इन दिनों बस्तर की चिंता में दुबले होने वाले काजियों की संख्या अचानक बढ़ गई है ! ये सभी अपने अपने उर्वर मस्तिष्क से तरह तरह फर्टिलाईजर्स के उत्पादन में जुटे हुए हैं ! यही नहीं सभी अपने फार्मूले से बस्तर के विकास और विनाश की कथाएँ बांच रहे हैं !
पिछले दिनों मैंने पूछा था कि " बस्तर को क्या मिला "और आश्चर्य नहीं कि बहुत कम लोगों नें उस पर टिप्पणी की ,गोया के सांप देख लिया हो ! बस्तर में लोटा लेकर आने वाले गैर आदिवासी करोड़पति(अरबपति भी ) हो चुके हैं ! लोकतंत्र के स्तंभों से वास्ता रखने वाले कई मित्र भी धन्नासेठों की श्रेणी में पहुँच चुके हैं !
मामला व्यक्तिगत उन्नति और बस्तर को निचोड़ने मात्र का नहीं है ! सत्ताएं भी बस्तर की बेशकीमती संपदाओं को दुहने में लगी हुई हैं ! अब वनधन हो ,भूमि में छुपी सम्पदाएँ हों याकि भूमि हो ,हर स्तर पर बस्तर का विनाश जारी है !
बस्तर का दुर्भाग्य है कि कथित बुद्धिजीवियों और लोकतंत्र के कथित स्तंभों की ईंटों /सीमेंट /फेविकोल्स /एरल्डाइट्स नें , अतीत कालीन भाटों या चारणों का चोला पहन लिया है राज्याश्रय की लालसा में अपनी बुद्धिजीविता को गिरवी रख दिया है !
वे आंख मूँद कर सत्ताओं की पैरोकारी (बेशर्मी की हद तक /तर्कहीन भी )में उतर आए हैं ! उन्हें नौकरशाही की हर प्रस्तुति ,विकास की गंगा ,जमुना और सरस्वती दिखाई देती है उन्हें आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच बढती आर्थिक खंदकें दिखाई नहीं देती हैं !
मैं अक्सर सोचता हूँ कि कहूं के ये लोग बस्तर को घुन की तरह चाट जायेंगे !
मित्र कहते हैं कि बस्तर को घुन लगा है कि ... इंसानी पैरासाइट्स ने जकड रक्खा है !

5 टिप्पणियाँ:
माई कृपा से बस्तर का कुछ नहीं बिगडेगा । नौकरशाह आते जाते रहेंगे ।
बस्तर की हालत बदतर होती जा रही है । मुद्दा चिन्तनीय है ।
बस्तर जितना खूबसूरत है उसकी किस्मत उतनी शानदार नहीं है ।
बस्तर के विषय में आपके अनुभव काफी तल्ख़ लगते हैं ! यदि कोई उपाय है तो सुझाएँ कि बेलगाम नौकरशाही का क्या तोड़ है ! अथवा शोषकों से कैसे निपटें ! आप जो भी लिखते हैं अच्छा लगता है !
आप सबकी टिप्पणियों के लिए धन्यवाद
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