मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

नानाबोझो की दुनिया...

उन दिनों जबकि धरती एकदम नई नकोर बनी थी, नानाबोझो ने अपने घर की खिड़की से बहते झरने की ओर देखा । वही सफ़ेद रंगत, हर शय सिर्फ सफ़ेद स्याह, वो हर रोज दिखते हुए, इन रंगों से उकता गया था ।  उसने कुछ नया करने की ठानी, सो अपने घर से अलग अलग रंगों की डिबिया और ब्रश लेकर घास के मैदान की ओर चल पड़ा । जमीन पर बैठकर उसने सबसे पहले घास को हरी रंगत में में रंग दिया फिर वायलेट को गहरी नील रंगत, टाइगर लिली को भूरे डाट्स के साथ नारंगी रंग में और गुलाबों को लाल, गुलाबी, पीले, बैगनी रंग, डाला, डेफ़ोडिल को पीले रंगों में रंग डाला और कुछेक फूल सफ़ेद भी छोड़े ।

यानि कि नानाबोझो की कल्पना जहां तक, जिस रंगत में उड़ती फिरी, फूलों की रंगत भी बदलती गई । इस काम में उसका भाई सूरज, चमकदार धूप के साथ उसकी मदद कर रहा था । उसने देखा कि दो ब्ल्यू बर्ड्स आसमान में ऊपर नीचे, दायें बायें, जिक जैग मंडरा रहीं थी, वो दूसरे के आगे पीछे उड़ती हुई नानाबोझो के करीब से गुज़रीं, उनमें से पहली का दायां पंख लाल रंग और दूसरी का बायां पंख नारंगी रंग में डूब गया । नानाबोझो ने उन्हें डांट लगाई पर वो पहले की तरह से खेलती रहीं, जल्द ही उनके पंख और पैर अनेकों रंगों में रंग गये । नानाबोझो ने अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर उन्हें दूर भगाने की कोशिश की ।

बेपरवाह ब्ल्यू बर्ड्स उड़ती हुई झरने की ओर जा पहुंचीं । पहली ब्ल्यू बर्ड झरने के ऊपर की धुंध में से गुज़री उसके ठीक पीछे दूसरी भी, नीचे ऊपर नीचे, झरने के एक छोर से दूसरे छोर तक, उनके ओस में भीगे पंखों से रंग बिखर रहे थे, इधर सूरज की रौशनी भी चमकदार थी । नानाबोझो पहले मुस्कराया, फिर बुदबुदाया, तुम दोनों ने खेल ही खेल में इन्द्र धनुष बना डाला । तब से आज तक नानाबोझो के घर के पास वाले झरने के ऐन ऊपर इन्द्र धनुष का स्थायी ठिकाना है और उसकी दुनिया खूबसूरत, रंगत वाले फूल पौधों, जानवरों, परिंदों से सज गई है...