मां लियांग बेहद गरीब किन्तु दयालु युवा था और वो एक सम्पन्न किसान के यहाँ
मवेशी चराने का काम करता था । उसे पेंटिंग करना बहुत पसंद था सो जहां भी मौका
मिलता तस्वीरें बना दिया करता । एक रात,
उसने सपने में एक बुजुर्ग को देखा , जिन्होंने उसे , एक जादुई
पेंट ब्रश देते हुए सलाह दी कि वो दूसरे गरीब लोगों की मदद किया करे । जब वह सोकर उठा, तो उसने
कमरे में पेंट ब्रश पाया । उस दिन के बाद से मां लियांग, लोगों की मदद के लिए उस
पेंट ब्रश का इस्तेमाल करने लगा । वो लोगों की जरूरत को ध्यान में रखकर चित्रांकन
करता और फिर उसके चित्र जीवंत हो जाया करते थे । एक रोज उसने महसूस किया कि लोगों
के पास खेतों की जुताई के लिए बैल और दूध के लिए गायें नहीं हैं तो उसने गाय और
बैलों के चित्र बनाए, परिणाम स्वरूप लोगों के पास , जीवंत हुई गायों से दूध उपलब्ध
होने लगा और बैलों से खेतों की जुताई आसान हो गई, फिर उसे ख्याल आया कि लोगों के
खेतों में सिचाई की सुविधा नहीं है तो उसने नदी का चित्र बनाया जो सचमुच की नदी की
तरह से खेतों के करीब से बहने लगी और फसलें हरियाने लगीं । ज्यादातर लोग जान चुके
थे कि मां लियांग, लोगों की परेशानियां दूर करने के लिए पेंट ब्रश का इस्तेमाल
करता है । उन लोगों में से एक धन सम्पन्न शख्स भी था ।
उसने किसी पारिवारिक प्रकरण में मां लियांग से मदद ली थी ।
उसे पेंट ब्रश की ताकत का एहसास हुआ तो उसने मां लियांग के कब्जे से उस पेंट ब्रश
को हथियाने की बात सोची । वो स्वभाव से बुरा आदमी था और उसका ख्याल था कि वो इस
पेंट ब्रश की मदद से बहुत ज्यादा पैसा कमा सकता है । बहरहाल उसने अपने कारिंदे भेज
कर मां लियांग को जेल भिजवा दिया और उसका पेंट ब्रश हथिया लिया । जादुई पेंट ब्रश
पाकर वो बहुत खुश था और उसने अपने दोस्तों को घर बुलाकर ढेर सारे चित्र बनाए लेकिन
आश्चर्य यह कि उसके द्वारा बनाया हुआ एक भी चित्र जीवित नहीं हुआ । उसने एक बार
फिर से कारिंदे भेज कर मां लियांग को जेल से बाहर बुलवाया और उससे कहा कि अगर तुम
मेरे कहने से कुछ तस्वीरें बना कर जिंदा कर दोगे तो मैं तुम्हें हमेशा हमेशा के
लिए जेल से आजाद करवा दूंगा । मां लियांग जानता था कि वो आदमी दुष्ट है पर उसके
सामने आजादी का कोई दूसरा विकल्प था ही नहीं ।
मां लियांग ने उसके सामने एक शर्त रखी कि अगर तुम मेरी आजादी की बात पर
कायम रहोगे तो मैं तुम्हारे लिए चित्र बना दूंगा । बुरा व्यक्ति बहुत खुश हुआ और
उसने कहा , हाँ मैं तुम्हारी आजादी के अपने वचन पर कायम रहूँगा । अब तुम मेरे लिए
सोने का पहाड़ का चित्र बनाओ ।
बहरहाल मां लियांग के मन में उस व्यक्ति से मुक्ति की योजना
पनप चुकी थी , तो उसने सबसे पहले समुद्र का चित्र बनाया और उसे जीवित कर दिया , यह
देखकर दुष्ट व्यक्ति बौखला गया , उसने कहा तुमने समुद्र क्यों बनाया ? जल्दी से
सोने का पहाड़ बनाओ । मां लियांग ने कहा ठीक है और उसने सोने के पहाड़ का चित्र
समुद्र के दूसरी ओर बना दिया । इस पर दुष्ट व्यक्ति ने कहा कि अब एक विशाल जहाज भी
बनाओ ताकि मैं समुद्र पार जाकर ढेर सारा सोना इकट्ठा कर पाऊं । यह सुनकर मां
लियांग मुस्कराया और बोला ठीक है । उसने
जहाज का विशाल चित्र बनाया जिसमें सबसे पहले दुष्ट व्यक्ति चढ़ गया और उसके ठीक
पीछे पीछे उसके परिवार के लोग और मित्रगण भी जहाज पर सवार हो गए । इसके बाद जहाज ,
लंबी समुद्री यात्रा पर, सोने के पहाड़ की ओर चल पड़ा और जैसे ही समुद्र के बीचो बीच
पहुंचा , मां लियांग ने एक विशाल लहर बनाई , जिससे टकरा कर जहाज डूब गया और वो
व्यक्ति, अपने रिश्तेदारों, दोस्तों सहित
काल के गाल में समा गया । इस प्रकार से मां लियांग की बुद्धिमत्ता से ना केवल मां
लियांग बल्कि सारे गांव के लोग उस बुरे स्वभाव के व्यक्ति के आतंक से मुक्त हो गए
और एक बार फिर से मां लियांग, खुशी खुशी गरीब लोगों की मदद करने लगा ।
यह एक चीनी आख्यान है जिसके संकेतानुसार ग्रामीण बसाहटों
में बहुसंख्य आबादी निर्धन और जीवन अवसरों से वंचित हुआ करती है और गिने चुने धन
सम्पन्न लोग उनके शोषण और बदहाली के लिए उत्तरदाई होते हैं । कथा में, मां लियांग नामक व्यक्ति भी निर्धन किन्तु
सदाशय है । वो अपने गांव में कम-ओ-बेश सबकी सहायता खुले मन से करता है । उसके गांव
की बहुसंख्य आबादी के निर्धन होने और गिने चुने परिवारों के सम्पन्न होने की
प्रतीकात्मकता समाज की जनसंख्या के द्विवर्गीय होने का संकेत देती है । स्पष्ट है
कि यह वैषम्य आर्थिक और साधन संपन्नता पर आधारित है । इस मिथक में सम्पन्न व्यक्ति
की लोलुपता, निचले सामाजिक संस्तरण से सब कुछ निचोड़ लेने जैसा संकेत देती है । कुल
मिलाकर यह गांव, कार्ल मार्क्स के
द्विवर्गीय समाज वैषम्य और शोषण की अवधारणा के जैसा प्रतीत होता है । मां लियांग
की सदाशयता और वंचितों की सहायता के उसके संकल्प से यह बोध होता है कि जैसे
सर्वहारा वर्ग में किसी नायक ने एकजुटता की पहल की हो । उल्लेखनीय है कि अन्यान्य
कारणों से ही सही, मां लियांग , एक शोषक
व्यक्ति की सहायता कर बैठता है जिसकी परिणति स्वरूप उसे जेल जाना पड़ता है । शोषक व्यक्ति , मां लियांग से उसकी ऊर्जा और
सहायता के साधन छीन लेना चाहता है ।
मिथक में यह उल्लेख मिलता है कि शोषक व्यक्ति सहायता के
साधनों को छीन लेने के उपरांत भी, स्वार्थी सिद्धि में विफल रहता है । उसके
स्वार्थ का आधार विशुद्धतः आर्थिक है सो उसने मां लियांग की मुक्ति के सौदे के नाम
पर, मां लियांग से ही अपनी हित सिद्धि करवाना चाही लेकिन इस बार मां लियांग सतर्क
था उसने पिछली भूलों से सबक सीखा था । मां लियांग ने होशियारी से पहले समुद्र फिर
समुद्र पार सोने का पहाड़ और उसके बाद विशाल जलपोत के चित्र बनाए तदुपरांत शोषक की
लालसा के गर्त में , शोषक और उसके कुनबे को ही धकेल दिया । यह एक कुशल योजना थी
जिसके अंतर्गत विशाल समुद्री लहर से शोषक वर्ग का अंत किया जाना था उसे सबसे बाद
में रचा गया । यह मुक्ति का सबसे सफल आयोजन था जिसमें सारे चित्र जीवित होकर शोषणकर्ता
को ही निगल गए और मां लियांग ने गांव के शोषित वर्ग को आगत जीवन की विभीषिका से
मुक्त करा लिया और कथा के इस मोड़ पर सिर्फ एक ही वर्ग गांव में स्वतंत्र होकर जिया
, मां लियांग और उसके जैसे अन्य निर्धन लोगों का वर्ग । मां लियांग इस मुक्तिकामी
वर्ग का नायक बना और लोगों की सहायता में लगा रहा । बहरहाल ये कहना कठिन है कि यह
आंदोलन हिंसक नहीं था और ये कि स्वतंत्र हुए लोग साधन विपन्नता में एक जैसे नहीं
थे ।
मिथक में किसी बुजुर्ग व्यक्ति द्वारा पेंट ब्रश का उपहार,
मां लियांग को दिए जाने का उल्लेख है और वो भी स्वप्न में । प्रतीत होता है कि यह
मां लियांग जैसे विचारशील और सृजनहारे के चिंतन का परिणाम था जिसके आधार पर शोषण
के विरुद्ध युद्ध को जीता गया । मां लियांग एक सृजन शील व्यक्ति है और उसने
सुनियोजित ढंग से शोषक वर्ग का समूल नाश करने योग्य सोने के पहाड़ के प्रतीक गढ़े,
जिसके समुद्र के उस पार मौजूद होने का आश्वासन दिया गया किन्तु विशाल जहाज के
समुद्र की प्रचंड लहरों से ना बच पाने का जतन भी किया गया । कथा की इस व्याख्या
में बुजुर्ग व्यक्ति को अनुभवी और ज्ञानवान व्यक्ति माना जा सकता है । संभव है कि
सुधि जन को कथा की यह व्याख्या अनुपयुक्त लगे किन्तु इस मिथक की दूसरी व्याख्या
आध्यात्मिकता और दैवीयता से ओत प्रोत है ।
यहां एक बुजुर्ग यानि कि एक देवतुल्य व्यक्ति मां लियांग की मदद की गरज से उसे एक
जादुई पेंट ब्रश देता है जिसके माध्यम से बनाए गए चित्र स्वयं ही जीवंत हो जाते
हैं और मां लियांग ऐसे ही चित्र गढ़ते हुए साधनहीन तबके की मदद करता है । उसे चित्र
कला का अभ्यास है और देवतुल्य व्यक्ति ने उसके अभ्यास के अनुकूल साधन उसे दिए हैं ताकि
उसकी सदाशयता का लाभ वंचित तबके को मिल पाए । कथनाशय यह कि दैवत्व सदैव ही वंचित आबादी
के पक्ष में खड़ा रहता है ।