रविवार, 4 दिसंबर 2011

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे ...


पिछले चार  दिनों से आंग्ल दैनिक समाचार पत्र  कर्नाटक राज्य के मंगलूर अंचल में संपन्न 'स्नान के अनुष्ठान' की ख़बरों से अटे पड़े हैं , हालाँकि हिन्दी दैनिक समाचार पत्र  इस विषय पर  लगभग मौन हैं और ब्लाग जगत भी ! सुना ये कि त्वचा संबंधी रोगों के भैषेजिक ईश्वरीय अनुग्रह के बदले में किया गया प्रतीकात्मक मानवीय व्यवहार  है  !  आंग्ल भाषी समाचार पत्रों  में छपी इस खबर के विषय में हमने अब तक कोई धारणा नहीं बनाई है  !  ना कोई आग्रह और ना ही पूर्वाग्रह  !  संभव है ब्लागर बंधु इस मुद्दे पर अधिक तथ्यगत जानकारी  दे सकें  ! उनका अभिमत जानने की इच्छा है  ! ख़बरों के हवाले से जो बिंदु उभर कर आये हैं वे इस तरह से है ...

(1)  यह एक परम्परागत वार्षिक आयोजन है , जिसमें दलित  / आदिवासी समुदाय के भक्तगण ईश्वर को धन्यवाद ज्ञापित करते हैं  !
(2)  ब्राम्हणों द्वारा केले के पत्तों पर खाना खा चुकने  के बाद जो अवशेष भोज्य पदार्थ आदि होते  है , दलित  भक्तगण उस सामग्री के ऊपर लुढकते हैं  !
(3)  इस अनुष्ठान को सत्ता का समर्थन प्राप्त है  !
(4)  इस अनुष्ठान पर सवाल खड़े करने वाले दलित कार्यकर्ता को भक्तगणों द्वारा पीटा गया  !

दि  हिंदू  समाचार पत्र  दिनांक 1.12.11 से  साभार  

जैसा कि हमने निवेदन किया कि  इस मुद्दे पर अब तक कोई राय कायम नहीं की है अतः मित्रों का अभिमत हमारे लिए अनमोल होगा !

53 टिप्‍पणियां:

  1. यह व्यवहार अत्यंत अनुचित है -यहाँ के हिन्दी अखबारों में तो यह खबर प्रमुखता से थी ...एक जगह आपने निदान शब्द लिखा है जो मेरी समझ से उपचार होना चाहिए -निदान माने डायिग्नोसिस!

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  2. इस तरह के कृत्य को अनुष्ठान कहना ही अपराध है.यह महज़ कुछ लोगों की रोजी-रोटी का पाखंड है जिसमे कम पढ़े-लिखे लोग फंस जाते हैं.यह अप्राकृतिक ,अनैतिक और अन्यायपूर्ण भी है !

    और हाँ,आपको इससे इतर धारणा की प्रत्याशा है क्या ?

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  3. बाद मरने के यदि रब ने पूछा कि तू धरती का प्राणी है न! तो कितनी शर्मिंदगी होगी!!

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  4. @ अरविन्द जी ,
    सुझावानुसार नया शब्द स्थापित किया गया ! संभव है आपके क्षेत्र के हिंदी अखबार आपके प्रदेश की मुखिया की प्रतिक्रिया से प्रेरित हुए हों :)

    अनुष्ठान को अनुचित या निंदनीय कहने वाली संक्षिप्त प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर अनुष्ठान की विवेचना की अपेक्षा कर रहा हूं मैं ! शायद सामाजिकता ,धार्मिकता , जातीयता ,विश्वास , त्वचा रोग , खाद्य पदार्थों में मौजूद कोई ऐसी वज़ह जिससे उपचार होते हों , वगैरह वगैरह !

    @ देवेन्द्र जी ,
    आभार !

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  5. @ संतोष जी ,
    वास्ते आपकी टीप का प्रथमार्द्ध...धन्यवाद,किन्तु...

    वास्ते आपकी टीप का उत्तरार्द्ध...जी, ज़रूर है ! कृपया अरविन्द जी को संबोधित मेरी प्रतिक्रिया का दूसरा पैरा देखने का कष्ट करें :)

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  6. पहली राय का पहला अधिकारी तो लुढ़कने वाला भक्‍त ही होगा.
    अपनी राय दे कर उसे, उसके इस अधिकार से वंचित किये जाने का भागी बनना मुझे उचित नहीं जान पड़ रहा.

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  7. त्वचा रोग का निदान तो इससे संभव नहीं । यह विश्वास इसलिए होता है कि कोई रोग सिर्फ एक जाति विशेष को नहीं हो सकता। शेष.. जानने का मैं भी इच्छुक हूँ।

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  8. डाइग्‍नोसिस, ट्रीटमेंट, क्‍योर शब्‍दों पर एक बार पुनः विचार किया जा सकता है.

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  9. @खाद्य पदार्थों में मौजूद कोई ऐसी वज़ह जिससे उपचार होते हों , वगैरह वगैरह !

    उसके लिये भी औषधि का जूठा होना तो आवश्यक नहीं है।

    मुझे इस अनुष्ठान के बारे में कोई जानकारी नहीं है लेकिन असीम विविधता भरे देश में परम्परा या धर्म के नाम पर कुछ भी किया जाता रहा है। परम्परा पालक भक्तों द्वारा परम्परा विरोधी कार्यकर्ता की पिटाई भी समस्या के बारे में कुछ तो कह ही रही है। अब जब खबर फैल गयी है तब तो समाज और प्रशासन को इसकी सुध लेनी चाहिये।

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  10. -लेट द रोलिंग बी रोल्ड बैक बट .....

    लोक परम्पराएँ कभी कभी प्रेक्षणात्मक सच्चाईयों पर आधारित होती हैं ,उनका वैज्ञानिक परीक्षण अपेक्षित होता है जिससे उनके अंधविश्वास के रूप का उन्मोचन हो सके ....क्या पता खाने में इस्तेमाल होने वाले मसाले ,खट्टेपन और हल्दी के एकल या मिलेजुले प्रभावों से चर्मरोग ठीक होते आये हों यह अचानक ही किसी सांयोगिक घटना से उद्घाटित हुआ हो और कालांतर में एक प्रथा का रूप ले लिया हो ......कई बिन्दुओं का वैज्ञानिक पद्धति पर अन्वेषण जरुरी है -
    १-क्षेत्र विशेष में क्या त्वचा संबंधी रोग अधिक होते हैं ?
    २-क्या ये रोग दलितों को अधिक प्रभावित करते हैं? यदि हाँ तो क्या -
    ३- उनकी दिनचर्या के ,काम के ,आजीविका के ऐसे ख़ास पहलू हैं जहाँ त्वचा रोग फैलने का कोई कारण है ?
    ४-इंगित रोग क्या क्षेत्र के कथित उच्च वर्ग में नहीं होता ? ताड़ी हाँ तो क्या ऐसा उनकी कोई ख़ास जीवन पद्धति या खान पान है ? या कोई निषेध जो दलितों के लिए वर्जित न हो ?
    ५-क्या वहां के किसी मसाले के वाह्य लेपन से त्वचारोग दूर होता है ?
    अली साहब आप क्यों नहीं उक्त क्षेत्र का दौरा लगाते -सब्बाटिकल लेकर ?
    आज की तारीख में खाने के पत्तलों पर लेटना तो सचमुच अनुचित है,अशोभनीय और अस्वीकार्य है -वैज्ञानिक तथ्य सामने आना चाहिए -लेट द रोलिंग बी रोल्ड बैक !

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  11. @ राहुल सिंह जी ,
    पहली राय के पहले लुढकने वाले अधिकारी की नमूनार्थ प्रतिक्रिया के लिए , इस प्रविष्टि का बिंदु क्रमांक 4 देखने की कृपा करेंगे :)
    उसे उसके अधिकार से वंचित नहीं करने के आपके कथन से मैं अपने लिए क्या संकेत ग्रहण करूं :)

    कोई बेहतर शब्द सुझाइए ! फिलहाल भैषेजिक कर रहा हूं !

    @ देवेन्द्र जी ,
    अरविन्द जी पे भरोसा कर रहा हूं ! देखना है इसपर वे क्या कहते हैं !

    @ स्मार्ट इन्डियन जी ,
    औषधि का जूठा होना ज़रुरी नहीं है ,संभव है यह केवल वर्णगत सर्वोच्चता को प्रकट / स्वीकार करने के लिए जोड़ा गया तत्व हो !
    उनके विश्वास का लाभ अन्ततः किसे है कह नहीं सकते !
    प्रशासन को बल प्रयोग वाले तर्क / वाली समस्या पर ध्यान देना चाहिए ! सहमत !

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  12. Uf!Ye kaisa anushtthaan? Sab kuchh kalpna ke pare lagta hai!

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  13. अली साब ,
    हमें आपका जवाब मिल गया था,बज़रिये मिश्रजी !

    दर-असल ,अनुष्ठान तो वह होता है जिसमें कोई जाति या वर्ग-भेद न हो,सम्पूर्ण समुदाय के लिए हो और औचित्यपूर्ण हो.
    धीरे-धीरे इसिलए अनौचित्यपूर्ण अनुष्ठानिक-विधान खत्म होते जा रहे हैं.

    इस कृत्य से तो 'घिन' ज़्यादा मुखरित हो रही है !

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  14. अली भाई !
    इस प्रकार के अनुष्ठान हमारे समाज के कलंक हैं , किसी देश का सारे विश्व में मज़ाक बनाने के लिए ऐसे आदिम आयोजन काफी हैं ....
    मेरी लिखी कुछ लाइने आपकी नज़र हैं...

    बच्चों मानवकुल ने अपने
    कुछ लोग निकाले घर से हैं
    बस्ती के बाहर ! जंगल में
    कुछ और लोग भी रहते हैं
    निर्बल भाई को बहुमत से घर बाहर फेका है हमने
    आचरण बालि के जैसा कर क्यों लोग मनाते दीवाली?

    घर के आँगन में लगे हुए
    कुछ वृक्ष बबूल देखते हो
    हाथो उपजाए पूर्वजों ने ,
    इनमे फलफूल का नाम नहीं
    काटो बिन मायामोह लिए, इन काँटों से दुःख पाओगे
    घर में जहरीले वृक्ष लिए क्यों लोग मनाते दीवाली ?
    .....

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  15. ....
    छाया प्रकरण से भी आगे
    कुछ महा धर्मज्ञानी आए
    पदचिन्ह दिखें न शूद्रों के
    पैरों में झाडी बाँध चलें
    पशुओं से भी बदतर जीवन, कर दिया धर्म रखवालों ने !
    मानव जीवन पर ले कलंक, क्यों लोग मानते दीवाली ?

    पानी पीने को पनघट पर
    कुत्ता आ जाए अनिष्ट नहीं
    पर शूद्र अगर मुंडेर से भी
    छू जाए , महा अपराधी है
    प्यासा गरीब जल के बदले, पिटता है वस्त्र रहित होकर !
    मानव को प्यासा मार अरे ! क्यों लोग मानते दीवाली ?

    अधिकार नाम से दिया नहीं
    कुछ धर्म के इन विद्वानों ने
    धन अर्जित संचित करने का
    अधिकार लिया रखवालों ने
    जूठन एकत्रित कर खाओ, धन का तुम को कुछ काम नहीं !
    तन मन धन शोषण कर इनका, क्यों लोग मानते दीवाली ?

    वंचित रखा पीढियों इन्हें
    बाज़ार हाट दुकानों से,
    सब्जी,फल,दूध,अन्न अथवा
    मीठा खरीद कर खाने से
    हर जगह सामने आता था, अभिमान सवर्णों का आगे !
    मिथ्या अभिमानों को लेकर क्यों लोग मानते दीवाली ?

    उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
    कर अपने को पंडित माने।
    मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
    मारण पर मंगलगान करें ,
    संस्कृत का, क ख ग न पढ़ा , व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं!
    ऐसे पंडित कुलगुरु बना, क्यों लोग मनाते दीवाली ?

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  16. दलित को दलित ही बनाए रखने का एक और फ़ंडा ये भी. (जिसको बुद्धीसम्मत घोषित किए जाने के लिए हज़ार दूसरी थ्योरियां गढ़ी जाएंगी...उस समाज में)

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  17. अच्छा हुआ ऐसी ख़बरें मेरी नज़रों से बची रहीं...तस्वीरों की तरफ तो देखा भी नहीं जा रहा...

    आज भी इस तरह की परम्पारायें विद्यमान हैं...और ऐसा नहीं कि ऐसे आयोजन करनेवाले सभी अशिक्षित हैं...फिर ऐसी शिक्षा का क्या लाभ...

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  18. @ अरविन्द जी ,
    वास्ते आपकी टीप नंबर दो...टीप स्पैम में चली गई थी उस वक़्त देख नहीं पाया ! जैसा कि आपसे अपेक्षा थी ! आभार !

    हमें बेशक ऐसी ही संभावनाओं की तलाश और फिर उनकी पुष्टि करना चाहिए जिनकी दम पे अनुष्ठान के धार्मिक जातीय रंग चटख किये गये होंगे !

    लगता तो यही है कि खाने के मसालों और त्वचा के रोगों के उपचार में कोई सकारात्मक सम्बन्ध ज़रूर होगा ! किसी संयोग विशेष के उपरान्त घटना पर दैवीय चमत्कार का आलेपन कर लुढकने की परम्परा तो बाद में ही शुरू हुई होगी !

    आपका कहना सही है कि अनुष्ठान का निषेध कर उन बिंदुओं का अध्ययन किया जाना चाहिये जिनके कारण से परंपरा को जन्म और फिर स्थायित्व मिला !

    @ क्षमा जी ,
    बहुत आभार ! आज निंदा से ज्यादा परम्परा की विवेचना की फरमाइश है !

    @ संतोष जी ,
    वास्ते आपकी टीप क्रमांक दो...
    आपने घटना को निंदनीय कहा सो आभार ! अपेक्षा जो आपसे थी उसे आपने मिश्रा जी के मजबूत कांधों के हवाले करके छुट्टी पा ली :)

    @ सतीश भाई ,
    मौके के मुताबिक़ ,अत्यंत सार्थक सुन्दर कविता की प्रस्तुति के लिए आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूं !
    कई बार अचम्भा होता है कि इतनी हसीन रचना सतीश भाई के इशारों पर कैसे थिरकती है !

    @ काजल भाई ,
    सो तो है ही !

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  19. मेरा सीधा और सरल सा आशय बस यही कि इस बारे में सोचना और प्रतिक्रिया की
    शुरुआत उन भक्‍तों से होनी चाहिए, यदि वे ऐसा परम्‍परा से करते आ रहे हैं
    तो बौद्धिक वर्ग को छिः, शर्मनाक, सोचनीय आदि कहने के पहले इसका इतिहास
    जानने का प्रयास करना चाहिए तब यह सोचें कि ऐसा अभी भी क्‍यों संभव है,
    ऐसा लगता अवश्‍य है कि यह रूढि़ है, परिवर्तन होना चाहिए, लेकिन इस बहाने
    समाज के मनस को समझने में मदद होगी और वही समझ श्रेयस्‍कर है, जहां तक
    इसमें सुधार या परिवर्तन का प्रश्‍न है तो मैं वापस वही कहूंगा कि यह उन
    भक्‍तों के द्वारा औचित्‍य विचार कर होनी चाहिए, जो ऐसा कर रहे हैं.

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  20. @ रश्मि जी ,
    तस्वीर देखना मेरे लिए भी कठिन था !


    @ राहुल सिंह जी ,
    अरविन्द जी की दूसरी टीप का आशय भी कमोबेश वही है जो आप कह रह हैं अन्तर केवल इतना कि इसकी शुरुवात उन्हीं भक्तों से हो जोकि इस घटना क्रम में लिप्त हैं ! मेरा ख्याल है कि किसी अंधे को राह दिखाना सबसे पहले आंख वालों के हिस्से का काम है और यह भी कि अंधे को अपने हिस्से की थोड़ी सी रौशनी उपलब्ध कराई जाये ताकि आगे का रास्ता वो खुद ब खुद तय कर पाये !

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  21. ये कोई ज़रुरी तो नही कि आदिकाल से चली आ रही परम्परा सही हो. लोग कहते है कि समय के साथ सब कुछ बदल जाता है. पर ये परम्परा क्यों नही बदलती. खास कर वैसी परम्पराएँ जिनसे हमे लाभ से ज्यादा हानि हो. फिर भी हम आँख मूंद कर उसके पीछे चलते चले जाते है.

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  22. अली सा.
    मैं जिस संस्था में कार्यरत हूँ, उसमें इस अंचल के कर्मचारियों की बहुलता है... उनके साथ कभी किसी चर्चा में इस घटना/परमपरा/कुरीति/विधान के विषय में सुना था..
    इसके सामाजिक,पारंपरिक, वैज्ञानिक, धार्मिक पहलू प्र तो अपनी पूर्ण अनभिज्ञता है.. किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यह भी समाज के क्षैतिज विभाजन को ऊर्ध्वाधर विभाजन में बदलने की कोई कुरीति है!! विशेष कुछ भी कहने में अपनी असमर्थता व्यक्त करता हूँ!!

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  23. @ अंधे को राह दिखाना.
    राह तो दिखाना ही चाहिए, लेकिन इससे पहले उसकी राह भी देखना-समझना जरूरी होगा और क्‍यों न राह दिखाने के बजाय उनकी आखें खोलने में मदद की जाए और राह वे खुद देखें (अक्‍सर राह दिखाते हुए नए ठेकेदार-मठाधीश स्‍थापित होने लगते हैं और उन्‍हें अपनी राह चलाने लगते हैं, अंधों में दिलचस्‍पी लेने का एक बड़ा कारण यह भी होता है)
    भक्‍तों के लिए कहा जाता है- जगत कहै भगत बइहा, भगत कहै जगत बइहा.

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  24. एक विचार आ रहा था कि सभी प्रमुख धर्मों की दो-तीन ऐसी रूढि़यों पर विचार किया जाय, जो प्रत्‍यक्षतः असंगत जान पड़ती हैं. (सावधान रहें! खेल खतरनाक हो सकता है).

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  25. सभी धर्म पंथो की अपनी अपनी मान्यताएं है,लेकिन चर्चा की छूट, सुधार के लिए खुलापन जितना हिन्‍दू धर्म में है उतना कहीं नहीं। कोई काहू में कोई काहू में मगन।

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  26. हिप्पोक्रेट्स ने कहा है कि आहार ही औषधि है।
    बचे हुए खाने का इस्तेमाल बतौर दवा किया जा रहा है।
    यह खाने का एक अच्छा इस्तेमाल है।
    जब तक तालीम और मुनासिब इलाज की सहूलत मयस्सर न हो पाएंगे,
    ग़रीब ग़ुरबा इस तरह के टोटके आज़माते रहेंगे और अक़ीदत और यक़ीन से भी कुछ बीमारियां दूर होती हैं और कुछ अपनी मुद्दत पूरी करके ख़ुद भी चली जाती हैं।
    बीमारी से निजात मिलने तक ग़रीब जनता को ज़िंदा रखने का एक सच्चा बहाना तो दे ही रहा है यह झूठा खाना।
    एक नुक्ता ए नज़र यह भी है।

    जानकारी भरी उपयोगी पोस्ट !

    आभार ||
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    क्या इस पोस्ट को हम अपने ब्लाग पर दिखा सकते हैं आपके लिंक के साथ ?

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  27. अरविन्द मिश्राजी और सतीश सक्सेनाजी की जय हो !

    बकिया लोग भी नारे लगवाना चाहते हैं तो बढ़िया सा उत्तर दें !

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  28. @ अमित चन्द्रा जी ,
    अगर हम ही नहीं चाहेंगे तो हमारी परम्पराएं कैसे बदलेंगी ?
    अच्छी या बुरी का फैसला सार्वजानिक हित में निहित माना जाये !

    @ सलिल जी ,
    जी आपकी बात समझता हूं ! अपनी अधूरी जानकारी के चलते मैंने भी अभिमत चाहे हैं वर्ना मैं खुद भी मुद्दे का विश्लेषण करने की कोशिश करता !

    @ राहुल सिंह जी ,
    (१)
    मुझे लगता है कि आपके कहने और मेरे कहने में शब्दों का कोई हेर फेर है ! मेरे लिए सामाजिक जीवन की शताब्दियों से चली आ रही ये प्रवृत्तियां एक तरह से ड्रग एडिक्शन जैसी है ! अब अगर परिजन / डाक्टर पहले पहल ना करें और ड्रग एडिक्ट के विवेकशील / तर्कवान / स्व विवेचक आत्म सुधारक होने का भरोसा किया जाये तो मैं इस कथन से आंशिक रूप से असहमत होऊँगा ! क्योंकि मेरा विश्वास है कि एडिक्ट को अव्वल तो परिजन / डाक्टर की मदद की दरकार है फिर आगे उसकी स्वयं की विल पावर की ज़रूरत पड़ेगी ! अंततः स्वयं पीड़ित की मुक्त हो पाने की विल पावर...पर पहल तो किसी डाक्टर / परिजन को ही करना होगी ! मठाधीशी के खतरे तब होंगे जब पहल करने वाला समुदाय बहिरागत हो ! उसकी नियत संदिग्ध हो ! सम्बंधित प्रकरण में इसी जातीय समुदाय के कुछ लोगों (परिजनों) की सुधारवादी पहल को मैं इसी नज़रिए से देख रहा हूं हालाँकि इस चक्कर में वे एडिक्टजन से पिट भी चुके हैं !

    (२)
    असंगत नहीं पर जोखिम ज़रूर है जो इस प्रविष्टि में मैंने नहीं लिया :)
    मेरा ख्याल है कि सभी धर्मों से इस तरह की रूढियों को खदेड़े जाने की ज़रूरत है ! अगर निज पूर्वाग्रह ना हों तो चर्चा में हर्ज ही क्या है ?

    @ समीर लाल जी ,
    हां यही तो !

    @ ललित जी ,
    बात हिंदू धर्म की नहीं है वर्ना इसे पूरे देश में होना चाहिए था ! स्थानीय परम्पराओं को धर्म में घुसपैठिया मान कर ही बात करना बेहतर होगा !
    पोस्ट में मुद्दे पर अपनी अल्पज्ञता के हवाले से केवल अभिमत /तथ्यगत विवरण चाहे गये हैं ! जो नहीं जानते उसे जानने में मगन होने में हर्ज ही क्या है :)

    @ डाक्टर अयाज़ अहमद साहब ,
    इस केस में आहार और औषधि के मुद्दे पे आख़री फैसला अभी हुआ नहीं है , कोई एक्सपेरिमेंट्स हो तो बात बने ! अभी तो बात सिर्फ इमकानात पे टिकी हुई है कि इसकी शुरुवाती वज़ह क्या हो सकती है !
    बहरहाल अपना अच्छा या बुरा उन लोगों को ही तय करना है जैसा कि इस केस में, उसी बिरादरी के कुछ लोगों ने एक तंजीम बना कर किया है ! हालाँकि वे इस चक्कर में अपने ही लोगों से पिट भी गये हैं !
    आप इस पोस्ट को जरूर शेयर कर सकते हैं ! आखिर को इस मुद्दे को मैंने भी न्यूज पेपर्स के हवाले से लिया है इसलिए इसपर मेरा कापी राईट नहीं है !

    @ संतोष जी ,
    आपने खुद अब तक कोई विश्लेषण नहीं किया है जबकि निंदा से हटकर विश्लेषण की फरमाइश की थी मैंने :)

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  29. @ अली साब विश्लेषण के लिए विशेषज्ञता ज़रूरी है,काहे को अँधेरे में लट्ठ मारें ?

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  30. आपका पोस्ट मन को प्रभावित करने में सार्थक रहा । बहुत अच्छी प्रस्तुति । मेर नए पोस्ट ' आरसी प्रसाद सिंह ' पर आकर मेरा मनोबल बढ़ाएं । धन्यवाद ।

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  31. त्वचा संबंधी रोगों के भैषेजिक ईश्वरीय अनुग्रह के बदले में किया गया प्रतीकात्मक मानवीय व्यवहार है!'
    क्या त्वचा रोग दलितों और आदिवासियों को ही होते हैं?
    क्या ईश्वर सवर्ण जातियों के प्रति अनुग्रहित नही?त्वचा रोग होने पर वे डॉक्टर्स की सेवा क्यों लेते हैं भाई ?लौट क्यों नही लगाते झूठन पर?
    ' इस अनुष्ठान पर सवाल खड़े करने वाले दलित कार्यकर्ता को भक्तगणों द्वारा पीटा गया!'
    अच्छा किया यह तो.उनको भी विरोध की तभी सूझी? साल भर क्या करते रहे वे? क्यों इस तरह के आयोजनों ,अनुष्ठानो का बहिष्कार करने को अपने वर्ग के लोगों को मानसिक रूप से तैयार नही किया?
    ऐसे कार्यकर्ता चर्चा मे आ कर अपने वर्ग के नेता बनकर राजनीति मे घुसना चाहते हैं.इनका उद्देश्य वर्ग का हित होता तो इस तरह के अनुष्ठानों मे झूठन पर लौट लगाना कभी का बंद हो चूका होता.

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  32. @ संतोष जी ,
    :)

    @ प्रेम सरोवर जी ,
    जी , ज़रूर ! आभार !

    @ इंदु जी ,
    वास्ते टीप का पैरा एक दो...
    प्रश्न यही है कि उपचार की यह विधि किसी विशिष्ट वर्ग के लिए ही क्यों प्रचलित है ? अव्वल तो ये भी कि यह उपचार की विधि है भी या कि नहीं या फिर किसी तुक्के की निरंतरता ? कुछ प्रश्न और भी , जैसे जातीय श्रेष्ठता के प्रदर्शन की परम्परा ?
    फिलहाल इन प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं है और अगर है भी तो केवल अनुमान जिनकी सत्यता प्रमाणित होना अभी शेष है !

    वास्ते टीप का पैरा तीन चार पांच...
    जिस दलित कार्यकर्ता को पीटा गया वह एक सुधार वादी दलित सामाजिक संगठन का सदस्य है और उसे केवल तात्कालिक विरोध के लिए नहीं पीटा गया है !

    यह एक सम्मोहनकारी जातीय/धार्मिक मानसिकता है जो सुधारों का विरोध करती है !

    कर्नाटक के इस प्रश्न में राजनीति परम्परा के पक्ष में है जबकि सामाजिक संगठन विरोध में !

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  33. आज भी ऐसा होता है !!!
    दुखद आश्चर्य!

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  34. निदान शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है १- कारण २- निवारण (उपचार)
    यूँ, यह कुछ विचित्र सा लगता है, एक शब्द के दो विपरीत अर्थ. किन्तु आयुर्वेद में भी निदान शब्द दोनों ही अर्थों में व्यवहृत होता है. वार्ता में कभी कभी हम कहते हैं -" आपकी समस्या का निदान (निराकरण ) हम नहीं कर सकते" या " कुछ पता चला, डॉक्टर ने क्या निदान ( डायग्नोसिस ) किया ?"
    दक्षिण की इस परम्परा का मूल तो पता नहीं परन्तु अभी इसका जो भी स्वरूप है वह निश्चित ही अधार्मिक है. अन्न पर लोटना अन्न का अपमान है, लोटने वाले का भी. आयुर्वेदिक पंचकर्म में त्वकरोग एवं वातव्याधि के लिए औषधिसिद्ध उष्ण भात से स्वेदन का शास्त्रोक्त विधान है किन्तु उसकी भी एक सुनिश्चित किन्तु व्ययसाध्य विधि है. संभव है कि इस व्ययसाध्य चिकित्सा से वंचित कुछ निर्धनों ने कभी उच्छिष्ट का उपयोग इस कार्य के लिए किया हो और कालान्तर में यह रूढि में बदल गया हो. जो भी हो, ब्राह्मणों का यह कर्तव्य बनता था कि वे लोगों को किसी भी रूढि के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराते.

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  35. @ यह विश्वास इसलिए होता है कि कोई रोग सिर्फ एक जाति विशेष को नहीं हो सकता।
    देवेन्द्र जी ! कुछ रोग केवल कुछ जाति विशेष के लोगों को ही होते हैं. अली जी बस्तर के रहने वाले हैं उन्हें पता होगा कि सिकलिंग और थैलीसीमिया जैसी जेनेटिक ( हीमोग्लोबिनोपैथी ) व्याधियाँ विश्व की कुछ एथनिक समूह विशेष की जातियों में ही पायी जाती हैं उच्च जातियों में तब तक नहीं मिलतीं जब तक कि उन्होंने अंतरजातीय विवाह न किया हो. एक ठाकुर साहब ( उत्तरप्रदेश निवासी) अपनी बच्ची को, सिकलिंग का इलाज कराने मेरे पास लेकर आये. मैंने उन्हें कह दिया कि उनकी बच्ची को सिकलिंग नहीं हो सकता, क्योंकि वे राजपूत हैं. बाद में जब उन्होंने रिपोर्ट दिखाई तो मुझे उनकी बात माननी पडी, बाद में पता चला कि बस्तर में आने के बाद उन्होंने किसी आदिवासी महिला से विवाह किया था.

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  36. आपने सतीश जी के ब्लोग्पोस्त (वो इश्वर में श्रद्धा वाली)पर जो टिप्पणियां दी है वो मुझे बहुत अच्छी लगीं, काश हर किसी को ये बात समझ आती तो आज ज़माने में धर्म और भगवान के नाम पर झूठ का इतना बखेडा खड़ा नहीं होता. खैर अब हमें इसे खत्म करने का प्रयास करना होगा.

    कभी हमारे ब्लॉग पर भी पधारिये.

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  37. @ कौशलेन्द्र जी ,
    (१)
    दोनों अर्थों में प्रचलन के अनुसार मैंने 'निदान' ही लिखा था किन्तु अरविन्द जी की खटकन के चलते शब्दकोष देखा तो पाया कि वहां इसे उपचार के अर्थ में उद्धृत नहीं किया गया है सो प्रचलन वाले अर्थ का मोह छोड़ कर मैंने शब्द यहां तक की वाक्य ही बदल लिया :)

    (२)
    १९९२-९३ में एक वर्कशाप के सिलसिले में जबलपुर जाना हुआ था वहां आई.सी.एम.आर.में सिकलिंग और थेलीसीमिया को लेकर विशेष प्रोजेक्ट चल रहा था ! वहां के मित्रों ने कहा वर्कशाप में शामिल लोगों का परीक्षण करते हैं ! आश्चर्य यह कि धमतरी की एक जैन महिला में सिकलसेल के प्रमाण मिले ! पहले मेरा ख्याल था कि ऐसा केवल कमार आदिवासियों और साहू लोगों में होना चाहिए था !
    यह समस्या मंडला क्षेत्र के आदिवासी तथा धमतरी क्षेत्र के कमार / साहू / जैन और बीजापुर गंगालूर के रहवासी आदिवासियों के अलावा उन लोगों में है जोकि कभी रामटेक महाराष्ट्र से आकर यहां बस गये थे ! इसीलिये स्थान विशेष में जाति के बजाये एथनिक समूह कहना मुझे ठीक लग रहा है ! विवाह संबंधों वाली बात सही है !

    @ मेरे विचार जी,
    आभार ! आपके विचारों को जानने के लिए आपके ब्लॉग में जरूर पहुंचेंगे !

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  38. ज़नाब ! अली जी ! निवेदन करना चाहूंगा कि अफ्रीका एवं अमेरिका में भी वहाँ की स्थानीय कुछ जातियों ( नीग्रो समूहों ) में ही ये रोग मिलते हैं. घाल-मेल तब होता है जब बाहर से आये लोग स्थानीय लोगों से वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित करते हैं....उनकी संतानों को ऐसी जेनेटिक व्याधियां होनी स्वाभाविक हैं. इसी वर्ष सितम्बर में बस्तर विश्विद्यालय के सेमीनार में इस विषय पर मेरा भी एक प्रेजेंटेशन था. समूह कहें या जाति, कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तथाकथित उच्च वर्ग के लोग इन व्याधियों से मुक्त हैं. सरकारी तंत्र चाहता है कि लोग इस व्याधि से पूर्ण मुक्ति केलिए ( जोकि जींस के डायल्यूशन के सिद्धांत पर आधारित है और कई पीढ़ियों का समय लेगा) अंतर्जातीय विवाह करें पर जो जेनेटिक्स के विज्ञान से परिचित हैं वे अब जातियों को महत्त्व देने लगे हैं. यह चिंतन व शोध का विषय हो सकता है कि जेनेटिक व्याधियों के लिए ऊपर वाले ने कुछ समूहों को ही क्यों चुना ? ठाकुरों-ब्राह्मणों एवं गोरी यूरोपीय जातियों को क्यों छोड़ दिया ?
    विषय था उच्छिष्ट पर दलितों-आदिवासियों का लोटना. क्या आप इसके मूल में पंचकर्म की अवधारणा और फिर उसकी रस्म अदायगी से सहमत हैं ?
    बनारसी बाबा का तर्क भोज्य पदार्थों में मिले मसालों के औषधीय गुणों की ओर जा रहा है, जाना भी चाहिए किन्तु वर्ष में एक बार लोटन क्रिया से चर्म रोग पर कितना प्रभाव पड़ सकेगा ? निश्चित ही यह प्रतीकात्मक रहा होगा या फिर वंचितों की विवशता.

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  39. @ कौशलेन्द्र जी,
    जब हम समस्या से ग्रस्त आदिवासियों को लेते हैं तो चयनित आदिवासी समूह में उच्च और निम्न जातियां नहीं होतीं, इसी तरह से नीग्रोस को भी ले लीजिए या विश्व के किसी अन्य समूह को ! इनमें 'समस्या के कारण' जो भी हों पर जातीय विभाजन नहीं है इसलिए ऊपर वाला इनमें से किसी नीच जाति को व्याधिग्रस्त और उच्च जाति को व्याधि मुक्त कर दे ऐसा कहना उचित नहीं होगा !

    यूरोपीय गोरे और अफ्रीकी काले का भेद प्रजातीय (रेशियल) तो है पर ऊंच नीच का नहीं जैसा कि जाति (कास्ट) में होता है ! जातीय आधार पर पहचान हिंदू धर्म की विशिष्टता है जबकि सिकलिंग इस धर्म से बाहर के जनसमूहों में भी है ! बस इसीलिये इस समस्या से ग्रस्त जनसमुदाय को एथनिक समूह कहना उचित है !

    यदि आप केवल हिंदू धर्म के समस्याग्रस्त व्यक्तियों के लिए जातीय संबोधन देना चाहें और फिर उच्च जाति को ईश्वरीय वरदान तथा निम्न जाति को ईश्वरीय दंड जैसा कथन करें तो भी चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से यह उचित कथन नहीं होगा क्योंकि समस्या के कारण आप भी जानते हैं !

    अवशिष्ट भोजन पर लुढकने और रोग मुक्ति के विषय पर किसी तथ्यपरक अनुसंधान से पहले केवल अनुमान ही लगाये जा सकते हैं जैसा कि अरविन्द जी ने किया और उतना ही मैं भी कर सकता हूं ! मैंने कोई निश्चित धारणा कायम नहीं की अभी तक !

    आप बस्तर विश्वविद्यालय गये थे,बस इसी रास्ते पर मैं भी रहता हूं यदि कभी फिर से गुजरें तो प्रसन्नता होगी ! रास्ते में एक्सिस बैंक और स्टेट बैंक के एटीएम एक ही भवन में है उसके ठीक पीछे सफ़ेद रंग की एक कुटिया अपनी है !

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  40. अजीब सा है।
    न जाने परंपरा के नाम पर क्‍या क्‍या किया जाता है.....

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  41. अली साहब ! सन सिटी ( लाल-बाग़) में अपनी भी कुटिया है....अभी नया- नया रहना प्रारम्भ किया है..आपके मोहल्ले से ज्यादा वाकिफ नहीं हूँ. इस माह के अंत तक एक बार आऊँगा...तब भेंट करूंगा. चलित दूरभाष संख्या है- 9424137109
    @ जातीय आधार पर पहचान हिंदू धर्म की विशिष्टता है...
    विषयांतर हो रहा है पर यह एक आवश्यक मुद्दा है.
    प्रथमतः, "हिन्दू" धर्म एक सरकारी धर्म है. भारतीयों का धर्म तो "सनातन धर्म" है...जिसकी पहचान जाति नहीं बल्कि वर्ण और आश्रम व्यवस्था है .
    जाति की बात पर आते हैं.
    यदि हम हमारे समाज की रूढिगत धारणा को थोड़ी देर के लिए अलग कर दें और शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करें तो "जाति" निकट रक्त संबंधों का एक समूह है जिनमें कई प्रकार की समानताएं मिलती हैं. भारत अपने क्षेत्रफल, नाना समुदाय, नाना विचार, नाना परंपराएं, नाना आजीविका के साधन आदि के कारण अन्य देशों की अपेक्षा विशाल और विविधता लिए हुए है. "जाति" और "एथनिक समूह" में शब्दों का ही अंतर है सार गत कुछ नहीं. दोनों के वर्गीकरण के कारण लगभग सामान हैं. समाज की मान्यताओं और राज्य की नीतियों के अनुसार कोई शब्द हीनता सूचक हो जाता है तो कोई शब्द उच्चता सूचक. शब्दों के स्थानापन्न शब्द भी अपने मूल भाव को त्याग नहीं पाते. गांधी जी द्वारा पवित्र घोषित किया गया "हरिजन" शब्द का उच्चारण भी आज अपराध है. विदेशियों द्वारा दिया गया एवम बहुप्रचलित "आदिवासी" शब्द भी आज प्रतिबंधित है. वर्त्तमान में इन शब्दों के स्थान पर क्रमशः अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कहने का शासकीय निर्देश है. ( जनता को बेवकूफ़ बनाने का कितना चतुराई भरा तरीका है ! ) आप ध्यान दीजिये ...वर्गीकरण अभी भी कायम है और वर्गीकरण के कारण भी वही हैं. केवल नामों के साथ हेरा-फेरी हो रही है. उत्तरप्रदेश में हमारे कुछ मुसलमान मित्र हैं ...उनसे पता चला कि उन लोगों में भी शादी-व्याह से पहले जातिगत विचार किया जाता है. कोई सइयद किसी दर्जी के यहाँ शादी नहीं करता. रायपुर के एक संभ्रांत...उच्च शिक्षित ( डॉक्टर ) सैयद परिवार ने अपनी उच्च शिक्षित लड़की को एक दसवीं पास, बस्तर के निपट गाँव के पेंटर लडके से सिर्फ इसलिए ब्याह दिया क्योंकि उन्हें और कोई सैयद मिल नहीं रहा था. ( आप मिलेंगे तो पता बता दूंगा) . सभी समाजों में एक दूसरे को हीनता से देखने का मानवीय तामसिक गुण हमारी समाज व्यवस्था और तथाकथित विकास का परिणाम है जो भौतिक विकास के साथ निरंतर बढेगा ही, कम नहीं होगा. ( सरकारें भी नहीं चाहतीं कि यह सब कम हो ). इस सबका आशय यह नहीं है कि मैं जाति व्यवस्था का पोषक हूँ. बस्तर में आने के बाद इस व्यवस्था पर गहराई से विचार करने को बाध्य हुआ हूँ. जब कोई सतनामी अपने नाम के आगे शुक्ल, उपाध्याय, मिश्र, चौहान, बघेल, चटर्जी, बनर्जी और राठौर जैसे उपनाम लगता है तो यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि आखिर वे अपने ही समूह से अपने को प्रथक कर किसी दूसरे समूह में होने का भ्रम क्यों उत्पन्न करना चाहते है? खैर यह एक सामाजिक विषय है जिस पर चर्चा अपरिहार्य है. पर बाद में कभी....
    अभी तो विचारणीय यह है कि किसी समूह विशेष में ही कोई व्याधि विशेष उत्पन्न क्यों होती है. मैं प्रतीक्षा कर रहा था कि इस विषय पर बनारस के वैज्ञानिक बाबा कुछ प्रकाश डालेंगे पर वे तो, लगता है कि भांग खाकर मज़े ले रहे हैं :)) मौन तोडिये विप्र जी ! कुछ तो उवाचिए ....चलिए, म्यूटेशन से शुरू करते हैं ...शुरू करो अन्ताक्षरी .....

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  42. @ अतुल जी ,
    सो तो है !

    @ कौशलेन्द्र जी,
    महीने के आखिर में ,मैं आपको फोन कर लूंगा !

    शायद शब्दों का ही फेर है ! विषय लंबा है सो कभी जाति व्यवस्था पे भी पृथक से बात कर लेंगे !

    मुसलमानों ने अपने पूर्वजों के कम्बल अब तक नहीं छोड़े हैं :)

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  43. @ यूरोपीय गोरे और अफ्रीकी काले का भेद प्रजातीय (रेशियल) तो है पर ऊंच नीच का नहीं जैसा कि जाति (कास्ट) में होता है !

    गोरों और कालों के बीच का नस्लीय भेद ...और हिंसा जग प्रसिद्द है. भेद कुछ कम अवश्य हुआ है पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. गोरों ने तो कई सभ्यताओं और जातियों (नृवंशसमूहों) को सदा के लिए समाप्त कर दिया है . इस अत्याचार के पीछे केवल सत्ता की लालसा और अधिकारों का विस्तार ही नहीं बल्कि उंच-नीच की भावना भी थी.

    @ उच्च जाति को ईश्वरीय वरदान तथा निम्न जाति को ईश्वरीय दंड जैसा कथन करें तो भी चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से यह उचित कथन नहीं होगा क्योंकि समस्या के कारण आप भी जानते हैं !

    जाति-विशेष को ईश्वरीय वरदान या दंड मानना सतही तौर पर गलत हो सकता है ...है भी, विशेषकर तब जबकि लोगोंके मन में ईश्वर की धारणा मंदिर/ मस्जिद/चर्च ...मन्नत....चढ़ावा ..आदि तक ही सीमित हो. किन्तु जब किसी भौतिक शास्त्री या जीव विज्ञानी की धारणा वाले ईश्वर की बात आयेगी तो यह मानना पडेगा कि ईश्वर दंड भी देता है और वरदान भी. यह ईश्वर का जो "देना" है वह वस्तुतः हमारे कर्म का प्रतिफल है .....परिस्थितियों का भी ....यदि हम म्यूटेशन को इसके लिए उत्तरदायी मानते हैं तो म्यूटेशन भी अकारण ही नहीं हो जाते. बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता ...यह भारतीय दर्शन भी कहता है और भौतिक शास्त्र भी.
    जहाँ परमाण्विक परीक्षण किये जाते हैं वहाँ के वाशिंदों को यदि एक समय के बाद कोई म्यूटेशन हो जाय...या भोपाल गैस पीड़ितों में कुछ समय बाद किसी म्यूटेशन का पता चले ...तो कोई तो कारण स्पष्ट है .....कारण किसके द्वारा जनित है या शिकार कौन हुआ ....यह प्रश्न अभी नहीं है. अभी तो प्रश्न केवल इतना है कि क्या कोई भी परिणाम बिना किसी कारण के उत्पन्न हो सकता है? यदि नहीं तो निश्चित ही कारणों को उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी घटकों की उपेक्षा नहीं की जा सकती. सारे परिणाम किसी न किसी प्रतिक्रिया के उत्पाद ही हैं .....कोई भी वैज्ञानिक इसे ईश्वर ( एक वह शक्ति जिस पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं है ..और जो सुपर वैज्ञानिकों का सुपर वैज्ञानिक है ) की व्यवस्था ही स्वीकार करेगा. यदि हम फिजियोलोजी में फीड बैक एक्शन की बात करते हैं तो क्या यह एक आश्चर्य जनक प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है ? यही है ईश्वर की व्यवस्था. जो अवश्यम्भावी है और जिसे किसी देवालय में जाकर या किसी चढ़ावे की रिश्वत से बदला नहीं जा सकता.
    म्यूटेशन के अनेक कारणों में हमारी दिनचर्या-रात्रिचर्या ....भोजन-पानी की आदतें ...भौगोलिक स्थिति आदि बहुत से कारण हो सकते हैं जो विभिन्न समूहों में विविधता लिए हो सकते हैं. हम किसी जाति को दोषी नहीं ठहरा रहे ...किसी समूह की जीवन शैली आदि की भिन्नता को कारण मान रहे हैं. छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में देखें या अफ्रीका के ही .....एक ही परिवेश में कई समुदाय के लोग पीढ़ियों से रहते आये हैं पर सिकलिंग के शिकार केवल साहू, कुर्मी, मानिकपुरी, सतनामी ....आदि ही हैं. ब्राह्मणों पर ईश्वर की कोई विशेष कृपा हो ऐसा नहीं है ...ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता. पैथोलोजिकल चेंजेज सभी में एक से होते हैं ....दुराचारी ब्राह्मण होगा तो क्या उसे किडनी फैल्योर नहीं होगा ?
    पिछली टिप्पणी में ईश्वर (ऊपर वाले) के नाम पर किया गया संकेत म्यूटेशन के कारणों की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए था....कुछ परिहास के मूड में भी आ गया था.

    @ इसलिए ऊपर वाला इनमें से किसी नीच जाति को व्याधिग्रस्त और उच्च जाति को व्याधि मुक्त कर दे ऐसा कहना उचित नहीं होगा !

    निश्चित ही...आपकी बात से सहमत हूँ. जाति विशेष के कारण हम ईश्वर से किसी तरह की रियायत प्राप्त नहीं करते .....हमारे कर्म ही इसके लिए उत्तरदायी हैं. सिकलसेल "ट्रेट" का रोगी यदि एसिडोसिस उत्पन्न होने वाले कारणों का सेवन करेगा तो उसे कौन बचा सकेगा ? दूसरी ओर सिकलसेल "डिसीज" के रोगियों को भी मैंने परहेज़ करने के कारण सामान्य जीवन जीते देखा है. हम अपने कर्मों का ही परिणाम भोगने के लिए बाध्य होते हैं. कारण और कार्य के बीच के संबंधों की वैज्ञानिक व्यवस्था के संचालक को ईश्वर के रूप में देखता हूँ मैं....जो निष्पक्ष है .....क्योंकि फिजिक्स हो या पैथोलोजी वहाँ कोई जातिगत ( समूहगत ) सिफारिश नहीं चलती.

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  44. @ कौशलेन्द्र जी ,
    मसलन प्रजातीय विभेद में उच्चता और निम्नता की कल्पना हिटलर ने की थी और इसका परिणाम हिंसक भी था किन्तु प्रजातीय विभेद में उच्चता और निम्नता के कोई वैज्ञानिक आधार नहीं हैं ! यह एक तरह से समानांतर विभाजन है ना कि सीढीदार ! गोरे और काले की चमड़ी ,आँखों , बालों एवं अन्य शारीरिक लक्षणों , वगैरह वगैरह में श्रेष्ठता और हीनता कैसे तय की जायेगी ? व्यक्तिगत भावना और कल्पना का वास्तविकता से क्या लेना देना ?
    मिसाल के तौर पर एक ही प्रजाति से सम्बंधित ब्राह्मण अगर उच्चता और निम्नता के बोध से हिंसा की हद तक पीड़ित हों तो क्या इसे प्रजातीय विभेद कह सकेंगे ?

    प्रश्न यह है कि अगर मानवीय धारणाओं और उसके कर्मों को ईश्वर के माथे मढा जाना है तो फिर सारे तर्कों से इतर केवल ईश्वर ही उत्तरदाई होगा दंड या पुरस्कार 'देने और लेने' के लिए ! वर्ना मनुष्य को आगे बढ़कर अपनी करनी के लिए स्वयं को उत्तरदाई मान लेने का साहस होना चाहिए !

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  45. अली जी ! पुनः स्पष्ट कर दूं, बुरी तरह विकृत हो चुकी वर्त्तमान जाति व्यवस्था का मैं समर्थक नहीं हूँ ....किन्तु जब भी कभी समाज में इस परम्परा का जन्म हुआ होगा उस समय की परिस्थितियों और आवश्यकता का विश्लेषण किये बिना जाति व्यवस्था को पूरी तरह नकार देना उचित नहीं होगा. रावण की लाख अच्छाइयों के बाद भी वह मात्र कुछ गलतियों के कारण समाज में स्वीकार्य नहीं हो सका. दूसरी ओर, अपने तमाम तर्कों के बाद भी रावण बध के कारण राम को प्रायश्चित करना पडा. समाज की दृष्टि बड़ी सूक्ष्म होती है....वह कमजोर हो सकता है पर उसकी मान्यताओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. "जाति" के जन्म के समय की स्थितियों पर विचार करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि यह मनुष्यकृत वर्गीकरण है. उसे इस वर्गीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी ? और जब वर्गीकरण हुआ तो उसके कुछ पैमाने तय किये गए होंगे .....पैमानों का कुछ आधार रहा होगा जो कि निश्चित ही पक्षपातपूर्ण न होकर गुणात्मक रहा होगा. कालान्तर में गुणात्मक आधार समाप्त हो गया और एक सामाजिक व्यवस्था रूढ़ि हो गयी . विशिष्टता आधारित यह वर्गीकरण आज भी है. नाम बदल गए हैं. आज इन जातियों के नाम मिश्र, शुक्ल, भदौरिया, अग्रवाल ....आदि न होकर कलेक्टर, मंत्री, डॉक्टर, इंजीनियर, आतंकवादी, माओवादी आदि हैं. इन नव निर्मित जातियों के प्रति आपकी कुछ धारणाएं विकसित हुयी होंगी. यथा, कलेक्टर अपने छात्र जीवन में बहुत कुशाग्र बुद्धि रहा होगा, जो नाखान्दा रहा होगा वह राजनीति में आ गया, डॉक्टर दिमाग से तेज़ होते हैं पर पैसों के लालची होते हैं, इंजीनियर की गणित अच्छी होती है .....आदि आदि. मंत्री लाख शक्तिशाली हों पर जनता का सच्चा सम्मान नहीं ले पाते बल्कि उन्हें हिकारत ही मिलती है. फूल-माला और जयकारों की वास्तविकता सभी जानते हैं. बहुत शक्तिशाली होकर भी दुनिया का बड़े से बड़ा आतंकवादी या तानाशाह जनता का पूज्य नहीं बन सका. वहीं व्यक्तिगत कार्य के लिए दीपक में राज्य का तेल प्रयोग न करने वाले महामात्य झोपड़ी में रहकर भी अपनी मृत्यु के सैकड़ों वर्ष बाद आज भी पूज्यनीय और अनुकरणीय हैं. महामात्य अपने ब्राह्मण होने के कारण नहीं बल्कि अपने आचरण के कारण ब्राह्मण बने और समाज में पूज्य बने. गुणात्मक आधार पर यह जो धारणा किसी समूह के प्रति समाज में विकसित होती है वही तो जाति है. इसके लिए पूरी तरह व्यक्ति ही उत्तरदायी है ...ईश्वर बिलकुल नहीं. किन्तु ईश्वर की भूमिका बड़ी महत्त्वपूर्ण है. वह तराजू लेकर बैठा है. आप जितने मूल्य की जो चीज़ चाहेंगे वह आपको उतनी ही तौल कर दे देगा. आपके पास तराजू नहीं है ...इसलिए यह व्यवस्था उसी के पास है. हम चूंकि लालची और बेईमान हैं ....पक्षपात कर सकते हैं इसलिए हमारे कर्म और फल के बीच में अनुपात स्थापित करने के लिए ईश्वर की ज़रुरत पड़ी.
    ध्यान दिया जाय, वैदिक काल में जाति नहीं बल्कि वर्ण व्यवस्था थी जो कि बहुत ही तरल थी...लोगों को अपना गुणात्मक उन्नयन करने की स्वतंत्रता थी ...और तदनुरूप उच्च वर्ण की उपाधि लेने की भी. प्रश्न गुणों के स्तर का है...वर्गीकरण तो व्यवस्था है.
    आज हॉस्पिटल में मैंने अपने साथी डॉक्टर्स से एथनिक समूहों में जेनेटिक म्यूटेशन के बारे में चर्चा की. वे कोई भी ब्राह्मण नहीं हैं पर सभी ने म्यूटेशन के लिए अन्य कई कारणों के साथ समूहगत आचरण की परम्परा को भी स्वीकार किया.
    जहाँ तक गोरे-काले की बात है. वहाँ भी फिजिकल आधार पर पर्याप्त विभेद हैं. एलबीनो धूप नहीं सह सकते. गोरों की अपेक्षा काले लोग शारीरिक श्रम अधिक कर सकते हैं, चर्म रोग गोरों को होने की सम्भावनाएं अपेक्षाकृत अधिक होती हैं. इतना ही नहीं पुरुषों और महिलाओं में भी रोगों का वर्गीकरण है. स्त्री-प्रजनन संबंधी रोगों को छोड़ दिया जाय तो भी कोलीलीथियासिस महिलाओं के रोग के रूप में जाना जाता है. एलोपेसिया पुरुषों का ही रोग है.
    पुनश्च, गुणात्मक आधार पर पूर्व निर्मित जाति व्यवस्था विकृत हो जाने के कारण अब अप्रासंगिक हो गयी है. नयी व्यवस्था अपना आकार ले रही है ......हमारे-आपके चाहने न चाहने से से कुछ भी रुकेगा नहीं.

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  46. बहुत सुंदर प्रभावित करती पोस्ट ,.बहुत अच्छा लिखते है अति उत्तम.....


    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
    घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
    मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
    रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  47. एक कुरीति |

    कुरीति का अर्थ है - किसी वैज्ञानिक या अवैज्ञानिक कारण से आरम्भ हुई कोई प्रक्रिया बिना समझे, बिना परखे दोहराते चले जाना - जब की उसका सकारात्मक अर्थ कोई भी प्रकट रूप में नज़र न आता हो , जबकि नकारात्मकता साफ़ दिखाई पड़ रही हो |

    एक कुरीति को support करने के लिए उसके वैज्ञानिक कारण ढूंढना और उसे येन केन प्रकारेण "यह हो रहा है - तो ठीक ही होगा" यह साबित करना क्या ठीक है ? यदि कोई बीमारी होती भी हो, तो आजकल के औषधि विज्ञानं से उपाय खोजे जा सकते हैं | मेडिकल centres पर data होगा ही उपलब्ध - वह study किया जा सकता है | आप लोग तो विद्वान doctors हैं, यदि कोई बीमारी genetic है, तो क्या ऊपर से लेप करने से - साल में एक बार - वह ठीक होगी ? as a doctor इस पर अपनी राय ज़रूर दीजियेगा |

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  48. शिल्पा जी ! कोई भी जेनेटिक व्याधि किसी भी औषधि से ठीक नहीं हो सकती. चर्म रोगों एवं कुछ वातव्याधियों में औषधिसिद्ध उष्ण भात से स्वेदन की बात मैंने की थी. किन्तु यह भी वर्ष में केवल एक बार रस्म अदायगी से ठीक नहीं होता. किसी भी परम्परा को वैज्ञानिक और उचित ठहराने के लिए ही जोड़ तोड़ करने के पक्ष में मैं भी नहीं हूँ. मैं दक्षिण भारत की इस परम्परा का स्पष्ट शब्दों में विरोध करता हूँ. मैंने प्रथम टिप्पणी में ही सारी बात स्पष्ट कर दी थी. बाद की अन्य टिप्पणियों में तो विषयांतर हुआ है किन्तु उन विषयों पर मैं अभी भी दृढ हूँ.

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  49. @ कौशलेन्द्र जी .
    (१)
    जाति व्यवस्था हमारे लिए एक सामाजिक धारणा है और प्रजाति जैविक धारणा इसलिए हम इन्हें इन्हीं अर्थों में देखते है और इन्हीं आशयों में इनका उल्लेख करते हैं ! आप इन्हें एक जैसा संबोधन मानते हैं तो भी ! हम एक ही प्रश्न से जूझ रहे थे कि जूठन में लुढकने की प्रथा पर मित्रों के अभिमत मांगे जायें ! व्यक्तिगत रूप से मेरा उद्देश्य इस प्रथा के जानकार लोगों का पक्ष जानना था किन्तु उस क्षेत्र का कोई ब्लागर आया ही नहीं ! हालाँकि अन्य मित्रों की प्रतिक्रियाएं भी उपयोगी लगीं !

    जाति और वर्ण के सम्बन्ध में आपसे इस हद तक सहमत हूं कि यह सामाजिक ढांचे का उद्देश्यपरक विभाजन है जिसमें प्रारंभिक समय में तरलता थी और अब रूढ़ता ( रिजीडिटी ) आ गई है , आज की तिथि में किसी विश्वामित्र के ब्रह्मऋषि होने की कल्पना भी दूभर है ! खैर यह सब विषयान्तर है ! मुद्दा अब भी वही कि उस प्रथा के कारण क्या और निवारण क्या ?

    (२) शिल्पा जी को भैषज पक्ष पर प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार !

    @ धीरेन्द्र जी ,
    आपको धन्यवाद ज्ञापित करता हूं !

    @ शिल्पा जी ,
    कौशलेन्द्र जी ने भैषज पक्ष की बात कह दी है !
    प्रथा के विषय में मेरी अपनी कोई पक्की राय नहीं है ! जान लूं तो कहूं !
    अन्य तथ्यों के अलावा एक बात जो चित्र से मुझे स्पष्ट नज़र आ रही है कि भोजन अवशेष बहुत अधिक है और यह अन्न का प्रथम दृष्टया दुरूपयोग भी है ! जैसा कि मैंने पहले ही कहा , प्रथागत जातीय मसले पर टिप्पणी फिलहाल नहीं कर रहा हूं !

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  50. दुखद प्रथा है! प्रशासन का समर्थन है तो और दुखद!

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