5000 वर्ष ईसा पूर्व के ग्रीक-ओ-रोमन गल्प कहते हैं कि देवता एगडिस्टस धरती
पर, जुपिटर के बिखरे हुए शुक्राणुओं से जन्मा किन्तु देवताओं ने उसका बंध्याकरण कर
दिया, जिसके फलस्वरूप वो केवल देवी सायबेले के स्त्री रूप में ही शेष रह गया था ।
इस गल्प के समानांतर दूसरी गल्प कहती है कि एगडिस्टस, सायबेले का स्त्री पुरुष रूपेण,
समेकित अवतार था और उसके पौरुष के अंश, धरती पर गिरने से अखरोट का वृक्ष पैदा हुआ,
जिसके फल खाकर कुंवारी जलपरी नाना गर्भवती हुई और उसने एट्टिस को जन्म दिया, जिसे वनस्पतियों
और चरवाहों के फ्रीजियन देव के तौर पर स्वीकार किया गया । स्पष्ट है कि एट्टिस,
प्रकृति का देव था और उसका जन्म कुंवारी जलपरी नाना की कोख से देवी सायबेले के
पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अवतार एगडिस्टस के पौरुष अंशों से हुआ था और इस सांकेतिक अर्थ
में, एट्टिस को सायबेले का पुत्र भी माना जाएगा ।
इस आख्यान में अचंभित करने वाला कथन ये है कि अपने युवापन में एट्टिस और उसकी मातृस्वरूपा सायबेले, प्रेमी युगल माने गए हैं । इससे आगे बढ़कर, बेहद दिलचस्प, स्वभाविक, प्रसंग ये कि, कुछ समय के बाद, एट्टिस को अप्सरा सैग्रिटिस से प्रेम हो गया और वो उससे ब्याह करना चाहता था । एट्टिस की इस हरकत, कदाचित बेवफाई से, सायबेले अत्यधिक क्रोधित हो गई और उसकी क्रोधाग्नि से, एट्टिस विक्षिप्त हो गया । इसके उपरांत गल्प कथन ये है कि, एक तरफ अप्सरा सैग्रिटिस से प्रेम और ब्याह की आकांक्षा और दूसरी तरफ देवी सायबेले की क्रोधाग्नि, से बावले हो गए एट्टिस ने फर के एक दरख्त के नीचे खुद का बंध्याकरण कर लिया और काल के गाल में समा गया, उसके बहते, बिखरे खून से उस जगह एक जामुनी पुष्प, प्रथम नीलवर्णी फूल खिला ।
इस मिथक के अनुसार एगडिस्टस, उर्वरता की देवी सायबेले का पूर्ववर्ती, स्त्री पुरुष रूपी, समेकित संस्करण है, जो कि धरती पर बिखरे जुपिटर के शुक्राणुओं से जन्मा था लेकिन पिता जुपिटर की इस द्विलिंगीय गुण धर्म वाली संतान को अन्य देवताओं ने बंध्याकरण करके, देवी सायबेले के स्त्री-लिंगीय रूप तक सीमित कर दिया । इसी आख्यान का दूसरा संस्करण कहता है कि एगडिस्टस के शुक्राणुओं से अखरोट के दरख्त का आजन्म हुआ और उसका फल खाकर कुंवारी, जलपरी नाना, देवता एट्टिस को जन्म देती है , जो चरवाहों और वनस्पतियों का देवता है जबकि सायबेले उर्वरता की देवी है । इस कथा का यह सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि युवा एट्टिस अपनी मातातुल्य सायबेले का प्रेमी हो जाता है जिसे वर्तमान समय की यौन नैतिकता के मानदंड के हिसाब से सर्वथा अनुचित, माना जाएगा । हालांकि आख्यान कालीन समाज में इसे वर्जनाओं के दायरे में सम्मिलित नहीं किया गया है ।
सामान्य तौर पर एट्टिस और सायबेले के मध्य एक पीढ़ी का आयुगत फासला है ऐसे में स्वभाविक था कि एट्टिस सायबेले की तुलना में अप्सरा सैग्रिटिस की ओर आकर्षित हो जाता है और उससे ब्याह भी करना चाहता है । कथा को बाँचते हुए हम इसी मोड़ पर महसूस करते हैं सायबेले की सौतियाडाह , ईर्ष्या, बेवफाई के विरुद्ध क्रोध और प्रतिकार स्वरूप सामर्थ्य, शक्ति का आक्रामक, मारक प्रदर्शन । यूं तो देवता अमर माने जाते हैं पर इस आख्यान का नायक एट्टिस अतार्किकता की सीमा तक बदहवास हो चुका है और स्वयं के बंध्याकरण, सतत बहते हुए रक्त की परिणति स्वरूप मानवीय मृत्यु को स्वीकार करता है । अंततः कुंवारी मां जलपरी नाना का देवता पुत्र, उत्कर्ष और अमरता की सीढ़ियों से फिसलता हुआ पुनः वनस्पति, नील पुष्प हो जाता है । यह भी एक किस्म का प्रेम है जो नैतिक अनैतिक में भेद नहीं करता, प्रेम जो देवताओं में भी बहु-स्त्रीगामी है , प्रेम जो आसमान से गिरकर खजूर में नहीं अटकता बल्कि मिट्टी में मिल जाता है ।