शुक्रवार, 18 मई 2012

लोक आख्यान : सृष्टि का कौन है कर्ता ?

उन दिनों कोई भूमि नहीं थी ! केवल आकाश और समुद्र था और उनके दरम्यान प्रकाश की खोज में एक परिंदा लगातार परवाज करते हुए थक गया था !  तब उसने समुद्र के पानी को आकाश की ओर धकेलना शुरू कर दिया ! इससे विचलित आकाश ने समुद्र को ऊपर बढ़ने से रोकने के लिए कई द्वीप बरसाये  ! ऐसा उसने तब तक किया , जब तक कि , समुद्र का ऊपर की ओर बढ़ना , रुक नहीं गया ! इसके बाद आकाश ने परिंदे को आदेशित किया कि वह प्रकाश युक्त , एक द्वीप में , अपना घोंसला बनाये और समुद्र तथा आकाश को शांति से रहने दे ! यही वो समय था , जब समुद्र और धरती की बयारों ने आपस में ब्याह कर लिया , जिसके फलस्वरूप उनके एक संतान हुई , जो कि एक बांस था !

एक दिन पानी की सतह में  तैर रहा बांस , किनारे की ओर जाते हुए परिंदे  के  पैरों  से  टकरा  गया  !  इस पर क्रोधित होकर , परिंदे ने बांस पर चोंच का तीव्र प्रहार किया , जिसके एक हिस्से से एक स्त्री और एक पुरुष बाहर आये  !  इसके बाद भूकंप ने सारे परिंदों और मछलियों की एक बैठक , बुलाकर पूछा कि , इन दोनों प्राणियों का , क्या किया जाये ? सबने उनकी शादी का निर्णय लिया और फिर शादी के बाद इस जोड़े के , ढेरों बच्चे पैदा हुए जिनसे कि , मनुष्यों की अनेकों प्रजातियां बनी ! अपने वैवाहिक जीवन के कुछ समय बाद , जोड़ा इन व्यर्थ / निकम्मे / निष्क्रिय बच्चों से उकता गया और इन्हें किसी दूसरी जगह भेजने की सोचने लगा , परन्तु उसे कोई दूसरी जगह मालूम ही नहीं थी !

समय गुज़रता गया किन्तु इन बहुसंख्य बच्चों के कारण अभिभावकों को तनिक भी शांति नहीं मिलती थी ! एक दिन निराशा में पिता ने एक लकड़ी लेकर बच्चों को चारों ओर से पीटना शुरू कर दिया ! पिटाई के भय से आक्रांत बच्चे अलग अलग दिशाओं में भागे ! कुछ कमरों में छुप गये और कुछ दीवारों में , जबकि कुछ बच्चे बाहर की ओर भागे ! अनेकों बच्चे समुद्र की ओर पलायन कर गये और कईयों ने फायरप्लेस में पनाह ली ! अब हुआ ये कि जो बच्चे कमरों में छुपे थे , वे कालांतर में इस द्वीप के मुखिया बने और जो दीवारों में छुपे थे , वे दास हो गये ! जो बच्चे बाहर की ओर भागे थे , वे स्वतंत्र मनुष्य हुए , किन्तु जिन्होंने फायरप्लेस में शरण ली थी उन्हें नीग्रो होना पड़ा ! इसके अतिरिक्त जो लोग सुदीर्घ वर्षों के लिए समुद्र के पार चले गये थे , जब उनके बच्चे वापस लौटे तो वे गोरे लोग हुए ! 

सभ्यताओं के उत्कर्ष की गाथायें अपने प्रारंभिक समय में मौखिक परम्पराओं के माध्यम से कही और सहेजी गईं हैं ! फिलीपींस के इस लोक आख्यान में सृष्टि की रचना के लिए जल और आकाश तत्व के अतिरिक्त परिंदे के रूप में चील जैसे पक्षी की मौजूदगी बयान की गई है ! परिंदे के पंखों की हलचल से हवा के दोलित होने और हवा से समुद्र की लहरों के ऊंचे उठने का प्रतीकात्मक बिम्ब इसलिए गढ़ा गया प्रतीत होता है कि , जिसके कारण आकाश बारिश के दौरान जल में घुली हुई मिट्टी से द्वीपों का सृजन कर सके ! कोई आश्चर्य नहीं कि आख्यान , प्रकाश का स्रोत आकाश को मानता है , जिसे उसने अपने बनाये हुए द्वीपों में से एक में रख छोड़ा है ! परिंदे को , निरंतर उड़ान से होने वाली थकान से निपटने के लिए एक आश्रय और प्रकाश की तलाश थी ! उसकी बेचैनी , एक रूढ़ और स्थापित व्यवस्था को तोड़ कर नई व्यवस्था के जन्म का कारण बनती है ! वह घोंसला बनाता है ताकि आगे चलकर इंसान उससे अपने लिए घर / आश्रय की बनाने की प्रेरणा ले सकें ! 

लोक चेतना में धरती और समुद्र की बयारों के ब्याह की कल्पना और उसके परिणाम स्वरुप लंबी घास के रूप में बांस के जन्म का ख्याल अदभुत है ! बांस का पानी में तैरना , मनुष्य के जीवन में , उसकी भावी उपयोगिता का बयान है ! परिंदे की चोंच से बांस के टुकड़े के फूटने और उससे स्त्री पुरुष के सीधे सीधे जन्म को यूं तो कोरी कल्पना कहा जा सकता है !  किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि पोले बांस के अन्दर से किसी कीट के निकलने की साम्यता के आधार पर मनुष्य के धरती पर प्रथम अवतरण की कल्पना की गई होगी ! लेकिन बांस से चोट लगने और परिंदे के प्रतिकार की घटना से , सांकेतिक रूप से बांस और ‘चोंच की’ हड्डी के , हथियार स्वरूप इस्तेमाल के औचित्य के बारे में भी सोचा जा सकता है ! चोट लगने के लिए उत्तरदाई बांस और फिर बांस को फाड़ डालने वाली हड्डी में निहित शक्ति की धारणा मनुष्य के काम की ही थी और उसने नि:संदेह इस शक्ति का उपयोग हर तरह से अपने हक़ में किया होगा ! चाहे तैरने के लिए या फिर घोंसले / नीड़ बनाने के लिए या फिर अपने शत्रुओं से निपटने के लिए ! 

सृष्टि  की रचना के लिए कहे गये इस लोक आख्यान में कमोबेश उन्हीं तत्वों का समावेश किया गया  है जो कि आदिमकाल से  ही मनुष्य के जीवन के लिए उपयोगी रहे हैं  !  इस लोक आख्यान में वर्णित सृष्टि सृजन कर्म , वैज्ञानिक चिंतन परम्परा में कपोल कल्पना भले ही  माना जाये किन्तु आरंभिक मनुष्यों  में , अपने काम की / अपनी उपयोगिता की , वस्तुओं को चिन्हित कर , उन्हें अपनी स्मृतियों में अमर / अक्षुण बनाये रखने के श्रेय से लोक संसार को वंचित नहीं किया जा सकता   !



( एकरसता के ख्याल से प्रेम पर लिखी जा रही श्रृंखला को किंचित रोक कर लोक आख्यानों पर लिखना शुरू कर रहा हूं  !  प्रेम संबंधों वाली श्रृंखला आगे भी ज़ारी रहेगी )

19 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन की उत्पत्ती की सभी लोकगाथाए मनोरंजक है और मानव की कल्पनाशीलता और स्थानीय मान्यताओ के बेहतरीन उदाहरण है. बस एक अंतर है हर जगह "इंटेलिजेंट डिजाइन(क्रियेशनिज्म)" के समर्थक नहीं है...

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  2. आशीष जी
    आपका कहना सही है ! असल में इन्हें तत्कालीन समाज अपनी सुविधा / उपादेयता और उन दिनों की परिस्थितियों के प्रति अपनी समझ के अनुकूल गढ़ता रहा है ! इसलिए भिन्न समाजों की गाथाओं में कुछ अंतर देखने को मिल सकते हैं लेकिन ज्यादातर गाथाओं में प्राकृतिक तत्वों का साम्य आपको मिलेगा ही !

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  3. प्रस्तुत लोक आख्यान से सकारात्मक सोच के साथ लगाये गये अनुमान बड़े सटीक हैं। लोक मत, एक कान.. दो कान.. मैदान, होने के दरमियां कई गर्द-ओ-गुबार झेलते होंगे और बात के बतंगड़ बनते होंगे। इनसब के बावजूद इसमे कोई संदेह नहीं कि मत के लिए विचार और विचार के लिए घटनाएं प्रेरक होती हैं। लोक आख्यानों को कोरी कल्पना कह कर उपहास उडा़ने के बजाय अर्थ ढूँढने और समझते रहने की आवश्यकता है।
    ..बढ़िया लगी पोस्ट।

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    1. देवेन्द्र जी ,
      शुक्रिया !

      सामान्यतः आप मेरी हर पोस्ट पर मेरा हौसला बढ़ाते हैं पर इस पोस्ट पर आपके कथन को पढ़कर कुछ ज्यादा ही भावुक हुआ जा रहा हूं :)

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  4. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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    1. धन्यवाद ! आपका ब्लाग ज़रूर देखेंगे !

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  5. आपकी इस दार्शनिक-टाइप पोस्ट को एक बार पढके चक्कर खा गया हूँ.लोक-कथाएं भी दुरूह होती हैं ?

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    1. और मैं आपकी टिप्पणी पढ़के चक्कर खा रहा हूं :)

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  6. कहीं कुछ भी बदलाव आ जाय मगर लोकवेद आज भी लोगों को अनुप्राणित कर रहा है -रोचक!

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    1. अरविन्द जी ,
      ये सही है , हालांकि लोक आख्यान काल और स्थान के अनुरूप थोड़े बहुत परिमार्जित होते रहते हैं !

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  7. दुबारा से पढ़ा हूँ,पर पूरी तरह से समझ नहीं पाया !

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  8. लोक आख्यान सुनकर/पढ़कर ..मनुष्य की कल्पनाशीलता..चीज़ों को देखने का नजरिया...मनुष्य की जीवनोपयोगी वस्तुओं का कथा में कुशलता से समाविष्ट करना...सब अचरज में डाल देता है.

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  9. वे भी समाज में मान्य रहीं
    कैसी वे युग गाथाएं थी !
    अपने सीमित संसाधन से
    वे हमको बचा यहाँ लायीं
    कैसे वे जी पाए होंगे , अपने बच्चों को चिपटाए !

    आज कहाँ पंहुचा दिया आपने, लाखों वर्ष पहले उस समय की शिक्षा और बुद्धि अनुसार मानव , समस्याओं से जूझता रहा और अप्रमाणिक मान्यताओं के साथ विकास की सीढियाँ लांघने में आखिरकार सफल हुआ ही...

    चाहे कितने ही अविकसित थे मगर उपलब्ध साधन और समझ से उन भयावह परिस्थितियों से निकालने में वे आदिम संस्कृति सफल रही थी !

    कभी कभी गर्व होता है अपने समाज पर !

    एक बेहतरीन लेख , जितना भी समझ पाया , के लिए आभार प्रोफ़ेसर !

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    1. सतीश भाई ,
      आपकी प्रतिक्रिया बेहद खूबसूरत है ! शुक्रिया !

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  10. गहन चिंतन!

    ईद की दिली मुबारकबाद!

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