भरता ! भाभी जी आपका ख्याल रखती ये अच्छी बात है ! आपको भी ब्लागिंग से समय चुराकर भाभी को समय देना चाहिये !

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    2. @आपको भी ब्लागिंग से समय चुराकर भाभी को समय देना चाहिये !

      यही तो नहीं कर सकता !

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    3. यही तो नहीं कर सकता ? बुरी बात !

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  2. मुश्किल से 'सुखदुखे समेकृत्वा...........' साधने की कोशिश की थी, अब आपकी भविष्यवाणी\सलाह\अंदेशा\ परिहास को मानते हुए बर्दाश्तने की कोशिश करे लेते हैं जी :)

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    1. मो सम कौन जी ,
      इसी भरोसे पर तो भविष्यवाणी / सलाह / अंदेशा / परिहास किया था जी :)

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  3. @ अब बस एक ही ख्याल ये बीबियां कितना ख्याल रखती हैं अपने शौहरों का !

    साले साहब को बस स्टाप छोड़ने न जाते तो असली चाय का टेस्ट पता चलता भाई जान .....

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    1. ख्याल रखने वाली चाय तो रोज़ ही मिलती है भाई ! यूं समझिये कि उसके स्वाद से गिला जाता रहा वर्ना बसस्टेंड जाना तो मुझ पर थोपा गया एक्स्ट्रा काम था ही :)

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  4. शीर्षक देखकर खिंची चली आयी. मुझे ये गीत बेहद पसंद है, बचपन से ही. तब तो इसके संगीत के कारण सुनती थी. जब प्रेम हुआ था तो समझ में आया इसका अर्थ. अब ये बीते दिनों की याद दिलाता है :)

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    1. @ गीत ,
      वे सम्पूर्ण अपनापे के साथ हम पर काबू करते हैं ! कभी हीलिंग टच देते हैं और कभी ह्रदय को निचोड़ लेने वाली अनुभूतियां ! वे अकेले ऐसे मित्र हैं जो चाहे जितना भी दुःख दें हम शिकायत नहीं करते :)

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    2. अब मैं सोच में पड़ गया हूँ कि अपनी अगली पोस्ट का शीर्षक क्या लिखूँ ! :)

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    3. ये आप रख लीजिए मै दूसरा बदल लेता हूं :)

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  5. बाकी तो भरम हैं मन के ,सकूं तो यहीं है यहीं है यहीं है !
    मैं तो वैसे भी कभी कभार बीमार होने नाटक कर जाता हूँ और यह सुख हलोरता हूँ ...
    बीमार पड़ने पर ही क्या सुख हलोरना ...
    अभी क़ल ही तो कहा चक्कर आ गया है ...तेल मालिश और न जाने क्या क्या फुरहरी सी दौड़ती रही रंगों पर ..
    हे यह गोपनीय फार्मूला है केवल आपके यहाँ साझा कर रहा हूँ ! :)

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    1. अरविन्द जी ,

      'बाकी तो भरम हैं मन के ,सकूं तो यहीं है यहीं है यहीं है'

      ये तो अच्छा ख़ासा लिख दिया आपने ! क्या आप इस लाइन में एक और लाइन जोड़ सकते हैं ?

      कभी गोपनीय फार्मूला ओपनीय हो गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे :)

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  6. अपनों के चेहरों पे पसरे / बिखरे सुकून को लेकर भी कोई वणिकों की तरह से सोचता है भला ?
    जितने भी पति हैं ,उनकी पत्नियों पर इतनी तोहमतें , प्रोटेस्ट किया जाएगा :)
    निर्मल हास्य को एक तरफ रखे तो सही बात है कि यदि जीवन साथी वफादार , प्यार करने वाला है तो उसके जैसी देखभाल कोई नहीं कर सकता और यदि दुष्ट , अत्याचारी है तो उसके जैसा दुखी कोई नहीं कर सकता ! मेरी टिप्पणी बिना लिंग भेद के पढ़ी जाए !

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    1. आपकी टिप्पणी बिना भेदभाव के पढ़ी गई :)

      तोहमतें कहां , पतियों को तो वणिक की तरह ना सोचने की सलाह दी गई है :)

      सच है आपसी विश्वास और समर्पण महत्वपूर्ण है , वर्ना जीते जी नर्क तो है ही !

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  7. 'shanti'.....sundar hoti hai.....lekin 'sangeet'...usme shondarya bhar deta hai....

    bhavon ke abhivyakti ke liye shangeet sabse sundar sadhan hain.....


    bakiya baton pe hum aap-ke-hi formule pe chalne wale hain???


    pranam.

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    1. सञ्जय जी ,
      आपकी प्रतिक्रिया अदभुत है !

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  8. जानता हूं कि ज्यादातर शौहर एक ही भट्टे के तपे हुए होते हैं सो मेरे लिखे को अपना ही सुख दुःख समझ कर बर्दाश्त कर लेंगे।

    ..इत्ती बढ़िया लाइन इत्ते छोट में शर्माकर क्यो लिखी आपने? :)

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    1. सिगरेट के डिब्बे पे चेतावनी की तर्ज़ पर मैं तो शौहरों के लाज रख रहा था ! ये आप हैं जो उन्हें '...' किये दे रहे हैं :)

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  9. अली सा.
    जब दुबई में था (जहां की जुबान पैसे की जुबान है) तो एक दोस्त ने पेशकश की कि भाभी जी (मेरी शरीके हयात) के लिए मेरी नज़र में एक नौकरी है. मैंने इनसे पूछा कि क्या इरादा है तो वे रूमानी अंदाज़ में, जो बीवियाना कम, माशूकाना ज़्यादा था, बोलीं, “आपके ऑफिस से और बिटिया के स्कूल से आने का इंतज़ार और आप दोनों की मुस्कराहट का मुआवजा... इससे ज़्यादा मुझे कुछ भी दरकार नहीं!”
    हम तो इसी भट्ठे के तपे हैं.
    ये गाना और इस फिल्म के सभी गाने समां बाँध देते हैं.. “पर्बतों के पेड़ों पर” एक पेंटिंग की तरह लगता है, और “गोरी ससुराल चली” ठेठ पंजाबी विवाह-गीत. “तुम अपना रंजोगम” साहिर साहब का कलाम है, लिहाजा बयानी एक एक मर्द की है, बस एक्सप्रेस एक नायिका की जुबानी हुई है.. और साहिर साहब तो उस भट्ठे तक पहुंचे ही नहीं, फिर भी आज उनकी रूह को सुकून हासिल हुआ होगा कि कई भट्ठे के तपे लोगों ने उन्हें याद किया.. :)
    वैसे हमारी शरीके हयात हमें रंजो गम से दूर रखने के लिए रोज़े रखती हैं और दुआएं मांगती हैं.. हम भी उनकी दुआओं की लाज रखने को अपना रंजो गम अपने तक ही रख लेते हैं!!
    पुनश्च:
    सुबह ठीक से जागी भी नहीं और हम जगा दिये गये !
    इस लाइन ने दिल जीत लिया!!

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    1. हम तो सुबह के जगने और भट्ठी के सुलगने से पहले ही घर छोड़ कर खुली हवा में घूमने निकल पड़ते हैं।:)

      मैने जिस पंक्ति को हाईलाइट किया उस पर सलिल भैया ज्ञान का ऐसा प्रकाश फैला दिया कि तबियत मस्त हो गई।

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    2. सलिल जी ,
      इस लिहाज़ से आप खुशकिस्मत हैं ! साहिर साहब भट्टे तक पहुंचे हो या ना पहुंचे हों , उनकी फीलिंग्स खासकर जो गीतों में उभरकर आईं , अच्छे से अच्छे भट्टे वालों को मात देती हैं :) और हम जैसे तपे हुए तो उन्हें याद करते ही हैं :)
      जो लाइन आपको पसंद आई वो मैंने आपको नज़र की !

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    3. देवेन्द्र जी,
      साफ़ साफ़ क्यों नहीं कहते कि दूसरों की भट्टियों को देखने के चक्कर में बाहर निकल पड़ते हैं :)

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  10. बॉस : आज तुम देर से क्यों आए ?
    'सॉरी सर '। कल मेरी शादी थी ।
    बॉस : ठीक है । आइन्दा ऐसी गलती फिर मत करना ।

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  11. बोल के साथ साथ...इस गीत की धुन भी बड़ी प्यारी है...और उसपर जगजीत कौर की पुरकशिश आवाज...
    अब तो इस गीत को सुनने का मन हो रहा है..

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    1. ज़रूर सुन लीजियेगा ! पोस्ट के बारे में कुछ नहीं कहा आपने :)

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  12. महसूसने को batane के andaj ,के साथ ham khud को जोड़ लेते हैं तो बात बनती ही है. बढ़िया अली साब.

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    1. डाक्टर साहब ,
      शुक्रिया !

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  13. वो मेरी मैं उसका, गले तक मुझे तो यकीं है, यकीं है, यकीं है,
    भरम कोई बाक़ी नहीं मन में, गर जो सुकूं है कहीं तो यहीं है,
    सुनहरे थे क्या दिन कि लगता था जन्नत, यहीं है, यहीं है, यहीं है,
    मगर अब 'श्री मुख' से सुनते है अक्सर, "नही है, नहीं है, नही है" !
    http://aatm-manthan.com

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    1. बहुत ही खूबसूरत जोड़ बैठाई है आपने ! मैंने कल डाक्टर अरविन्द जी से कह भी दिया था कि वे इसे पढ़ लें ! आगे देखता हूं कि मेरा जोर इस पर चलता है कि नहीं :)

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  14. आखिरी बात बड़ी बारीकी से आई है.

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  15. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....

    इंडिया दर्पण की ओर से आभार।

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