रविवार, 30 अगस्त 2026

मेइरियांग और लुबुआन्नेई

कहते हैं कि लुबुआन्नेई ने बालपन में ही अपने पिता को खो दिया था और उसकी मां खेतों में मजदूरी करके उसका पालन पोषण कर रही थी । लुबुआन्नेई का अल्पवयस दोस्त मेइरियांग भी अपने अभिभावकों को खोकर अनाथ होने का असहनीय दर्द भुगत रहा था । वो दोनों ज्यादातर वक्त एक साथ गुजारते, खेलते कूदते, यहां तक कि जंगल से जलावन की लकड़ी भी एकत्रित किया करते । लुबुआन्नेई की मां मेइरियांग को अपने बेटे की तरह से प्यार करती थी । बचपन से लेकर किशोरावस्था और फिर युवापन तक के साहचर्य ने, मेइरियांग और लुबुआन्नेई के दरम्यान लगावट के बीज बो दिए थे ।  एक रोज मेइरियांग ने लुबुआन्नेई से पूछा कि , क्या वो अपने ही गांव के किसी युवा से ब्याह करना चाहती है या दूसरे गांव के किसी अन्य नौजवान से ? लुबुआन्नेई खामोश रही तो मेइरियांग ने कहा कि वो किसी और से उसका ब्याह करवा देगा । यह सुनकर लुबुआन्नेई ने मेइरियांग के हाथ में काट लिया । इससे मेइरियांग समझ गया कि लुबुआन्नेई के मन में भी वही भावनाएं हैं जो खुद उसके मन में थीं । वक्त गुजरा मेइरियांग को गांव में ईमानदार और सम्मानित व्यक्ति के तौर पर पहचाना जाने लगा । उस गांव में , इंसान को उसकी ताकत और संस्कारों के आधार पर श्रेष्ठ माना जाता था । मेइरियांग , शारीरिक गतिविधियों और खेलकूद में सर्वाधिक दक्ष था ।

इसलिए गांव वालों ने उसे स्थानीय संगठन खांगचू का मुखिया बना दिया ।  इसी तरह से लुबुआन्नेई को भी चरित्रवान और सामाजिक मूल्यों के लिए समर्पित , खूबसूरत युवती माना जाता था । उसकी खूबसूरती के चर्चे आस पास के गांव में भी आम थे सो एक रोज मुलियांगाह नाम का एक युवा लुबुआन्नेई के गांव आया और उसने खांगचू के मुखिया और लुबुआन्नेई के प्रेमी मेइरियांग को पंजा कुश्ती की चुनौती दी क्योंकि वो खुद भी अपने गांव का चैंपियन था । असल में वो मेइरियांग की तुलना में ज्यादा धनाढ्य परिवार का वारिस था । तीन चक्र के इस मुकाबले में पहला चक्र मुलियांगाह ने जीत लिया लेकिन बाकी के दोनों चक्र   मेइरियांग ने जीते । यह एक कड़ा मुकाबला था जिसमें बहिरागत युवा की शिकस्त हुई , जिससे वो संतुष्ट ना था । बहरहाल, बाद में पता चला कि मुलियांगाह , लुबुआन्नेई की खूबसूरती को रूबरू देखने आया था और फिर कुछ ही दिन बाद उसके पिता, उसके लिए लुबुआन्नेई का हाथ मांगने आ पहुंचे । चूंकि लुबुआन्नेई की मां एक विधवा महिला थी और जिंदगी की मुश्किलों को समझती थी, तो उसने अपेक्षाकृत सम्पन्न घराने के युवा मुलियांगाह से अपनी सुपुत्री का ब्याह करने के लिए हामी भर दी । नतीजतन ये ब्याह , फसल की कटाई के बाद के मौसम में होना तय हुआ ।

लुबुआन्नेई को घटनाक्रम की जानकारी नहीं थी वर्ना वो पहले ही दिन इस रिश्ते से इंकार कर देती ।  इसके बाद मुलियांगाह अक्सर लुबुआन्नेई के गांव आने लगा तो लुबुआन्नेई को शक हुआ उसने अपनी मां से पूछा और सच जानते ही वो बौखला गई। उसने कहा , वो ये शादी नहीं करेगी क्योंकि वो मेइरियांग से प्यार करती है । उसकी मां ने उसे बहुत समझाया और आखिरकार यह भी कह दिया कि अगर लुबुआन्नेई इस रिश्ते को कुबूल नहीं करेगी तो वो आत्महत्या कर लेगी । अब अपनी मां के दबाब में , लुबुआन्नेई के पास खामोश हो जाने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था ।  लुबुआन्नेई ने अपने प्रेमी मेइरियांग से अपनी व्यथा कही तो उसने भारी मन से कहा कि शायद उनकी किस्मत में यही लिखा है । उसने वादा किया कि अब वो लुबुआन्नेई से कभी नहीं मिलेगा और आगत ब्याह के लिए शुभकामनाए देते हुए वहां से चल दिया ।  वो , शोकाकुल था और लुबुआन्नेई से जरा दूर जाते ही बिलख बिलख कर रोया । वो जानता था कि अब वो , कभी भी किसी अपने के साथ , सूर्यास्त नहीं देख पाएगा और ना ही अपने मन की बात कह सकेगा । वो अनाथ था और लुबुआन्नेई से अपनी हर बात साझा करता था । उसने खुद को दिलासा देने के लिए यह ख्याल गढ़ा  कि  लुबुआन्नेई अधिक धनवान व्यक्ति से ब्याह करके आराम से जी सकेगी ।

आहिस्ता आहिस्ता फसल कटाई का मौसम आ गया और मुलियांगाह के परिजन लुबुआन्नेई को विदा करवाने आ पहुंचे।लुबुआन्नेई आखिरी बार मेइरियांग से मिलना चाहती थी पर वो वहां था ही नहीं ।  लुबुआन्नेई ने मेइरियांग के खेतों की तरफ जा रही एक युवती को अपना हार सौंपा और कहा कि , इसे मेरी आखिरी निशानी बतौर मेइरियांग को सौंप देना , हालांकि मेइरियांग उस युवती को भी नहीं मिला । युवती ने खलिहान में उस हार को छोड़ दिया ताकि मेइरियांग जब भी वापस आए , उस हार को देख  ले । दोपहर ढलते ढलते मेइरियांग खाना खाने के नाम पर खलिहान वापस आया तो उस हार को देख कर समझ गया कि उसे आखिरी बार लुबुआन्नेई से मिलना होगा, वो गांव वापस भागा पर लुबुआन्नेई , वहां से जा चुकी थी । वो उस रास्ते पर बेतहाशा भागा, जहां से लुबुआन्नेई की विदाई हुई थी पर सब कुछ खत्म हो चुका था । उसने हताशा में लुबुआन्नेई का नाम पुकारा , लुबुआन्नेई ने घाटी में गूंजती प्रियतम की आवाज को सुना । उसने जबाब भी दिया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी , अब अन्य कोई विकल्प शेष नहीं था । एक छोटी सी घाटी में शुरू हुई प्रेम कथा, वहीं पर खत्म हो गई , एक नन्ही घाटी , बड़े पहाड़ों की बेड़ियां तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकी , सुनते हैं आज भी उस घाटी में सर्द और बेबस सदाएं  गूंजती हैं । 

ये आख्यान तामेंगलोंग , मणिपुर के नन्हे से गांव बुआनरुआंगलुआंग में बहुश्रुत और बहुकथनीय है , जहां आख्यान के नायक नायिका की प्रेम कहानी बालपन के साहचर्य के दौरान पुष्पित, पल्लवित हुई और अकाल मौत मर गई । उल्लेखनीय है कि ये कथा मणिपुर में विजातीय, नागा जनजाति की बसाहट की पसंदीदा और बेहतरीन कहानियों में से एक है । आख्यान दो नन्हे बच्चों को लेकर कहा गया है जिसमें से सुकन्या लुबुआन्नेई के सिर से पिता का साया उठ चुका है और उसकी मां एक निर्धन मजदूर वर्गीय विधवा है जबकि बालक मेइरियांग अपने माता पिता को खोकर शत प्रतिशत निराश्रित और अनाथ है हालांकि लुबुआन्नेई की मां उसे अपने पुत्र की तरह से स्नेह करती है । कथा का सार ये है कि बालक और बालिका अपने जैविक अभिभावकों में से दोनों या एक को खो चुके हैं । इस तरह से वो दोनों स्नेह से पूर्णतः या अंशतः वंचित अल्पवयस्क है । उनका बाल मन एक दूसरे के साथ में खेल कर, घरेलू कार्य में सहयोगी होकर, एक दूसरे के मित्र और कालांतर में अनुरक्त प्रेमी जोड़े के रूप में बखाने गए हैं । आख्यान कहता है कि दोनों ही आर्थिक रूप से समाज के विपन्नतम संस्तरण के सदस्य है । ऐसे में मेइरियांग एक मेहनती और देह दक्ष युवक के रूप में स्वयं को स्थापित करता है और अपने गांव में स्वभाविक नायक का दर्जा हासिल कर लेता है । 

वो नायिका से बेहद शालीनता के साथ यह रहस्योद्घाटन करवाने में सफल हो जाता है कि नायिका भी उसे प्यार करती है । अपने प्रेम की पुष्टि के लिए वो नायिका की अन्यत्र शादी का कथन करता है और नायिका  उसके हाथ में काटकर स्नेहासिक्त रोष प्रकट करती है ।  कथनाशय यह कि उनका रोमांस अप्रत्यक्ष संकेतों के माध्यम से प्रकटित और मुखरित हो जाता है । इस आख्यान में प्रातीतिकता के साथ उनके रोमान और यकजहती का उल्लेख किया गया है कि वो दोनों एक साथ, लगभग हरेक सांझ , सूर्यास्त के गवाह हुआ करते । सूरज जो संध्या काल में मृदु ऊष्मा , प्रेम की सुखद हरारत का प्रतीक है , हर बार डूब जाता है और अगली सुबह नई उम्मीद के साथ वापस लौटता है । उन दोनों का जीवन लगभग ऐसे ही , ऐन सूरज की तरह से प्रेम की क्षणिक मृत्यु और क्षणिक पुनर्जीवन से होकर गुजरता है । यह उम्मीद और नाउम्मीदी के दरम्यान झूलते हुए इश्क सा, लय और अ-लय सा प्रेम ।  गांव छोटा है , घाटी छोटी है और इश्क भी अंततः बड़े दीर्घकाय पहाड़ों , अजनबी बड़प्पन के आगे दम तोड़ देता है , संबंधों की अकाल मृत्यु के जैसा। नायिका की मां ने पति  खोया था , निर्धनता देखी थी, अपनी मासूम कन्या के अभाव देखे थे , वो नायक की अपेक्षा अधिक सम्पन्न परिवार के युवा से नायिका का ब्याह तय करते हुए एकदम व्यवहारिक कदाचित निष्ठुर दुनियादार सी परिलक्षित होती है । 

नायिका खूबसूरत है सो उसे दूसरे गांव का धन संपन्न युवा पत्नी बतौर हासिल करना चाहता है ।  वो नायक जैसा सबल और देह दक्ष युवा तो है ही,  लेकिन उसे कथा के नायक पर धन संपन्नता का अग्रगण्य वर्चस्व हासिल है । धन , संभवतः कथा कालीन दिनों में भी सुरक्षित भविष्य की आश्वस्ति देता है जो नायिका की मां के फैसले का आधार बनता है । वो नायिका के अनुराग पर नायिका के भविष्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देती है गोया वो भी छोटी घाटी तुल्य नायिका के सामने दीर्घाकार पहाड़ बन गई हो , परिवार के बड़े पहाड़, निष्ठुर पहाड़ जहां नन्हे प्रेम के आर्तनाद मांद पड़ जाते हैं । यहां आख्यान दु:खांत प्रेम को संबोधित है जहां विरह अंतिम नियति है । अनुरक्त बेबसी , धनाधिक्य के सामने बेसबब है , नायक और  नायिका अंतिम बार मिल भी नहीं सके । वो दोनों एक दूसरे के कांधों में सिर रखकर अपना दर्द तक नहीं बांट पाए । मुमकिन है वो अनंत काल तक पहाड़ों के निष्ठुर सीनों में दु:ख की नदी की मानिंद बहते रहें पर उनके आंसू एक दूसरे को भिगो तक नहीं सके । उनमें अंतिम संवाद भी नहीं हुआ पर उनकी आहत सदाएं भटकती रहेंगी सदा सर्वदा...