मुद्दतों पहले सूरज आसमान में बहुत तेज भागता था जिसकी वजह से दिन बहुत छोटा
और रातें बहुत लंबी होती थीं । ऐसे में माओरी लोग अपने दिन प्रतिदिन के काम काज
ढंग से नहीं निपटा पाते थे । इतना ही नहीं तब फसलों के उत्पादन और भोजन की
व्यवस्था भी बाधित हुआ करती थी । इस समस्या से निपटने के लिए माओरी अर्द्ध देव
माउई ने एक योजना बनाई लेकिन उसके भाई बंधु ही उसकी योजना से असहमत थे क्योंकि वो
जानते थे कि सूरज आग का विशाल गोला है जिसे पकड़कर उसकी गति धीमी करना असंभव है ।
माउई ने कहा सृष्टि में कुछ भी असंभव नहीं होता। इसके बाद उसकी मां और भाइयों ने
पटसन से बेहद मजबूत फंदे बुने। माउई ने महान पूर्वज मूरीरंगावेनुआ के जबड़े की
जादुई हड्डी अपने साथ एक हथियार की तरह से रख ली और रात के अंधेरे में सदल बल
पूर्व दिशा में स्थित उस गुफा की ओर बढ़े , जहां सूरज यानि कि तामानुइतेरा विश्राम
करता था ।
वहां पहुंचकर उन्होंने दरख्तों की ओट में मिट्टी की दीवालें बनाई तथा जगह जगह
जादुई फंदे छुपा दिए और सूरज के जागने का इंतजार करने लगे । माउई ने भाइयों से कहा
कि जब तक मैं ना कहूँ कोई भी अपनी जगह से नहीं हिलेगा ।जैसे ही भोर हुई सूरज अपनी
गुफा से बाहर निकलने लगा , उसका सिर और धड़ गुफा से बाहर आते ही माउई ने इशारा किया
। जिसके बाद भाइयों ने पूरी ताकत से रस्सियाँ और फंदे खींचे । जिसकी वजह से सूरज
उन फंदों में बुरी तरह से फंस गया । वो गुस्से में गरजा और खुद की आजादी के लिए
भयंकर गर्मी छोड़ने लगा । गर्मी की तीव्रता से माउई के भाई विचलित होने लगे लेकिन
माउई ने कहा बस जरा सी देर हौसला बनाए रखो , फिर वो पूर्वज के जबड़े की जादुई हड्डी
लेकर आगे बढ़ा और उसने हड्डी से सूरज की पिटाई करना शुरू कर दिया।यहाँ तक कि सूरज
उसकी पिटाई से कमजोर और अधमरा हो चला था ।
बेबस सूरज ने माउई से पूछा कि, तुम मेरी पिटाई क्यों कर रहे हो ? तब माउई ने
सूरज से कहा, तुम आसमान में बहुत तेज भागते हो जिसकी वजह से माओरी लोग खेती करने ,
शिकार करने और अन्य जरूरी काम करने में विफल हो जाते हैं । माउई की जबरदस्त पिटाई
से कराह रहे सूरज ने हार मान ली और वादा किया कि अब वो आसमान में धीमी गति से
यात्रा किया करेगा । सूरज के वादे से आश्वस्त माउई ने रस्सियाँ ढीली कीं और सूरज
लड़खड़ाते हुए आसमान मे जा पहुँचा । इसका नतीजा ये हुआ कि दिन लंबे होने लगे । इसके बाद
माओरी लोगों को, खेती करने , मछली पकड़ने और रोशनी के मजे लेने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध होने लगा । माउई के प्रति
कृतज्ञ हुए माओरी लोग आज भी सूरज की किरणों को माउई की रस्सियाँ कहा करते हैं ।
यह आख्यान इंसानों के जीवन में सूरज और उसके ताप के महत्व को रेखांकित करता है
। आख्यान के मुताबिक सूरज की गति की
तीव्रता के कारणवश दिन छोटे होने लगे थे । इतने छोटे कि उनकी फसलों को पनपने और पकने तक का
समय नहीं मिल पाता था । वो शिकार नहीं कर
पाते थे यहां तक कि दिन प्रति दिन के दूसरे काम पूरे करना भी दुश्वार हो गया था ।कथा कहती है कि माउई , जोकि माओरी जनजाति का अर्द्ध
देव था , सूरज की इस हरकत से चिंतित था क्योंकि उसे पता था कि धूप की उम्र घट जाने
से माओरी समाज के सामने जीवन के लिए अपरिहार्य भोजन आदि व्यवस्थाओं का संकट बढ़ रहा
है अतः उसने तय किया कि वो सूरज को नसीहत देगा । उसने सूरज की गति को धीमा करने की योजना बनाई थी
लेकिन उसके अपने पारिवारिक सदस्य भी इस योजना को जोखिम भरा मान रहे थे ।
उसके भाइयों का विचार था कि सूरज अत्यंत ज्वलनशील आग का विशाल गोला है और उसे
कैद करने की कोशिश में उन सभी की जान भी जा सकती है । माउई इस बात से सहमत नहीं था,
उसने कहा कि दुनियाँ में कोई बात असंभव नहीं होती। हम सूरज को पकड़कर दंड जरूर देंगे। माउई की बात सुनकर घरवालों ने पटसन से मजबूत
रस्सियाँ बनाईं और मजबूत फंदे भी । ग्रामीण परिवेश में पटसन का इस्तेमाल सामान्य
बात है किन्तु सूरज को उसके सोने वाली गुफा से निकलते ही पकड़ना और पटसन के फंदों में
तब तक जकड़ कर रखना जब तक कि सूरज माओरी समुदाय के हित में कोई अनुकूल आश्वासन ना
दे दे कथा में यह उल्लेख माओरी हौसले के अभिव्यक्ति है । इस आख्यान में दरख्तों की ओट मिट्टी की दीवालें
और मृत पूर्वज के जबड़े की हड्डी का कथन अद्भुत है । दरख्तों और मिट्टी की ओट से सूर्य के ताप को सह लेने का अनुभव ,
कमाल का है ।
जबड़े की जादुई हड्डी से सूरज की पिटाई, तत्कालीन समय में प्रचलित हथियारों से संबंधित कथन माना जा सकता है ।यानि कि प्रचलित वनस्पति की रस्सियाँ और प्रचलित हथियारों से सूरज को दंडित किया जाना मिथक कालीन समाज के अनुभव और ज्ञान की अभिव्यक्ति करता है । बहरहाल सूरज के ताप से परिजन विचलित हैं किन्तु अर्द्ध देव माउई उन्हें हौसला देते हुए फंदों में फंस चुके सूरज की बेदम पिटाई करते हुए सूरज को असहाय और कातर बना देता है और फिर सूरज स्वयं की मुक्ति के लिए माउई से समझौता करता है कि अब वो आसमान में अपनी गति धीमी करेगा । इतनी धीमी कि रात और दिन के दरम्यान समयावधि का संतुलन बन जाये और माओरी समुदाय दिन के उजाले का लाभ ले पाए । उस सुबह घायल सूरज अपनी मुक्ति के बाद लड़खड़ाता हुआ आसमान की ओर जाता है और तब से लेकर आज तक सामान्य गति से यात्रा की अपनी वचनबद्धता से मुकरा नहीं है ।