रविवार, 12 सितंबर 2010

ये बे दीन पत्थर ऊंचाइयों को गढ़ते हैं !

चार सितम्बर की शाम , खबर ये कि श्वसुर साहब की तबियत ज्यादा ही नासाज़ है !  ज़ल्द से ज़ल्द पोस्ट वेब पेज के हवाले करता हूं और बीबी को हुक्म कि कल सुबह प्रस्थान की तैय्यारी की जाये ! ब्लॉग पर सन्देश छोडता हूं कि टिप्पणियों का रिस्पांस दो तीन दिनों के गैप से कर पाऊंगा और फिर सोने की नाकाम कोशिश...!सुबह तकरीबन ३.३० बजे मोबाइल की आवाज़ से अंदेशा पुख्ता हुआ कि वे ज़न्नतनशीं हुए  !  बीबी घबराई सी आधी नींद में उठ बैठती है...क्या हुआ ?  मैं कहता हूं , कुछ भी नहीं सुबह और ज़ल्दी चलेंगे !  खुद ड्राइविंग की हिम्मत नहीं सो परिचित प्रोफेशनल से कहा है कि सुबह ७ बजे शार्प निकलेंगे !

दोपहर बाद १ बजे के आस पास घर पहुंचते ही बीबी से छुपाने लायक कुछ ना रहा...रोने की आवाजें तेजतर होती हुई...वहां अंतिम यात्रा की तैय्यारियां पूरी हो चुकी थीं और फिर...कब्रिस्तान में अंतिम प्रार्थना के बाद  मिट्टी को मिट्टी के हवाले करने का दस्तूर पूरा हुआ !  जिस बंदे ने तमाम जिंदगी आराम से गुज़ारी हो उसे गीली सर्द स्याह कब्र के हवाले करते हुए खुद की मौत का ख्याल आया...ओह तब भी ऐसा ही होगा ?  सब मुझे अंधेरे में अकेला छोड़ कर चल देंगे ?  एक भयानक सन्नाटे में ऐसी ही मिट्टियों के दरमियान...

सोग के तीन दिन बाद जगदलपुर वापसी से पहले भाई संजीव तिवारी से बात करता हूं...आगे कभी आऊंगा तो भिलाई आकर आपसे ज़रूर मिलूंगा फिलहाल अल्लाह हाफिज !  उफान मारती हुई शिवनाथ नदी... मुहांसे भरी हुई सड़कें , वापसी की रफ़्तार को मद्धम और कार के अंदर पसरे सन्नाटे को और भी लंबा करती हुई !  जीवन मृत्यु के यथार्थ पर बरबस दौडती हुई सोच...किसी और सिम्त जाती भी तो कैसे  ?

कांकेर से गुज़रते हुये चाय के बहाने थोड़े से आराम का ख्याल...पप्पू भाई को ज़रूर अच्छा लगा होगा हालांकि हमें जगदलपुर छोड़ कर उन्हें रात में वापसी भी करना है  ! शहर के दोनों तरफ काले पत्थरों के बेतरतीब सिलसिले से पिरामिड जैसे पहाड़ की शक्ल नमूदार होती है ! छोटे बड़े ...आड़े तिरछे कितने सारे पत्थर...इंसानों के हाथ पड़ते ही मस्जिदों...मकबरों की बुनियाद में जा पड़ेंगे या फिर देवता बनने को मजबूर हो जायेंगे वर्ना इंसानों के पैरों तले रौंदे जाने तक अलग अलग शक्लों में ही सही बे मज़हब से एक दूसरे की आगोश में किसी पहाड़ को ऊंचाईयां बख्शते हैं ! फिलहाल एक ही ख्याल के साथ घर वापसी का नया बहाना ...नई उम्मीद पालता हूं ...ये बे दीन  पत्थर ऊंचाइयों को गढ़ते हैं और हम इंसान...?     


44 टिप्‍पणियां:

  1. वैसे तो कोई भी व्यक्तिगत अनुभव से नहीं कह सकता,पर अंदाज़न के ही तकाजें में , अगर मौत से भयानक कुछ है, तो वो शायद मौत पर विचार करना ही होगा...

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  2. अफसोसनाक -मुझे खबर रही सब -नियति को यही मंजूर था .....

    सब मुझे अंधेरे में अकेला छोड़ कर चल देंगे ?
    अली सा ,छोड़ तो अभी से चल दिए सब ...
    कारवाँ गुजर गया है ......अब कैसा जश्न ?

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  3. मृत्यु जो अंतिम सत्य है उस पर कहने के लिए कभी भी शब्द नहीं होते मेरे पास...बस मौन और कभी कभार खारे पानी की कुछ बूंदों से ही खुद को व्यक्त कर पाता हूँ. ......

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  4. इन्न लिल्लह ओ इन्नल अलैह राजऊन !!
    और कुछ नहीं कहन को!

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  5. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. अफ़सोसनाक...
    अल्लाह मरहूम की मग़्फ़िरत फ़रमाए.

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  7. उनकी आत्मा को उस अँधेरे में ही शान्ति मिले. परिवार को इस गमी से जूझने की शक्ति मिले.

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  8. ईश्वर आपको और भाभीजी को शक्ति दे। जीवन है तो मृत्यु भी है, हम उससे डर सकते हैं पर बच नहीं सकते

    गीता में श्रीकृष्ण कहते है:
    "जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु..."
    और...
    "मृत्यु सर्व हरश्चाहम..."

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  9. मृत्‍यु तो शाश्‍वत सत्‍य है भईया, अंधेरे या उजाले में इसे झुठलाया नहीं जा सकता. रही बात बे दीन पत्‍थरों की तो बेजुबान पत्‍थरों में जो हमने देखा वही गढ़ा, असल में तो ये मानव के विकास के पहले से उंचाईयां ही गढ़ते रहे हैं, आपने महसूस किया, यह बड़ी बात है, प्रकृति से गलबहियां देते दर्शन के लिए धन्‍यवाद भईया।
    सुब्रमण्‍यंम जी की तरह मैं भी कहता हूं कि आपके श्‍वसुर की आत्मा को उस अँधेरे में ही शान्ति मिले. परिवार को इस गमी से जूझने की शक्ति मिले.

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  10. लिंक देने का वादा आपने पूरा किया, यह तो मेरा अधिकार था।

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  11. @ मजाल साहब , अरविन्द जी , विचार शून्य साहब ,संवेदना के स्वर बंधुओं , रमेश केटीए जी,
    शाहिद मिर्ज़ा साहब,आदरणीय सुब्रमनियन जी , भाई स्मार्ट इन्डियन ,
    आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया !

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  12. @ संजीव भाई ,
    आपका अधिकार हमेशा बना रहेगा ! पाषाण विषयक दर्शन पर आपकी स्वीकृति हेतु आभार !

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  13. जानकर दुख हुआ। यह चीज़ ऊपरवाले ने अपने हाथ में रखी है। हमें अपने गम में शामिल समझें।

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  14. @ भाई मो सम कौन ? ,
    बहुत शुक्रिया !

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  15. दु:खद. आपने हमें अपना समझ सांझा किया. हमें इस पल में शामिल समझें. साभार.

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  16. माटी चितंन तो एक सुंदर दर्शन दे गया !
    .. छोटे बड़े ...आड़े तिरछे कितने सारे पत्थर...इंसानों के हाथ पड़ते ही मस्जिदों...मकबरों की बुनियाद में जा पड़ेंगे या फिर देवता बनने को मजबूर हो जायेंगे वर्ना इंसानों के पैरों तले रौंदे जाने तक अलग अलग शक्लों में ही सही बे मज़हब से एक दूसरे की आगोश में किसी पहाड़ को ऊंचाईयां बख्शते हैं !
    ..वाह!
    .. न जाने क्यों श्मशान से लौटने के बाद हम अपने उच्चविचार भूल जाते हैं. याद भी करते हैं तो अमल में नहीं ला पाते।
    ...बड़े बुजुर्गों का साया सर से हट जाने से बड़ी तकलीफ दूसरी नहीं हो सकती। अब यही सोच कर संतोष करना है कि वे किसी पहाड़ की ऊँचाइयों से भी ऊँचे उठ चुके हैँ।

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  17. अल्लाह मरहूम को जन्नत नसीब करे और रिश्तेदारों को सब्र अता फरमाएं.
    आपकी गंभीर पोस्ट पर:-
    आपका भावुक दिल 'पत्थरों' से भी जिस क़दर प्रभावित होता है, उस क़दर प्रभावित करने की क्षमता भी रखता है. आपके लेख ने एक शेर याद दिला दिया:-
    "पत्थर की मूर्ती में धड़कता था एक दिल,
    पहलू में आदमी ही के शायद खुदा न था." [शायद कृष्ण बिहारी "नूर" का है ये शेर]

    पत्थर की 'पत्थरी' पर मैंने भी कुछ यूं कह डाला है , अर्ज़ है:-

    बे दीन आदमी हुआ पत्थर नहीं जनाब,
    इंसानियत का कर रहा ख़ाना वही ख़राब,
    पत्थर का दीन खामशी,मज़बूती,बुलंदी!,
    यह शिष्टता भी रखता कि देता नहीं जवाब!!
    --mansoorali hashmi

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  18. ग्राम चौपाल में तकनीकी सुधार की वजह से आप नहीं पहुँच पा रहें है.असुविधा के खेद प्रकट करता हूँ .आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ .वैसे भी आज पर्युषण पर्व का शुभारम्भ हुआ है ,इस नाते भी पिछले 365 दिनों में जाने-अनजाने में हुई किसी भूल या गलती से यदि आपकी भावना को ठेस पंहुचीं हो तो कृपा-पूर्वक क्षमा करने का कष्ट करेंगें .आभार


    क्षमा वीरस्य भूषणं .

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  19. उनकी आत्मा को शान्ति मिले.

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  20. इन्ना लिल्लाहि व् इन्ना इलैही राजिउन. अल्लाह मरहूम को जन्नत नसीब फरमाए और घर वालो को सब्र अता फरमाए.

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  21. श्रद्धांजलि ...
    ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और परिवारजनों को यह दुःख सहन करने की शक्ति ...

    पता नहीं पोस्ट से सम्बंधित है या नहीं ...कहते हैं कि शमशान में जो भाव हर व्यक्ति के मन में होता है , वह स्थाई भाव हो जाए तो इस दुनिया से अपराध समाप्त हो जाएँ ..!

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  22. @ काजल भाई ,
    हार्दिक आभार !

    @ देवेन्द्र भाई ,
    दर्शन की स्वीकृति और भावनात्मक संबल के लिये आपका आभारी हूं !

    @ मंसूर अली साहब ,
    दुआ कीजियेगा !

    @ अशोक बजाज जी ,
    आभार !

    @ संजीत भाई ,
    शुक्रिया !

    @ शहरयार भाई ,
    दुआओं के लिए शुक्रिया !

    @ वाणी जी ,
    आपका हार्दिक आभार !
    आपकी श्मशान वाली बात में सच है !

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  23. ईश्वर दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करे और परिवार जनों को यह अपूरणीय क्षति सहने की क्षमता...
    विनम्र श्रद्धांजलि

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  24. बहुत अफसोसजनक .
    उनकी आत्मा को शांति मिले.

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  25. दु:खद! हालाँकि जीवन के इस अन्तिम सत्य से मुँह मोडना भी भला किसके लिए संभव हुआ है....
    ईश्वर दिवंगत आत्मा को शान्ती प्रदान करे तथा कुटुम्बीजनों को इस दु:ख को सहने की शक्ति.....

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  26. हम आप अपने दुःख में शामिल पाइए...
    मौत पर कुछ भी कहना हमारे वश की बात कहाँ...हाँ ये ज़रूर कहेंगे..सबका यही हाल होना है...बस ज़रा सा आगे-पीछे...
    अब ज़रा..आपकी लेखनी की बात...
    अगर जो ये पत्थर इन्हें पढ़ पाते
    तो यकीं कीजिये वो भी आज मुस्कुराते
    और जो कहीं समझ जातें आपकी बातें
    तो देवता बनने से भी इनकार कर जाते....

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  27. हमें आप अपने दुःख में शामिल पाइए...
    मौत पर कुछ भी कहना हमारे वश की बात कहाँ...हाँ ये ज़रूर कहेंगे..सबका यही हाल होना है...बस ज़रा सा आगे-पीछे...
    अब ज़रा..आपकी लेखनी की बात...
    अगर जो ये पत्थर इन्हें पढ़ पाते
    तो यकीं कीजिये वो भी आज मुस्कुराते
    और जो कहीं समझ जातें आपकी बातें
    तो देवता बनने से भी इनकार कर जाते....

    उत्तर देंहटाएं
  28. @ रश्मि जी ,शिखा जी ,दिनेश भाई ,अदा जी ,
    आप सब का ह्रदय से आभार !

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  29. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें और मैडम को ये दुःख सहने की शक्ति दें.. ये एक ना एक दिन हम सब के साथ होना है.. अगर इस बात को हमेशा याद रखें तो गुनाहों से दूर ही रहेंगे हम..

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  30. आपने तो प्रकृति और संस्‍कृति को आमने-सामने खड़ा कर दिया.

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  31. “मनमौजी” जी के ब्‍लॉग का इंतजार रहेगा.

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  32. अली साहब ! आपके आदरणीय ससुर साहब के इंतकाल
    की दुखद सूचना आपके ब्लॉग से मिली. ईश्वर उनकी आत्मा को
    शान्ति प्रदान करे. परिवार की इस दुखद घटना पर
    आपने अपनी अनुभूतियों को जिन शब्दों में स्वर दिया
    है , वे सचमुच दिल को छू जाती हैं .

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  33. .
    .
    .
    "ये बे दीन पत्थर ऊंचाइयों को गढ़ते हैं और हम इंसान...?"

    हम इंसानों को दूसरे फालतू कामों से ही फुर्सत नहीं मिली अब तक...


    "जिस बंदे नें तमाम जिंदगी आराम से गुज़ारी हो उसे गीली सर्द स्याह कब्र के हवाले करते हुए खुद की मौत का ख्याल आया...ओह तब भी ऐसा ही होगा ? सब मुझे अंधेरे में अकेला छोड़ कर चल देंगे ?"

    जिसने जीवन पाया है उसकी देह के साथ तो होना है ही यह सब एक दिन... पर अली साहब जब हम ही नहीं रहे (मौत के बाद)... तो गीली सर्द स्याह कब्र में अंधेरे में अकेला रहा या सूखी गर्म दहकती-लाल चिता में जला कौन ?... देह है वह हम तो नहीं हैं, न ?


    ...

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  34. @ प्रवीण शाह जी,
    भाई मुझे उस वक़्त ऐसा लगा जैसे कि मैं जिन्दा ही... :)

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  35. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करें .... और परिवार को इस गमी से जूझने की शक्ति .....

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  36. जिस बंदे नें तमाम जिंदगी आराम से गुज़ारी हो उसे गीली सर्द स्याह कब्र के हवाले करते हुए खुद की मौत का ख्याल आया...ओह तब भी ऐसा ही होगा ? सब मुझे अंधेरे में अकेला छोड़ कर चल देंगे ? एक भयानक सन्नाटे में ऐसी ही मिट्टियों के दरमियान...


    ham aksar aisaa kuchh nahin sochte........

    alaah unhein jannt nasib karaaye...

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  37. 'जिस बंदे नें तमाम जिंदगी आराम से गुज़ारी हो उसे गीली सर्द स्याह कब्र के हवाले करते हुए खुद की मौत का ख्याल आया..ओह तब भी ऐसा ही होगा ? सब मुझे अंधेरे में अकेला छोड़ कर चल देंगे ?'

    जिंदगी का यही फसाना है, कब किसकी बारी आए किसने जाना है।

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  38. एक बार आया था। मृत्यु पर कुछ कह पाना बड़ा कठिन लगता है।
    अभी मो सम कौन ब्लॉग पर 'मुसाफिर तू जाएगा कहाँ' सुनते हुए टिप्पणी कर रहा हूँ।

    मुसाफिर तू जाएगा कहाँ?

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  39. यह तो बहुत दुःख की बात है...

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  40. आज कई दिनों बाद पुरानी पारी खेलने के लिए आया तो देखा की ऐसे भाव हैं की फिर ठंडा हो रहा हूँ ! ठंडा यानी स्थायी ! यानी और पक्व ! और ठोस !

    विगत दिनों में निर्वेद ही साध रहा था , और यहाँ कुछ ऐसे ही दर्शन का विस्तार ! पंचभूत हमसे बड़े हैं , हमें नाप देते हैं , चाहे आग हो या मिट्टी(धरती) !

    अली जी , एक गाना इन दिनों गुनगुनाया , यहाँ भी कुछ ऐसा ही देखकर उसे यहाँ लिंकित कर रहा हूँ ! ये भाव विरचित करते हैं --- http://www.youtube.com/watch?v=LL0ia5Acrqo

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  41. ओह ... जीवन | ...... कभी न कभी हम सभी को जाना ही है न ? परन्तु यह जानकारी भर तो किसी एक के जाने का महत्व कम नहीं करती है !!

    हर प्रियजन का जाना हर एक को उतना ही गहन दुःख देता है, इस दर्द को सिर्फ इसलिए कम नहीं कहा जा सकता की यही दूसरों के साथ भी होता रहा है / हो रहा है / होगा |

    :(
    belated condolences ....

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